परशुराम सहस्रनाम स्तोत्रं
परशुराम सहस्रनाम स्तोत्रं भगवान
विष्णु के अवतार परशुराम के हज़ारों नामों का गुणगान करता है,
और इसमें भगवान राम परशुराम के रूप में स्वयं विष्णु के अवतार का
सम्मान कर रहे हैं। यह प्रसंग राम, लक्ष्मण और सीता के
अयोध्या वापसी के समय का है, जब वे परशुराम से मिलते हैं। इसका
पाठ करने से शत्रुओं का नाश, सुख-समृद्धि और जीवन में सभी
बाधाएँ दूर होती हैं; इसे दाशरथी राम द्वारा रचित माना जाता
है और यह विशेष रूप से अक्षय तृतीया अर्थात् परशुराम जयंती पर पढ़ने या सुनने से
अत्यंत फलदायी होता है।
परशुराम सहस्र नाम स्तोत्रम्
परशुराम जी का उल्लेख शास्त्रों व
धर्मग्रंथों में किया गया है तथा इनके अनेक नामों का भी वर्णन मिलता है। रामकथा
में भी परशुरामजी का वर्णन आया है।
रामकथा में परशुरामजी
चारों पुत्रों के विवाह के उपरान्त
राजा दशरथ अपनी विशाल सेना और पुत्रों के साथ अयोध्या पुरी के लिये चल पड़े। मार्ग
में अत्यन्त क्रुद्ध तेजस्वी महात्मा परशुराम मिले। उन्होंने राम से कहा कि वे
उसकी पराक्रम गाथा सुन चुके हैं, पर
राम उनके हाथ का धनुष चढ़ाकर दिखाएँ। तदुपरान्त उनके पराक्रम से संतुष्ट होकर वे
राम को द्वंद्व युद्ध के लिए आमंत्रित करेंगे। दशरथ अनेक प्रयत्नों के उपरान्त भी
ब्राह्मणदेव परशुराम को शान्त नहीं कर पाये। परशुराम ने बतलाया कि विश्वकर्मा ने अत्यन्त श्रेष्ठ कोटि के दो धनुषों का निर्माण किया था।
उनमें से एक तो देवताओं ने शिव को अर्पित कर दिया था और दूसरा विष्णु को। एक बार
देवताओं के यह पूछने पर कि शिव और विष्णु में कौन बलबान है, कौन
निर्बल- ब्रह्मा ने मतभेद स्थापित कर दिया। फलस्वरूप विष्णु की धनुष टंकार के
सम्मुख शिव धनुष शिथिल पड़ गया था, अतः पराक्रम की वास्तविक
परीक्षा इसी धनुष से हो सकती है। शान्त होने पर शिव ने अपना धनुष विदेह वंशज
देवरात को और विष्णु ने अपना धनुष भृगुवंशी ऋचीक को धरोहर के रूप में दिया था,
जो कि मेरे पास सुरक्षित है।'
राम ने क्रुद्ध होकर उनके हाथ से
धनुष बाण लेकर चढ़ा दिया और बोले - 'विष्णुबाण
व्यर्थ नहीं जा सकता। अब इसका प्रयोग कहाँ पर किया जाये।' परशुराम
का बल तत्काल लुप्त हो गया। उनके कथनानुसार राम ने बाण का प्रयोग परशुराम के तपोबल
से जीते हुए अनेक लोकों पर किया, जो कि नष्ट हो गये। परशुराम
ने कहा - 'हे राम, आप निश्चय ही
साक्षात विष्णु हैं।' तथा परशुराम ने महेन्द्र पर्वत के लिए
प्रस्थान किया। राम आदि अयोध्या की ओर बढ़े। उन्होंने यह धनुष वरुण देव को दे
दिया। परशुराम की छोड़ी हुई सेना ने भी राम आदि के साथ प्रस्थान किया।
श्रीपरशुरामसहस्रनामस्तोत्रम्
पुरा दाशरथी रामः कृतोद्वाहः
सबान्धवः ।
गच्छन्नयोध्यां राजेन्द्रः
पितृमातृसुहृद् वृतः ॥ १॥
ददर्श यान्तं मार्गेण
क्षत्रियान्तकरं विभुम् ।
विवाह के बाद,
अपने रिश्तेदारों (बान्धवों) के साथ अयोध्या लौटते समय, राजा दशरथ के पुत्र राम (दाशरथी) अपने माता-पिता और मित्रों से घिरे हुए
थे, और मार्ग में शक्तिशाली क्षत्रियों के संहारक परशुराम जी
से उनकी भेंट होती है।
रामं तं भार्गवं
दृष्ट्वाभितस्तुष्टाव राघवः ।
रामः श्रीमान्महाविष्णुरिति नाम
सहस्रतः ॥ २॥
भगवान राम (राघव) द्वारा परशुराम
(भार्गव) को देखकर स्तुति कर रहे हैं, क्योंकि
परशुराम भी भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। राघव कहते हैं कि राम ही श्रीमान् और महाविष्णु
हैं, और उन्होंने परशुराम के सहस्र नामों से (स्तुति की)।
अहं त्वत्तः परं राम विचरामि
स्वलीलया ।
इत्युक्तवन्तमभ्यर्च्य प्रणिपत्य
कृताञ्जलिः ॥ ३॥
परशुराम जी कहते हैं,
हे राम, मैं तुमसे बढ़कर हूँ और मैं अपनी लीला
