कामकलाकाली खण्ड षष्ठ पटल

कामकलाकाली खण्ड षष्ठ पटल     

महाकालसंहिता कामकलाकाली खण्ड षष्ठपटल शेष भाग में कामकाली के खड्गसिद्धि का वर्णन करने के पश्चात् खड्ग के लिये बलिदान आदि का उल्लेख है । सिद्धाञ्जन की सिद्धि गुटिका सिद्धि गुटिका के लिये प्रयोज्य कुम्भ तथा बलिदान, कुम्भरक्षा के पश्चात् गुटिका धारण करना मन्त्र एवं उसके प्रभाव का विस्तृत वर्णन कर तालबेताल को सिद्ध करने की प्रक्रिया का वर्णन है। अन्त में इस सिद्धि के लिये नरबलि के मन्त्र का वर्णन कर इसके फल का चर्चा की गयी है ।

कामकलाकाली खण्ड षष्ठ पटल

महाकालसंहिता कामकलाकाली खण्ड पटल ६     

Mahakaal samhita kaam kalaa kaali khanda patal Six

महाकालसंहिता कामकलाकालीखण्ड: षष्ठः पटल:

महाकालसंहिता कामकलाखण्ड षष्ठ पटल

महाकालसंहिता कामकलाकालीखण्ड छटवाँ पटल

महाकालसंहिता

कामकलाखण्ड:

(कामकलाकालीखण्ड :)

षष्ठः पटल:

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – देव्यै खड्गसमर्पणमन्त्रः  

वक्ष्यमाणेन मन्त्रेण दैव्यै खड्गं समर्पयेत् ।

वेदादिवाग्भवक्रोधमेघविद्युद्रमार्णकान् ॥ १०१ ॥

उच्चार्य घोरनादे च दंष्ट्राविकट इत्यपि ।

मुखमण्डन उच्चार्य महाघोर इतीरयेत् ॥ १०२ ॥

तथा घोरतरे चैव महाशब्दाद् भयङ्करे ।

श्मशानवासिनीत्युक्त्वा योगिनीडाकिनीपदम् ॥ १०३ ॥

ततः परिवृते प्रोच्य कल्पान्तेति पदं लिखेत् ।

कालानल निगद्यैव विकराल इतीरयेत् ॥ १०४ ॥

दुर्निरीक्ष्य ततो रूपे दशानां युगकं वदेत् ।

गर्ज विध्वंसय च्छिन्धि दम मर्दय पातय ॥ १०५ ॥

उच्छादय क्षोभय च मारय द्रावयेत्यपि ।

ततो वदेदिमं खड्गं देहि मेऽग्न्यङ्गनायुतः ॥ १०६ ॥

खड्गसमर्पण - मन्त्र - वक्ष्यमाण मन्त्र से देवी को वह खड्ग समर्पित करे । ( मन्त्र इस प्रकार है- ) वेदादि, वाग्भव, क्रोध, मेघ, (=क्लौं), विद्युत् (= ब्लौं), रमा बीजों का उच्चारण कर 'घोरनादे दंष्ट्राविकटे मुखमण्डने' का उच्चारण कर 'महाघोरे' कहना चाहिये । उसी प्रकार 'घोरतरे महाभयङ्करे श्मशानवासिनि' कहकर 'योगिनीडाकिनीपरिवृते' कहे। उसके बाद 'कल्पान्तकालानलविकराले' का कथन करना चाहिये । ततः 'दुर्निरीक्ष्यरूपे' कहने के बाद 'गर्ज विध्वंसय छिन्धि दम मर्दय पातय उच्छादय क्षोभय मारय द्रावय इन दशपदों का दो-दो बार उच्चारण करे । इसके बाद 'इमं खड्गं देहि में' कहने के साथ अग्न्यङ्गना कहे । ( इस प्रकार मन्त्र का स्वरूप यह होगा - ॐ ऐं हूं क्लौं ब्लौं श्रीं घोरनादे दंष्ट्राविकटे मुखमण्डने महाघोरे घोरतरे महाभयङ्करे श्मशानवासिनि योगिनीडाकिनीपरिवृते कल्पान्तकालानलविकराले दुर्निरीक्ष्यरूपे गर्ज गर्ज विध्वंसय विध्वंसय छिन्धि छिन्धि दम दम मर्दय मर्दय पातय पातय उच्छादय उच्छादय क्षोभय क्षोभय मारय मारय द्रावय द्रावय इमं खड्गं देहि मे स्वाहा ।। १०१-१०६ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – खड्गस्य बलिदानविधिः

ततः स्वगात्ररुधिरं देव्यै दद्यान्नृपो बलिम् ।

ततो दद्यान्नरबलिमभावे महिषायुतम् ॥ १०७ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – खड्गस्य कृते देव्या अनुज्ञाप्रार्थनम्

देवि कामकलाकालि सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि ।

देहि खड्गं भगवति त्रिलोकीविजयाय मे ॥ १०८ ॥

एवं गृहीत्वानुज्ञां वै हस्ते संलाप्य यत्नतः ।

अङ्कोलीतैलमुच्चण्डं गृह्णीयान्मन्त्रमुच्चरन् ॥ १०९ ॥

बलिदान एवं अनुज्ञा - इसके बाद राजा अपने शरीर के रक्त की बलि दे । इसके बाद नरबलि दे । (नरबलि के अभाव में महिष की बलि दे । (बलिदान के बाद अनुज्ञा के लिये कहे कि ) हे भगवति! त्रैलोक्य के विजय के लिये खड्ग प्रदान करो। इस प्रकार अनुज्ञा प्राप्त कर अपने हाथ में अङ्कोल के तेल का अधिक से अधिक लेप कर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करता हुआ साधक खड्ग ग्रहण करे ।। १०७-१०९ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – खड्गमुष्टौत्सरुनिवेशनमन्त्रः

