पूजन विधि, ज्योतिष, स्तोत्र संग्रह, व्रत कथाएँ, मुहूर्त, पुजन सामाग्री आदि

चीनाचार तन्त्र पटल ३

चीनाचार तन्त्र पटल ३   

चीनाचार तन्त्र पटल ३ में शुभ लक्षणों वाली ९ प्रकार की कन्यायें, आठ प्रकार की सिद्धियां, योनिपीठपूजा, सौत्रामणी याग, भार्गव ऋषि का सुरा को शाप देने का वर्णन किया है।

चीनाचार तन्त्र पटल ३

चीनाचारतन्त्रम् तृतीयः पटलः

Chinachar tantram chapter 3

चीनाचार तंत्र तीसरा पटल

चीनाचारतन्त्र तृतीय पटल

चीनाचारतन्त्रम्

तृतीयः पटलः

।। ॐ तारणि देव्यै नमः ।।

चीनाचारतन्त्र पटल तीन   

अथ तृतीयः पटलः

श्री शिव उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा हरेर्बुद्धशरीरिणः ।

वशिष्ठस्तं पुनः प्राह कृताञ्जलिपुटो मुनिः ।। 1 ॥

श्री शिव पार्वती से बोले कि हे पार्वती ! जब बुद्धरूप भगवान् विष्णु ने वशिष्ठ मुनि से ऐसा कहा बुद्ध के शरीर वाले विष्णु के उस पूर्वोक्त वचन को सुनकर वशिष्ठ मुनि ने हाथ जोड़ कर उनसे फिर कहा - ।।1 ।।

वशिष्ठ उवाच

भगवन् देवदेवेश तत्त्वज्ञानमय प्रभो ।

महाचीनक्रमाचारः कथितो भवता मम ॥ 2 ॥

प्रधानं द्वयमेवास्मिन् मदिरा योषिदेव तु ।

एतयोः किं प्रधानं तद् ब्रूहि मे परमेश्वर ॥ 3 ॥

वशिष्ठ बोले हे देवदेवेश ! भगवन्! हे तत्त्वज्ञानमय प्रभो ! आपने मुझे महाचीन क्रमाचार को बताया है। इसमें दो ही प्रधान तत्त्व है एक मदिरा और दूसरा- स्त्री (नारी) अब इन दोनों में कौंन प्रधान है। हे परमेश्वर ! वह मुझे बताइये।। 2-3।।

श्री भगवानुवाच

एतस्मिन् परमाचारे तुल्यमेव द्वयं मुने ।

प्राधान्यं योषितां किन्तु देवानां च न संशयः ॥4॥

यतो हि योषितां देहे सदैवाधिष्ठिता शिवा ।

अतः पूजासु सर्वासु तासां प्राधान्यमुच्यते ॥ 5 ॥

बुद्धरूप शरीर वाले विष्णु अर्थात् भगवान् बुद्ध ने कहा कि हे मुने! इस परमाचार में मदिरा और स्त्री-ये दोनों ही समान हैं। वैसे स्त्रियों की प्रधानता है; किन्तु देवों की प्रधानता है इसमें भी कोई संशय नहीं है; क्योंकि स्त्रियों के शरीर में सदैव शिवा (भवानी, प्रकृति, दुर्गा) अधिष्ठित रहती हैं। इसीलिए सब पूजाओं में स्त्रियों की प्रधानता होती है।।4-5।।

वशिष्ठ उवाच

बुहि देव विधानञ्च सर्वज्ञानमय प्रभो ।

यथा योषित्सु तत्पूजा कर्त्तव्या नरपुङ्गवैः ॥6 ॥

मुनि वशिष्ठ ने कहा कि हे देव! हे सब प्रकार के ज्ञान रखने वाले प्रभो ! क्या श्रेष्ठ मनुष्यों द्वारा स्त्रियों की पूजा करनी चाहिए? ।।6।।

