चीनाचार तन्त्र पटल ४
चीनाचार तन्त्र पटल ४ में कौलधर्म का
वर्णन किया है।
चीनाचारतन्त्रम् चतुर्थः पटलः
Chinachar tantram chapter 4
चीनाचार तंत्र चौथा पटल
चीनाचारतन्त्र चतुर्थ पटल
चीनाचारतन्त्रम्
चतुर्थः पटलः
।। ॐ तारा देव्यै नमः ।।
चीनाचारतन्त्र पटल चार
अथ चतुर्थः पटलः
वशिष्ठ उवाच
कुलेशानि! प्रशस्तानां विहितानां च
लक्षणम् ।
कुलद्रव्यस्य निर्माणं वद
माहात्म्यमेव च ॥1॥
अविधानेन यत्पापं सविधानेन तत् फलम्
।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि वद मे
करुणानिधे ॥ 2 ॥
वशिष्ठ मुनि ने बुद्ध रूपी भगवान्
विष्णु से कहा कि हे भगवन् कुलेशानी देवी के प्रसन्न होने के जो लक्षण हैं और
कुलद्रव्यों का निर्माण तथा उसका माहात्म्य हमें बताइये।। साथ ही यह भी बतलाइये कि
पूजा में विधान न हो सके तो क्या पाप है तथा यदि पूजा में ठीक प्रकार विधान किया
जाये तो उसका क्या फल है? ॥1-2॥
श्रीभगवानुवाच
मुने शृणु प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं
परिपृच्छसि ।
तस्य श्रवणमात्रेण त्रिदशैः समतां
व्रजेत् ॥3 ॥
भगवान् बुद्ध ने कहा कि हे वशिष्ठ
मुनि सुनो ! यदि तुम मुझसे पूंछते हो तो बताऊंगा। उसके सुनने मात्र से मनुष्य की
तीनों दशायें समान हो जाती हैं अर्थात् बाल्यावस्था, यौवनावस्था और वृद्धावस्था तीनों समान हो जाती हैं, भाव
यही कि वह सदा एक सा बना रहता है।।3।।
आधारेण विना पात्रं न हि तृप्यन्ति
मातरः ।
तस्माद् विधिवदाधारं कल्पयेत्
कुलनायकः ॥4॥
आधार के बिना पात्र (साधक) को
मातायें तृप्त नहीं करती है। इसलिए कुलनायक को विधिवत् आधार की कल्पना करनी चाहिए
।।4।।
आधारं त्रिपदं प्राहुः षट्पदं वा
चतुष्पदम् ।
अथवा वर्तुलाकारं कुर्यादतिमनोहरम्
॥5॥
आधार तीन प्रकार का कहते हैं-छः पद
वाला या चार पद वाला अथवा वर्तुलाकार (गोल) होना चाहिए तथा उसे अत्यन्त मनोहर
(सुन्दर) बनाना चाहिए। आधार का अर्थ है कि जहाँ पर पूजा की जाती है,
वहाँ जिस पर पात्र को रखना है ॥5॥
स्वर्ण रौप्यशिलाकूर्म कपालालाबुमृण्यम्
।
पुण्यवृक्षसमुद्भूतं पात्रं
कुर्याद् विचक्षणः ॥6॥
अब पात्र के बारे में बताते हैं कि
पात्र सोने का, चांदी का, पत्थर का, कछुआ का, मनुष्य के
सिर के कपाल का, कुम्हड़े अथवा मिट्टी का अथवा पुण्यवृक्ष की
लकड़ी से बनाना चाहिए ॥6॥
अतिसूक्ष्ममतिस्थूलं छिन्नभिन्नं च
वर्जयेत् ।
अम्भसां द्वादशं प्रस्थं
द्विप्रस्थं पयसस्ततथा ॥ 7 ॥
मुष्टिमात्रं करे देवि ! एकस्मिन्
योजयेच्छुचिः ।
शीतादिरहिते स्थाने स्थापयेद्
दिवसद्वयम् ॥8॥
भगवान् शंकर ने कहा कि हे देवि !