से (अपनी शक्ति से) विचरण करता हूँ। और फिर राम ऐसा कहने वाले (परशुराम जी) को
प्रणाम किया, उनका सत्कार किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
श्रीराघव उवाच -
यन्नामग्रहणाज्जन्तुः प्राप्नुयात्र
भवापदम् ।
यस्य पादार्चनात्सिद्धिः
स्वेप्सितां नौमि भार्गवम् ॥ ४॥
श्री राम ने कहा- जिनके नाम
के स्मरण से जीव (मनुष्य) भव (संसार) के संकटों से पार पा लेता है,
और जिनके चरणों की पूजा से मनचाही सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त होती है,
उन्हीं भगवान भार्गव को मैं नमन करता हूँ।
निःस्पृहो यः सदा देवो भूम्यां वसति
माधवः ।
आत्मबोधोदधिं स्वच्छं योगिनं नौमि
भार्गवम् ॥ ५॥
जो देव (परशुराम) हमेशा निःस्पृह
(इच्छा-रहित, वैराग्यवान) होकर इस पृथ्वी पर
माधव (भगवान विष्णु के अवतार) के रूप में निवास करते हैं, आत्म-ज्ञान
रूपी निर्मल सागर के समान, उन योगी भार्गव (परशुराम) को मैं
नमस्कार करता हूँ।
यस्मादेतज्जगत्सर्वं जायते यत्र
लीलया ।
स्थितिं प्राप्नोति देवेशं
जामदग्न्यं नमाम्यहम् ॥ ६॥
जिनसे यह सारा संसार लीला (खेल-खेल
में) उत्पन्न होता है और जिनमें ही यह स्थिर होता है,
उन देवों के देव भगवान जामदग्न्य (परशुराम) को मैं प्रणाम करता हूँ।
यस्य भ्रू भङ्गमात्रेण ब्रह्माद्याः
सकलाः सुराः ।
शतवारं भवन्यत्र भवन्ति न भवन्ति च
॥ ७॥
जिनकी भौंह के एक संकुचन (भ्रू-भंग)
मात्र से ब्रह्मा आदि सभी देवता सौ बार उत्पन्न होते हैं और सौ बार नष्ट हो जाते
हैं,
उन्हीं भगवान परशुराम को मैं नमस्कार करता हूँ।
तप उग्रं चचारादौ यमुद्दिश्य च
रेणुका ।
आद्या शक्तिर्महादेवी रामं तं
प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥
रेणुका (परशुराम की माता) ने जिस
आदि शक्ति (परशुराम) को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था,
मैं उन भगवान राम (परशुराम) को प्रणाम करता हूँ।
परशुराम सहस्रनाम स्तोत्र
॥ अथ विनियोगः ॥
ॐ अस्य
श्रीजामदग्न्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य श्रीराम ऋषिः जामदग्न्यः परमात्मा देवता
अनुष्टुप् छन्दः श्रीमदविनाशरामप्रीत्यर्थं चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थं जपे
विनियोगः ॥
॥ अथ करन्यासः ॥
ॐ ह्रां गोविन्दात्मने
अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं महीधरात्मने तर्जनीभ्यां
नमः ।
ॐ ह्रूं हृषीकेशात्मने मध्यमाभ्यां नमः
।
ॐ ह्रैं त्रिविक्रमात्मने
अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रौं विष्णवात्मने
कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रः माधवात्मने
करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥
॥ अथ हृदयन्यासः ॥
ॐ ह्रां गोविन्दात्मने हृदयाय नमः ।
ॐ ह्रीं महीधरात्मने शिरसे स्वाहा ।
ॐ ह्रूं हृषीकेशात्मने शिखायै वषट् ।
ॐ ह्रैं त्रिविक्रमात्मने कवचाय
हुम् ।
ॐ ह्रौं विष्णवात्मने नेत्रत्रयाय
वौषट् ।
ॐ ह्रः माधवात्मने अस्त्राय फट् ।
॥ अथ ध्यानम् ॥
शुद्धजाम्बूनदनिभं
ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तं कृष्णाजिनधरं
विभुम् ॥ ९॥
जो शुद्ध,
उज्ज्वल और उत्तम सोने (जाम्बूनद) के समान चमकने वाले, ब्रह्म (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालक) और शिव
(संहारक) - तीनों के स्वरूप वाले, सभी प्रकार के आभूषणों
(अलंकारों) से सुशोभित, काले मृग (कृष्ण मृग) की खाल (चर्म)
को धारण करने वाले, सर्वव्यापक (विभु) परमेश्वर है।
बाणचापौ च परशुमभयं च चतुर्भुजैः ।
प्रकोष्ठशोभि रुद्राक्षैर्दधानं
भृगुनन्दनम् ॥ १०॥
भृगु नंदन (परशुराम) जो धनुष-बाण,