श्री भगवानुवाच

योनिपीठे मन्त्रपीठे यन्त्रपीठे च पार्वति ।

त्रिधा भित्वा महामाया पूज्यते साधकोत्तमैः ॥7॥

सर्वेषामेव पीठानां प्रधानं योनिपीठकम् ।

तत्र सम्पूजिता देवी झटित्येव प्रसीदति ॥8 ॥

भगवान् शिव ने पार्वती से कहा कि हे पार्वति ! योनिपीठ, मन्त्रपीठ और यन्त्रपीठ में तीनों में उत्तम साधकों द्वारा महामाया पूजी जाती है। उन सब तीनो पीठों में योनिपीठ प्रधान है, वहाँ पर सम्यक् प्रकार से पूजित देवी शीघ्र प्रसन्न होती है ।। 7-8।।

अणिमाद्यष्टसिद्धीनां कारणं परमं मुने ।

योनिपूजाविधिं वक्ष्ये मम सर्वार्थसाधनम् ॥ 9 ॥

श्री भगवान् ने कहा कि हे मुनिवर ! अणिमा आदि आठ सिद्धियों की जो परम कारण है, जो सभी अर्थों की साधन है, उस योनिपूजा को तुम्हें बताऊंगा । ॥9॥

नटी कापालिकी वैश्या रजकी नापितङ्गना ।

ब्राह्मणी शूद्रकन्या च तथा गोपालकन्यका ॥10॥

मालाकारस्य कन्या च नवकन्याः प्रकीर्तिताः ।

प्रशस्ता सर्वजातीनां विदग्धा लक्षणान्विता ॥11॥

नटी, कापालिकी, वेश्या, धोबिन, नाईन, ब्राह्मणी, शूद्रकन्या, ग्वाला की पुत्री और मालाकार (माली) की पुत्री, ये नौ प्रकार की कन्यायें कही गयी हैं। ये 9 प्रकार की कन्यायें सब जातियों में प्रशस्त (चतुर) वितग्ध और शुभ लक्षणों वाली है।।10-11।।

विशेष :- प्रशस्त का अर्थ प्रशंसनीय एवं चतुर है। विदग्ध का अर्थ है- विशेष दग्ध अर्थात् विशेष रूप से जलाने वाली, कामभाव पैदा करने वाली, विदग्धा का अर्थ स्वेच्छाचारिणी भी है। भाव यही कि ये 9 प्रकार की स्त्रियां कामभाव में कुशल होती है। इसलिए पूजा में इनको ही शुभ माना गया है।

सिद्धियां आठ प्रकार की कही गयी हैं, वे हैं-1 अणिमा, 2 लघिमा, 3 प्राप्ति, 4 प्राकाम्य, 5 महिमा, 6 ईशित्व, 7 वशित्व, 8 कामवसायिता ।

गुरुपादगता ग्राह्या नान्यथा वरवर्णिनि ।

अन्यथा तु वरारोहे नरके पतति ध्रुवम् ॥12॥

शिव ने कहा कि हे उत्तम और सुन्दर रंग वाली पार्वती गुरु के चरणों में गयी हुई को भी अन्यथा नहीं समझना चाहिए अर्थात् जो गुरु के चरणों में आ गयी है, उसे भी योनिपूजा के कार्य में स्वीकार किया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो हे सुन्दर नितम्बों वाली पार्वति ! वह साधक निश्चय ही नरक में गिरता है। भाव यही कि यदि कोई भी स्त्री योनिपूजा हेतु गुरुचरणों में स्वयं उपस्थित हो जाये तो उसकी योनि पूजा करनी चाहिए, यदि नहीं की जायेगी तो साधक नरक में जायेगा ॥12॥