अत्यन्त पतला, अत्यन्त मोटा अथवा छिन्न-भिन्न
(टूटा-फूटा ) पात्र नहीं होना चाहिए। उसके बाद जल के 12 प्रस्थ और दूध के 2 प्रस्थ
एक हाथ में लेना चाहिए और शीतादि से रहित स्थान में दो दिन रखना चाहिए ॥ 7-8 ॥
ततो वह्नौ समारोप्य जम्बालसदृशं
पचेत् ।
अवरोप्य पुनः शीतामवस्थामानयेद्
बुधः ॥ 9 ॥
उसके बाद अग्नि में रखकर जम्बाल
(कीचड़) के समान उसे पकाना चाहिए। फिर उसे निकालकर शीत अवस्था में लाना चाहिए
अर्थात् उसे ठण्डा करना चाहिए ॥ 9 ॥
विशेष—'जम्बाल' का अर्थ है-कीचड़ के समान गाढ़ा होने तक ।
पयः प्रस्थेन पिष्ट्वा तु
हस्ताभ्यां मेलयेत्ततः ।
सम्यगर्धक्रमेणैव पयसालोड्य मेलयेत्
॥10॥
दूध को पत्थर से पीसकर उसके बाद
दोनों हाथों से मिलाना चाहिए, फिर ठीक
प्रकार से अर्धक्रम से दूध से आलोडन कर अर्थात् रई से मथकर मिला देना चाहिए ॥10॥
सैषा पैष्टीति विख्याता पूजिता
देवतानरैः।
गुरुं स्मरन् पिबन् मद्यं खादन्
मांसं न दोषभाक् ॥ 11 ॥
इस प्रकार वह यह पैष्टी इस नाम से
विख्यात हुई तथा यह पैष्टी देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित है। इस प्रकार गुरु
का स्मरण करते हुए इसको पीते हुए और मद्य-मांस खाते हुए कोई दोष नहीं है ॥11॥
सेवते चेत् सुखार्थाय मद्यादीन् स च
नारकी ।
प्राशयेद् देवताप्रीत्यै
स्वाभिमानविवर्जितः ।। 12 ॥
श्वपचोऽपि कुलज्ञानी
ब्राह्मणादतिरिच्यते ।
यदि सुख के लिए कोई मद्य,
मांस, मत्स्य का सेवन करता है, वह नरक जाता है तथा जो देवताओं के प्रसन्न करने के लिए अपने अभिमान को छोड़कर
खाये -पीये तथा उसे कुलाचार ज्ञान हो, ऐसा व्यक्ति श्वपच
(अतिनीच, चाण्डाल) होते हुए भी ब्राह्मण से महान् होता है ।।12।।
यः कौलिकः कुलज्ञानं न पश्यति न
विन्दति ॥13॥
धिक् तस्य जीवनं लोके धिक् तस्यापि
च पौरुषम् ।
जो कौलिक (कुलाचार वाला व्यक्ति)
कुलज्ञान को नहीं देखता है और न उसे करता है, उसका
संसार में जीना धिक्कार है और उसके पुरुषार्थ को भी धिक्कार है ।।13।।
ते विद्यापुण्यकर्माणस्ते शान्तास्तेऽपि
योगिनः ॥14 ॥
येषां चित्ते भाग्यवशात् कुलज्ञानं
प्रकाशते ।
विद्या को जानने वाले और पुण्यकर्म
को करने वाले तथा शान्तचित्त वाले वे ही योगी हैं, जिनके चित्त में भाग्यवश कुलज्ञान प्रकाशित होता है ।।14।।
ते वन्द्यास्ते महात्मानः
सुकृतार्था नरोत्तमाः ॥15॥
येषामुत्पद्यते चित्ते कुलज्ञानं
मयोदितम् ।
वे ही मनुष्यों में श्रेष्ठ मनुष्य
हैं,
वे ही वन्दनीय हैं तथा वे ही पुण्यात्मा हैं, जिनके
चित्त में मेरे द्वारा उत्पन्न किया हुआ कुलज्ञान है ।।15।।
त्रासिता हि मया पूर्वं पशवः
शास्त्रकोटिभिः ।। 16 ॥
कुलधर्मं न जानन्ति ततो
ज्ञानाभिमानिनः ।
भगवान् शंकर ने कहा कि हे देवि !
