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चीनाचार तन्त्र पटल ५

चीनाचार तन्त्र पटल ५    

चीनाचार तन्त्र पटल ५ में भगवान् बुद्ध ने वशिष्ठ मुनि से महाचीनक्रम के कौलाचार में ८ निषिद्ध बतलाना, पार्वती ने भगवान् शंकर से पंचमकारों से सिद्धि संशय प्रश्न पूछना, महादेव का प्राचीन मुनियों का कथा बतलाना तथा वशिष्ठ मुनि का महाचीनाचारक्रम से देवी तारा की सिद्धि प्राप्त करने का वर्णन है।

चीनाचार तन्त्र पटल ५

चीनाचारतन्त्रम् पञ्चमः पटलः

Chinachar tantram chapter 5

चीनाचार तंत्र पांचवां पटल

चीनाचारतन्त्र पंचम पटल

चीनाचारतन्त्रम्

पञ्चमः पटलः

चीनाचारतन्त्र पटल पांच    

अथ पञ्चमः पटलः

श्री भगवानुवाच

समयं तत्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रामानसः ।

येन विज्ञानमात्रेण सिद्धो भवति साधकः ॥ 1 ॥

श्रीभगवान् बुद्ध ने कहा कि हे पुत्र वशिष्ठ ! जो कुलधर्म (समय) है, उसे मैं तुम्हें बताऊंगा, जिसका विशेष ज्ञान हो जाने से साधक सिद्ध पुरुष हो जाता है ।। 1 ।।

घातयेद् गोपयेत्तन्न निन्दयेन्न विलोकयेत् ।

पूजयेद् भावयेच्चैव वर्जयेन्न तु गोपयेत् ॥ 2 ॥

इस कौलधर्म के साथ घात नहीं करना चाहिए और न ही इसे छिपाना चाहिए तथा कभी इसकी निन्दा नहीं करनी चाहिए और न ही इसे देखना चाहिए ।। 2 ।।

कामं क्रोधं तु मात्सर्यं विकारं चिन्तनोद्भवम् ।

निद्रां लज्जा दौर्मनस्यं घातयेदष्टकं प्रिये य ॥3॥

काम, क्रोध, मात्सर्य, मन के विकार, चिन्तन करने से पैदा हुए भाव, निद्रा, लज्जा, दुर्मनस्यता (अर्थात् मन में किसी के प्रति बुरा भाव) इन आठों को नष्ट कर देना चाहिए ।। 3 ।।

मन्त्रं मुद्राऽक्षसूत्रं च योगिनीवरसङ्गमम् ।

भैरवागमनाचारमेतत् सर्वं प्रगोपयेत् ॥4॥

कौलधर्म में जिस मन्त्र का प्रयोग हो और कौल में की गयी मुद्रा जो मद्य-पान के बाद पैदा होती है, उसे अक्षसूत्र को तथा योगिनी और वर के सङ्गम (सम्भोग) को और भैरव के आगमन के आचरण को, इस सबको अच्छी तरह गुप्त रखना चाहिए ।। 4 ।।

कुलं गुरुं सुधां विद्यां साधकान् शोभितं तथा ।

शुभाशुभञ्च यत् कर्म निन्द्यं नैव कदाचन ॥ 5 ॥

कुल, गुरु, सुधा (सुरा), साधकों, विद्या, शोभित तथा शुभ और अशुभ जो कर्म हैं, वे कभी भी निन्दनीय नहीं है। अर्थात् कुल की निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये, अन्य पाण्डुलिपि में गुरु के स्थान पर सुरा शब्द है, अतः सुरा की निन्दा भी नही करनी चाहिये। इसी तरह सुधा/अमृत की निन्दा भी नहीं करनी चाहिये। साधकों और कहीं कोई शोभत हो रहा हो, उसकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। साथ ही शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों की निन्दा नहीं करनी चाहिये। यहाँ पर अशुभ कर्म की निन्दा न करना तो उचित कथन नहीं है; परन्तु इसका आशय है कि निन्दा मत करो; परन्तु स्वयं अशुभ मत करो। एक पाण्डुलिपि में सुधा के स्थान पर सुरा शब्द है और साधकान् शोभितं के स्थान पर साधिकामधिकम् पाठ है। जिसके अनुसार अर्थ होगा कि कौलाचार में जो कुलगुरु होते हैं, उसमें जो सुरापान किया जाता है तथा साधक जो भी कर्म करते हैं, उनकी कभी निन्दा नहीं करनी चाहिए ।। 5 ।।