परशु (कुल्हाड़ी) और अभय मुद्रा को चार भुजाओं से धारण किए हुए हैं,
बाहुओं (प्रकोष्ठ) पर सुशोभित रुद्राक्षों को धारण किए हुए हैं।
हेमयज्ञोपवीतं च
स्निग्धस्मितमुखाम्बुजम् ।
दर्भाञ्चितकरं देवं
क्षत्रियक्षयदीक्षितम् ॥ ११॥
सोने के यज्ञोपवीत (जनेऊ) से
सुशोभित,
शांत मुस्कान और कमल-मुख वाले, दूर्वा से
सुशोभित हाथों वाले, क्षत्रियों के विनाश के लिए उद्यत
(संकल्पित) उस देव (परशुराम) का ध्यान करता हूँ।
श्रीवत्सवक्षसं रामं ध्यायेद्वै
ब्रह्मचारिणम् ।
हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं
सनकाद्यैरभिष्टुतम् ॥ १२॥
भगवान परशुराम (जो राम के रूप में
भी पूजे जाते हैं) जो श्रीवत्स वक्षस्थल वाले,
ब्रह्मचारी, हृदय रूपी कमल के मध्य में विराजमान और सनकादि
मुनियों द्वारा पूजित हैं।
सहस्रमिव सूर्याणामेकी भूय पुरः
स्थितम् ।
तपसामिव सन्मूर्तिं
भृगुवंशतपस्विनम् ॥ १३॥
जो सहस्त्रों सूर्यों के समान
तेजस्वी,
तपस्या की साक्षात् मूर्ति और भृगु वंश का एक महान तपस्वी हैं।
चूडाचुम्बितकङ्कपत्रमभितस्तूणीद्वयं
पृष्ठतो
भस्मस्निग्धपवित्रलाञ्छनवपुर्धत्ते
त्वचं रौरवीम् ।
मौञ्ज्या मेखलया
नियन्त्रितमधोवासश्च माञ्जिष्ठकम्
पाणौ कार्मुकमक्षसूत्रवलयं दण्डं
परं पैप्पलम् ॥ १४॥
जो चूड़ा (शिखा) में कौवे के पंख
(कङ्कपत्र) को धारण करनेवाले, पीठ पर दोनों
ओर तरकश, भस्म व त्रिपुंड्र से सुशोभित, मूँज की मेखला (कमरबंद), मृगचर्म (हिरण की खाल) से
बना अधोवस्त्र, लाल रंग के वस्त्र, हाथ
में धनुष, रुद्राक्ष की माला, और एक
दण्ड (छड़ी) धारण किए हुए हैं, तथा उनके हाथ में पैप्पल
(परशु/कुल्हाड़ी) हैं।
रेणुकाहृदयानन्दं भृगुवंशतपस्विनम्
।
क्षत्रियाणामन्तकं पूर्णं
जामदग्न्यं नमाम्यहम् ॥ १५॥
मैं भृगुवंशी तपस्वी, रेणुका के
हृदय को आनंद देनेवाले, क्षत्रियों का अंत करने वाले,
पूर्ण (संपूर्ण) और जमदग्नि के पुत्र, भगवान
परशुराम को नमन करता हूँ।
अव्यक्तव्यक्तरूपाय निर्गुणाय
गुणात्मने ।
समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥
१६॥
जो अव्यक्त (अदृश्य),
व्यक्त (दृश्य), निर्गुण (गुणों से परे), गुणात्मक (गुणों का आश्रय) और संपूर्ण जगत के आधारभूत स्वरूप (मूर्त) हैं,
ऐसे ब्रह्म को नमस्कार है।
श्रीपरशुराम सहस्रनाम स्तोत्र
आगे के श्लोक में भगवान् श्रीपरशुरामजी
का सहस्रनाम (१००० नाम) दिया गया है,जिसका भावार्थ नाम अनुसार स्पष्ट है अतः इसका
अर्थ नहीं दिया जा रहा है।
॥अथ श्रीपरशुरामसहस्रनामस्तोत्रम् ॥
ॐ रामः श्रीमान्महाविष्णुर्भार्गवो
जमदग्निजः ।
तत्त्वरूपी परं ब्रह्म शाश्वतः
सर्वशक्तिधृक् ॥ १॥
वरेण्यो वरदः सर्वसिद्धिदः
कञ्जलोचनः ।
राजेन्द्रश्च सदाचारो जामदग्न्यः
परात्परः ॥ २॥
परमार्थैकनिरतो जितामित्रो जनार्दनः
।
ऋषि प्रवरवन्धश्च दान्तः
शत्रुविनाशनः ॥ ३॥
सर्वकर्मा पवित्रश्च अदीनो दीनसाधकः
।
अभिवाद्यो महावीरस्तपस्वी नियमः
प्रियः ॥ ४॥
स्वयम्भूः सर्वरूपश्च सर्वात्मा
सर्वदृक्प्रभुः ।
ईशानः
सर्वदेवादिर्वरीयन्सर्वगोऽच्युतः ॥ ५॥
सर्वज्ञः सर्ववेदादिः शरण्यः
परमेश्वरः ।
ज्ञानभाव्योऽपरिच्छेद्यः
शुचिर्वाग्मी प्रतापवान् ॥ ६॥
जितक्रोधो गुडाकेशो
द्युतिमानरिमर्दनः ।
रेणुकातनयः साक्षादजितोऽव्यय एव च ॥
७॥
विपुलांसो महोरस्कोऽतीन्द्रो
वन्द्यो दयानिधिः ।
अनादिर्भगवानिन्द्रः
सर्वलोकारिमर्दनः ॥ ८॥
सत्यः सत्यव्रतः सत्यसन्धः
परमधार्मिकः ।
लोकात्मा लोककृल्लोकवन्द्यः सर्वमयो
निधिः ॥ ९॥
वश्यो दया सुधीर्गोप्ता दक्षः
सर्वैकपावनः ।
ब्रह्मण्यो ब्रह्मचारी च ब्रह्म
ब्रह्मप्रकाशकः ॥ १०॥
सुन्दरोऽजिनवासाश्च ब्रह्मसूत्रधरः
समः ।
सौम्यो महर्षिः शान्तश्च
मौञ्जीभृद्दण्डधारकः ॥ ११॥
कोदण्डी सर्वजित्छत्रदर्पहा
पुण्यवर्धनः ।
