श्री सीताराम पूजन
श्री सीता-राम पूजन घर में सुख,
शांति और सौभाग्य के लिए किया जाता है, जिसमें
स्नान के बाद राम-सीता की प्रतिमा स्थापित करें, पीले और लाल
वस्त्र चढ़ाएं, गठबंधन करें, धूप-दीप
जलाएं, भोग लगाएं, रामचरितमानस या रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करें और आरती करें; यह पूजा विशेष रूप
से विवाह पंचमी अथवा राम दरबार मूर्ति स्थापन, पूजन पर की जाती है।
श्री सीता-राम पूजन विधान
साधक को चाहिये कि वह प्रात:काल
स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठे,
पूजन के लिये आवश्यक समस्त सामग्री अपने पास रख लें ताकि बार-बार उठना न पड़े। वैदिक विधान से
पूजन हेतु अपने घर के उत्तर भाग में एक मण्डप का निर्माण करें। मण्डप के पूर्व
द्वार पर शंख, चक्र तथा पवनपुत्र हनुमान की स्थापना करें
अर्थात् इनके चित्र बना लें। दक्षिण द्वार पर बाण, शंख,
धनुष तथा श्री गरुड़ जी की स्थापना करें। पश्चिम द्वार पर गदा,
खड्ग और अंगदजी की एवं उत्तर द्वार पर पद्म स्वास्तिक और श्री नील
जी की स्थापना करें । सामान्य पूजन में यदि ऐसा सम्भव न हो तो सुन्दर आसन पर भगवान
श्री राम व माता सीता की स्थापना कर आसन के चारों ओर पूर्ण वर्णित क्रम से मानसिक
रूप से सभी की स्थापना की जा सकती है । मण्डप के मध्य में चार हाथ विस्तार की
वेदिका का निर्माण करें जिसमें सुन्दर तोरण लगे हों।
मण्डप के मध्य में अष्टदल कमल बनाकर
केन्द्र में श्री सीता राम व लक्ष्मण जी को स्थापित करें तथा केन्द्र के पूर्व
स्थित दल में श्री दशरथ जी, दक्षिण
पूर्व के दल में माता कौशल्या, दक्षिण दल में कैकयी, दक्षिण पश्चिम दल में सुमित्रा, पश्चिम दल में श्री
भरत जी, पश्चिमोत्तर दल में श्री शत्रुघन जी, उत्तर दल में वानरराज सुग्रीव तथा पूर्वोत्तर दल में पवनपुत्र हनुमान जी
की स्थापना करनी चाहिए ।
श्री सीता-राम पूजन पद्धति
संकल्प
कोई भी साधना,
पूजन या अनुष्ठान करने से पूर्व संकल्प लिया जाता है कि किस
उद्देश्य से पूजन या अनुष्ठान किया जा रहा है। साधक को चाहिये कि वह हाथ में जल
अक्षत व पुष्प लेकर निम्न मंत्रोच्चार के साथ संकल्प करें-
ॐ तत्सद्य श्री ब्रह्मणो
द्वितीयपरार्धे श्री श्वेतावाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे कलियुगे कलिप्रथमचरणे
(अमुक) संवत्सरे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ (अमुक) वासरे
सकलपापक्षयकाम: (अमुक ) नामाहं मम आत्मनः सकलाभीष्टसिद्धयर्थं श्री
सीतारामप्रीत्यर्थं च परिकरसहितं श्री सीता-रामपूजनं च करिष्ये ।
श्री सीता-राम पूजन विधि
Method of Worship shri
Sita-Ram
फिर श्री गणेश - गौरी का संक्षिप्त
पूजन करके तथा कलश की स्थापना करके साधक मण्डप में स्थापित मूर्ति अथवा चित्र के