आनीयान्यतमां भद्रां सर्वाभरणसुन्दरीम् ।

सुन्दरीं यौवनोन्मत्तां निर्लज्जां चारुहासिनीम् ॥13॥

कृत्वा दिसम्बरां तां तु गन्धकुङ्कुमचन्दनैः ।

अनुलिप्तां मुक्तकेशी तप्तस्तद्योनिमण्डले ॥14॥

गुरुशक्तिं समाराध्य पूजयित्वा षडङ्गकम् ।

पीठपूजां विधायाऽथ तन्मध्ये पूजयेच्छिवाम् ॥15॥

दूसरी श्रेष्ठ भली भोली सब आभूषणों से युक्त सुन्दरी, यौवन से मत्त, लज्जाविहीन, सुन्दर हास करने वाली स्त्री को लाकर उसको दिगम्बर (बिल्कुल वस्त्रविहीन) कर उसके समस्त शरीर पर गन्ध कुङ्कुम और चन्दन का लेप करना चाहिए, उसके केश खुले होने चाहिए अर्थात् केश खोल देने चाहिए। फिर उस ऐसी सुन्दरी के योनिमण्डल में गुरुशक्ति की सम्यक् प्रकार से आराधना कर और उसके छः अंगों आंखों, कानों, कपोलों, नासिका, मस्तक, ओष्ठ की पूजा करके और पीठपूजा करके उसके मध्य में शिवा का पूजन करना चाहिए ॥13-15॥

तत्र चावाहनं नास्ति जीवन्यासो न वा मुनिः ।

उपचारैः पूजयित्वां चार्घ्यं दत्त्वा ततः पुनः ।

जप्त्वा लिङ्गे भैरवञ्च पूजयित्वा महेश्वरीम् ॥16॥

गन्धासवाक्षतैः पुष्पैर्होमं कुर्यादतः परम् ।

धर्माधर्महविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसा स्स्रुचा ॥17॥

सुषुम्णावर्त्मना नित्ये अक्षवृत्ति जुहोम्यहम् ।

स्वाहान्तो होममन्त्रोऽयं प्रतिधाताहुतिर्मुनिः ॥18 ॥

वहाँ पर किसी का आवाहन नहीं है अर्थात् वहाँ पर किसी को बुलाना नहीं है और न ही जीवन्यास है अर्थात् वहाँ कोई प्राणी नहीं होना चाहिये। उपचारों से पूजकर उसको अर्घ्य देकर लिङ्ग में भैरव की पूजाकर, फिर महेश्वरी की पूजाकर इसके बाद गन्ध (सुगन्धित द्रव्य) आसव (मदिरा) और अक्षत (चावल) तथा पुष्पों से होम करना चाहिए तथा उस होम में धर्माधर्म हविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसास्रुचा सुषुम्णावर्त्मना नित्ये अक्षवृत्तिं जुहोम्यहम्।" इस मन्त्र को पढ़कर स्वाहा कहने के बाद प्रतिघात आहुति देनी चाहिए। इस मन्त्र का भाव है कि धर्म और अधर्म की हवि से दीप्त आत्मा रूप अग्नि में मनरूपी चम्मच से सुषुम्णा नाड़ी के मार्ग में नित्य मैं अक्षवृत्ति की आहुति देता हूँ ।। 16-18।।

पूर्णाहुतिं जपान्ते च जुहुयान्मनुनाऽमुना ।

प्रकाशाकाशहस्ताभ्यामवलम्ब्योन्मनीस्स्रुचा ॥19॥

धर्माधर्मकलास्नेहपूर्णं वह्नौ जुहोम्यहम् ।

स्वाहान्तोऽयं भवेन्मन्त्रो घोरपातक मुक्तिदः ॥20 ॥

जप के अन्त में इस मनु के द्वारा प्रकाश और आकाश रूप दोनों हाथ का अवलम्बन कर ऊपर को उठे हुए चमचा से 'धर्माधर्म कलास्नेहपूर्ण वह्नौ 'जुहोम्यहम्' इस मन्त्र से आहुति देनी चाहिए और फिर स्वाहा कर अन्त करना चाहिए। इस मन्त्र का भाव है-धर्म और अधर्म कला स्नेहपूर्ण हो, मैं आग में हवन करता हूँ। इस मन्त्र की आहुति घोर पाप से मुक्ति प्रदान करने वाली है ।।19-20।।

पूजाकालं विना नैव पश्येच्छक्तिं दिगम्बरीम् ।

पूजाकालं विना नैव सुरा पेया च साधकैः ॥ 21 ॥

साधकों को पूजाकाल (पूजा के समय) के बिना दिगम्बरी शक्ति को नहीं देखना चाहिए अर्थात् पूजा के समय ही स्त्री को नग्न अवस्था में देखना चाहिए तथा पूजा के समय के बिना मदिरा का पान भी नहीं करना चाहिए ।। 21।।