करवाल महाराज सर्वदेवधृत प्रभो ।

कालनेमिवधे त्वं हि विष्णुना विधृतः पुरा ॥ ११० ॥

नन्दकेति ततः सञ्ज्ञां सम्प्राप्तस्त्वं जगत्प्रभो ।

इन्द्रेण जम्भसङ्ग्रामे धृतस्त्वं क्रथनोऽभवः ॥ १११ ॥

दुर्गया दुर्गसङ्ग्रामे यदा त्वं विधृतो ह्यभूः ।

विद्युत्पातेति सञ्ज्ञां त्वमवाप्तस्तत्क्षणे विभो ॥ ११२ ॥

सर्वैर्देवगणैः सार्धं जायमाने महाहवे ।

रावणेन धृतः पूर्वं चन्द्रहासस्त्वमप्यभूः ॥ ११३ ॥

त्रैलोक्यविजयार्थं हि त्वमिदानीं मया धृतः ।

वज्रघात इतीयं ते सञ्ज्ञा देव मया कृता ॥ ११४ ॥

एवं मन्त्रं समुच्चार्य त्सरुं मुष्टौ निवेशयेत् ।

स नग्न एव तिष्ठेद्धि यावदिच्छं महात्मनः ॥ ११५ ॥

उच्चारणीय मन्त्र - 'हे करवाल महाराज! समस्त देवताओं के द्वारा धारण किये जाने वाले भगवन् ! प्राचीनकाल में कालनेमि के वध के समय विष्णु ने आपको धारण किया था। हे जगत्प्रभो! उस समय आपने नन्दक नाम प्राप्त किया। जम्भासुर के साथ सङ्ग्राम के समय इन्द्र ने तुमको धारण किया और तुम क्रथन ( नाम वाले) हो गये । दुर्गासुर के सङ्ग्राम में जब तुम्हारा धारण दुर्गा ने किया तो तुम विद्युत्पातकी सञ्ज्ञा प्राप्त किये। देवताओं के साथ होने वाले महायुद्ध में रावण ने धारण किया तो तुम चन्द्रहास हो गये। इस समय मैंने त्रैलोक्यविजय के लिये तुम्हारा धारण किया है । हे देव! मैंने तुम्हारा नाम वज्रघात रखा है ।' इस प्रकार मन्त्र का उच्चारण कर साधक को उसकी मुठिया अपनी मुट्ठी में लेनी चाहिये । योगी साधक जब तक चाहे (खड्ग को नङ्गा रखे और स्वयं भी) नग्न पड़ा रहे ।। ११०-११५ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – अस्य खड्गस्य फलश्रुतिः

एवं खड्गमुपादाय यत्र युद्धे व्रजत्यसौ ।

जयस्तत्र भवेदस्य नात्र कार्या विचारणा ॥ ११६ ॥

साधकेन तु कर्तव्या केवलं चालनक्रिया ।

स्वयमेव कृपाणोऽयं शातयत्याशु वैरिणः ॥ ११७ ॥

यत्र यत्रैव पतति वज्रघातोऽसिपुङ्गवः ।

केवलं तत्र तत्रैव पतत्यशनिरेव हि ॥ ११८ ॥

एकतो वज्रघातोऽयमेकतो वीरकोटयः ।

द्रष्टुमेव न शक्तास्ते किं पुनर्योद्धुमाहवे ॥ ११९ ॥

तत्कृपाणकरं ये ये पश्यन्ति रणमध्यगाः ।

ते ते चक्षुर्मुद्रयित्वा तत्रैव निपतन्त्यधः ॥ १२० ॥

वज्रघातप्रभावोऽयं वर्णितुं नैव शक्यते ।

तथापि किञ्चिच्चापल्यात् कथितं देवि तेऽग्रतः ॥ १२१ ॥

खड्गसिद्धिफलइस प्रकार के खड्ग को लेकर वह (=युयुत्सु साधक) जिस युद्ध में जाता है उसमें उसकी विजय होती है। इसमें विचार नहीं करना चाहिये । साधक खड्ग का केवल चालन करे। यह कृपाण स्वयं शत्रुओं को शीघ्र काट डालता है। यह वज्रघात नामक श्रेष्ठ खड्ग जहाँ-जहाँ गिरता है वहाँ वहाँ वज्रपात ही होता है। एक ओर यह वज्रघात और एक ओर करोड़ों वीर । वे इस खड्ग को देख भी नहीं सकते और रणक्षेत्र में युद्ध करने की क्या बात । जो-जो रणबांकुरे उस कृपाण को देखते हैं वे आँख बन्द कर उसी युद्ध क्षेत्र में नीचे गिर पड़ते हैं । वज्रघात के इस प्रभाव का वर्णन करना सम्भव नहीं फिर भी हे देवि ! चञ्चलता कारण तुम्हारे आगे कुछ कह दिया गया ।। ११६ १२१ ॥

