नरसिंह स्तुति
नृसिंह रूपधारी भगवान विष्णु का यह
प्रह्लादकृत नरसिंह स्तुति श्रीविष्णुपुराण के प्रथमांश अध्याय-२० के श्लोक ९-१३
में वर्णित है। इसके पाठ से मनुष्य राज्यलक्ष्मी, बहुत से पुत्र पौत्रादि तथा परम ऐश्वर्य पाकर, कर्माधिकार
के क्षीण होनेपर पुण्य-पाप से रहित हो भगवान का ध्यान करते हुए उनके परम निर्वाणपद
प्राप्त करता है। पूर्णिमा, अमावास्या, अष्टमी अथवा द्वादशी को इसे पढने से मनुष्य को गोदान का फल मिलता है । जिस
प्रकार भगवान ने प्रल्हादजी की सम्पूर्ण आपत्तियों से रक्षा की थी उसी प्रकार वे
सर्वदा उसकी भी रक्षा करते हैं।
नरसिंह स्तुति:
Narasingh stuti
श्रीविष्णुपुराण प्रह्लादकृत नरसिंह स्तुति
नरसिंह स्तुति श्रीविष्णुपुराणे
प्रह्लादकृता
नरसिंहस्तुति
प्रह्लाद उवाच
ऊँ नमः परमार्थार्थ स्थूलसूक्ष्मक्षराक्षर
।
व्यक्ताव्यक्त कलातीत सकलेश
निरंञ्जन ।। ९ ।।
प्रह्लादजी कहने लगे ;–
हे परमार्थ ! हे अर्थ (दृश्यरूप ) ! हे स्थूलसूक्ष्म
(जाग्रत-स्वप्रदृश्यस्वरूप) ! हे क्षराक्षर (कार्य-कारणरूप ) हे व्यक्ताव्यक्त
(दृश्यादृश्यस्वरूप ) ! हे कलातीत ! हे सकलेश्वर ! हे निरंजन देव ! आपको नमस्कार
है।
गुणाञ्जन गुणाधार निर्गुणात्मन्
गुणस्थिर ।
मूर्त्तामूर्त्त महामूर्त्ते
सूक्ष्ममूर्त्ते स्फुटास्फुट ।। १० ।।
हे गुणों को अनुरंजित करनेवाले ! हे
गुणाधार ! हे निर्गुणात्मन ! हे गुणस्थित ! हे मूर्त और अमूर्तरूप महामुर्तिमान !
हे सूक्ष्ममूर्ते ! हे प्रकाशाप्रकाशस्वरुप ! (आपको नमस्कार है ] ।
करालसौम्यरूपात्मन्
विद्याविद्यालयाच्युत ।
सदसद्रूप सद्भाव सदसद्भावभावन ।। ११
।।
हे विकराल और सुंदररूप ! हे विद्या
और अविद्यामय अच्युत ! हे सदसत् (कार्यकारण) रूप जगत के उद्भवस्थान और सदसज्जगत के
पालक ! (आपको नमस्कार है ] ।
नित्यानित्यप्रपञ्जात्मन्
निष्प्रपञ्चामालश्रित ।
एकानिक नमस्तुभ्यं वासुदेवादिकारण
।। १२ ।।
हे नित्यानित्य (आकाशघटादिरूप )
प्रपंचात्मन ! हे प्रपंच से पृथक रहनेवाले हे ज्ञानियों के आश्रयरूप ! हे
एकानेकरूप आदिकारण वासुदेव ! (आपको नमस्कार है ] ।
यः स्थूलसूक्ष्मः प्रकटः प्रकाशो
यःसर्व्भूतो न च सर्व्वभूतः ।
विश्वं यतश्चैतदविश्वहेतो
र्नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ।।
१३ ।।
जो स्थूल-सूक्ष्मरूप और
स्फुट-प्रकाशमय है, जो अधिष्ठानरूप से
सर्वभूतस्वरूप तथापि वस्तुत: सम्पूर्ण भूतादि से परे है, विश्व
के कारण न होने पर भी जिनसे यह समस्त विश्व उत्पन्न हुआ है, उन
पुरुषोत्तम भगवान् को नमस्कार है ।
इति श्रीविष्णुपुराणे प्रथमांऽशे विशोऽध्याय प्रह्लादकृता नरसिंह स्तुति समाप्त।।

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