विशेष-पूजा के बिना मांस और मदिरा का पान नहीं करना चाहिये। ऐसा हमारे उत्तम धर्म शास्त्र मनुस्मृति में भी लिखा हुआ है। देखिये-

न मांस भक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।

प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिश्च महाफलाः ।। - मनु. 5/56

आयुष्यं हीयते दृष्ट्वा पीत्वा तु पशुनां व्रजेत् ।

सौत्रामण्यां कुलाचारे ब्राह्मणः प्रपिबेत् सुराम् ॥2 2 ॥

अन्यत्र कामतः पीत्वा प्रायश्चित्ती भवेन्नरः ।

पूजा के समय के अलावा मदिरा (सुरा) को देखकर आयु नष्ट होती है तथा पीकर पशुता आती है। अतः सौत्रामणी और कुलाचार में ही ब्राह्मण को सुरा पान करना चाहिए। अन्य समय पीकर प्रायश्चित करना चाहिए ।। 22 ।।

श्लोक में यह बहुत ही रहस्य की बात कही गयी है कि कुलाचार अथवा सौत्रामणी याग के अलावा समय में सुरा को देखने से ही आयु नष्ट होती है और पीकर पशुता आती है अर्थात् मनुष्य पशु बन जाता है। यह तो देखा ही जा रहा है।

अन्यत्र काम (इच्छा) से पीकर मनुष्य प्रायश्चित्ती होना चाहिए अर्थात् सौत्रामणी व्रत में और कुलाचार के समय ही सुरापान करना चाहिए। इच्छावश अन्य समय करने पर मनुष्य को प्रायश्चित्त करना चाहिए तथा प्रायश्चित तो बहुत घोर पाप का किया जाता है, अतः अन्य समय में सुरापान करना घोर पाप है।

विशेष :- सौत्रामणी एक विशेष यज्ञ है। सौत्रामणी के अर्थ के अनुसार सुत्रामा = इन्द्र देवता, जिसका वह सुत्रामन्+अण् प्रत्यय= सौत्रामण ( आदिवृद्धि होकर) फिर स्त्रीलिंग में 'ङीप्' प्रत्यय सौत्रामणी शब्द बना। सुत्रामा का अर्थ सुष्ठुत्रायतेऽनेन इति अर्थात् जो अच्छी प्रकार से रक्षा करता है, वह सौत्रामणी कहा जायेगा। अतः यह व्रत अच्छी प्रकार रक्षा करने के लिए बनाया गया है। यजुर्वेद की काण्व शाखा के 21 अध्याय में मन्त्र है- स्वाहोक्त्वा स्वादुना तीव्रां तीव्रेणामृताममृतेन मधुमती मधुमता सृजामि सं सोमेन सोमो ऽस्य श्विभ्यां पचास्व सरस्वत्यै पचस्वेन्द्राय सूत्रामणे पचास्व । यजुर्वेद काण्व शाखा अध्याय 21।।

इस मन्त्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मधु (मीठी वस्तु) से मधु (सुरा) को मैं उत्पन्न करता हूँ। अतः हे देवेन्द्र! इस मधु से बनी सुरा सोम को पचाओ। इस प्रकार सौत्रामणी व्रत का विधान सुरापान के लिए ही किया गया है। अतः ब्राह्मण को सौत्रामणी यज्ञ के समय ही सुरापान करना चाहिए। अन्य समय में सुरा पान करना घोर पाप है।

वात्स्यायनसूत्र भाष्य में कहा गया है कि-

सौत्रामण्यां कुलाचारिब्राह्मणः प्रपिबेत् सुराम् ।

अन्यत्र कामतः पीत्वा पतितस्तु द्विजो भवेत् ।।

अर्थात् कुलाचारी ब्राह्मण को सौत्रामणी यज्ञ में ही सुरा का पान करना चाहिए, अन्यत्र काम (इच्छा) से पीकर द्विज पतित हो जाता है। श्लोक में कहा गया है कि 'अन्यत्र कामतः पीत्वा प्रायश्चित्ती भवेन्नरः ।'