कन्यायोनिं पशुक्रीडां नग्नां स्त्रीं प्रकटस्तनीम् ।

द्यूतविग्रहपापार्थान् सर्वथा न विलोकयेत् ॥6॥

कन्या की योनि, पशुक्रीडा, नंगी स्त्री, खुले स्तनवाली स्त्री, जुआ, लड़ाई झगड़ा आदि पाप पूर्ण कार्यों को किसी भी प्रकार से नहीं देखना चाहिए।।6।।

गुरुं देवीं तथा साधून् शक्तिं चात्मानमव्ययम् ।

भक्तितः साधकान् सर्वान् पूजयेच्च प्रयत्नतः ॥ 7 ॥

गुरु, देवी तथा साधुओं (सज्जन पुरुषों) की शक्ति की, कभी नष्ट न होने वाली आत्मा की तथा भक्ति से युक्त सब साधकों की प्रयत्न पूर्वक पूजा करनी चाहिए ।। 7 ।।

गुरुवाक्योपदेशञ्च साधूक्तिमिष्टदेवताम् ।

स्वधर्मश्च कुलाचारं सदात्मानं च भावयेत् ॥8 ॥

गुरु के वाक्योपदेश को, साधु की उक्ति (कथन) को अपने इष्ट देवता को, अपने धर्म को, कुलाचार को, अपनी आत्मा में विशेष रूप से भावित कर लेना चाहिए। अर्थात् उपर्युक्त सबको अपनी आत्मा में पूरी तरह समाविष्ट कर लेना चाहिए ॥ ॥ 8 ॥

अगम्यागमनञ्चैव धूर्तगोष्ठीच वर्जयेत् ।

अनृतं पापगोष्ठीञ्च वर्जयेत् कुलनायकः ॥9॥

अगम्य जो गमन के योग्य नहीं है, उसका आगमन और धूर्तों के साथ बैठक, अनृत (असत्य) और पापियों के साथ बैठक, ये सब साधक को छोड़ देना चाहिए ।।9।।

विण्मूत्रशोणितक्लेदहीनाङ्गीं पिबतीं सुराम् ।

कपाहरणञ्चैव अष्टावेव जुगुप्सयेत् ॥ 10 ॥

मल, मूत्र, रक्त, क्लेद (घाव से निकलने वाले मवाद को) जिसका कोई अंग टूटा-फूटा हो और सुरा पान करती हुई स्त्री तथा कपालहरण करने वाले इन आठों से घृणा करनी चाहिए ।।10।।

इत्येवं समयाचारं यः करोति हि साधकः ।

सम्प्राप्य देवीसम्भावं जीवन्मुक्तिञ्च गच्छति । 11 ॥

इस प्रकार जो साधक समयाचार करता है अर्थात् कहे हुए आचार का पालन करता है, वह देवी के समान भाव को प्राप्त कर जीवित रहता हुआ ही मुक्ति को प्राप्त करता है।।11।।

एवं तारामतं प्रोक्तं सर्वसिद्धिरनुष्ठिता ।

अनेन चीनाचारेण साधकः स्वयमीरितः ॥12 ॥

विष्णु रूप भगवान् बुद्ध ने वशिष्ठ मुनि से कहा कि इस प्रकार मैंने सब सिद्धियों से अनुष्ठित तारामत को तुमसे कहा है। इस चीनाचार के द्वारा साधक स्वयं प्रेरित होता है ।।12।।

अनेन चीनाचारेण तारामाराध्य साधकः ।

यद्वा न लभते वस्तु तन्नास्ति भुवनत्रये ॥13॥

इस चीनाचार द्वारा साधक तारा देवी की आराधना करके साधक वही वस्तु नहीं प्राप्त करता है, जो तीनों लोकों में नहीं है।।13।।