कविर्ब्रह्मर्षि वरदः कमण्डलुधरः
कृती ॥ १२॥
महोदारोऽतुलो भाव्यो जितषड्वर्गमण्डलः
।
कान्तः पुण्यः सुकीर्तिश्च
द्विभुजश्चादि पूरुषः ॥ १३॥
अकल्मषो दुराराध्यः सर्वावासः
कृतागमः ।
वीर्यवान्स्मितभाषी च निवृत्तात्मा
पुनर्वसुः ॥ १४॥
अध्यात्मयोगकुशलः सर्वायुधविशारदः ।
यज्ञस्वरूपी यज्ञेशो यज्ञपालः
सनातनः ॥ १५॥
घनश्यामः स्मृतिः शूरो जरामरणवर्जितः
।
धीरो दान्तः सुरूपश्च सर्वतीर्थमयो
विधिः ॥ १६॥
वर्णी वर्णाश्रमगुरुः
सर्वजित्पुरुषोऽव्ययः ।
शिवशिक्षापरो युक्तः परमात्मा
परायणः ॥ १७॥
प्रमाण रूपो दुर्ज्ञेयः पूर्णः
क्रूरः क्रतुर्विभुः ।
आनन्दोऽथ
गुणश्रेष्ठोऽनन्तदृष्टिर्गुणाकरः ॥ १८॥
धनुर्धरो धनुर्वेदः
सच्चिदानन्दविग्रहः ।
जनेश्वरो विनीतात्मा
महाकायस्तपस्विराट् ॥ १९॥
अखिलाद्यो विश्वकर्मा विनीतात्मा
विशारदः ।
अक्षरः केशवः साक्षी मरीचिः
सर्वकामदः ॥ २०॥
कल्याणः प्रकृति कल्पः सर्वेशः
पुरुषोत्तमः ।
लोकाध्यक्षो गभीरोऽथ
सर्वभक्तवरप्रदः ॥ २१॥
ज्योतिरानन्दरूपश्च वह्नीरक्षय
आश्रमी ।
भूर्भुवःस्वस्तपोमूर्ती रविः
परशुधृक् स्वराट् ॥ २२॥
बहुश्रुतः सत्यवादी भ्राजिष्णुः
सहनो बलः ।
सुखदः कारणं भोक्ता भवबन्ध
विमोक्षकृत् ॥ २३॥
संसारतारको नेता
सर्वदुःखविमोक्षकृत् ।
देवचूडामणिः कुन्दः सुतपा
ब्रह्मवर्धनः ॥ २४॥
नित्यो नियतकल्याणः शुद्धात्माथ
पुरातनः ।
दुःस्वप्ननाशनो नीतिः किरीटी
स्कन्ददर्पहृत् ॥ २५॥
अर्जुनः प्राणहा वीरः
सहस्रभुजजिद्धरीः ।
क्षत्रियान्तकरः शूरः
क्षितिभारकरान्तकृत् ॥ २६॥
परश्वधधरो धन्वी रेणुकावाक्यतत्परः
।
वीरहा विषमो वीरः पितृवाक्यपरायणः ॥
२७॥
मातृप्राणद ईशश्च धर्मतत्त्वविशारदः
।
पितृक्रोधहरः क्रोधः
सप्तजिह्वसमप्रभः ॥ २८॥
स्वभावभद्रः शत्रुघ्नः स्थाणुः
शम्भुश्च केशवः ।
स्थविष्ठः स्थविरो बालः सूक्ष्मो
लक्ष्यद्युतिर्महान् ॥ २९॥
ब्रह्मचारी विनीतात्मा
रुद्राक्षवलयः सुधीः ।
अक्षकर्णः सहस्रांशुर्दीप्तः कैवल्यतत्परः
॥ ३०॥
आदित्यः कालरुद्रश्च
कालचक्रप्रवर्तकः ।
कवची कुण्डली खड्गी चक्री
भीमपराक्रमः ॥ ३१॥
मृत्युञ्जयो वीर सिंहो जगदात्मा
जगद्गुरुः ।
अमृत्युर्जन्मरहितः कालज्ञानी
महापटुः ॥ ३२॥
निष्कलङ्को गुणग्रामोऽनिर्विण्णः
स्मररूपधृक् ।
अनिर्वेद्यः शतावर्तो दण्डो दमयिता
दमः ॥ ३३॥
प्रधानस्तारको धीमांस्तपस्वी
भूतसारथिः ।
अहः संवत्सरो योगी संवत्सरकरो
द्विजः ॥ ३४॥
शाश्वतो लोकनाथश्च शाखी दण्डी बली
जटी ।
कालयोगी महानन्दः तिग्ममन्युः
सुवर्चसः ॥ ३५॥
अमर्षणो मर्षणात्मा प्रशान्तात्मा
हुताशनः ।
सर्ववासाः सर्वचारी सर्वाधारो
विरोचनः ॥ ३६॥
हैमो हेमकरो धर्मो दुर्वासा वासवो
यमः ।
उग्रतेजा महातेजा जयो विजयः कालजित्
॥ ३७॥
सहस्रहस्तो विजयो दुर्धरो
यज्ञभागभुक् ।
अग्निर्ज्वाली महाज्वालस्त्वतिधूमो
हुतो हविः ॥ ३८॥
स्वस्तिदः स्वस्तिभागश्च महान्भर्गः
परो युवा ।
महत्पादो महाहस्तो बृहत्कायो
महायशाः ॥ ३९॥
महाकटिर्महाग्रीवो महाबाहुर्महाकरः
।
महानासो महाकम्बुर्महामायः पयोनिधिः
॥ ४०॥
महावक्षा महौजाश्च महाकेशो महाजनः ।
महामूर्धा महामात्रो महाकर्णो
महाहनुः ॥ ४१॥
वृक्षाकारो महाकेतुर्महादंष्ट्रो
महामुखः ।
एकवीरो महावीरो वसुदः कालपूजितः ॥
४२॥
महामेघनिनादी च महाघोषो महाद्युतिः
।
शैवः शैवागमाचारी हैहयानां
कुलान्तकः ॥ ४३॥
सर्वगुह्यमयो वज्री बहुलः कर्मसाधनः
।
कामी कपिः कामपालः कामदेवः कृतागमः
॥ ४४॥
पञ्चविंशतितत्त्वज्ञः सर्वज्ञः
सर्वगोचरः ।
लोकनेता महानादः कालयोगी महाबलः ॥
४५॥
असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा वीर्यकृद्वीर्यकोविदः
।
वेदवेद्यो वियद्गोप्ता
सर्वामरमुनीश्वरः ॥ ४६॥
सुरेशः शरणं शर्म शब्दब्रह्म सतां
गतिः ।
निर्लेपो निष्प्रपञ्चात्मा
