षट्कर्म कवच

षट्कर्म कवच

क्रियोड्डीश महातन्त्रराज के पटल १४ में वर्णित माँ भद्रकाली के षट्कर्म कवच का पाठ करने मात्र से साधक के सारे शत्रुओं का नाश अवश्य ही हो जाता है इसमें संशय नहीं है।

षट्कर्म कवच

षट्कर्म कवचम्

Shatkarma kavach

शत्रुमर्दन षट्कर्म कवच

भद्रकाली कवचं

षट्कर्मणां कवचं शत्रुमर्दनम्

श्रीदेव्युवाच

श्रुतं वटुकमाहात्म्यं पूर्णविस्मयकारकम् ।

इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं वै षट्कर्मणाम् ।।१।।

शत्रुसंहारक षट्कर्म कवच - श्री देवी जी ने कहा- हे प्रभु! विस्मयकारक बटुक माहात्म्य का मैंने श्रवण किया। अब मेरी इच्छा षट्कर्म कवच श्रवण करने की है। कृपा करिये आप उसे कहिये ॥ १ ॥

श्रीश्वर उवाच

शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।

श्रवणात् पठनाद्वापि शत्रुनाशाय तत्क्षणात् ।। २ ।।

श्री ईश्वर ने कहा- हे देवि ! श्रवण करो; तुम्हारी प्रसन्नता हेतु : षट्कर्मकवच का वर्णन करता हूँ। इस कवच का श्रवण करने अथवा पाठ कर से शत्रु का नाश होता है ॥ २ ॥

श्रीदेव्युवाच

त्रैलोक्यमोहनार्थं तु कवचं मे प्रकाशय ।

त्रैलोक्यशत्रु संहन्तु नाशितं यत्क्षमं भवेत् ॥ ३ ॥

एवमुक्तो महादेवः क्रुद्धो भूत्वा जगत्पतिः ।

देवीं प्रबोधयामास वाक्येनामृतवर्षिणा । । ४ । ।

श्रीदेवी जी ने कहा- हे प्रभु! त्रैलोक्यमोहन हेतु कवच का वर्णन करें, जिस कवच के पाठमात्र से तीनों लोक के शत्रु नष्ट हो जाते हैं। देवी पार्वती के वचन सुनकर भगवान् शिव क्रोधित होकर उन्हें अमृतवर्षिणी वाणी से समझाने लगे।।३-४॥

श्रीमहादेव उवाच

परानिष्टे महादेवि ! कुतस्ते जायते मतिः ।। ५ ।।

श्री महादेव ने कहा- हे महादेवि ! दूसरों के प्रति आपके मन में अनिष्ट की भावना किस प्रकार उत्पन्न हो गयी ? ॥५॥

श्रीदेव्युवाच

जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत् ।

ये यथा मां प्रपद्यन्ते श्रुतिरस्ति पुरातनी ।। ६ ।।

यदि ते वर्तते देव दया हि कथ्यतां मयि ।

शत्रूणां प्राणनाशार्थमुच्चाटन वशीकृतौ ।। ७ ।।

तेषां हि बलनाशार्थं सर्वदा प्रयता नराः ।।८।।

श्रीदेवीजी ने कहा- हे प्रभु! श्रुति का ऐसा वचन है कि जो मारने योग्य हो, उसे अवश्य ही मारना चाहिये। उसे मारने से ब्रह्महत्यादि का दोष नही लगता । हे भगवन्! यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो शत्रुप्राणनाशक उच्चाटन तथा वशीकरण आदि कर्मों को मुझसे कहिये; क्योंकि मनुष्य शत्रु बलनाशहेतु अनेक उपाय किया करते हैं ।। ६-८ ।।

ईश्वर उवाच

शृणु देवि ! महाभागे ! कालाग्निप्राणवल्लभे ।

यस्य धारणमात्रेण शत्रूणां नाशनं भवेत् ।। ९ ।।

धृत्वा तु पादमूलेन स्पृष्ट्वा दास इवाकरोत् ।

शरणागतमात्रन्तु नाशितुं नैव शक्यते ।। १० ।।

शृणु देवि! महाभागे सावधानावधारय ।

शत्रूणां प्राणनाशार्थं कुपितः काल एव सः ।। ११ । ।

श्री शिवजी ने कहा- हे देवि! हे महाभागे ! हे कालाग्निप्राणवल्लभे ! श्रवण करो। जिसके धारण करने मात्र से शत्रु का नाश हो जाता है, उस कवच का श्रवण करो। पैर के मूल में इस कवच को धारण करके शत्रु का स्पर्श करने पर शत्रु दास की भाँति सदैव आज्ञा पालन करता रहता है। उस शरणागत की नाश करने की आवश्यकता नहीं है। हे देवि ! हे महाभागे ! सावधान होकर श्रवण करो। शत्रु के नाश हेतु यह कवच कुपित काल के समान है।।९-११।।