श्रीदेव्युवाच

देव! देव! महादेव! जगत्प्रलयकारक ! ।

कुलाचारेण मद्याद्यैः कथं सिद्धिर्भवेत् प्रभो ! ॥14॥

यदेतन्मदिरापानं यत् परस्त्रीनिषेवणम् ।

अधर्मकारणं सर्वं छिन्धि मे संशयं विभो ॥15

अब जो भगवान् बुद्ध ने वशिष्ठ से कहा था, उसके विषय में पार्वती ने सदाशिव भगवान् शंकर से पूंछा हे देवों के देव महादेव ! हे संसार की प्रलय करने वाले प्रभो ! यह बताइये कि कुलाचार द्वारा मद्य-मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन इन पंचमकारों से कैसे सिद्धि हो जानी चाहिए, क्यों कि यह जो मदिरा पीना और स्त्री के साथ सम्भोग करना है। यह सब तो अधर्म का कारण है। अतः हे भोलेनाथ ! मुझे सन्देह है, इस पापपूर्ण कर्म से कैसे सिद्धि होगी। मुझे संशय है, अतः इस संशय को दूर कीजिए ।।14-15।।

श्रीशिव उवाच

साधु पृष्टं त्वया देवि ! कथयामि शृणुष्व मे ।

पुरा दारुमये रम्ये मुनयः साधनापराः ॥16॥

मद्यपानं चिकीर्षन्ति परस्त्रीघर्षणञ्च वै ।

तान् दृष्ट्वा सूचिताधर्मान् ब्रह्मा मां पर्युपस्थितः ॥17॥

भगवान् शंकर ने कहा कि तुमने उचित ही पूछा है। अब सुनो मैं तुम्हें बताता हूँ। प्राचीन काल में बहुत पहले दारुमय (वृक्षों से युक्त) रम्य स्थान में मुनि लोग साधन में तत्पर थे तथा वे मद्यपान करना चाहते थे तथा दूसरों की स्त्रियों का घर्षण करना चाहते थे। इस प्रकार अधर्म को सूचित करने वाले उनको देखकर ब्रह्मा जी मेरे पास आये।।16-17।।

देव! देव! महादेव! सृष्टिस्थितिलयात्मक ! ।

एते दारुवने पापा मद्यपानरतास्तथा ॥18 ॥

परस्त्रियं घर्षयन्ति मद्यं खादन्ति नित्यशः ।

दिगम्बरा मुण्डिताश्च गतिरेषां कथं भवेत् ॥19॥

तब हे पार्वति ! ब्रह्मा जी ने मुझसे कहा कि हे देवों के देव ! महादेव! हे संसार की रचना पालन और संहार करने वाले शंकर जी ! मुझे यह बताइये कि दारुवन में ये दिगम्बर नंगे रहने वाले मुण्डित, मद्य पीने में रत पापी मुनि लोग नित्य मद्यपान करते हैं और दूसरों की स्त्रियों का घर्षण करते हैं। इनकी गति क्या होती है।।18-19।।

इति ब्रह्मवचः श्रुत्वा तमुवाच ह्यहं प्रिये ।

पितामह! न जानासि चीनाचारक्रमं भवान् ॥20॥

इस प्रकार तब शंकर ने पार्वती से कहा कि हे पार्वति ! ब्रह्मा जी के वचन को सुनकर मैंने उन ब्रह्मा जी से कहा कि हे पितामह! आप चीनाचारक्रम को नहीं जानते हैं ।। 20।।

उग्रतारां महाविद्यामेते नित्यं जपन्ति हि ।

पूजयन्ति च तामेव चीनाचारपरायणाः ॥21॥

ये सब चीनाचारक्रम परायण मुनि लोग उग्रतारा नामक महाविद्या को नित्य जपते हैं और उसी की पूजा करते हैं।।21।।

साधकाः सर्व एवैते महात्मानो महाशयाः ।

जीवन्मुक्तिगताः सर्वे देवीभक्तिपरायणाः ॥ 22 ॥

ये सभी उग्रतारा देवी को सिद्ध करने वाले हैं, महान् आत्मा और महान् पुरुष हैं। ये सब देवी भक्ति में परायण हैं और इन सब ने जीवित रहते हुए मुक्ति प्राप्त कर ली है ।। 22।।

परस्त्रीघर्षणाच्चैव मद्यपानाच्च नित्यशः ।

अश्वमेधादप्यधिकं लभन्ते फलमुत्तमम् ॥23॥

शंकरजी ने कहा कि हे पार्वति ! दूसरों की स्त्री के घर्षण से और मद्यपान करने से अश्वमेध यज्ञ आदि के फल से भी उत्तम फल प्राप्त होता है।। 23।।