मैंने पहले कोटि शास्त्रों से पशुओं को त्रासित किया,
उसके बाद ज्ञानाभिमानी कुलधर्म को नहीं जानते हैं ।।16।।
पशुशास्त्राणि सर्वाणि मयैव कथितानि
वै ।। 17 ॥
स्मृत्युक्तेन च मार्गेण मोहनाय
दुरात्मनाम् ।
हे देवि ! सभी पशुशास्त्र मेरे
द्वारा ही कहे गये हैं तथा मैंने वे स्मृति के कथनानुसार नीच पुरुषों के मोहन के
लिए ही कहे हैं ।।17।।
विशेष-दूसरी
पाण्डुलिपि में मार्गेण के स्थान पर मन्त्रेण शब्द आया है तब अर्थ होगा कि स्मृति
में कहे गये मन्त्र द्वारा मैंने ही सभी पशुशास्त्र कहे हैं।
महती पशुभावनं तेषां वाच्छापि जायते
॥18 ॥
तेषां च सद् गतिर्नास्ति
कल्पकोटिशतैरपि ।
पशु भावों को जानने की उनकी भी महती
इच्छा होती है; परन्तु उनकी करोड़ों वर्षों तक
सद्गति नहीं होती ।।18।।
विशेष
:- अन्य पाण्डुलिपि में 'महती पशुभावानां'
के स्थान पर महा पापवशात्मानाम् आया है, जिसके
अनुसार अर्थ होगा कि जो महापाप के वशीभूत हैं, उनकी इच्छा भी
होती है, लेकिन उनकी सद्गति नहीं होती। भाव यही है कि जो भाव
वश बिना कुलस्थान के मद्य-मांस मैथुन आदि करते हैं, उनकी
करोड़ों वर्षों तक सद्गति नहीं होती।
बहुशः कौलिकं धर्मं श्रुत्वा
ज्ञानविभेदकम् ॥19॥
निन्दन्ति पामराः सर्वे
पारम्पर्यविमोहिताः ॥20 ॥
अनेकों प्रकार के कौलिक धर्म को
सुनकर ज्ञान में अनेकों प्रकार भेद करने वाले तरह-तरह की बातें करके परम्परा
विमोहित व्यक्ति इस कौलिक निन्दा करते हैं। वे इस कौलक धर्म को सुनकर ही करते हैं
वे अच्छी तरह इसे जानते नहीं ।। 19-20।।
वशिष्ठ उवाच
मद्यपानेन मनुज;
सिद्धिं सम्यग् लभेत् प्रभो ।
मद्यपानरताः सर्वे सिद्धिं यन्तु च
पाशवाः ॥21॥
मांसभोजनमात्रेण यदि पुण्या
गतिर्भवेत् ।
लोके मांसाशिनः सर्वे पुण्यभाजो
भवन्तु वै ॥ 22 ॥
स्त्रीसम्भोगेन लोकानां यदि मोक्षो
भवेदिह ।
सर्वेऽपि जन्तवो लोके मुक्ताः स्युः
स्त्रीनिषेवणात् ॥23॥
मुनि वशिष्ठ ने भगवान् बुद्ध से कहा
कि हे प्रभो ! मुझे यह बतलाइये कि मद्य-पान से सभी पाशव (पशुधर्म को मानने वाले
अर्थात् शैव सिद्धि को प्राप्त कर लें तो फिर मद्यपान करने वाले सभी लोग क्यों
नहीं सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं तथा यदि मांस के खाने मात्र से यदि पुण्यगति हो
जाये तो फिर संसार में सभी मांस खाने वाले पुण्य भोगी हो जायेंगे और जो कौलाचार
में यह कहा जाता है कि स्त्री सम्भोग से लोगों को मोक्ष मिलती है तो फिर संसार में
तो सभी प्राणी सम्भोग करते हैं। सभी स्त्री का सेवन करते हैं। अतः सभी को मोक्ष हो
जाना चाहिए ।। 21-23।।
बुद्ध उवाच
अतः शृणुष्व त्वं पुत्र कुलधर्मं
महानघम् ।
मोक्षं ददाति वै तारा
एतद्धर्मप्रवर्तिनाम् ॥24॥
वृथा पानं यत्क्रियते सुरापानं
तदुच्यते ।
स महापातकी चैव वेदादिषु निरूपितः ॥
25 ॥
भगवान् बुद्ध ने कहा कि हे पुत्र
वशिष्ठ सुनो! कुलधर्म महान् और पापरहित है तथा इस कुलधर्म के मार्ग में प्रवृत्त
लोगों को मां तारा मोक्ष प्रदान करती है। जो व्यक्ति बेकार बिना किसी
कुलधर्म के सुरापान करते हैं, वे वेद आदि
शास्त्रों में महापापी माने गये हैं ।।24-25।।
वशिष्ठ उवाच
त्वन्मुखाच्छ्रोतुमिच्छामि कुलधर्मं
विशेषतः ।
एतस्य तु विशेषज्ञस्त्वदन्यो नास्ति
कश्चन ॥26॥
तस्य धर्मस्य माहात्म्यं
सर्वधर्मोत्तमस्य च ।
वद मे परमेशान यदि चास्ति कृपा मयि
॥27॥
वशिष्ठ ने कहा कि हे भगवन्! मैं
विशेषत: आपके मुख से कुलधर्म को सुनना चाहता हूँ; क्योंकि इस कुलधर्म का विशेष ज्ञानी आपके अलावा अन्य कोई नहीं है, अतः हे भगवन्! यदि आपकी मुझ पर कृपा है तो इस कुलधर्म की महिमा
(माहात्म्य) मुझे बताइये ।। 26-27।।
श्री भगवानुवाच
मुने! शृणु प्रवक्ष्यामि यन्मां
त्वं परिपृच्छसि ।
तस्य श्रवणमात्रेण योगिनीनां प्रियो
भवेत् ॥28॥
श्री भगवान् ने कहा कि हे मुनि
वशिष्ठ! यदि तुम मुझसे पूंछना चाहते हो तो मैं तुम्हें उस कुलधर्म को बताऊंगा,
जिसके सुनने मात्र से मनुष्य योगियों का प्रिय हो जाता है ।।28।।
शिवब्रह्मगुहादीनां न मया कथितः
पुरा ।
कथयामि तव स्नेहात्
शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥29॥
भगवान् बुद्ध ने कहा कि हे वशिष्ठ!