कपोल भाग का स्पर्श करते हुए श्री राम-मंत्र (ऊँ परिकसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
नमः) का उच्चारण करें, जिससे कि मूर्ति
में प्राण-प्रतिष्ठा हो जाय। तदुपरान्त भगवान श्री रामचतुष्टय का इस प्रकार ध्यान
करना चाहिए-
वामे भागे जनकतनया राजते यस्य
नित्यं
भ्रातृप्रेमप्रवणहृदयो लक्ष्मणो
दक्षिणे च ।
पादाम्भोजे पवनतनयः श्री मुखे
बद्धनेत्रः
साक्षाद् ब्रह्म प्रणतवरदं
रामचन्द्रं भजे तम् ॥
अर्थात् जिनके वाम भाग में श्री
जानकी जी नित्य विराजित हैं, दायें भाग में
भ्रात- प्रेम से सने हुए हृदयवाले श्री लक्ष्मण जी सुशोभित हैं और जिनके चरणकमलों
के पास पवनपुत्र श्री हनुमान जी श्री मुख की ओर एकटक दृष्टि लगाये बैठे हैं,
उन मूर्तिमान् ब्रह्म भक्तवरदायक रघुनायक श्री रामचन्द्र की मैं शरण
ग्रहण करता हूँ ।
आवाहन-स्थापन-सांनिध्य
आवाहयामि विश्वेशं जानकीवल्लभं
प्रभुम् ।
कौशल्यातनयं विष्णुं श्री रामं
प्रकृतेः परम् ॥
श्री रामागच्छ भगवान रघुवीर
नृपोत्तम ।
जानक्या सह राजेन्द्र सुस्थिरो भव
सर्वदा ॥
रामभद्र महेष्वास रावणन्तक राघव ।
यावत्पूजां करोम्यद्य तावत् त्वं
संनिधौ भव ॥
रघुनायक राजर्षे नमो राजीवलोचन ।
रघुनन्दन मे देव श्री रामाभिमुखो भव
॥
ॐ परिकरसहितं श्री
सीतारामचन्द्रमावाहयामि, स्थापयामि च ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर यह भावना
करें कि मैं मण्डप के मध्य परिकरसहित भगवान श्री सीताराम जी का आवाहन करके उन्हें
स्थापित कर रहा हूँ ।
आसन
राजाधिराज राजेन्द्र रामचन्द्र
महीपते ।
रत्नसिंहासनं तुभ्यं दास्यामि
स्वीकुरु प्रभो ॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री
सीतारामचन्द्राय इदमासनं समर्पयामि ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर आसन के
निमित्त पुष्प अर्पित करते हुए यह भावना करें कि मण्डप के मध्य में भगवान सीतारामजी
रत्नसिंहासन पर तथा उनके सभी परिकर अपने- अपने आसन पर विराजित हो रहे हैं।
पाद्य
त्रैलोक्यपावनानन्त नमस्ते रघुनायक
।
पाद्यं गृहाण राजर्षे नमो राजीवलोचन
॥
ॐ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
पाद्यं समर्पयामि ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर जल अर्पित
करते हुए यह भावना करें कि रत्नसिंहासन पर आसीन भगवान श्री सीताराम जी के श्री
चरणों को एवं तदनन्तर उनके परिकरों के चरणों को भी मैं सुगन्धित जल से धो रहा हूँ।
अर्ध्य
सभी को अलग-अलग अर्ध्य प्रदान करने
का विधान है, अतः जिस-जिस मंत्र से जिन-जिन
को अर्ध्य दिया जाना चाहिये इसका विवरण दिया जा रहा है। जिस प्रकार भगवान श्री राम
के लिये अर्ध्य प्रदान किया जाय, उसी प्रकार अन्यों को भी
प्रदान करना चाहिये ।
भगवान श्री राम के लिए
दशग्रीवविनाशाय जातोऽसि रघुनन्दन ।
गृहाणार्ध्वं मया दत्तं प्रसीद
परमेश्वर ॥