निर्व्यग्रो व्यग्रनाशनः ॥ ४७॥
शुद्धः पूतः शिवारम्भः
सहस्रभुजजिद्धरिः ।
निरवद्यपदोपायः सिद्धिदः
सिद्धिसाधनः ॥ ४८॥
चतुर्भुजो महादेवो व्यूढोरस्को
जनेश्वरः ।
द्युमणिस्तरणिर्धन्यः कार्तवीर्य
बलापहा ॥ ४९॥
लक्ष्मणाग्रजवन्द्यश्च नरो नारायणः
प्रियः ।
एकज्योतिर्निरातङ्को मत्स्यरूपी
जनप्रियः ॥ ५०॥
सुप्रीतः सुमुखः सूक्ष्मः कूर्मो
वाराहकस्तथा ।
व्यापको नारसिंहश्च बलिजिन्मधुसूदनः
॥ ५१॥
अपराजितः सर्वसहो भूषणो भूतवाहनः ।
निवृत्तः संवृत्तः शिल्पी क्षुद्रहा
नित्य सुन्दरः ॥ ५२॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोता
व्यासमूर्तिरनाकुलः ।
प्रशान्तबुद्धिरक्षुद्रः
सर्वसत्त्वावलम्बनः ॥ ५३॥
परमार्थगुरुर्देवो माली संसारसारथिः
।
रसो रसज्ञः सारज्ञः
कङ्कणीकृतवासुकिः ॥ ५४॥
कृष्णः कृष्णस्तुतो धीरो मायातीतो
विमत्सरः ।
महेश्वरो महीभर्ता शाकल्यः
शर्वरीपतिः ॥ ५५॥
तटस्थः कर्णदीक्षादः सुराध्यक्षः
सुरारिहा ।
ध्येयोऽग्रधुर्यो धात्रीशो
रुचिस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ५६॥
कर्माध्यक्षो निरालम्बः सर्वकाम्यः
फलप्रदः ।
अव्यक्तलक्षणो व्यक्तो व्यक्ताव्यक्तो
विशाम्पतिः ॥ ५७॥
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशो जगन्नाथो
जनेश्वरः ।
ब्रह्मा हंसश्च रुद्रश्च स्रष्टा
हर्ता चतुर्मुखः ॥ ५८॥
निर्मदो निरहङ्कारो भृगुवंशोद्वहः
शुभः ।
वेधा विधाता द्रुहिणो देवज्ञो
देवचिन्तनः ॥ ५९॥
कैलासशिखरावासी ब्राह्मणो
ब्राह्मणप्रियः ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो ज्येष्ठः
श्रेष्ठः शुभाकृतिः ॥ ६०॥
बाणारिर्दमनो यज्वा
स्निग्धप्रकृतिरग्नियः ।
वरशीलो वरगुणः सत्यकीर्तिः कृपाकरः
॥ ६१॥
सत्त्ववान् सात्त्विको धर्मी बुद्धः
कल्की सदाश्रयः ।
दर्पणो दर्पहा दर्पातीतो दृप्तः
प्रवर्तकः ॥ ६२॥
अमृतांशोऽमृतवपुर्वाङ्मयः सदसन्मयः ।
निधानगर्भो भूशायी कपिलो विश्वभोजनः
॥ ६३॥
प्रभविष्णुर्ग्रसिष्णुश्च
चतुर्वर्गफलप्रदः ।
नारसिंहो महाभीमः शरभः कलिपावनः ॥
६४॥
उग्रः पशुपतिर्भर्गो वैद्यः
केशिनिषूदनः ।
गोविन्दो गोपतिर्गोप्ता गोपालो
गोपवल्लभः ॥ ६५॥
भूतावासो गुहावासः सत्यवासः श्रुतागमः
।
निष्कण्टकः सहस्रार्चिः स्निग्धः
प्रकृतिदक्षिणः ॥ ६६॥
अकम्पितो गुणग्राही सुप्रीतः
प्रीतिवर्धनः ।
पद्मगर्भो महागर्भो वज्रगर्भो
जलोद्भवः ॥ ६७॥
गभस्तिर्ब्रह्मकृद्ब्रह्म राजराजः
स्वयम्भवः ।
सेनानीरग्रणी साधुर्बलस्तालीकरो
महान् ॥ ६८॥
पृथिवी वायुरापश्च तेजः खं बहुलोचनः
।
सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः
सर्वगुह्यमयो गुरुः ॥ ६९॥
अविनाशी सुखारामस्त्रिलोकी
प्राणधारकः ।
निद्रारूपं क्षमा तन्द्रा
धृतिर्मेधा स्वधा हविः ॥ ७०॥
होता नेता शिवस्त्राता सप्तजिह्वो
विशुद्धपात् ।
स्वाहा हव्यश्च कव्यश्च शतघ्नी
शतपाशधृक् ॥ ७१॥
आरोहश्च निरोहश्च तीर्थः तीर्थकरो
हरः ।
चराचरात्मा सूक्ष्मस्तु विवस्वान्
सवितामृतम् ॥ ७२॥
तुष्टिः पुष्टिः कला काष्ठा मासः
पक्षस्तु वासरः ।
ऋतुर्युगादिकालस्तु लिङ्गमात्माथ
शाश्वतः ॥ ७३॥
चिरञ्जीवी प्रसन्नात्मा नकुलः
प्राणधारणः ।
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं
त्रिविष्टपम् ॥ ७४॥
मुक्तिर्लक्ष्मीस्तथा भुक्तिर्विरजा
विरजाम्बरः ।
विश्वक्षेत्रं सदाबीजं
पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ७५॥
भिक्षुर्भैक्ष्यं गृहं दारा
यजमानश्च याचकः ।
पक्षी च पक्षवाहश्च मनोवेगो निशाचरः
॥ ७६॥
गजहा दैत्यहा नाकः पुरुहूतः
पुरुष्टुतः ।
बान्धवो बन्धुवर्गश्च पिता माता सखा
सुतः ॥ ७७॥
गायत्रीवल्लभः प्रांशुर्मान्धाता
भूतभावनः ।
सिद्धार्थकारी सर्वार्थश्छन्दो
व्याकरण श्रुतिः ॥ ७८॥
स्मृतिर्गाथोपशान्तश्च पुराणः