निशुम्भशुम्भसङ्ग्रामे देव्या चायं धृतः पुरा ।

ततो देवासुरे युद्धे बलिना बलिना धृतः ॥ १२२ ॥

रक्षोवानरसङ्ग्रामे ततो रावणिना धृतः ।

निवातकवचाख्यानाः कालकेयाभिधास्तथा ॥ १२३ ॥

देवानामप्यवध्या ये हिरण्यपुरवासिनः ।

नवत्यर्बुदषट्खर्वनिखर्वशतसम्मिताः ।। १२४ ॥

वज्रघातप्रसादेन तेऽर्जुनेन जिताः पुरा ।

वीरभद्रं समाराध्य सौप्तिकानीकचारिणा ॥ १२५ ॥

द्रौणिना निशि धृत्वैनमवशिष्टा निपातिताः ।

प्राचीनकाल में शुम्भ निशुम्भ के सङ्ग्राम में देवी ने इसको धारण किया था । इसके बाद देवासुरसङ्ग्राम में बलवान् बलि ने भी इसको धारण किया था। राक्षसों और वानरों के सङ्ग्राम में मेघनाद ने इसे धारण किया। निवातकवच और कालकेय नाम वाले राक्षस जो कि हिरण्यपुर में निवास करते थे और देवताओं के भी अवध्य थे, जिनकी सङ्ख्या ९० अर्बुद ६ खर्व और १०० निखर्व थी, वज्रघात की कृपा से अर्जुन द्वारा जीत लिये गये। सौप्तिक सेना में सञ्चरण करने वाले महारथी अश्वत्थामा ने वीरभद्र की आराधना कर रात्रि में इसको धारण किया और शेष शत्रुओं का नाश कर दिया ।। १२२-१२६ ।।

यावच्छत्रुबलं सर्वं न निःशेषं भवेत् प्रिये ॥ १२६ ॥

तावन्मुष्टिन च्यवति कराप्रादिति निश्चितम् ।

खड्गसिद्धिमिमां श्रुत्वा समरे विजयो भवेत् ॥ १२७ ॥

हे प्रिये! जब तक समस्त शत्रुबल नि:शेषता के चरणों में नहीं लोटने लगता तब तक इसकी मुठिया हाथ से नहीं छूटती यह निश्चित है । (मनुष्य) इस खड्ग-सिद्धि को सुनकर समर में विजयी होता है ।। १२६-१२७ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – अञ्जनप्रयोगविधिः  

अथाञ्जनप्रयोगं ते प्रवक्ष्यामि वरानने ।

येनाञ्जितो निधिं पश्येदेनं कश्चन नेक्षते ॥ १२८ ॥

भौमवाराप्तपञ्चत्वसूतिकाबालखर्परम् ।

समानीय श्मशाने तु कञ्जलं तत्र पातयेत् ॥ १२९ ॥

नवनीतं भक्षयित्वा कृष्णमार्जारकं सदा ।

तद्वान्तं तत्समादाय राजीवार्कस्य तन्तुना ॥ १३० ॥

खञ्जरीटस्य गरुता सार्द्धं वर्त्ति प्रकल्पयेत् ।

ततस्तत्कज्जलं नीत्वा शनिवारे निमन्त्रयेत् ॥ १३१ ॥

प्रातर्देव्यै समर्प्यथ मन्त्रेणानेन चाञ्जयेत्

अञ्जन- प्रयोग हे वरानने ! अब तुमको अञ्जन-प्रयोग बतलाऊँगा । इस अञ्जन को आँख में लगाने वाला (व्यक्ति भूमि के अन्दर निहित ) खजाने को देख लेता है किन्तु इस (व्यक्ति) को कोई भी नहीं देख पाता । मङ्गलवार को किसी प्रसूता के मरे हुए बालक की खोपड़ी को श्मशान भूमि में ले जाकर उसमें कज्जल बनाये । काली बिल्ली मक्खन (नवनीत) को खाने के बाद वमन कर दे तो उस वान्त की राजीवाक (=राया मछली) के तन्तु (नस) और खञ्जरीट के गरुत् (= पङ्ख) को मिलाकर बत्ती बनाये। इसके बाद उस कज्जल को शनिवार के दिन अभिमन्त्रित करे । प्रातःकाल देवी को समर्पित कर साधक निम्नलिखित मन्त्र को पढ़ते हुए उसे आँख में आँजे ॥ १२८-१३२ ।।

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – अञ्जनसिद्धयर्थं मन्त्रजपविधिः

वाग्भवं कामलं क्रोधं भूतबीजमथोच्चरेत् ॥ १३२ ॥

निगद्य सर्वसिद्धीति दायिनीति पदं वदेत् ।

मा मां पश्यन्तु चोद्धृत्य सर्वाभूतानि चोच्चरेत् ॥ १३३ ॥

स्वाहान्तं मन्त्रमुल्लिख्याञ्जयेन्नेत्रेऽविचारयन् ।

मन्त्र वाग्भव कमला क्रोध भूत बीजों का उच्चारण करे। इसको कहकर सर्वसिद्धिदायिनि मा मां पश्यन्तु' कहकर 'सर्वभूतानि' कहे। अन्त में 'स्वाहा' कहे ( मन्त्र का स्वरूप - ऐं श्रीं हूं स्फ्रें सर्वसिद्धिदायिनि मा मां पश्यन्तु सर्वभूतानि स्वाहा ) इस मन्त्र को कहकर नेत्रों में बिना किसी सन्देह के अञ्जन लगाये ॥। १३२-१३४ ।।