यहाँ नर शब्द का प्रयोग है। अतः यहाँ प्रत्येक व्यक्ति के विषय में कहा गया है कि अन्य समय में कामवश (इच्छा से) मनुष्य यदि शराब पीए तो उसे प्रायश्चित्त करना चाहिए अर्थात् उसने पाप किया है, उसका निदान करना चाहिए।

अब आगे बताते हैं कि क्यों पीना पाप है।

भार्गवेण पुरा शप्तां श्रुत्वा देवीं च वारुणीम ॥23॥

ब्रह्मा लोकगुरुः साक्षात् प्रययौ भार्गवान्तिकम् ।

प्रसाद्योवाच तं ब्रह्मा वाचाऽमृतसमानया ॥24 ॥

प्राचीन काल में भार्गव ऋषि ने इस सुरा को शाप दे दिया था, इसको सुनकर संसार के गुरु पितामह ब्रह्मा साक्षात् भार्गव ऋषि के पास गये और अपनी अमृत के समान वाणी से उन्हें प्रसन्न कर बोले- ॥23-24॥

देवानाममृतं ब्रह्म तदीयं लौकिकी सुरा ।

ब्रह्मज्ञानमयी देवी कुलाचारेण कृष्यते ॥ 25 ॥

सौत्रामण्याञ्च देवास्तु तृप्यन्ते सुरयैव हि ।

सेयं शप्ता त्वया ब्रह्मन् तस्याः शापं प्रमोचय ॥ 26 ॥

लोकगुरु ब्रह्मा जी ने भार्गव ऋषि से कहा कि हे ब्रह्म ! भार्गव जी ! यह लौकिकी सुरा देवताओं का अमृत है। यह ब्रह्म ज्ञानमयी देवी सुरा कुलाचार द्वारा निकाली जाती है, खींची जाती है तथा हे ब्रह्म ! सौत्रामणी यज्ञ में देवता लोग सुरा के द्वारा तृप्त होते हैं। ऐसी इस सुरा को महाराज आपने शाप दे दिया है। अतः उसका शाप नष्ट कर दीजिए ॥25-26॥

ब्रह्माणं प्रणिपत्याह ततोऽसौ भृगुनन्दनः ।

मद्वाक्य निष्फलं न स्यात्त्वद्वाक्यञ्च पितामहः ॥27॥

उसके बाद इन भृगु पुत्र भार्गव ऋषि ने प्रणाम करके ब्रह्मा जी से कहा कि हे पितामह! मेरा वचन निष्फल नहीं हो सकता है; क्योंकि यह मेरा तत्त्व वाक्य है ।। 27 ।।

आवश्यकं करिष्यामि तदर्थं नियमः कृतः ।

सौत्रामण्यां कुलाचारे सुराशापविमुक्तये ॥28॥

फिर भी मैंने सुरा को शाप से विमुक्त करने के नियम बनाया है कि कुलाचार और सौत्रामणी याग में सुरापान को आवश्यक करूंगा ।।28।।

मन्त्रत्रयं प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमनाः प्रभो ।

एकमेव परं ब्रह्म स्थूलसूक्ष्ममयं ध्रुवम् ॥29॥

कचोद्भवां ब्रह्महत्यां तेन ते नाशयाम्यहम् ।

सूर्यमण्डलसम्भूते वरुणालयसम्भवे ॥30॥

(शुक्राचार्य) भार्गव ऋषि ने कहा कि हे ब्रह्मन् ! मैं तीन मन्त्र बताऊंगा हे प्रभो ! एकाग्रचित्त होकर सुनिये। एक ही परमब्रह्म है तथा वह निश्चय ही स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही प्रकार का है। हे देव! मैंने सूर्यमण्डल में पैदा हुए वरुणालय (सुरा) के प्रभाव के उत्पन्न होने में कच नामक ब्राह्मण की हत्या की थी। इसीलिए मैं इस सुरा को नष्ट करता हूँ ।। 29-30।।

