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अष्ट भैरव

अष्ट भैरव

अष्ट भैरव भगवान शिव के आठ रौद्र और शक्तिशाली स्वरूप हैं, जो आठों दिशाओं के रक्षक माने जाते हैं, और ये प्रत्येक दिशा और जीवन के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करते हैं, जिनकी पूजा से भय, रोग और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। ये भैरव कालभैरव के अधीनस्थ माने जाते हैं। प्रत्येक अष्ट भैरव को आठ अधीनस्थ भैरवों का स्वामी माना जाता है, कुल मिलाकर ६४ भैरव हैं।

अष्ट भैरव

अष्ट भैरव

Astabhairava

भैरव शिवजी के ही प्रतिरूप हैं। वस्तुत: शिवजी और भैरव में कोई अन्तर नहीं है। अत: भैरव की उपासना भी शिवजी की उपासना के समान फल देने वाला है। शिवमहापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का ही पूर्णरूप बताते हुए लिखा गया है -

भैरव: पूर्णरूपोहि शंकरस्य परात्मन: ।

मूढास्तेवै न जानन्ति मोहिता:शिवमायया ॥

भैरव भगवान शिव (शंकर) का ही पूर्ण और परमात्मा स्वरूप हैं, लेकिन मूर्ख लोग शिव की माया से मोहित होकर उन्हें नहीं पहचान पाते और भैरव व शिव को अलग समझते हैं।

भैरव के स्वरूप

श्री भैरव के शरीर का रंग श्याम है। उनकी चार भुजाएँ हैं जिनमें वे त्रिशूल, खड्ग, खप्पर तथा नरमुण्ड धारण करते हैं। अन्य मतानुसार वे एक हाथ में मोर पंखों का चंवर भी धारण करते हैं। उनका वाहन श्वान (कुत्ता) है। उनकी वेशभूषा लगभग शिवजी के समान है। शरीर पर भस्म, मस्तक पर त्रिपुण्ड, बाघम्बर धारण किए, गले में मुण्ड माला और सर्पो से शोभायमान रहते हैं। भैरव श्मशान वासी हैं। ये भूत-प्रेत योगिनियों के अधिपति हैं। भक्तों पर स्नेहवान और दुष्टों का संहार करने में सदैव तत्पर रहते हैं। हर प्रकार के कष्टों को दूर करके बल, बुद्धि, तेज, यश, धन तथा मुक्ति प्रदान करने के कारण इनकी विशेष प्रसिद्धि है।

श्री भैरव के अन्य रूपों में 'महाकाल भैरव' तथा 'बटुक भैरव' मुख्य हैं।

अष्टभैरव

असिताङ्गोरुरुश्चण्डः क्रोधश्चोन्मत्तभैरवः ।

कपालीभीषणश्चैव संहारश्चाष्टभैरवम् ॥

अष्ट भैरव के रूप में जिन आठ नामों की प्रसिद्धि है वे इस प्रकार हैं-

१.अतिसांग भैरव, २.चण्ड भैरव, ३. भयंकर भैरव, ४. क्रोधोन्मत्त भैरव, ५. भीषण भैरव, ६. संहार भैरव, ७. कपाली भैरव, ८. रूरू भैरव।

भगवान भैरव के मुख्यतः आठ स्वरूप है जिन्हे अष्ट भैरव कहते हैं। उनके इन आठो स्वरूपों को पूजने से वे अपने भक्तो पर प्रसन्न होते है तथा उन्हें अलग-अलग फल प्रदान करते है।

अष्ट भैरव के नाम (मुख्यतः माने जाने वाले):

असितांग भैरव (Asitanga Bhairava): पूर्व दिशा के स्वामी, साहस और कलात्मक क्षमता के प्रतीक।

चंड भैरव (Chanda Bhairava): क्रोध और शक्ति के देवता, शत्रुओं के नाश के लिए पूजे जाते हैं।

रुरु भैरव (Ruru Bhairava): ज्ञान और विद्या के संरक्षक।

क्रोध भैरव (Krodha Bhairava): तीव्र क्रोध और विजय के प्रतीक।

उन्मत्त भैरव (Unmatta Bhairava): उन्माद, पागलपन और रचनात्मक ऊर्जा के देवता।

कपाल भैरव (Kapala Bhairava): मृत्यु और मोक्ष के संरक्षक, जिनके हाथ में कपाल होता है।