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – अञ्जनसिद्धिफलश्रुतिः

नैनं पश्यन्ति भूतानि नैनं पश्यन्ति मानुषाः ॥ १३४ ॥

नैनं पश्यन्ति गीर्वाणा न नागा नासुराः खगाः ।

अयं पश्यति भूतानि परमाणुसमान्यपि ॥ १३५ ॥

निधिं भूमितलगतं सर्वं पश्यति साधकः ।

व्यवधानगतं चापि दूरदेशगतं तथा ॥ १३६ ॥

तिरश्चां विरुतं वेत्ति वेत्ति चैषां च चेष्टितम् ।

आकाशचारिणः सर्वान् पश्यत्येव न संशयः ॥ १३७ ॥

सुभगः सर्वनारीणां भवेत् काम इवापरः ।

सर्वत्रैवाप्रतिहतो विचरेत महीतले ॥ १३८ ॥

अञ्जनसिद्धि का फल इसको न तो भूत, न मनुष्य, न देवता, न नाग, न असुर और न ही पक्षी देख पाते हैं। और यह परमाणु के समान (सूक्ष्मतम ) प्राणियों को भी देख लेता है । यह साधक पृथिवी के अन्दर गड़ी हुई व्यवधानयुक्त और दूरदेश में स्थित भी समस्त निधि को देख लेता है। पक्षियों की बातों और उनकी चेष्टाओं को जान लेता है। समस्त आकाशचारियों को अवश्य देखता है इसमें कोई संशय नहीं है । दूसरे कामदेव के समान समस्त स्त्रियों के लिये वह सुभग होता है । इस पृथ्वीतल पर सर्वत्र निर्बाध विचरण करता है ॥ १३४-१३८ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – गुटिकासिद्धिविधिः

अथ ते गुटिकासिद्धिं प्रवदामि समासतः ।

यत्सिद्धौ सर्वसिद्धिः स्यादेकसिळ्या न संशयः ॥ १३९ ॥

रेखायुतं स्थूलपीतं शुचिदेशगतं प्रिये ।

पुष्करिण्युदपानस्थं भेकमेकमुपाहरेत् ॥ १४० ॥

एकस्मिन् मार्त्तिके कुम्भे नूतने तं निधापयेत् ।

पलमेकं शुद्धमूतं तन्मध्ये निक्षिपेत् प्रिये ॥ १४१ ॥

मुखमाच्छादयेत्तस्य सरावेण प्रयत्नतः ।

बहुना जतुना तच्च मुद्रयेद् वारपञ्चकम् ॥ १४२ ॥

तथाचरेत् प्रयत्नेन विशेन्नाम्भो यथाण्वपि ।

ततो लिखेदमुं मन्त्रं कुम्भे साधकसत्तमः ॥ १४३ ॥

गुटिका-सिद्धि - अब तुम्हें संक्षेप में उस गुटिका - सिद्धि को बतलाऊँगा जिस एक सिद्धि से निःसन्देह समस्त सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। हे प्रिये! कमल वाले तालाब में रहने वाले रेखायुक्त अत्यन्त पीले रंग वाले तथा पवित्र स्थान में स्थित मेढ़क को ले आये । मिट्टी के नये घड़े में उसे रखे। उस घड़े के मध्य एक पल शुद्ध ऊत (= पारद) डाल दे । उसके बाद कसोरे से उस घट के मुख को प्रयत्नपूर्वक बन्द कर दे । प्रचुर जतु के द्वारा उस घट को पाँच बार मुद्रित करे । ऐसा कर दे ताकि उस (घट) में पानी का एक कण भी प्रवेश न कर सके। इसके बाद साधक निम्नलिखित मन्त्र को घट के ऊपर लिखे ।। १३९-१४३ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – कुम्भे लेखनीयमन्त्रनिर्देश:

तारवाग्भवकन्दर्पवधूलज्जारमारुषः ।

पाशप्रासादफेत्कारी भूतप्रेतामृतान्यपि ॥ १४४ ॥

महाक्रोधं क्षेत्रपालं चण्डकालीयगारुडान् ।

कालविद्युन्मेघनागरतिबीजानि चालिखेत् ॥ १४५ ॥

चतुर्विंशतिबीजानि खेचरीसहितानि च ।

उक्त्वा कामकलाकालि रक्ष रक्षेति चोच्चरेत् ॥ १४६ ॥

आकाशबीजत्रितयं महीबीजद्वयं ततः ।

वारुणं बीजमेकं हि प्रोच्चरेत्तदनन्तरम् ॥ १४७ ॥

अस्त्रत्रितयसंयुक्तः स्वाहान्तो मनुरीरितः ।

मन्त्र - तार वाग्भव कन्दर्प वधू लज्जा रमा क्रोध पाश प्रासाद (= हौं) फेत्कारी (= हस्ख्फ्रें) भूत (=स्क्रों) प्रेत (=स्हौः) अमृत (=ग्लूं) महाक्रोध (=क्षं) क्षेत्रपाल (=क्षौं) चण्ड (=फ्रौं) काली गरुड (=क्रैं) काल (=जूं) विद्युत् (=ब्लौं) मेघ (=क्लौं) नाग (ब्रीं) रति बीजों को लिखे । खेचरी (=खौं) सहित चौबीस बीजों को कहकर 'कामकलाकालि रक्ष रक्ष' कहे। फिर आकाश बीज (=हं) को तीन बार पृथिवी बीज ( =लं) को दो और वारुण बीज (=वं) को एक बार कहे । तीन बार अस्त्र मन्त्र को बोल कर 'स्वाहा' कहे । ( इस प्रकार मन्त्र का स्वरूप होगा - ॐ ऐं क्लीं स्त्रीं ह्रीं श्रीं हूं आं हौं हस्ख्फ्रें स्फों स्हौः ग्लूं क्षं क्षौं फ्रौं क्रीं क्रैं जूं ब्लौं क्लौं ब्रीं क्लूं खौ कामकलाकालि रक्ष रक्ष हं हं हं लं लं वं फट् फट् फट् स्वाहा॥१४४-१४८॥

चलत्तोयप्रवाहाया: कुल्याया हस्तमात्रतः ॥ १४८ ॥

भूमेः खनित्वा तत्राधो घटं संस्थापयेदमुम् ।

उपरिष्टात् प्रदेयानि शर्कराशकलानि च ॥ १४९ ॥

यथोपरि प्रवाहस्तु गच्छेत् कुर्यात्तथाविधिम् ।

तत्र षण्मासपर्यन्तं स्थापयेद् यत्नतो घटम् ॥ १५० ॥

अन्वहं भक्षयेत् तत्स्थमूतं भेकः क्षुधान्वितः ।

जिस छोटी नदी में पानी निरन्तर बह रहा हो उसमें एक हाथ नीचे भूमि में गड्ढा खोदकर इस घट को रख दे। ऊपर से बालू या पत्थर के कण से ढँक दे ताकि उसके ऊपर पानी बहता रहे। उस घट को वहाँ छः महीने तक रहने दे । उसमें स्थित मेढक भूख लगने पर वह पारा खाता रहेगा ।। १४८-१५१ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – अत्र बलिदानविधिः

बलिस्तत्र प्रयत्नेन देयः प्रतिचतुर्दशि ॥ १५१ ॥

भेकरूपेण सा देवी स्वयमेवात्ति तं यतः ।

तस्मात्तत्रार्च्चनं कार्यं देवीबुद्ध्या न संशयः ॥ १५२ ॥

सूतस्तदुदरे बद्धो भवतीति सुनिश्चितम् ।

षण्मासानन्तरं देवि तत उत्थापयेत्सुधीः ॥ १५३ ॥

गृहकोणे ततः स्थाप्यमन्धकारे रहस्यपि ।

एकं हि विवरं कार्यं कुम्भे तत्र शनैः शनैः ॥ १५४ ॥

सम्पिष्टहिङ्गुलीतोयं पलमात्रं विनिः क्षिपेत् ।

तेन छिद्रपथा देवि मासि मास्येवमाचरेत् ॥ १५५ ॥

तत्तोयं षट्पलमितं षट्सु मासेषु दापयेत् ।

ततः संवत्सरे पूर्णे बहिर्निष्कासयेच्छनैः ॥ १५६ ॥

ततोऽन्तरीक्षे तत्स्थाप्यं प्रयत्नेन विचक्षणः ।

तत्र विघ्नकराः सर्वे देवदानवराक्षसाः ॥ १५७ ॥

सावधानो भवेत्तस्मात् प्रतिक्षणमनन्यधीः ।

बलिदान प्रत्येक चतुर्दशी को वहाँ बलि देनी चाहिये । क्योंकि मेढक के रूप में देवी ही उस (पारद) को खाती है। इसलिये सन्देहरहित होकर वहाँ देवी की बुद्धि से पूजा करनी चाहिये । वह पारद उस (मेढक) के पेट में बद्ध हो जाता है । हे देवि ! छह महीने के बाद विद्वान् साधक उस घड़े को वहाँ से उठा ले । उसे घर के कोने में अन्धकार में एकान्त में रख दे। उस कुम्भ में धीरे-धीरे एक बिल बनाये । पिसी हुई हिङ्गुली (=काँटेदार जंगली भण्टा ) एक पल की मात्रा में उस (घट) में फेंक दे। प्रत्येक मास उस छिद्र से यह कार्य करता जाय। इस प्रकार छह महीने में छह पल पानी उसमें चला जायगा। एक वर्ष पूर्ण होने पर धीरे से उस घट को बाहर ले आये और खुले आसमान के नीचे उसे रख दे। (ऐसी स्थिति में) वहाँ देवता दानव राक्षस विघ्न करते हैं। इसलिये एकचित्त साधक प्रतिक्षण इस विषय में सावधान रहे ।। १५१-१५८ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – घटरक्षामन्त्रनिर्देश:

तत्र रक्षा प्रकर्त्तव्या मन्त्रेणानेन पार्वति ॥ १५८ ॥

क्रोधबीजत्रयं प्रोच्य देव्याः सम्बोधनं वदेत् ।

यक्षराक्षसभूतेति पिशाचप्रेत इत्यपि ॥ १५९ ॥

कूष्माण्डजम्भकेत्येव योगिनी डाकिनीति च ।

स्कन्दवेताल उच्चार्य क्षेत्रपाल विनायक ॥ १६० ॥

ततो घोणक उल्लिख्य गुह्यकेति पदं वदेत् ।

विनायकेभ्य इत्युक्त्वा इमं घटमुदीरयेत् ॥ १६१ ॥

रक्ष रक्षेति चोद्धृत्य स्वाहान्तो मन्त्र उत्तमः ।

घटरक्षा मन्त्र - हे पार्वति ! निम्नलिखित मन्त्र से उसकी रक्षा करनी चाहिये- क्रोध बीज का तीन बार उच्चारण कर देवी का सम्बोधन कहे। फिर 'यक्ष राक्षस भूत पिशाच प्रेत कूष्माण्ड जम्भक योगिनी डाकिनी स्कन्द वेताल' कहकर 'क्षेत्रपाल विनायक घोणक गुह्यक' कहे । 'विनायकेभ्यः' कहकर 'इमं घटं रक्ष रक्ष स्वाहा' कहे । ( मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार होगा- हूं हूं हूं कामकलाकालि यक्षराक्षसभूत- पिशाचप्रेतकुष्माण्ड जम्भक योगिनीडाकिनी स्कन्दवेताल क्षेत्रपाल विनायक घोणकगुह्यकविनायकेभ्य इमं घटं रक्ष रक्ष स्वाहा ) ।। १५८-१६२ ॥

मन्त्रेणानेनावगुण्ठ्य कुर्यादेवं ततः परम् ॥ १६२ ॥

कृष्णधुत्तुरवृक्षस्य पलमात्रं द्रवं शुचि ।

दद्याच्च प्रथमे मासि तेन च्छिद्रेण साधकः ॥ १६३ ॥

द्वितीये मासि तुलसी तृतीये श्रेयसीरसम् ।

चतुर्थे मार्करीं दद्यात् पञ्चमे लक्ष्मणारसम् ॥ १६४ ॥

षष्ठे हैमवतीपत्रद्रवदानं विधीयते ।

पूर्णे ह्यष्टादशे मासि प्रदद्यान्माहिषं बलिम् ॥ १६५ ॥

ततो निष्कासयेद् भेकं सिन्दूरारुणसन्निभम् ।

वस्त्रैः करं वेष्टयित्वा ततस्तमवनामयेत् ॥ १६६ ॥

शनैः शनैर्धूनयेच्च यावद्वमति दर्दुरः ।

ततः सा गुटिका देवि सिन्दूरारुणसन्निभा ॥ १६७ ॥

इन्द्रगोपादपि तथा माणिक्यशकलादपि ।

महाशोणा भवेद् देवि तां प्रगृह्य विचक्षणः ॥ १६८ ॥

प्राणप्रतिष्ठामापाद्य पूजयित्वा यथाविधि ।

देव्यनुज्ञां समासाद्य मन्त्रेणानेन धारयेत् ॥ १६९ ॥

इस मन्त्र से अवगुठन कर साधक काले धतूर (के पत्ते) का एक पल रस प्रथम मास में उसी छिद्र से घट में डाल दे। दूसरे मास में तुलसी तीसरे मास में श्रेयसी (= पान) चतुर्थ में मार्कव (= भृङ्गराज) पाँचवें में लक्ष्मणा और छठें मास में हैमवती (= हरें) के पत्ते का द्रव देने का विधान है। अट्ठारह महीना पूरा होने पर भैंसा की बलि दे । उसके बाद (घट में से) सिन्दूर के समान अरुण मेढक को निकाल ले । अपने हाथों में वस्त्र लपेट कर मेढ़क को पेट के बल लिटा दे। धीरे-धीरे ऊपर से तब तक ठोंके जब तक कि मेढक उस गुटिका को उगल न दे। हे देवि! वह गोली लाल सिन्दूर इन्द्रगोप (= वीरबहूटी नामक लाल कीड़ा) और माणिक्य के टुकड़े से भी अधिक अरुण होती है। विद्वान् उसको लेकर उसमें प्राणप्रतिष्ठा करे । तत्पश्चात् विधिवत् पूजन कर देवी की आज्ञा लेकर निम्नलिखित मन्त्र को पढ़ते हुए उसको धारण करे ।। १६२-१६९ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – गुटिकाधारणमन्त्रनिर्देशः

प्रणवं शाम्भवं बीजं मायाकामाङ्कुशामृतम् ।

सर्वसिद्धिमथोच्चार्य देहि देहीति सङ्गृणेत् ॥ १७० ॥

ततः स्वाहा पदं चोक्त्वा शिखायां बन्धयेत्ततः ।

मन्त्र प्रणव शाम्भव (ङ) माया काम अङ्कुश अमृत बीज का उच्चारण कर 'सर्वसिद्धि' कहकर 'देहि देहि' कहना चाहिये । उसके बाद 'स्वाहा' पद का उच्चारण करे ( मन्त्र का स्वरूप यह है - ॐ ङं ह्रीं क्लीं क्रों वं सर्वसिद्धिं देहि देहि स्वाहा ।। १७०-१७१ ॥