विशेष-कच नामक ब्राह्मण की हत्या की कथा इस प्रकार है-देवताओं और राक्षसों में निरन्तर युद्ध चलता रहता था । प्रायः देवता राक्षसों से पराजित ही होते रहते थे। इसका कारण था कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य के पास मृत को जीवित करने वाली विद्या थी। अतः जितने भी राक्षस युद्ध में मरते थे, शुक्राचार्य उन सबको जीवित कर दिया करते थे। देवता लोग परेशान थे। देवताओं के राजा इन्द्र ने अपने गुरु बृहस्पति के पुत्र कच को शुक्राचार्य के पास शिष्य के रूप में भेजा, ताकि कच उस विद्या को सीख ले और उससे मरे हुए देवता भी जीवित किये जा सकें। कच शुक्राचार्य के पास गये और उन्होंने विद्या सीख ली। राक्षसों को यह भय था कि यह विद्या सीखकर युद्ध में मरे हुए देवताओं को जीवित कर देगा, इसलिए राक्षसों ने कच को मार डाला। शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी कच से बहुत प्रेम करती थी, अतः देवयानी के अनुरोध पर शुक्राचार्य ने कच को जीवित कर दिया; परन्तु राक्षसों ने उसे फिर मार दिया। अपनी पुत्री को दुःखी देखकर शुक्राचार्य ने कच को पुनः जीवित कर दिया। राक्षसों ने कच को फिर मार दिया और इस भय से कि शुक्राचार्य उसे जीवित कर देंगे। उसकी भस्म (राख) को शुक्राचार्य की मदिरा मे डाल दिया। शुक्राचार्य ने इस मदिरा को पी लिया और अब कच उनके पेट में था, जब उनकी बेटी कच के वियोग में अत्यन्त दुःखी हो गयी तो शुकाचार्य ने उसे फिर जीवित कर दिया, तब से देवयानी उससे और अधिक प्रेम करने लगी; परन्तु उसने देवयानी के प्रेम प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि तुम मेरी बहिन हो; क्योंकि तुम्हारे ही पिता के पेट से पैदा हुआ हूँ तथा तुम उनकी पुत्री हो, अतः मेरी बहिन हो गयी; अतः मैं तुम्हें अपनी पत्नी नहीं बना सकता। इस पर देवयानी ने उसे शाप दिया कि तुमने जो मेरे पिता से विद्या सीखी है, उसे तुम भूल जाओगे। तब उसने भी देवयानी को शाप दिया कि तुम्हारा विवाह किसी ब्राह्मण के साथ नहीं होगा, कोई क्षत्रिय ही तुम्हे वरण करेगा। इसी कारण देवयानी क्षत्त्रिय राजा ययाति की पत्नी बनी।