एतांस्तु निन्दयेद् यस्तु महापातकवान् भवेत् ।

इतो दूरं प्रयाहि त्वं मा मां स्पृश पितामह ॥ 24 ॥

शंकर जी ने पार्वती से कहा कि हे पार्वति ! तब मैंने उन ब्रह्मा जी से कहा कि हे पितामह! इस चीनाचार क्रम में लगे हुए, मद्यपानरत दूसरों की स्त्रियों का घर्षण करने वाले मुनियों की जो निन्दा करे, वह महान् पापी होता है तथा आप निन्दा कर रहे हैं; इसलिए आप यहाँ से दूर जाइये। मेरा स्पर्श मत कीजिए: क्योंकि आप पापी हैं।। 24।।

परं विस्मयमापन्नः संशयाविष्टमानसः ।

किमिदं शम्भुना प्रोक्तं वेदद्याविधानकृत् ॥ 25 ॥

इति सञ्चिन्तयन् मौनं प्राह पङ्कजसम्भवम् ।

उवाच साधकास्ते वै जीवन्मुक्ता महाशयाः ॥26॥

परस्त्रियं घर्षयन्ति मद्यं खादन्ति नित्यशः ।

निर्वाणं ते च यास्यन्ति भगवत्याः प्रसादतः ॥27॥

इस प्रकार जब शंकरजी ने कहा तो ब्रह्मा जी को महान् आश्चर्य हुआ तथा उनका मन सन्देह से घिर गया और वे सोचने लगे कि ये भूतभावन भगवान् शंकर कह क्या रहे हैं। ये वेद की विद्या के विधान करने वाले ऐसा क्यों कह रहे हैं। ऐसा ब्रह्मा जी सोच रहे थे। इस प्रकार सोचते हुए मौन ब्रह्माजी से शंकर जी ने कहा कि वे साधक महान् आशय वाले हैं तथा जीवित रहते हुए ही मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं। नित्य मदिरा पान करते हैं और दूसरों की स्त्रियों का घर्षण करते हैं। अतः ये भगवती के प्रसाद से अवश्य निर्वाण प्राप्त करेंगे ॥ 25-27॥

चीनाचारं समाश्रित्य मुनयस्ते महाशयाः ।

तत्वज्ञानमयाः सर्वे विहरन्ति गृहीतले ॥28॥

त्वं शीघ्रं गच्छ तत्रैव तान् प्रसादय पद्मज ।

तेषु रुष्टेषु भवतो ब्रह्मत्वमपयास्यति॥29॥

शंकरजी ने कहा कि हे पार्वति ! मैने ब्रह्मा जी से कहा कि ये मुनि लोग चीनाचार का आश्रय लेकर तत्त्वज्ञानयुक्त होकर इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं। अत: हे ब्रह्मा जी तुम शीघ्र जाओ और वहाँ जाकर उन्हें प्रसन्न करो। उनके रूष्ट हो जाने पर तुम्हारा ब्रह्मत्व नष्ट हो जायेगा ॥28-29॥

महादेवेन यत् प्रोक्तं सत्यमेतन्न संशयः ।

आवयोः स न संस्पृशेत् साधकान् यो विनिन्दति ॥30॥

महादेव ने जो कहा यह सत्य है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। अत: हम दोनों को उसका स्पर्श भी नहीं करना चाहिए, जो ऐसे साधकों की निन्दा करता है ॥ 30 ॥

श्रीशिव उवाच

ततो हि मां प्रणम्यासौ परमेष्ठी पितामहः ।

गत्वा दारुवनं सर्वान् प्रणनाम मुनीश्वरान् ॥31॥

तुष्टाव परया भक्त्या स्तोत्रर्बहुविधैरपि ।

तेषां प्रसादमासाद्य कृतकृत्योऽभवद् विधि: ॥32॥

अब शंकर जी ने पार्वती से कहा कि हे देवि ! उसके बाद उन प्रजापति ब्रह्मा ने मुझे प्रणाम किया और उन्होंने दारुवन में जाकर अनेकों प्रकार की स्तुतियों से भी पराभक्ति द्वारा उन मुनियों को सन्तुष्ट किया (प्रसन्न किया) और फिर उनके प्रसाद (उनकी प्रसन्नता) को पाकर ब्रह्माजी कृत- कृत्य हो गये ॥31-32।।

श्रीदेव्युवाच

महाचीनक्रमाचारं ततो बुद्धादवाप्य च ।

वशिष्ठः स किमकरोत् तन्मे ब्रूहि महेश्वर ॥33॥

इसके बाद श्री देवी पार्वती ने भगवान् शंकर से कहा कि हे भोलेनाथ ! जब मुनि वशिष्ठ ने महात्मा बुद्ध से महाचीनक्रमाचार को प्राप्त कर लिया, तब मुनि वशिष्ठ ने उसे प्राप्त कर क्या किया? हे महेश्वर ! यह बताइये ॥33॥