ॐ श्री रामचन्द्राय अर्ध्यं
समर्पयामि ।
भगवती सीता के प्रति
दशग्रीविनाशाय जाता सावनिसम्भवा ।
मैथिली शीलसम्पन्ना पातु नः
पतिदेवता ॥
ॐ श्रीसीतादेव्यै अर्ध्यं समर्पयामि
।
श्री लक्ष्मण के प्रति
निहतो रावणिर्येन शत्रुजिच्छत्रुघातिना
।
स पातु लक्ष्मणो धन्वी
सुमित्रानन्दवर्द्धनः ।।
ॐ श्री लक्ष्मणाय अर्ध्यं समर्पयामि
।
श्री दशरथ जी के प्रति
नानाविधगुणागार गृहाणार्ध्यं
नृपोत्तम ।
रविवंशप्रदीपाय दशरथाय ते नमः ॥
ऊँ श्री दशरथाय अर्ध्यं समर्पयामि ।
माता कौशल्या के प्रति
गृहाणार्ध्यं महादेवि रम्ये
दशरथप्रिये ।
जगदानन्दवन्द्यायै कौशल्यायै नमो
नमः ॥
ॐ श्री कौशल्यादेव्यै अर्ध्यं
समर्पयामि ।
माता कैकयी के प्रति
दृढ़प्रतिज्ञे कैकेयि
मातर्भरतवन्दिते ।
गृहाणार्ध्यं महादेवि रक्ष मां
भक्तवत्सले ।।
ऊँ श्री कैकेयीदेव्यै अर्ध्यं
समर्पयामि ।
माता सुमित्रा के प्रति
शुभलक्षमणसम्पन्ने
लक्ष्मणानन्दवर्द्धिनि ।
सुमित्रं देहि मे देवि सुमित्रायै
नमो नमः ।।
ॐ श्री सुमित्रादेव्यै अर्ध्यं
समर्पयामि ।
श्री भरत जी के प्रति
भक्तवत्सल भव्यात्मन् रामभक्तिपरायण
।
भक्त्या दत्तं गृहाणार्ध्यं भरताय
नमो नमः ॥
ऊँ श्री भरताय अर्ध्यं समर्पयामि ।
श्री शत्रुघन जी के प्रति
लवणान्तक शत्रुघन शत्रुकाननपावक ।
गृहाणार्ध्यं मया दत्तं प्रसीद कुरु
मे शुभम् ॥
ॐ श्री शत्रुघनाय अर्ध्यं समर्पयामि
।
श्री सुग्रीव जी के प्रति
सुग्रीवाय नमस्तुभ्यं
दशग्रीवान्तकप्रिय ।
गृहाणार्ध्यं महाबाहो
किष्किन्धानायक प्रभो ॥
ऊँ श्री सुग्रीवाय अर्ध्यं
समर्पयामि ।
श्री हनुमान जी के प्रति
कुर्मकुम्भीरसंकीर्णमुत्तीर्णोऽसि
महार्णवम् ।
हनूमते नमस्तुभ्यं गृहाणार्ध्यं
महामते ॥
ॐ श्री हनुमते अर्ध्यं समर्पयामि ।
आचमन
नमः सत्याय शुद्धाय नित्याय
ज्ञानरूपिणे ।
गृहाणाचमनं नाथ सर्वलोकैकनायक ॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री
सीतारामचन्द्राय आचमनीयं समर्पयामि ।
स्नान
नमः श्री वासुदेवाय
तत्वज्ञानस्वरूपिणे ।
मधुपर्कं गृहाणेदं जानकीपतये नमः ॥
पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं पयोदधि घृतं
मधु ।
शर्करा चेति तद्भक्त्या दत्तं ते
प्रतिगृह्यताम् ॥
ब्रह्माण्डोदरमध्यस्थतीर्थैश्च
रघुनन्दन ।
स्नापयिष्याम्यहं भक्तया त्वं
प्रसीद जनार्दन ॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री
सीतारामचन्द्राय मधुपर्क- पञ्चामृते दत्त्वा स्नानार्थं जलं समर्पयामि ।
वस्त्र
तप्तकाञ्चनसंकाशं पीताम्बरमिदं हरे
।
त्वं गृहाण जगन्नाथ रामचंन्द्र
नमोऽस्तु ते ॥
ॐ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
वस्त्राणि समर्पयामि ।
यज्ञोपवीत
श्री रामाच्युत यज्ञेश श्रीधरानन्त
राघव ।
ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण
रघुनन्दन ॥
ॐ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर परिकरसहित