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – गुटिकायाः फलश्रुतिः

अव्याहतगतिर्भूत्वा यत्रेच्छा तत्र गच्छतु ॥ १७१ ॥

अनेनैव शरीरेण देवत्वं प्राप्नुयान्नरः ।

खेचरो जायते देवि तथैवादृश्यतां व्रजेत् ॥ १७२ ॥

लीयते वायुभूतोऽयं वायुमध्ये न संशयः ।

तेजो भूत्वा निविशते तेजस्येव स साधकः ॥ १७३ ॥

जले प्रविष्टो भवति जलरूपो वरानने ।

स आकाशतनुर्भूत्वाकाश एव विलीयते ॥ १७४ ॥

गुटिकासिद्धि का फल उस गुटिका को शिखा में बाँधने के बाद साधक जहाँ इच्छा होती है जा सकता है। मनुष्य इसी शरीर से देवत्व प्राप्त करता है । हे देवि! वह खेचर हो जाता है और उसी प्रकार अदृश्य भी हो जाता है। वायु के मध्य वायु बनकर लीन हो जाता है। वह साधक तेज बनकर तेज में लीन हो जाता है । हे वरानने! जल में प्रवेश करने पर वह जलरूप हो जाता है। आकाशवाला शरीर धारण कर वह आकाश में विलीन हो जाता है ।। १७१-१७४ ॥

सुमेरुशतसङ्काशो गरिम्णा स भवत्यपि ।

परमाणुसमो भूयादणिम्ना स क्षणान्तरम् ॥ १७५ ॥

पिबत्यब्धिचतुष्कं स यदि देवि पिपासति ।

चन्द्रसूर्यग्रहणि साधकश्चेद् दिधीर्षति ॥ १७६ ॥

ध्रियते तत्क्षणादेव कराभ्यां स्थित एव सः ।

शापानुग्रहसामर्थ्यं भवति क्षिप्रमेव हि ॥ १७७ ॥

लोकपालैः समं तस्य संवादो जायते मिथः ।

तेषां पुराणि व्रजति सखा चैषां भवेदसौ ॥ १७८ ॥

गुरुता में वह एक सौ सुमेरु पर्वत के समान और एक क्षण में अणिमा में परमाणुवत् हो जाता है । यदि उसे प्यास लगे तो चारो समुद्रों को पी जाता है। यदि चन्द्र-सूर्य ग्रह-नक्षत्र को पकड़ना चाहता है तो बैठे-बैठे हाथों से उनको पकड़ लेता है । उसके अन्दर शाप देने और शापमुक्त करने का सामर्थ्य आ जाता है । लोकपालों से उसका पारस्परिक संवाद होता है। वह उनके नगरों में जाता और उनका मित्र बन जाता है ।। १७५-१७८ ॥

नागाङ्गना देवकन्या यक्षिण्योऽप्सरसस्तथा ।

तस्याग्रतः समायान्ति स्वयं मदनविह्वलाः ॥ १७९ ॥

जीवेत् स साधक श्रेष्ठो यावदाचन्द्रतारकम् ।

न शक्यते समाख्यातुं महिमा मादृ (शैः) प्रिये ॥ १८० ॥

अथवा किं बहूक्तेन सत्यं सत्यं वचो मम ।

स साक्षाद् रुद्र एवेति मन्तव्यो नात्र संशयः ॥ १८९ ॥

नागों की स्त्रियाँ देव कन्यायें यक्षिणियाँ अप्सरायें कामविह्वल होकर स्वयं उसके आगे आ जाती हैं। वह साधक श्रेष्ठ जब तक चन्द्रमा और ताराओं की सत्ता है तब तक जीवित रहता है । हे प्रिये! मेरे जैसे लोग उसकी महिमा का व्याख्यान नहीं कर सकते। अधिक कहने से क्या लाभ मेरा वचन सत्य ही है। उसे निःसन्देह साक्षात् रुद्र समझना चाहिये॥१७९-१८१॥

रौप्यताम्राहिवङ्गायोराशीन् पर्वतसन्निभान् ।

यद्येष स्पृशति क्षिप्रं सुवर्णं निश्चितं भवेत् ॥ १८२ ॥

यस्मात्कामकलाकालीरूपेयं गुटिका प्रिये ।

तस्मान्नैव प्रयोक्तव्या ह्यन्यासु क्षुद्रसिद्धिषु ॥ १८३ ॥

केवलं देवतात्वैककारिणीं गुटिकामिमाम् ।

धारयेत् कालिकारूपामप्रमत्तेन चेतसा ॥ १८४ ॥

चाँदी ताँबा नाग बङ्ग लोहे की पर्वतसदृश राशि का यदि यह स्पर्श करता है तो शीघ्र ही वह निश्चितरूप से सुवर्ण हो जाती है । हे प्रिये! चूँकि यह गुटिका कामकलाकाली रूप है इसलिये क्षुद्र सिद्धियों के लिये इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये । केवल देवत्व देने वाली कालीरूपा इस गुटिका का सावधानी के साथ धारण करना चाहिये ।। १८२-१८४ ॥