श्रीशिव उवाच

महाचीनक्रमाचारं ततो देवादवाप्य सः ।

नीलाचलं समासाद्य कुलाचारपरायणः ॥34॥

ततोऽक्षमालां युवतीं चाण्डालीं रमयन्मुनिः ।

जपन् स साधयामास तारां मुक्तिपरदायिकाम् ॥35॥

श्री शिव ने पार्वती से कहा कि हे देवि ! उसके बाद महाचीनक्रमाचार का ज्ञान प्राप्त करके कुलाचार परायण उन वशिष्ठ ने चीन में नीलपर्वत पर जाकर अक्षमाला जपते हुए चाण्डाली युवती के साथ सम्भोग करते हुए मुक्ति प्रदान करने वाली तारा देवी की साधना की ॥34-35॥

तारामाराधयामास कृतकृत्योऽभवत् तदा ।

साक्षाद् भूता महादेवी तारा संसारतारिणी ॥36॥

तारोवाच वशिष्ठ त्वं वरान् वृणु यथेप्सितान् ॥37 ।।

जब वशिष्ठ मुनि ने तारादेवी की आराधना की, तब वे कृत-कृत्य हो गये और फिर उसके बाद संसार का उद्धार करने वाली महादेवी तारा उनके सामने साक्षात् उपस्थित हो गयीं और फिर तारा देवी मुनि वशिष्ठ से बोली कि वशिष्ठ तुम जैसा चाहो वैसा वर मांगो ॥36-37।।

श्रीशिव उवाच

तारादेवि ! जगन्मातर्ज्ञानविज्ञानदायिनि ! ।

वरमेकं वृणोमि त्वं प्रसन्ना यदि मे शिवे ॥38॥

महाचीनक्रमाचारैर्यस्त्वां सम्पूजयिष्यति ।

सर्वदा तस्य मातस्त्वं सुप्रसन्ना भविष्यसि ॥39॥

श्री शिव ने कहा कि हे पार्वति ! जब तारा देवी ने साक्षात् उपस्थित होकर वशिष्ठ से यथोच्छित वर मांगने को कहा, तब वशिष्ठ ने तारा देवी को कहा कि हे शिवे! यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो एक वर मांगता हूँ कि महाचीन क्रमाचार पद्धति से जो तुम्हारी पूजा करेगा, उस पर हे माता तुम सदा प्रसन्न रहोगी। यहीं वर मुझे दीजिए ॥38-39॥

चीनाचारेण यःकश्चित् तारां मां पूजयिष्यति ।

स मे पुत्रत्वमापन्नः सत्यं सत्यं न संशयः ॥40॥

उसके बाद जब वशिष्ठ ने उपर्युक्त वर मांगा तब तारा देवी ने कहा कि हे पुत्र ! जो भी चीनाचारक्रम पद्धति से मेरी पूजा करेगा, वह मेरे पुत्रत्व को प्राप्त करेगा अर्थात् वह मेरा पुत्र होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है ।।40।।

इह भोगान् वरान् भुक्त्वा बृहस्पतिरिवापरः ।

अन्ते यास्यति मत्पार्श्वं यत्र मे गणनायकः ॥ 41 ॥

यही नहीं जो मेरी पूजा करेगा, वह इसी लोक में श्रेष्ठ सब प्रकार के भोगों को प्राप्त करके दूसरे बृहस्पति के समान होगा और अन्त में जहाँ मेरे गणनायक हैं, वहाँ मेरे पास पहुंचेगा ।।41।।

रूपयौवनसम्पन्नैर्दिव्यकन्यागणैः सह ।

विहरत्यप्यसौ धीरो यावच्चन्द्रार्कतारकाः ॥42॥

तथा जब वह मेरा भक्त मेरे पास पहुंचेगा तो रूप-यौवन से सम्पन्न दिव्य कन्याओं के साथ जब तक सूर्य चन्द्रमा और तारागण रहेंगे, तब तक विहार करेगा ॥42॥