यह भी कहानी लम्बी है। संक्षेप में यह कि शुक्राचार्य वृषपर्वा दैत्य के पुरोहित थे। वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी दोनों सखियां गंगास्नान के लिए गयीं। वहाँ वे नग्न होकर स्नान कर रहीं थीं, उसी समय वहाँ क्षत्रिय राजा ययाति का अकस्मात् आना हुआ। तब हड़बड़ी में दोनों भागी और हड़बड़ी में शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्रों को पहन लिया। इस पर क्रोधित देवयानी ने कहा कि तुम शूद्र जाति की स्त्री ने मेरे वस्त्र पहन लिये। इस पर उन दानों में झगड़ा हो गया, तब शर्मिष्ठा ने राजपुत्री होने के नाते अपनी दासियों के सहयोग से देवयानी को एक कुंए में गिरा दिया। वह कुंए में चिल्ला रही थी। उसी समय राजा ययाति का वहाँ से जाना हुआ तो कुंए से चिल्लाती हुई देवयानी को राजा ने हाथ पकड़कर निकाला। अतः जब हाथ ग्रहण कर निकाला तो देवयानी ने अपने पिता शुक्राचार्य से कहा कि हमारे धर्मशास्त्र के अनुसार भले ब्राह्मण कन्या क्षत्रिय के विवाह योग्य न हो, परन्तु इन्होंने मेरा पाणि (हाथ) ग्रहण कर लिया है। अतः मैं अब इन्हीं के साथ विवाह करूंगी, क्योंकि हिन्दू धर्मशास्त्र में प्रतिलोम विवाह अवैध थे। अर्थात् ब्राह्मण के लिये चारों वर्णों की कन्यायें विवाहार्थ वैध थीं। क्षत्रिय को ब्राह्मण कन्या छोड़कर सब वैध थी, वैश्य को अपने तथा शूद्रवर्ण की कन्यायें वैध थी तथा शूद्र केवल शूद्र कन्या से ही विवाह कर सकता था। जो भी हो देवयानी ने इस नियम को नहीं माना और राजा ययाति का वरण किया, जिससे यदु और तुर्वसु दो पुत्रों का जन्म हुआ। यदु से यादव वंश चला। बाद में शर्मिष्ठा का विवाह भी राजा ययाति से हो गया। जिससे अनु, द्रुह्यु और पुरु तीन पुत्र हुए। शर्मिष्ठा से राजा का विवाह बाद में हुआ था। अतः राजा ययाति ने अपने वैवाहिक जीवन का आनन्द लेने के लिए अपने पांचों पुत्रों से आयु मांगी। सबसे बड़े पुत्र यदु ने मना कर दिया, तब उन्हें देश निकाला दे दिया। सबसे छोटे पुत्र ने आयु देना स्वीकार कर लिया। अतः राजा ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को राजा बना दिया। बाद में पुरु से ही पाण्डववंश चला, उधर यदु को घर से निकाल दिया गया। तब उन्होंने उदरपूर्ति तथा परिवार पालन के लिये गोपालन का व्यापार स्वीकार किया। कालान्तर में आर्थिक हीनता के कारण वे समाज में निम्न कोटि के माने गये। वैसे देखा जाये तो यदु की सन्तान यादव उच्चकोटि के क्षत्रिय हैं; क्योंकि यादव वंश ब्राह्मणी माता और क्षत्रिय पिता से उत्पन्न हैं; जबकि अन्य चन्द्रवंशीय क्षत्रिय जैसे की आज पुण्ढीर, तौमर आदि शूद्रा माता और क्षत्रिय पिता प्रसूत हैं। फिर भी वे उच्च माने जाते हैं। इसका कारण है-आर्थिक विषमता। अतः समाज परिवर्तन में धन ही कारण है।

अतः शुक्राचार्य यहाँ यह कहना चाहते हैं कि इस सुरा को पीकर मैंने ब्रह्म हत्या की थी, कच को मैं सुरा के नशे में पी गया, इसीलिए मैंने इसे शाप दिया है कि तुम्हें पीने वाला पापी माना जायेगा।

अमाबीजमये देवि शुक्रशापाद् विमुच्यताम् ।

वेदानां प्रणवो बीजं ब्रह्मानन्दमयं यदि ॥31॥

तेन सत्येन ते देवि ब्रह्महत्यां व्यपोहतु ।

अतः भगवान् शंकर कहते हैं कि हे देवि ! पार्वति ! ब्रह्मा जी ने कहा कि आपने जो शाप दिया है, उस शाप से इस सुरा को अमा (सूर्य और चन्द्रमा के संयोग होने पर) अर्थात् अमावस्या में शुक्र के शाप से विमुक्त कर दो, यदि वेदों का बीज (मूल कारण) प्रणव है और वह प्रणव (ॐ) यदि ब्रह्मानन्द मय है, इसलिए हे देवि ! सत्य के द्वारा ब्रह्महत्या को दूर करो ।। 31।।

इत्युक्त्वा ब्रह्मणो मन्त्रान् भार्गवः प्रणिपत्य तम् ॥32॥

जगाम भवनं देवि ब्रह्मा स्वभवनं ययौ ।

ऐसा कहकर भार्गव शुक्राचार्य ब्रह्मा जी मन्त्रों को प्रणाम करके चल दिये और ब्रह्मा अपने घर चले गये ।।32।।