प्राणचञ्चुरः ।
वामनश्च जगत्कालः सुकृतश्च युगाधिपः
॥ ७९॥
उद्गीथः प्रणवो भानुः स्कन्दो
वैश्रवणस्तथा ।
अन्तरात्मा हृषीकेशः पद्मनाभः
स्तुतिप्रियः ॥ ८०॥
परश्वधायुधः शाखी सिंहगः सिंहवाहनः
।
सिंहनादः सिंहदंष्ट्रो नगो
मन्दरधृक्सरः ॥ ८१॥
सह्याचलनिवासी च महेन्द्रकृतसंश्रयः
।
मनोबुद्धिरहङ्कारः कमलानन्दवर्धनः ॥
८२॥
सनातनतमः स्रग्वी गदी शङ्खी
रथाङ्गभृत् ।
निरीहो निर्विकल्पश्च
समर्थोऽनर्थनाशनः ॥ ८३॥
अकायो भक्तकायश्च माधवोऽथ
सुरार्चितः ।
योद्धा जेता महावीर्यः शङ्करः
सन्ततः स्तुतः ॥ ८४॥
विश्वेश्वरो
विश्वमूर्तिर्विश्वारामोऽथ विश्वकृत् ।
आजानुबाहुः सुलभः परं ज्योतिः
सनातनः ॥ ८५॥
वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः
सर्वभूताशयस्थितः ।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः
सहस्रपात् ॥ ८६॥
ऊर्ध्वरेताः ऊर्ध्वलिङ्गः प्रवरो
वरदो वरः ।
उन्मत्तवेशः प्रच्छन्नः
सप्तद्वीपमहीप्रदः ॥ ८७॥
द्विजधर्मप्रतिष्ठाता वेदात्मा
वेदकृच्छ्रयः ।
नित्यः सम्पूर्णकामश्च सर्वज्ञः
कुशलागमः ॥ ८८॥
कृपापीयूषजलधिर्धाता कर्ता परात्परः
।
अचलो निर्मलस्तृप्तः स्वे महिम्नि
प्रतिष्ठितः ॥ ८९॥
असहायः सहायश्च जगद्धेतुरकारणः ।
मोक्षदः कीर्तिदश्चैव प्रेरकः
कीर्तिनायकः ॥ ९०॥
अधर्मशत्रुरक्षोभ्यो वामदेवो महाबलः
।
विश्ववीर्यो महावीर्यो श्रीनिवासः
सतां गतिः ॥ ९१॥
स्वर्णवर्णो वराङ्गश्च सद्योगी च
द्विजोत्तमः ।
नक्षत्रमाली सुरभिर्विमलो
विश्वपावनः ॥ ९२॥
वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो
बीजवाहनः ।
निदाघस्तपनो मेघो नभो योनिः पराशरः
॥ ९३॥
सुखानिलः सुनिष्पन्नः शिशिरो
नरवाहनः ।
श्रीगर्भः कारणं जप्यो दुर्गः
सत्यपराक्रमः ॥ ९४॥
आत्मभूरनिरुद्धश्च दत्तात्रेयस्त्रिविक्रमः
।
जमदग्निर्बलनिधिः पुलस्त्यः
पुलहोऽङ्गिराः ॥ ९५॥
वर्णी वर्णगुरुश्चण्डः कल्पवृक्षः
कलाधरः ।
महेन्द्रो दुर्भरः सिद्धो
योगाचार्यो बृहस्पतिः ॥ ९६॥
निराकारो विशुद्धश्च व्याधिहर्ता
निरामयः ।
अमोघोऽनिष्टमथनो मुकुन्दो विगतज्वरः
॥ ९७॥
स्वयंज्योतिर्गुरुतमः
सुप्रसादोऽचलस्तथा ।
चन्द्रः सूर्यः शनिः केतुर्भूमिजः
सोमनन्दनः ॥ ९८॥
भृगुर्महातपा दीर्घतपाः सिद्धो
महागुरुः ।
मन्त्री मन्त्रयिता मन्त्रो वाग्मी
वसुमनाः स्थिरः ॥ ९९॥
अद्रिरद्रिशयो शम्भुर्माङ्गल्यो
मङ्गलोवृतः ।
जयस्तम्भो जगत्स्तम्भो बहुरूपो
गुणोत्तमः ॥ १००॥
सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवतात्मा
विरूपधृक् ।
चतुर्वेदश्चतुर्भावश्चतुरश्चतुरप्रियः
॥ १०१॥
आद्यन्तशून्यो वैकुण्ठः कर्मसाक्षी
फलप्रदः ।
दृढायुधः स्कन्दगुरुः परमेष्ठी
परायणः ॥ १०२॥
कुबेरबन्धुः श्रीकण्ठो देवेशः
सूर्यतापनः ।
अलुब्धः सर्वशास्त्रज्ञः शास्त्रार्थः
परमःपुमान् ॥ १०३॥
अग्न्यास्यः पृथिवीपादो द्युमूर्धा
दिक्ष्रुतिः परः ।
सोमान्तः करणो ब्रह्ममुखः
क्षत्रभुजस्तथा ॥ १०४॥
वैश्योरुः शूद्रपादस्तु
नदीसर्वाङ्गसन्धिकः ।
जीमूतकेशोऽब्धिकुक्षिस्तु वैकुण्ठो
विष्टरश्रवाः ॥ १०५॥
क्षेत्रज्ञः तमसः पारी भृगुवंशोद्भवोऽवनिः
।
आत्मयोनी रैणुकेयो महादेवो गुरुः
सुरः ॥ १०६॥
एको नैकोऽक्षरः श्रीशः
श्रीपतिर्दुःखभेषजम् ।
हृषीकेशोऽथ भगवान् सर्वात्मा
विश्वपावनः ॥ १०७॥
विश्वकर्मापवर्गोऽथ लम्बोदरशरीरधृक्
।
अक्रोधोऽद्रोह मोहश्च
सर्वतोऽनन्तदृक्तथा ॥ १०८॥
कैवल्यदीपः कैवल्यः साक्षी चेताः
विभावसुः ।
एकवीरात्मजो भद्रोऽभद्रहा
कैटभार्दनः ॥ १०९॥
विबुधोऽग्रवरः श्रेष्ठः
सर्वदेवोत्तमोत्तमः ।
शिवध्यानरतो दिव्यो नित्ययोगी
जितेन्द्रियः ॥ ११०॥
कर्मसत्यं व्रतञ्चैव
भक्तानुग्रहकृद्धरिः ।
सर्गस्थित्यन्तकृद्रामो
विद्याराशिर्गुरूत्तमः ॥ १११॥
रेणुकाप्राणलिङ्गं च भृगुवंश्यः
शतक्रतुः ।