दशवक्त्रा दशभुजा दशपादाञ्जनप्रभा ।

कोटिसूर्यप्रभा काली मम शत्रून् विनाशय ।

नाशयित्वा क्षणं देवि अन्यशत्रून् विनाशय ।। १२ ।।

क्रीं क्रीं क्रीं उग्रप्रभे विकटदंष्ट्रे परपक्षं मोहय मोहय पच पच मथ मथ दह दह हन हन मारय मारय ये मां हिंसितुमुद्यता योगिनीचक्रैस्तान् वारय वारय छिन्धि छिन्धि भिन्धि भिन्धि करालिनि गृह्णगृह्ण ओं क्रीं क्रीं क्रीं क्रीं स्फूर स्फूर पूर पूर पून पून चूल्व चूल्व धक धक धम धम मारय मारय सर्वजगद्वशमानय ओं नमः स्वाहा।

जिनके दस मुख, दस भुजाएँ और दस पैर हैं, नीलमणि के समान जिनकी उज्ज्वल प्रभा है और करोड़ों सूर्यों के समान जो दीप्तिमान है वह माँ काली मेरे सभी शत्रुओं को क्षणभर में ही नाश करें।

यह भद्रकाली कवच है। शत्रुनाश के लिये इसी का पाठ करना चाहिये ॥ १२ ॥

षट्कर्म भद्रकाली कवच महात्म्य  

इति ते कवचं देवि ! भद्रकाल्या प्रचोदितम् ।

भूर्जे विलिखितचैतत् स्वर्णस्थं धारयेद्यदि ।। १३ ।।

शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा धारयेद्यदि ।

त्रैलोक्यं मोहयेत्क्रोधात्त्रैलोक्यं चूर्णयेत्क्षणात् ।। १४ । ।

पुत्रवान्धनवान्धीमान् नानाविद्यानिधिर्भवेत् ।

ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद्द्वात्रस्पर्शनात्ततः ।। १५ ।।

शत्रवो नाशमायान्ति रजतेन प्रधारितम् ।

मासमात्रेण शत्रूणां महविपदकारणम् ।। १६ ।।

यं यं शत्रुं स्मरन्मर्त्यः कवचं पठति ध्रुवम् ।

तं तं नाशयते सद्यस्तथ्यं ते तद्वदाम्यहम् ।।१७।।

धारणे भजते शत्रुः कण्ठशोषं सदा भवेत् ।

हृत्कम्पों जायते तावद्यावत्तस्य कृपा न चेत् ।। १८ ।।

हे देवि ! इस प्रकार भद्रकाली कवच को तुमसे कहा। यदि इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर स्वर्ण से वेष्टित कर शिखा, दाहिनी भुजा एवं कण्ठ धारण किया जाय तो साधक तीनों लोकों को मोहित कर सकता है तथा अपने क्रोध से क्षण भर में ही तीनों लोकों का नाश भी कर सकता है। साथ ही पुत्रार्थी पुत्र को, धनार्थी धन को एवं विद्यार्थी अनेक प्रकार की विद्याओं को प्राप्त सकता है। इस कवच को उक्त विधि से लिखकर चांदी के ताबीज में पूर्वोक्त अंग पर धारण किया जाय तो उस साधक के शरीर के स्पर्श मात्र से ही ब्रह्मास्त्रादि शस्त्र शत्रु का नाश कर देते हैं। इसके अनुष्ठान के एक महीने पूर्व ही शत्रु महाविपति से ग्रस्त हो जाता है। साधक जिस-जिस शत्रु का स्मरण कर इस कवच का पाठ करता है, उस उस व्यक्ति का नाश अवश्य ही हो जाता है। शत्रु का ध्यान कर यदि इस कवच को स्वयं के गले में धारण किया जाय तो शत्रु का कण्ठ सूखने लगता है तथा शरीर कांपने लगता है और जब तक देवी भद्रकाली की कृपा न हो तब तक वह कांपता ही रहता है ।। १३-१८॥

इति श्रीक्रियोड्डीशे महातन्त्रराजे षट्कर्मणां कवचं शत्रुमर्दनम् चतुर्दशः पटलः ।। १४ ।।

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