मैंने पूर्व काल में इस कुलधर्म को शिव ब्रह्मा और गुह आदि से कहा है। अब मैं
तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण तुम से कह रहा हूँ। तुम इसे एकाग्रचित्त होकर
सुनो।।29।।
सर्वेभ्यश्चोत्तमा वेदा वेदेभ्यो
वैष्णवोत्तमः ।
वैष्णवादुत्तमः शैवः शैवाद्
दक्षिणमुत्तमम् ॥30॥
दक्षिणादुत्तमं वामं वामात्
सिद्धान्तमुत्तमम् ।
सिद्धान्तादुत्तमं कौलं कौलात्
परतरं न हि ॥31॥
संसार में सबसे उत्तम वेद हैं।
वेदों से भी उत्तम वैष्णव है, वैष्णव से
उत्तम शैव है। शैव से उत्तम दक्षिण पंथी हैं। दक्षिणपंथी से उत्तम वामपंथी हैं।
वामपन्थ से सिद्धान्तवादी उत्तम हैं। सिद्धान्त से उत्तम कौल (कुलधर्म) को मानने
वाले उत्तम हैं तथा कौल से श्रेष्ठ (उत्तम) कोई नहीं है।।30-31।।
गुह्याद् गुह्यतरं वत्स
सारात्सारतरं परम् ।
मथित्वा ज्ञानदण्डेन
वेदागममहार्णवम् ॥32॥
न कौलेन समो धर्मस्त्रिलोकेषु
विद्यते ।
भगवान् बुद्ध ने कहा कि हे पुत्र
वशिष्ठ यह कौल (कुलाचार) गुह्य से गुह्य अर्थात् अत्यन्त गूढ रहस्य वाला है तथा
सार का सार है। अर्थात् परम सार है। न्यह ज्ञानरूपी दण्ड द्वारा वेद और आगम रूपी
समुद्र से मथकर निकाला गया है। इस लिए कौलधर्म के समान तीनों लोकों में अन्य कोई
धर्म नहीं है ।। 32।।
विशेष
:- यहाँ पर 'संशयस्ते मया सोऽयं कुलधर्म
समुद्भवः ।' यह पाठ उचित नहीं दूसरी पाण्डुलिपि में 'न कौलेन समो धर्मः त्रिलोकेषु विद्यते' यही पाठ उचित
है। अतः यहाँ श्लोक में 'संशयस्ते... के स्थान पर न कौलेन समो...