श्रुतिमानेकबन्धुश्च शान्तभद्रः
समञ्जसः ॥ ११२॥
आध्यात्मविद्यासारश्च कालभक्षो
विश्रृङ्खलः ।
राजेन्द्रो भूपतिर्योगी निर्मायो
निर्गुणो गुणी ॥ ११३॥
हिरण्मयः पुराणश्च बलभद्रो
जगत्प्रदः ।
वेदवेदाङ्गपारज्ञः सर्वकर्मा महेश्वरः
॥ ११४॥
परशुराम सहस्रनाम स्तोत्रम्
फलश्रुतिः
एवं नाम्नां सहस्रेण तुष्टाव
भृगुवंशजम् ।
श्रीरामः पूजयामास प्रणिपातपुरःसरम्
॥ १॥
इस प्रकार सहस्र (हजारों) नामों से
भगवान श्री राम ने भृगुवंशज (परशुराम जी) की स्तुति की,
और उन्हें प्रणाम करते हुए उनकी पूजा की।
कोटिसूर्यप्रतीकाशो जटामुकुटभूषितः
।
वेदवेदाङ्गपारज्ञः स्वधर्मनिरतः
कविः ॥ २॥
जो कोटि (करोड़ों) सूर्यों के समान
प्रकाशमान, जटाओं और मुकुट से सुशोभित,
वेद और वेदांगों के ज्ञाता, अपने धर्म में लीन
रहने वाले कवि (या ज्ञानी) है ।
ज्वालामालावृतो धन्वी तुष्टः प्राह
रघूत्तमम् ।
सर्वैश्वर्यसमायुक्तं तुभ्यं प्रणति
रघूत्तमम् ॥ ३॥
आग की माला से घिरे,
धनुषधारी (परशुराम) संतुष्ट होकर रघु के श्रेष्ठ पुत्र (राम) से
बोले, सभी ऐश्वर्यों से युक्त हे रघूत्तम (राम), मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ ।
स्वतेजो निर्गतं तस्मात्प्राविशद्राघवं
ततः ।
यदा विनिर्गतं तेजः ब्रह्माद्याः
सकलाः सुराः ॥ ४॥
चेलुश्च ब्रह्मसदनं च कम्पे च
वसुन्धरा ।
ददाह भार्गवं तेजः प्रान्ते वै
शतयोजनाम् ॥ ५॥
उस (परशुराम) से उसका तेज (दिव्य
शक्ति) निकला और फिर, वह तेज राघव (श्री
राम) में प्रवेश कर गया, जब (उनका) तेज बाहर निकला/प्रकट हुआ,
तब ब्रह्मा सहित सभी देवता (परशुराम जी के तेज से) काँपने लगे (और) पृथ्वी भी काँप
उठी, (तब) परशुराम जी का वह तेज सौ योजन दूर तक फैल गया।
अधस्तादूर्ध्वतश्चैव हाहेति
कृतवाञ्जनः ।
तदा प्राह महायोगी प्रहसन्निव
भार्गवः ॥ ६॥
नीचे से ऊपर तक (हर दिशा में) 'हाहा' की ध्वनि (आवाज़) करने वाले (लोग/असुर/राक्षस)
थे। फिर महायोगी परशुराम ने हंसते हुए कहा (उन्हें संबोधित किया)।
श्रीभार्गव उवाच -
मा भैष्ट सैनिका रामो मत्तो भिन्नो
न नामतः ।
रूपेणाप्रतिमेनापि
महदाश्चर्यमद्भुतम् ।
संस्तुत्य प्रणायाद्रामः
कृताञ्जलिपुटो।ब्रवीत् ॥ ७॥
तब परशुराम (जो स्वयं राम के अवतार
हैं) उन्हें संबोधित करते हुए कहते हैं कि वे (परशुराम) और राम एक ही हैं,
वे नाम और रूप दोनों में अभिन्न हैं।
तब भगवान श्रीराम,
परशुराम जी के प्रति सम्मान और विनय भाव से, हाथ
जोड़कर उनका अभिवादन करते हुए अपनी बात कहते हैं।
श्रीराम उवाच -
यद्रूपं भवतो लब्धं सर्वलोकभयङ्करम्
।
हितं च जगतां तेन देवानां
दुःखनाशनम् ॥ ८॥
श्रीराम ने कहा- आपने (परशुराम) जो
रूप धारण किया है, वह सभी लोकों में
भय उत्पन्न करने वाला है (फिर भी) वह देवताओं के लिए कल्याणकारी और दुखों का नाश
करने वाला है।
जनार्दन करोम्यद्य विष्णो
भृगुकुलोद्भवः ।
आशिषो देहि विप्रेन्द्र
भार्गवस्तदनन्तरम् ॥ ९॥
उवाचाशीर्वचो योगी राघवाय महात्मने
।
परं प्रहर्षमापन्नो भगवान्
राममब्रवीत् ॥ १०॥
हे जनार्दन (विष्णु),
हे श्रेष्ठ ब्राह्मण (विष्णु), मुझे आशीर्वाद
दो। भृगु वंश में उत्पन्न भगवान परशुराम, जो कि एक महान योगी
थे, भगवान राम को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें
आशीर्वाद देने लगे।
श्रीभार्गव उवाच -
धर्मे दृढत्वं युधि शत्रुघातो
यशस्तथाद्यं परमं बलञ्च ।
योगप्रियत्वं मम सन्निकर्षः सदास्तु
ते राघव राघवेशः ॥ ११॥
श्रीभार्गव(परशुराम) ने कहा- हे
राघव (राम), हे राघवेश (राघवों के ईश्वर),
धर्म में दृढ़ता, युद्ध में शत्रुओं का नाश,
और यश (कीर्ति) प्राप्त करना, यही सबसे बड़ी
शक्ति है, योग में रमण करने वाला मेरा सान्निध्य आपके पास
सदा बना रहे ।
