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बृहस्पतिमंगल स्तोत्रं

बृहस्पतिमंगल स्तोत्रं

बृहस्पतिमंगल स्तोत्रं देवगुरु बृहस्पति को समर्पित एक शक्तिशाली स्तुति है, इसका पाठ करने से विशेषकर बृहस्पति से जुड़ी बाधाओं, ज्ञान, धर्म, शुभता, समृद्धि, सौभाग्य, सफलता और सभी बाधाओं का नाश होता है।

बृहस्पतिमंगल स्तोत्रं

बृहस्पति मङ्गलम् स्तोत्र

बृहस्पति सूर्य से पाँचवाँ और हमारे सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। यह मुख्य रूप से एक गैस पिंड है जिसका द्रव्यमान सूर्य के हजारवें भाग के बराबर तथा सौरमंडल में मौजूद अन्य सात ग्रहों के कुल द्रव्यमान का ढाई गुना है। बृहस्पति को शनि, अरुण और वरुण के साथ एक गैसीय ग्रह के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसे रात्रि में नंगी आंखों से देखा जा सकता है।

यह ग्रह प्राचीन काल से ही खगोलविदों द्वारा जाना जाता रहा है तथा यह अनेकों संस्कृतियों की पौराणिक कथाओं और धार्मिक विश्वासों के साथ जुड़ा हुआ था। रोमन सभ्यता ने अपने देवता जुपिटर के नाम पर इसका नाम रखा था। इसे जब पृथ्वी से देखा गया, बृहस्पति -२.९४ के सापेक्ष कांतिमान तक पहुँच सकता है, छाया डालने लायक पर्याप्त उज्जवल, जो इसे चन्द्रमा और शुक्र के बाद आसमान की औसत तृतीय सर्वाधिक चमकीली वस्तु बनाता है। (मंगल ग्रह अपनी कक्षा के कुछ बिंदुओं पर बृहस्पति की चमक से मेल खाता है)।

बृहस्पति एक चौथाई हीलियम द्रव्यमान के साथ मुख्य रूप से हाइड्रोजन से बना हुआ है और इसका भारी तत्वों से युक्त एक चट्टानी कोर हो सकता है।अपने तेज घूर्णन के कारण बृहस्पति का आकार एक चपटा उपगोल (भूमध्य रेखा के पास चारों ओर एक मामूली लेकिन ध्यान देने योग्य उभार लिए हुए) है। इसके बाहरी वातावरण में विभिन्न अक्षांशों पर कई पृथक दृश्य पट्टियां नजर आती है जो अपनी सीमाओं के साथ भिन्न भिन्न वातावरण के परिणामस्वरूप बनती है। बृहस्पति के विश्मयकारी 'महान लाल धब्बा' (Great Red Spot), जो कि एक विशाल तूफ़ान है, के अस्तित्व को १७ वीं सदी के बाद तब से ही जान लिया गया था जब इसे पहली बार दूरबीन से देखा गया था। यह ग्रह एक शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र और एक धुंधले ग्रहीय वलय प्रणाली से घिरा हुआ है। बृहस्पति के कम से कम ७९(२०१८ तक) चन्द्रमा है। इनमें वो चार सबसे बड़े चन्द्रमा भी शामिल है जिसे गेलीलियन चन्द्रमा कहा जाता है जिसे सन् १६१० में पहली बार गैलीलियो गैलिली द्वारा खोजा गया था। गैनिमीड सबसे बड़ा चन्द्रमा है जिसका व्यास बुध ग्रह से भी ज्यादा है। यहाँ चन्द्रमा का तात्पर्य उपग्रह से है।

बृहस्पति का अनेक अवसरों पर रोबोटिक अंतरिक्ष यान द्वारा, विशेष रूप से पहले पायोनियर और वॉयजर मिशन के दौरान और बाद में गैलिलियो यान के द्वारा, अन्वेषण किया जाता रहा है। फरवरी २००७ में न्यू होराएज़न्ज़ प्लूटो सहित बृहस्पति की यात्रा करने वाला अंतिम अंतरिक्ष यान था। इस यान की गति बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण का इस्तेमाल कर बढाई गई थी। इस बाहरी ग्रहीय प्रणाली के भविष्य के अन्वेषण के लिए संभवतः अगला लक्ष्य यूरोपा चंद्रमा पर बर्फ से ढके हुए तरल सागर शामिल हैं। इसके उपग्रहों की संख्या ७९ है।

बृहस्पति अर्थात् गुरु के पूजन पर बृहस्पतिमङ्गलस्तोत्रम् का पाठ करें तथा निम्न बृहस्पति मंत्र का जप करें-

ॐ बृं बृहस्पतये नमः॥

बृहस्पतिमङ्गलस्तोत्रम्

Brihaspati mangalam stotra

बृहस्पतिमंगलम् स्तोत्रम्

॥ अथ बृहस्पति मङ्गल स्तोत्र ॥

जीवश्चाङ्गिरगोत्रजोत्तरमुखो दीर्घोत्तरासंस्थितः ।

पीतोऽश्वत्थसमिद्धसिन्धुजनितश्चापोऽथ मीनाधिपः ॥ १॥

अंगिरा के वंशज 'जीव' (बृहस्पति), उत्तर दिशा की ओर मुख किए हुए, लंबी दाढ़ी वाले, पीले रंग के, अश्वत्थ (पीपल) की लकड़ी से बने धनुष धारण किए हुए (धनुर्धर), और मीन राशि के स्वामी हैं, जो ज्ञान और शुभता के प्रतीक हैं।

सूर्येन्दुक्षितिजप्रियो बुधसितौ शत्रूसमाश्चापरे ।

सप्ताङ्कद्विभवः शुभः सुरगुरुः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥ २॥

इसके सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध और शुक्र मित्र हैं, जबकि अन्य शत्रु; , २ और ११वें भावों (स्थानों) में शुभ फल देनेवाले ऐसे बृहस्पतिदेव सदा मंगल (कल्याण) करें।

प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।

पूजां नैव हि जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥ १॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।

यत् पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ २॥

हे बृहस्पति देव! भक्तिहीन मैं आपका मंत्र, आवाहन, पूजन, क्रिया, विसर्जन कुछ भी नहीं जानता हूं, अतः कृपा करके मेरी समस्त अपराधों को क्षमा कर दें और मेरी पूजन को पूर्णता प्रदान करें।

वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः ज्ञानविज्ञानपारग ।

विबुधार्तिहरो नित्यं देवाचार्य नमोऽस्तुते ॥ ३॥

वेदों और शास्त्रों के वास्तविक अर्थ को जानने वाले, ज्ञान (शास्त्र ज्ञान) और विज्ञान (व्यावहारिक ज्ञान) में निपुण, देवताओं के कष्टों को हरने वाले,देवताओं के गुरु (बृहस्पति) आपको नमस्कार है।

ॐ अनया पूजया वृहस्पतिदेवः प्रीयताम् ।

ॐ वृहस्पतये नमः ॐ जीवाय नमः ॐ सुराचार्याय नमः ।

 ॥ ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ ॥

इति श्रीबृहस्पतिमङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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