पाठ होना ही उचित प्रतीत होता है।
एकतः सकला धर्मा यज्ञदानजपादयः ॥33॥
एकतः कुलधर्मोऽयं
सर्वयज्ञाधिकप्रियः ।
भगवान् बुद्ध कुलधर्म की प्रशंसा
में कहते हैं कि एक ओर यज्ञ-दान-जपादि समस्त धर्म हैं और एक ओर यह अकेला कुलधर्म
है,
जो सभी यज्ञ-दान-जप आदि से अधिक प्रिय है ।। 33।।
प्रविशन्ति,
तथा नद्यः समुद्रं मुक्तबन्धनाः ॥34॥
तथैव सुमयाः सर्वे प्रविष्टाः
कुलवर्त्मनि ।
जिस प्रकार नदियां मुक्त बन्धन होकर
स्वतः बहती हुई समुद्र में प्रवेश करती हैं। उसी प्रकार सभी धर्म कुलधर्म के मार्ग
में प्रविष्ट हो जाते हैं ।।34।।
यथा हस्तिपदे लीनं सर्वप्राणिपदं
भवेत् ॥35॥
दर्शनानि च सर्वाणि कुलप्रयं तथा
मुने ।
मुने! जिस प्रकार हाथी के पैर में
सभी प्राणियों के पैर लीन हो जाते हैं, उसी
प्रकार इस कुलधर्म में सब दर्शन समा जाते हैं। भाव यह है कि जिस प्रकार हाथी के
पैर भूमि पर जब पड़ते हैं, तो उसके जो निशान हैं, उस निशान में सभी प्राणियों के पैरों के निशान समा जाते हैं, उसी प्रकार कुलधर्म में सब दर्शन समा जायेंगे।।35।।
यथाऽमरतरङ्गिण्या न समाः सकलापगाः ॥36
॥
तथैव समयाः सर्वे कुलधर्मेण केवलाः
।
जिस प्रकार अमर गंगा स्वर्गङ्गा
(गंगा नदी) उसी प्रकार सभी धर्म केवल कुलधर्म के द्वार है ।।36।।
मेरुकार्यपयोमूर्ध्नि सूर्यो
मुख्यतरो यथा ॥37॥
तथास्य समयाश्चास्य कुलस्य
महदन्तरम् ।
सुमेरु पर्वत की बर्फ के ऊपर जैसे
सूर्य मुख्यतर हैं अर्थात् सुमेरु पर्वत पर जो बर्फरूपी जल है,
उसके कारण सूर्य है; अर्थात् सुमेरु पर्वत की
ऊंचाई पर बर्फ (जल) भला कैसे हो सकता है; परन्तु है। इसके
कारण सूर्य हैं अर्थात् सूर्य ही इतने ऊंचे सुमेरु पर्वत पर जल पैदा कर देते हैं
तथा जैसे सूर्य की गर्मी तथा उससे बर्फ की उत्पत्ति में महान् अन्तर है, उसी प्रकार इसकी समया तथा इसके कुल में महान् अन्तर है ।।37।।
अस्ति चेज्ज्ञानवान् कश्च मत्समो भुवि
मानवः॥38॥
तथैव कुलधर्मेण समो नास्ति
जगत्त्रये ।
श्री भगवान् ने कहा कि हे वशिष्ठ !
जिस प्रकार इस पृथ्वी पर मेरे समान ज्ञानवान् कोई मनुष्य नहीं है। उसी प्रकार इस
कुलधर्म के समान तीनों लोकों में कोई धर्म नहीं है ।।38।।
जन्मभिर्बहुभर्धन्यास्तपोभिर्मुनिसत्तम
॥39 ॥
मोक्षं लभन्तु ते सर्वे
जीवन्मुक्तास्तु कौलिकाः।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यं न
संशयः ॥40॥
मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ ! अनेकों जन्मों
की तपस्याओं से वे लोग धन्य हैं। अत: वे सभी कौलिक कुलधर्म को मानने वाले
जीवनमुक्त हैं तथा मोक्षप्राप्त करते हैं। अर्थात् वे कभी इस संसार में जन्म नहीं
लेते। मोक्ष प्राप्त करते हैं। यह सत्य है और पुनः सत्य है,
इसकी सत्यता में कोई सन्देह नहीं है।।39-40।।
बहुना वा किमुक्तेन शृणुष्व अवधानतः
।
न कौलेन समो धर्मः सत्यमेतद् वदामि
ते ॥41॥
अधिक कहने से क्या लाभ है?
पुत्र वशिष्ठ ध्यान लगाकर सुनो कि कौलधर्म के समान कोई धर्म नहीं
है। मैं यह तुमसे सत्य कह रहा हूँ।।41।।
योगी चेन्नैव भोगी स्याद् भोगी
चेन्न तु योगवान् ।
योगभोगात्मकं कौलं तस्मात्
सर्वाधिकं त्विदम् ॥42 ॥
यदि कोई योगी है तो वह भोगी नहीं हो
सकता और यदि कोई भोगी है तो योगी नहीं हो सकता; परन्तु
यह कौलधर्म योग और भोग स्वरूप है, इसमें योग और भोग दोनों का
योग है। अर्थात् कौलधर्म को मानने वाला योगी और भोगी दोनों होता है ।।42 ।।
इति महाचीनाचारतन्त्रे सर्वाचार
सारोत्तमोनमे महाचीनक्रमे चतुर्थः पटलः ।।
आगे जारी..........चीनाचारतन्त्र पटल 5

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