भीषण भैरव (Bhishana Bhairava): भयानक रूप वाले, भय को दूर करने वाले।

संहार भैरव (Samhara Bhairava): अंत और विनाश के देवता, जो संतुलन लाते हैं।

शिवजी के प्रकारान्तर से निम्न नौ स्वरूप भी भैरव के माने जाते हैं-

१.क्षेत्रपाल, २. दण्डपाणि, ३. नीलकण्ठ, ४. मृत्युञ्जय, ५. मंजुघोष, ६. ईशान, ७. चण्डेश्वर, ८. दक्षिणामूर्ति, ९. अर्द्धनारीश्वर।

पूजा का समय:

रविवार, बुधवार और भैरव अष्टमी (कृष्ण पक्ष की अष्टमी) इनके पूजन के लिए विशेष दिन माने जाते हैं, जिससे ये शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

अष्ट भैरव का ध्यान स्तोत्र इस प्रकार है-

अष्ट भैरव मंत्र:

ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नमः ॥

मैं महाकाल भैरव को नमन करता हूँ, जो 'हं षं नं गं कं सं खं' (शक्तियों) के माध्यम से रक्षा करते हैं और सभी भय को नष्ट करते हैं।

नमस्कार मन्त्रः -

ॐ श्रीभैरव्यै, ॐ मं महाभैरव्यै, ॐ सिं सिंहभैरव्यै,

ॐ धूं धूम्रभैरव्यै, ॐ भीं भीमभैरव्यै, ॐ उं उन्मत्तभैरव्यै,

ॐ वं वशीकरणभैरव्यै, ॐ मों मोहनभैरव्यै ।

अष्ट भैरव ध्यानस्तोत्रम्

॥ अष्टभैरव ध्यान व स्वरूप ॥

असिताङ्ग भैरव ध्यान व स्वरूप

                        असितांग(असिताङ्ग) भैरव

असितांग(असिताङ्ग) भैरव को भैरव का उग्र रूप माना गया है, इनकी तीन आँखे होती है तथा इनका पूरा शरीर काले रंग का है। असितांग भैरव की सवारी हंस है तथा ये अपने गले में कपाल की माला धारण किये हुए है। इनका अस्त्र भी कपाल है। इनकी पत्नी का नाम ब्राह्मी है। असितांग भैरव का पूर्व दिशा के स्वामी और पुनर्वसु नक्षत्र है। इनका रत्न पीला नीलम है। भगवान भैरव की इस रूप की पूजा करने पर व्यक्ति की कलात्मक क्षमता बढ़ती है। ऐसा माना गया है कि इस रूप में भैरव की उपासना आपके भयंकर से भयंकर व असाध्य रोग को भी दूर कर सकती है। जो लोग लम्बे समय से किसी रोग से पीड़ित है और लाख यत्न के बाद भी उनका रोग ठीक नहीं हो पा रहा है तो असितांग भैरव मंत्र का जप करना चाहिए। कलियुग के समय में भैरव उपासना विशेष रूप से फल प्रदान करने वाली मानी गयी है।

असितांग भैरव मंत्र ।

॥  ॐ भं भं सः असितांगाये नमः ॥

असिताङ्ग भैरव ध्यानम् ।

रक्तज्वालजटाधरं शशियुतं रक्ताङ्ग तेजोमयं

     अस्ते शूलकपालपाशडमरुं लोकस्य रक्षाकरम् ।

निर्वाणं शुनवाहनन्त्रिनयनमानन्दकोलाहलं

     वन्दे भूतपिशाचनाथ वटुकं क्षेत्रस्य पालं शिवम् ॥ १॥

मैं उन भगवान शिव (असितांग भैरव) को प्रणाम करता हूँ, जिनकी जटाओं में लाल ज्वालाएँ और चंद्रमा सुशोभित हैं, जिनके अंग लाल हैं और जो तेज से प्रकाशित हैं, जिनके हाथों में त्रिशूल, कपाल, पाश और डमरू हैं, जो संसार की रक्षा करते हैं, जो निर्वाण स्वरूप, श्वानवाहन, तीन नेत्रों वाले और आनंदमय हैं, और जो भूत-पिशाचों के स्वामी और क्षेत्रपाल हैं।