भगवान श्री सीता- राम को उत्तरीय (ओढ़ने की चादर ) के साथ यज्ञोपवीत समर्पित करना
चाहिये ।
गन्ध
कुंकुमारु कस्तूरीकर्पूरं चन्दनं
तथा ।
तुभ्यं दास्यामि राजेन्द्र श्री राम
स्वीकुरु प्रभो ॥
ॐ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
गन्धं समर्पयामि ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर परिकरसहित
भगवान श्री सीताराम को कुंकुमादियुक्तं चन्दन चढ़ाना चाहिये।
पुष्प
तुलसीकुन्दमन्दारजातीपुंनागचम्पकै :
।
कदम्बकरवीरैश्च कुसुमैः शतपत्रकैः ॥
नीलाम्बुजैर्बिल्वपत्रैः
पुष्पमाल्यैश्च राघव ।
पूजयिष्याम्यहं भक्तया गृहाण त्वं
जनार्दन ॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री
सीतारामचन्द्राय पुष्पाणि पुष्पमालां च समर्पयामि ।
उपर्युक्त मंत्र पढ़कर परिकरसहित
भगवान श्री सीतारामचन्द्र जी को नाना प्रकार के पुष्प और पुष्पमालाएँ अर्पित करनी
चाहिये ।
पुष्पमालार्पण के अवसर पर ही भगवान
श्री रामचन्द्र जी के विभिन्न अंगों की पूजा होती है । क्रमश: मंत्र बोलकर मंत्र
के सामने जिन अंगों के नाम लिखे हैं, उन-उन
अंगों पर पुष्प या अक्षत चढ़ाने चाहिये ।
ॐ श्री रामचन्द्राय नमः,
पादौ पूजयामि । ( चरणों
पर)
ॐ श्री राजीवलोचनाय नमः,
गुल्फौ पूजयामि । (
टखनों पर)
ऊँ श्री रावणान्तकाय नमः,
जानुनी पूजयामि । (घुटनों
पर)
ऊँ श्री वाचस्पतये नमः,
ऊरू पूजयामि । (जाँघों
पर)
ॐ श्री विश्वरूपाय नमः,
जङ्घे पूजयामि। (पिण्डलियों
पर)
ॐ श्री लक्ष्मणाग्रजाय नमः,
कटि पूजयामि । (कमर पर)
ॐ श्री विश्वामित्रप्रियाय नमः,
नाभिं पूजयामि । ( नाभि पर)
ॐ श्री परमात्मने नमः,
हृदयं पूजयामि । ( हृदयं
पर)
ॐ श्रीकण्ठाय नमः,
कण्ठं पूजयामि । (कण्ठ पर)
ॐ श्री सर्वास्त्रधारिणे नमः,
बाहू पूजयामि । (भुजाओं पर
)
ऊँ श्री रघूद्रहाय नमः,
मुखं पूजयामि । ( मुख पर )
ॐ श्री पद्मनाभाय नमः,
जिह्वां पूजयामि । (
जिह्वा पर )
ऊँ श्री दामोदराय नमः,
दन्तान् पूजयामि । (दाँतों
पर)
ॐ श्री सीतापतये नमः,
ललाटं पूजयामि। (ललाट पर)
ऊँ श्री ज्ञानगम्याय नमः,
शिरः पूजयामि । ( सिर पर )
ॐ श्री सर्वात्मने नमः,
सर्वांङ्गं पूजयामि। (सारे
अंगों पर)
धूप
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध
उत्तमः ।
रामचन्द्र महीपाल धूपोऽयं
प्रतिगृह्यताम् ॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री
सीतारामचन्द्राय धूपमाघ्रापयामि ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर परिकरसहित
भगवान श्री सीताराम जी को धूप समर्पित करना चाहिये ।
दीपक
ज्योतिषां पतये तुभ्यं नमो रामाय
वेधसे ।
गृहाण दीपकं चैव
त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥
ॐ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
दीपं दर्शयामि ।
उपर्युक्त श्लोक को पढ़कर परिकरसहित