तुष्टोऽथ राघवः प्राह मया प्रोक्तं
स्तवं तव ।
यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा
द्विजोत्तमान् ॥ १२॥
द्विजेष्वकोपं पितृतः प्रसादं शतं
समानामुपभोगयुक्तम् ।
कुले प्रसूतिं मातृतः प्रसादं समां
प्राप्तिं प्राप्नुयाच्चापि दाक्ष्यम् ।
प्रीतिं चाग्र्यां बान्धवानां
निरोगम्
कुलं प्रसूतैः पौत्रवर्गैः समेतम् ॥
१३॥
अश्वमेध सहस्रेण फलं भवति तस्य वै ।
तब प्रसन्न होकर राम (परशुराम) बोले,
जो इस मेरे द्वारा कहे गए स्तोत्र को पढ़ेगा, सुनेगा
या श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सुनाएगा उसे द्विजों (ब्राह्मणों) का क्रोध शांत होना,
पितरों का प्रसाद मिलना, सौ वर्षों तक
(दीर्घायु) उपभोगयुक्त जीवन, कुल में संतान प्राप्ति, मातृपक्ष
से प्रसाद, सभी क्षेत्रों में सम्मान प्राप्ति और निपुणता
(दाक्ष्य), आनंद, आरोग्य, मित्रों और बन्धु-बांधवों सहित सुख, पौत्र-पौत्रियों से युक्त कुल और सहस्र अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता
है।
घृताद्यैः स्नापयेद्रामं स्थाल्यां
वै कलशे स्थितम् ॥ १४॥
नाम्नां सहस्रेणानेन श्रद्धया
भार्गवं हरिम् ।
सोऽपि यज्ञसहस्रस्य फलं भवति
वाञ्छितम् ॥ १५॥
जो भगवान परशुराम को घी आदि से कलश से
स्नान कराकर श्रद्धापूर्वक भार्गव (परशुराम) के इस हज़ार नामों (सहस्त्रनाम) का
पाठ करता है उसे इच्छित सहस्र यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
पूज्यो भवति रुद्रस्य मम चापि
विशेषतः ।
तस्मान्नाम्नां सहस्रेण पूजयेद्यो
जगद्गुरुम् ॥ १६॥
जो व्यक्ति सहस्र नामों से (भगवान)
जगद्गुरु (विश्व के गुरु) की पूजा करता है, वह रुद्र (शिव) और स्वयं परशुराम के
लिए अत्यंत प्रिय और पूजनीय बन जाता है।
जपन्नाम्नां सहस्रं च स याति परमां
गतिम् ।
श्रीः कीर्तिर्धीर्धृतिस्तुष्टिः
सन्ततिश्च निरामया ॥ १७॥
अणिमा लघिमा
प्राप्तिरैश्वर्याद्याश्च च सिद्धयः ।
सर्वभूतसुहृत्त्वं च लोके वृद्धीः
परा मतिः ॥ १८॥
जो सहस्त्र (हजारों) नामों का जाप
करता है,
वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है, और
उसे लक्ष्मी (समृद्धि), कीर्ति (यश), धी
(बुद्धि), धृति (धैर्य), तुष्टि (संतुष्टि),
निरामय संतति (रोगमुक्त संतान) , अणिमा
(अतिसूक्ष्म होने की शक्ति), लघिमा (अति-हल्का होने की
शक्ति), प्राप्ति (इच्छित वस्तु प्राप्त करना), ऐश्वर्य (पूर्ण ऐश्वर्य) व अष्टसिद्धि, सभी
प्राणियों के प्रति मैत्रीभाव, सांसारिक उन्नति और और अंत
में परम ज्ञान (परा मति) को प्राप्त करता है।
भवेत्प्रातश्च मध्याह्नं सायं च
जपतो हरेः ।
नामानि ध्यायतो राम सान्निध्यं च
हरेर्भवेत् ॥ १९॥
जो प्रातः,
दोपहर और शाम को राम (परशुराम) के नामों का जो ध्यान करता है, उसे
भगवान हरि (विष्णु) का सान्निध्य (निकटता) प्राप्त होता है।
अयने विषुवे चैव जपन्त्वालिख्य
पुस्तकम् ।
दद्याद्वै यो वैष्णवेभ्यो नष्टबन्धो
न जायते ॥ २०॥
जो व्यक्ति अयन
(उत्तरायण/दक्षिणायन) और विषुव (विषुवत्) के समय जप करके पुस्तक लिखता है और
वैष्णवों को देता है, वह बंधनों से मुक्त
हो जाता है और उसे कभी बंधन में नहीं पड़ना पड़ता।
न भवेच्च कुले तस्य
कश्चिल्लक्ष्मीविवर्जितः ।
वरदो भार्गवस्तस्य लभते च सतां
गतिम् ॥ २१॥
उसके कुल (परिवार) में कोई भी
लक्ष्मी (धन) से वंचित (गरीब) नहीं होता, और
भार्गव (परशुराम) उसके लिए वरदान देने वाले होते हैं तथा वह सज्जनों (सत्पुरुषों)
की गति (मोक्ष या उत्तम लोक) को प्राप्त करता है।
इति श्रीअग्निपुराणे दाशरथिरामप्रोक्तं श्रीपरशुरामसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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