रूरु भैरव ध्यान व स्वरूप

रूरु भैरव

भैरव का रुरु (गुरु) रूप अत्यंत प्रभावी व आकर्षक है इस रूप में वे बैल पर सवारी करते है। इस रूप में वे अपने हाथो पर कुल्हाड़ी, पात्र, तलवार और कपाल धारण किये हुए है तथा उनके कमर में एक सर्प लिपटा हुआ है। गुरु भैरव की पूजा करने पर समस्त ज्ञान की प्राप्ति होती है। इनकी पत्नी का नाम माहेश्वरी है। ब्रह्मवैवर्त पुराण अनुसार रूरु भैरव की उत्पत्ति श्रीकृष्‍ण के दाहिने नेत्र से हुई थी। रूरु भैरव का पूर्व दक्षिण दिशा के स्वामी और कार्तिक नक्षत्र है। इनका रत्न माणिक है।भैरवजी का यह रूप संपत्ति, धन और समृद्धि प्रदान करने वाला है। इन भैरव की उपासना करने से नौकरी और रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं। घर में प्रेमपूर्ण वातावरण निर्मित होता है। जीवन में हर प्रकार के संकट से रक्षा होती है।

रूरु भैरव मंत्र ।

।। ॐ भं भं ह्रौं रूरु भैरवाये नम:।।

रूरु भैरव ध्यानम् ।

निर्वाणं निर्विकल्पं निरूपजमलं निर्विकारं क्षकारं

     हुङ्कारं वज्रदंष्ट्रं हुतवहनयनं रौद्रमुन्मत्तभावम् ।

भट्कारं भक्तनागं भृकुटितमुखं भैरवं शूलपाणिं

     वन्दे खड्गं कपालं डमरुकसहितं क्षेत्रपालन्नमामि ॥ २॥

जो निर्वाण स्वरूप, विकल्प रहित, उपमा से परे, विकार (विकृति) रहित, 'क्ष' ध्वनि वाले (जो विनाश और सृष्टि का प्रतीक है), हुंकार (गर्जना) वाले, वज्र के समान दांतों वाले, अग्नि के समान नेत्रों वाले, रौद्र (भयानक) और उन्मत्त (मदहोश) भाव वाले, 'भट्' (भयंकर) ध्वनि करने वाले, भक्तों के नाग (शत्रु), तनी हुई भौंहें वाले, शूल (त्रिशूल) खड्ग, कपाल और डमरु धारण करने वाले क्षेत्रपाल (क्षेत्रों के रक्षक) भैरव को मैं प्रणाम करता हूँ।

चण्ड भैरव ध्यान व स्वरूप

चण्ड भैरव

भगवान भैरव का चण्ड भैरव रूप सफेद रंग का है तथा वे तीन आँखों से सुशोभित है। इस रूप में वह मोर की सवारी करते है। अपने एक हाथ में तलवार, दूसरे हाथ में पात्र, तीसरे हाथ में तीर व चौथे हाथ में धनुष धारण किये हुए है। चण्ड भैरव दक्षिण दिशा के स्वामी, मृगशिरा नक्षत्र और रत्न मूंगा है। उनकी पत्नी का नाम कौमारी।  भगवान भैरव के इस रुप को पूजने वाला व्यक्ति अपने शत्रुओ पर विजयी प्राप्त करता है तथा हर कार्य में उसे सफलता प्राप्त होती है।

चण्ड भैरव मंत्र ।

॥ ॐ हूं हूं चंड चंड भैरवाय भ्रं भ्रं हूं हूं फट् ॥

चण्डभैरव ध्यानम् ।           

बिभ्राणं शुभ्रवर्णं द्विगुणदशभुजं पञ्चवक्त्रन्त्रिनेत्रं

     दानञ्छत्रेन्दुहस्तं रजतहिममृतं शङ्खभेषस्यचापम् ।

शूलं खड्गञ्च बाणं डमरुकसिकतावञ्चिमालोक्य मालां

     सर्वाभीतिञ्च दोर्भीं भुजतगिरियुतं भैरवं सर्वसिद्धिम् ॥ ३॥

श्वेत वर्ण वाले, दस भुजाओं वाले (दशभुज), पांच मुख और तीन नेत्रों वाले, दान, छत्र (छाता), और चंद्रमा को धारण करने वाले, चांदी और बर्फ के समान उज्ज्वल, शंख, भेष (रूप), और धनुष (चाप) धारण किए हुए, भाला (शूल), तलवार (खड्ग), बाण, डमरू, जटा (सिकता), और माला को धारण किए हुए, सभी प्रकार के भय (सर्वाभीति) को दूर करते हुए, भुजाओं और पर्वत (भुजतगिरि) के साथ स्थित, भैरव सभी सिद्धियाँ प्रदान करते हैं।