भगवान श्री सीतारामचन्द्रजी को प्रज्वलित दीपक दिखलाना चाहिये ।
नैवेद्य
इदं दिव्यान्नममृतं रसैः षड्भिः
समन्वितम् ।
रामचन्द्रेश नैवेद्यं सीतेश
प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
नैवेद्यं समर्पयामि ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर परिकरसहित
श्री सीताराम को नैवेद्य समर्पित करना चाहिये । तदुपरांत श्री सीताराम के आचमन के
लिये शुद्ध जल समर्पित करना चाहिये ।
ताम्बूल
नागवल्लीदलैर्युक्तं
पूंगीफलसमन्वितम् ।
ताम्बूलं गृह्यतां राम
कर्पूरादिसमन्वितम् ॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
ताम्बूलं समर्पयामि ।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर परिकरसहित
भगवान श्री सीताराम जी को शुद्ध रीति से लगाया हुआ पान अर्पित करना चाहिये ।
आरती
मङ्गलार्थं महीपाल नीराजनमिदं हरे ।
संगृहाण जगन्नाथ रामचन्द्र नमोऽस्तु
ते ॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री सीतारामचन्द्राय
कर्पूरारार्तिक्यं समर्पयामि।
उपर्युक्त श्लोक पढ़कर किसी शुद्ध पात्र में कपूर तथा ( एक या पाँच या ग्यारह ) घी की बत्ती जलाकर परिकरसहित भगवान श्री सीताराम जी की आरती उतारनी चाहिए और समवेत स्वर में निम्नलिखित आरती का गायन करना चाहिये-
॥
आरति कीजै श्री रघुबर की,
सत चित आनँद शिव सुंदर की
दशरथ तनय कौसिला - नन्दन,
सुर मुनि रक्षक दैत्य - निकन्दन ।
अनुगत भक्त भक्त-उर-चन्दन,
मर्यादा पुरुषोत्तम वर की ॥
आरति कीजै श्री रघुबर की ॥
निर्गुण सगुण अरूप रूपनिधि,
सकल लोक वन्दित विभिन्न विधि ।
हरण शोक-भय,
दायक सब सिधि,
मायारहित दिव्य नर-वर की॥
आरति कीजै श्री रघुबर की॥
जानकीपति सुराधिपति जगपति,
अखिल लोक पालक, त्रिलोक-गति ।
विश्ववन्द्य अनवद्य अमित - मति,
एकमात्र गति सचराचर की॥
आरति कीजै श्री रघुबर की॥
शरणागत-वत्सल व्रतधारी,
भक्त-कल्पतरू वर असुरारी ।
नाम लेत जग पावनकारी,
वानर-सखा दीन-दुख - हर की॥
आरति कीजै श्री रघुबर की॥
पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, प्रणाम
नमो देवाधिदेवाय रघुनाथाय शर्ङ्गिणे
।
चिन्मयानन्तरूपाय सीतायाः पतये नमः
॥
ऊँ परिकरसहिताय श्री
सीतारामचन्द्राय पुष्पांजलिं समर्पयामि ।
अंजलि में पुष्प लेकर उपर्युक्त
श्लोक पढ़ना चाहिये श्लोक पाठ हो जाने पर पुष्पार्पण करके निम्नलिखित श्लोक पढ़ते
हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये-
यानि कानि च पापानि
ब्रह्महत्यादिकानि च ।
तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिणपदे
पदे ॥
प्रदक्षिणा करके भगवान श्री सीताराम
को प्रणाम करना चाहिये एवं उनकी प्रसन्नता प्राप्ति के लिये कातर - याचना करनी
चाहिये ।
इति: श्री सीता-राम पूजन विधि ॥

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