तत्रापि भविता वत्स योगसिद्धिरनुत्तमा ।

अणिमाद्याः सिद्धयस्त्वां सेविष्यन्ति निरन्तरम् ॥43॥

तथा हे पुत्र ! वहाँ भी वह जिससे कोई उत्तम सिद्धि नहीं है, ऐसी सिद्धि प्राप्त करेगा और फिर अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और ये आठों सिद्धियां निरन्तर सेवा करेंगी ॥ 43॥

इति लब्ध्वा वरं तस्या वशिष्ठोऽसौ महामुनिः ।

नक्षत्रलोकमासाद्य चाद्यापि द्योतते दिवि ॥44॥

इस प्रकार उन देवी तारा से वर प्राप्त करके वे वशिष्ठ मुनि नक्षत्र लोक को प्राप्त करके आज भी स्वर्ग में तारे के रूप में चमक रहे हैं ।।44॥

एष ते कथितो देवि! चीनाचारः सुदुर्लभः ।

समाचारात् साधकेन्द्रो भुक्तिं मुक्तिं लभेद् भुवि ॥45 ॥

अंब शंकरजी ने पार्वती से कहा कि हे देवि । मैंने यह अत्यन्त दुर्लभ चीनाचार तुम्हें बताया है। इसका सम्यक प्रकार से आचरण करने से साधकेन्द्र द्वारा पृथ्वी पर भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करना चाहिए ॥45॥

एतत् सर्वं प्रयत्नेन गोपितव्यं तथा प्रिये ।

यथाऽन्योऽन्येन लभते तथा कार्यं महेश्वरि ॥46॥

तथा हे प्रिये! यह जो मैंने तुम्हें बताया है, उस सबको प्रयत्न द्वारा छिपाना चाहिए। जैसे कि अन्य द्वारा अन्य प्राप्त करे, उसी तरह कार्य करना चाहिए। अर्थात् गुरु परम्परा से प्राप्त करना चाहिए, जैसे कि अन्य गुरु से अन्य शिष्य ने प्राप्त किया, फिर वह शिष्य गुरु बनकर अन्य शिष्यों को बताये, फिर वह गुरु बनकर अन्य शिष्य को बताये। इसी तरह गुरु परम्परा से इसका प्रचलन होना चाहिए ॥ 46 ॥

स्वयोनिमिव देवेशि गोपयेत् पशुसन्निधौ ।

यो भक्तः साधको ज्ञानी तस्मै वक्तव्यमेव हि ॥47 ॥

शंकरजी न कहा हे देवेशि! गूढ़ रहस्य को अपनी योनि के समान मनुष्यों से छिपाना चाहिए तथा जो भक्त साधक और ज्ञानी हो, उसे बता देना चाहिए ॥47॥

आलिङ्गनं चुम्बनं च स्तनयोर्मर्दनं तथा ।

दर्शनं स्पर्शनं योनेर्विकासो लिङ्गघर्षणम् ॥48 ॥

प्रवेशः स्थापनं शक्तेर्नवपुष्पाणि पूजने ।

शंकरजी कहते हैं कि आलिङ्गन, चुम्बन, दोनों स्तनों का मर्दन, देखना (योनि को देखना), स्पर्शन (योनि का छूना), योनि को खोलना और फिर योनि में लिङ्ग को रगड़ना, फिर लिंग को योनि में प्रवेश करना और उसके द्वारा शक्ति का स्थापन; ये नौ पुष्प चीनाचार पूजन में किये जाते हैं ।।48 ॥

विषं पीत्वा सुरां भुक्त्वा मांसं गत्वा रजस्वलाम् ॥49 ॥

यो जपेच्चण्डिकां देवीं तस्य दुःखं पदे पदे ।

विष खाकर, मदिरा पीकर, मांस खाकर, रजस्वला स्त्री के साथ गमन (रमण) करके जो चण्डिका का जप करे, उसको पद-पद पर दुःख होता है ॥49॥

देया विद्यार्थिने विद्या व्याधितेभ्यश्च औषधम् ।

देयं क्षुधार्थिने अन्नं त्रयं स्वर्गस्य लक्षणम् ॥ 50 ॥

हमेशा विद्या चाहने वाले को विद्या देनी चाहिए, रोगी को औषधि देनी चाहिए तथा सदैव भूखे को भोजन देना चाहिए। ये तीनों ही स्वर्ग जाने के लक्षण हैं ॥50॥

।।इति महाचीनाचारसारतन्त्रे सर्वाचारसारोत्तमोत्तमे महाचीनाचारक्रमे पञ्चमः पटलः ॥

।। महाचीनाचारक्रमः समाप्त ।।

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