क्रोध भैरव ध्यान व स्वरूप

क्रोध भैरव

भगवान भैरव के इस रूप का रंग नीला होता है तथा इनकी सवारी गरुड़ होती है। भगवान शिव के भाति ही क्रोध भैरव की भी तीन आंखे होती है तथा ये दक्षिण और पश्चिम के स्वामी माने जाते है। काल भैरव के इस रूप की पूजा करने पर सभी प्रकार की मुसीबतो और परेशानियों से मुक्ति मिलती है तथा व्यक्ति में इन मुसीबतो एवं परेशनियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। इनका नक्षत्र रोहिणी और रत्न मोती है। क्रोध भैरव का पत्नि वैष्णवी है और इनका मुख्य मंदिर तमिलनाडु के थिरुविसन्नलूर में है।

क्रोधभैरव मंत्र ।

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं क्रोध भैरवाय भ्रं भ्रं भ्रं फट्।

क्रोधभैरव ध्यानम् ।

उद्यद्भास्कररूपनिभन्त्रिनयनं रक्ताङ्ग रागाम्बुजं

     भस्माद्यं वरदं कपालमभयं शूलन्दधानं करे ।

नीलग्रीवमुदारभूषणशतं शन्तेशु मूढोज्ज्वलं

     बन्धूकारुण वास अस्तमभयं देवं सदा भावयेत् ॥ ४॥

उगते हुए सूर्य के समान कांति वाले, तीन नेत्रों से युक्त, लाल अंगों वाले, लाल कमल पर विराजमान, भस्म लगाए हुए, वरद (वरदान देने वाले), हाथ में कपाल (खोपड़ी) और अभय (निर्भयता) के साथ शूल (त्रिशूल) धारण किए हुए, नीली गर्दन वाले, सुंदर आभूषणों से सुशोभित, शांत, मूढ़ (अज्ञानियों के लिए), और अत्यंत उज्ज्वल, बंधूक (एक फूल) के समान लाल वस्त्र पहने हुए, हर पल अभय देने वाले क्रोध भैरव का सदा ध्यान करता हूँ।

उन्मत्त भैरव ध्यान व स्वरूप 

उन्मत्त भैरव

उन्मत्त भैरव का शरीर पीले रंग का है तथा वे घोड़े पर सवारी करते है। भैरव का यह रूप शांत स्वभाव का कहलाता है तथा इनकी पूजा अर्चना करने से व्यक्ति अपने सभी नकरात्मक विचारो से मुक्ति पाता है व उसे शांत एवं सुखद भावना की अनुभूति होती है। उन्मत्त भैरवनाथ की पत्नी वराही हैं और इन भैरव की दिशा पश्चिम है। इसका खास मंदिर तमिलनाडु के विजहिनाथर में है। इनकी पूजा करने से नौकरी, प्रमोशन, धन आदि की प्राप्ति होती है और साथ ही घर परिवार में प्रसन्नता का वातावरण निर्मित होता है। लहसुन, प्याज आदि त्यागकर शुद्ध सात्विक रूप से इनकी आराधना करने से ये जल्दी प्रसन्न होते हैं।

उन्मत्त भैरव मंत्र ।

॥ ॐ भं भं श्री उन्मताये नम: ॥

उन्मत्तभैरव ध्यानम् ।

एकं खट्वाङ्गहस्तं पुनरपि भुजगं पाशमेकन्त्रिशूलं

     कपालं खड्गहस्तं डमरुकसहितं वामहस्ते पिनाकम् ।

चन्द्रार्कं केतुमालां विकृतिसुकृतिनं सर्वयज्ञोपवीतं

     कालं कालान्तकारं मम भयहरं क्षेत्रपालन्नमामि ॥ ५॥

जिनके एक हाथ में खट्वांग (खोपड़ी की माला), दूसरे में सर्प, पाश, त्रिशूल, कपाल, खड्ग और डमरु हैं, जिनके एक हाथ में पिनाक धनुष है, जो चंद्रमा-सूर्य को धारण करते हैं, केतुमाला (सर्पों की माला) पहने हैं, विकृत और सुकृत (शुभ-अशुभ) रूप धारण किए हैं, सर्वयज्ञोपवीत (सभी यज्ञों के उपवीत) धारण किए हैं, काल और कालान्तक (समय और समय का अंत करने वाले) हैं, और जो भय हरने वाले हैं, ऐसे उन्मत्त क्षेत्रपाल भैरव को नमस्कार है।