अथापरं प्रयोगं च शृणु वक्ष्यामि कञ्चन ।

कोऽपि वीरो महायुद्धे सम्मुखे पतितो हि यः ॥ १८५ ॥

सशिरस्कं समादाय स्थापयेत् पितृकानने ।

अथ स्वयं शुचिः स्नातः कृतनित्याह्निकक्रियः ॥ ९८६ ॥

रात्रौ कृष्णचतुर्दश्यामभीतः साधकः सुधीः ।

वध्यमेकं नरं चौरं समादाय व्रजेन्नृपः ॥ १८७ ॥

आरुह्य तं शवं तत्र जपेन्मन्त्रमभीः शुचिः ।

साहस्त्रे वा द्विसाहस्त्रे जपे पूर्णे कपालिनी ॥ १८८ ॥

प्रविश्य तत्र कुणपं आवेशं विदधीत वै ।

ततो नरबलिं दद्याद् देव्यै साधकसत्तमः ॥ १८९ ॥

तालवेताल-सिद्धि - अब तुमको कोई दूसरा प्रयोग बतलाऊँगा, सुनो। यदि महायुद्ध में कोई वीर अपने सामने मर जाय तो शिरसहित उसको श्मशान में ले आकर रख देना चाहिये। इसके बाद स्वयं पवित्र हो स्नान सन्ध्या वन्दन आदि कर सुधी साधक राजा कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात्रि में निर्भय होकर एक वध्य पुरुष चोर को ले आये। फिर उस शव पर आरूढ़ होकर पवित्र और निर्भय वह मन्त्र का जप करे । एक हजार या दो हजार जप के पूर्ण होने पर कपालिनी उस शव में प्रवेश कर आवेश उत्पन्न करती है। इसके बाद उत्तम साधक (उस कपालिनी के लिये) नरबलि दे ॥ १८५- १८९ ।।

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – नरबलिदानमन्त्रनिर्देश:  

तारवाग्भवकन्दर्पप्रेतभूतामृतैः सह ।

प्रासादाङ्कशफेत्कारीगारुड क्षेत्रपालकैः ॥ १९० ॥

सम्बोध्य देव्या नामापि बलिं गृह्ण मुहुर्मुहुः ।

सिद्धिं मे देहि सम्भाष्य दापयेति ततः परम् ॥ १९१ ॥

स्वाहान्तं मन्त्रमुल्लिख्य दद्यादेतेन साधकः ।

भवेतां तालवेतालौ नामानौ सेवकोत्तमौ ॥ १९२ ॥

बलिमन्त्रतार, वाग्भव, कन्दर्प, प्रेत, भूत, अमृत, प्रासाद, अङ्कुश, फेत्कारी, गरुड, क्षेत्रपाल बीजों के साथ देवी के नाम का सम्बोधन कर 'बलिं गृह्ण गृह्ण' कहे । पुनः सिद्धिं मे देहि दापय स्वाहा' कहे। (मन्त्र का स्वरूप निम्नलिखित होगा-ॐ ऐं क्लीं स्हौः स्फों ग्लूं हौं क्रों हसख क्रौं क्षौं कामकलाकालि बलिं गृह्ण गृह्ण सिद्धिं मे देहि दापय स्वाहा ।) इस मन्त्र से बलि दे (इसके फलस्वरूप) ताल और वेताल उसके उत्तम सेवक हो जाते हैं ।। १९०-१९२ ।।

कामकलाकाली खण्ड पटल ६ – तालवेतालसिद्धिफलश्रुतिः

तावारुह्य व्रजेद् देवि भूर्भुवः स्वःपुरत्रयम् ।

तलं रसातलं चैव पातालसुतलातलान् ॥ १९३ ॥

मेरुशैलादिकांश्चैव व्रजेदेवं न संशयः ।

अन्तः समुद्रे विशति जले तेजसि लीयते ॥ १९४ ॥

आकाशे पर्वतादींश्च भिनत्ति स्वेन तेजसा ।

त्रैलोक्यान्तरगं स्थानं तादृशं नास्ति पार्वति ॥ १९५ ॥

यत्रायं नैव गच्छेत् स इत्येवं निश्चयो मम ।

अन्ये च बहवो देवि प्रयोगाः सन्ति भूरिशः ॥ १९६ ॥

ते सर्वेऽन्वेषणीयाश्च ह्यन्यकालीविधिष्वपि ।

इत्येते कथिता देवि प्रयोगाः सर्वसिद्धिदाः ॥ १९७ ॥

फलश्रुति - हे देवि ! उन दोनों पर आरूढ़ होकर राजा भूर्भुवः स्वः तीनो लोको में जाता है। तल रसातल पाताल सुतल अतल सुमेरु आदि पर्वतों पर निःसन्देह जाता है । समुद्र के भीतर प्रवेश करता और तेज तथा आकाश में विलीन हो जाता है। अपने तेज से पर्वत आदि को तोड़ देता है। हे पार्वति त्रैलोक्य के भीतर कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ यह न जा सके यह मेरा निश्चय है। हे देवि! अन्य भी बहुत से प्रयोग हैं, अन्य कालीविधियों में उनका अन्वेषण करना चाहिये । हे देवि ! इस प्रकार ये सब सिद्धिदायक प्रयोग तुमको बतलाये गये ॥१९३-१९७॥ 

॥ इत्यादिनाथविरचितायां पञ्चशतसाहस्त्र्यां महाकालसंहितायां सामान्यविशेषप्रयोगो नाम षष्ठः पटलः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीमद् आदिनाथविरचित पचास हजार श्लोकों वाली महाकाल- संहिता के कामकलाकाली खण्ड के सामान्यविशेषप्रयोग नामक षष्ठ पटल की आचार्य राधेश्याम चतुर्वेदी कृत 'ज्ञानवती' हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण हुई ॥ ६ ॥

आगे जारी ........ महाकालसंहिता कामकलाकाली खण्ड पटल 7

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