कपाल भैरव ध्यान व स्वरूप

कपाल भैरव

कपाल या कपाली भैरव जी का यह रूप बहुत ही चमकीला होता है तथा इस रूप में वह हाथी पर सवारी करते है। इस रूप में काल भैरव के चार हाथ होते है, अपने दाए दो हाथो में वे त्रिशूल और तलवार पकड़े है तथा उनके बाये दो हाथो में एक अस्त्र और एक पात्र है। भगवान भैरव के इस रूप की पूजा करने पर व्यक्ति सभी क़ानूनी कार्रवाइयों से मुक्ति प्राप्त करता है तथा उसके सारे अटके काम बनने लगते है। कपाल भैरव के पत्नी का नाम इंद्राणी है। इनकी दिशा उत्तर पश्चिम अर्थात वायव्य कोण है और नक्षत्र भरणी है। रत्न हीरा और कानों में कुंडल धारण किए हुए हैं। इनका खास मंदिर तमिलनाडु के थिरुवीरकुडी में है। भगवान काल भैरव के ब्रह्मकपाल से कपाल भैरव का जन्म हुआ था। भैरव इस रूप में समस्त संसार के कपाल और उसमें आने वाले विचारों के देवता हैं। श्री कपाल भैरव कपाल के प्रतीक देवता है इस कारण से तंत्र में इनकी आराधना मुख्य रूप से की जाती हैं। तंत्र में सिद्धि की पराकाष्ठा कपाल भेदन क्रिया को माना जाता हैं, कपाल के कुछ ही देवता या देवियां हैं जिनमें माता हिंगलाज, माता छिन्नमस्ता, माता रेणुका, और बाबा कपाल भैरव हैं, रुद्रांश होने के कारण ये जागृत कुंडलिनी शक्ति के प्रतीक और कुंडलिनी नियंता भी हैं।

कपाल भैरव मंत्र ।

॥ ॐ कपाल भैरवाय नम: ॥

॥ ॐ कम कपाल भैरवाय फट स्वाहा ॥

कपाल भैरव ध्यानम् ।

वन्दे बालं स्फटिकसदृशं कुम्भलोल्लासिवक्त्रं

     दिव्याकल्पैफणिमणिमयैकिङ्किणीनूपुरञ्च ।

दिव्याकारं विशदवदनं सुप्रसन्नं द्विनेत्रं

     हस्ताद्यां वा दधानान्त्रिशिवमनिभयं वक्रदण्डौ कपालम् ॥ ६॥

मैं उस बाल स्वरूप बटुक भैरव की वंदना करता हूँ जिनका मुख कुम्भ (घड़े) के समान गोल और उज्ज्वल है, जो स्फटिक के समान निर्मल हैं, दिव्य आभूषणों (जैसे सर्प-मणियों से बनी किंकिणी और नूपुर) से सुसज्जित हैं, जिनके दो नेत्र हैं, जो प्रसन्नचित्त और दो हाथों में डमरू और कपाल (खोपड़ी) धारण किए हुए हैं, और जो निर्भयता प्रदान करते हैं।

भीषण भैरव ध्यान व स्वरूप

भीषण भैरव

भीषण भैरव ने अपने एक हाथ में कमल का फूल, दूसरे में तलवार, तीसरे में त्रिशूल और चौथे में एक पात्र पकड़ा हुआ है। भीषण भैरव की सावारी सिंह की है और उनकी पत्नी का नाम चामुण्डी है। भीषण भैरव उत्तर दिशा के संवरक्षक हैं और इनका नक्षत्र स्वाति है। भीषण भैरव का खास मंदिर तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित है।भगवान भैरव की भीषण रूप में पूजा करने पर बुरी आत्माओं और भूतों से छुटकारा मिलता है।

भीषणभैरव मंत्र ।

॥ॐ भ्रं भीषण भैरवाय फट्॥

भीषणभैरव ध्यानम् ।

त्रिनेत्रं रक्तवर्णञ्च सर्वाभरणभूषितम् ।

कपालं शूलहस्तञ्च वरदाभयपाणिनम् ॥

सव्ये शूलधरं भीमं खट्वाङ्गं वामकेशवम् ।

रक्तवस्त्रपरिधानं रक्तमाल्यानुलेपनम् ।

नीलग्रीवञ्च सौम्यञ्च सर्वाभरणभूषितम् ॥

नीलमेख समाख्यातं कूर्चकेशन्त्रिनेत्रकम् ।

नागभूषञ्च रौद्रञ्च शिरोमालाविभूषितम् ॥

नूपुरस्वनपादञ्च सर्प यज्ञोपवीतिनम् ।

किङ्किणीमालिका भूष्यं भीमरूपं भयावहम् ॥ ७॥

जो तीन नेत्रों वाले, रक्त वर्ण वाले, सभी आभूषणों से सुसज्जित, कपाल (खोपड़ी) और त्रिशूल धारण किए हुए, और वर (वरदान) तथा अभय (निर्भयता) मुद्रा वाले, बाईं ओर त्रिशूल धारण किए, भयानक, खट्वांग लिए हुए और उलझी हुई जटाओं वाले, लाल वस्त्र पहने, लाल फूलों की माला और लाल चंदन/लेप लगाए हुए, नीले गले वाले, कोमल, नीलमेख नाम से विख्यात, जिनके घुंघराले बाल और कमल समान तीन आंखें, सर्पों से बने आभूषणों से सजे हुए हैं, रौद्र रूप वाले, गले में कपालों की माला सजी हुई, पैरों में नूपुरों (पैंजनों) की ध्वनि,  सर्प (नाग) को यज्ञोपवीत (जनेऊ) की तरह धारण किए हुए, और किङ्किणी (छोटी घंटियों) की माला से सुशोभित, जो एक भयावह और शक्तिशाली हैं, ऐसे भैरव को मैं प्रणाम करता हूँ।

संहार भैरव ध्यान व स्वरूप

संहार भैरव

संहार भैरव का का पूरा शरीर लाल रंग का है। संहार भैरव इस रूप में निर्वस्त्र है तथा उनके मष्तक में कपाल स्थापित है वह भी लाल रंग का। संहार भैरव की आठ भुजाएं हैं और शरीर पर सांप लिपटा हुआ है। संहार भैरव का वाहन श्वान है तथा उनकी तीन आंखे हैं। संहार भैरव की दिशा उत्तर-पूर्व है। नक्षत्र रेवती है। उनकी पत्नी चंडी है। संहार भैरव के इस रूप की पूजा करने पर व्यक्ति अपने समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त करता है। संहार भैरव का प्रमुख मंदिर तमिलनाडु के थिरुवेंकाडु एवं होसुर में है।

॥ संहार भैरव मंत्र ॥

ॐ ऐं  क्लीं सौः संहाराय स्वाहा ॥

संहारभैरव ध्यानम् ।

एकवक्त्रन्त्रिनेत्रञ्च हस्तयो द्वादशन्तथा ।

डमरुञ्चाङ्कुशं बाणं खड्गं शूलं भयान्वितम् ॥

धनुर्बाण कपालञ्च गदाग्निं वरदन्तथा ।

वामसव्ये तु पार्श्वेन आयुधानां विधन्तथा ॥

नीलमेखस्वरूपन्तु नीलवस्त्रोत्तरीयकम् ।

कस्तूर्यादि निलेपञ्च श्वेतगन्धाक्षतन्तथा ॥

श्वेतार्क पुष्पमालाञ्च त्रिकोट्यङ्गणसेविताम् ।

सर्वालङ्कार संयुक्तां संहारञ्च प्रकीर्तितम् ॥ ८॥

एक-मुख, तीन आंखों वाले, बारह हाथों वाले, जो डमरू, अंकुश, तीर, तलवार, भयभीत कर देने वाला भाला लिए हैं, साथ ही जो धनुष-बाण, कपाल, गदा, अग्नि लिए हैं और वर मुद्रा में हाथ हैं। जिनके बाँयी ओर के हाथों में शस्त्र और दाँयी ओर के हाथों में दीर्घायु के साधन हैं। जो नीली गर्दन वाले, नीले वस्त्र पहने हुए हैं, जिन्हें कस्तूरी, सुगंधित द्रव्य और अक्षत आदि चढ़ाये जाते हैं।सफेद कमल के हार के साथ करोड़ों सूर्यों के समान चमकने वाले आभूषणों से अलंकृत और संहार के लिए प्रशंसित भैरव को मैं नमस्कार करता हूँ।

इति श्रीभैरव स्तुति निरुद्र कुरुते ।

इति अष्ट भैरव ध्यानस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

इस प्रकार श्री भैरव की स्तुति (अष्टभैरव ध्यानस्तोत्र) समाप्त होता है।

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