ब्रह्मज्ञानी कुलाचारे शीघ्रं याति हरेः पदम् ॥33॥

पतितस्य तु तस्याङ्गे गणन्ति यदि रेणवः ।

तावत्कालं रेणुसंख्यं देवीलोके महीयते॥34॥

ब्रह्मज्ञानी कुलाचार में मदिरा पीकर शीघ्र ही विष्णु के पद को प्राप्त करता है और सुरापान कर गिरने वाले व्यक्ति के शरीर पर है, जब तक धूलि के असंख्य कण रहते हैं, तब तक वह देवी के लोक में महापद प्राप्त करता है ।।33-34।।

दूसरी पाण्डुलिपि में कहा गया है कि-

पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, पतित्वा च महीतले ।

उत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते ।।

अर्थात् सुरा (मदिरा) पीकर, पीकर और फिर पीकर जो भूमि पर गिरता है और गिरकर उठता है और उठकर फिर पीता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात् उसकी मुक्ति हो जाती है।

विशेष- यह प्रशंसा अत्यन्त निन्दनीय है, क्योंकि ऐसा करना करना स्वयं तथा अपने समस्त परिवार को नष्ट कर देना है।

पीत्वा लिङ्गे कुलाचारे मदिरा यौवनान्विताम् ।

कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नाशयेत् ॥35॥

यौवन से अन्वित (जवानी पैदा करने वाली) मदिरा को लिंग और कुलाचार में पीकर करोड़ों जन्मों के अर्जित पाप क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं ॥35॥

पीत्वा पीत्वा जपित्वा च मुक्तः कोटिकुलैः सह ।

ब्रह्मलोके वसेद् देवि सत्यं सत्यं न संशयः ॥36॥

भगवान् शंकर ने कहा कि हे देवि ! सुरा को पीकर, पीकर और पीकर जप करके मनुष्य अपने करोड़ों परिवारों के साथ ब्रह्म लोक में निवास करता है । यह सत्य है, सत्य है, कोई सन्देह नहीं ॥36॥

तत्रैव व्याप्ति व्याप्तिमाप्नोति न पुनर्जायते भुवि ।

पीत्वा च पूजयेद् देवीमीशत्वं लभते ध्रुवम् ॥37॥

तत्रैव लयमाप्नोति पुनर्नैव निवर्तते ।

तथा वह व्यक्ति वहीं पर व्याप्ति को प्राप्त करता है। अर्थात् मुक्त होता है और वह पृथ्वी पर फिर नहीं उत्पन्न होता है। व्याप्ति का अर्थ यहाँ मनुष्य सुरा पान कर देवी का पूजन करे तो निश्चित ही ईशत्व को प्राप्त करता है और वही ईशत्व में लीन हो जाता है और फिर इस संसार में नहीं लौटता। अर्थात् वह ईश्वर के बन्धन में लीन होकर जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है ।। 37।।

पीत्वाऽग्निहोत्री भूत्वा च त्रैलोक्यैश्वर्यभाजनम्॥38॥

जायते साधकः श्रेष्ठो महायोगी महासुखी ।

पीत्वा योगी भोजयित्वा सोऽहं हंसस्ततः परम् ॥39॥

स्वाहेति जायते जीवो मुक्तो वीरो जगत्त्रये ।

चिरजीवी जरामुक्तो विमुक्तः सर्वपातकैः ॥40॥

अणिमादियुतोऽपि स्यात् सत्यं सत्यं न संशयः ।

सुराका पान कर अग्निहोत्री होकर अर्थात् यदि मनुष्य पीकर यज्ञ करे तो तीनों लोकों के ऐश्वर्य का भोग करने वाला हो जाता है। पीकर साधना करने वाला साधक श्रेष्ठ साधक बन जाता है और महायोगी और फिर महासुखी होता है। योगी पीकर भोग करके सोऽहम्' स्थिति को प्राप्त होता है, अत: पीकर भोग करने पर योगी अपनी आत्मा को परमात्मा में मिला देता है, तब उसकी सोऽहम् (वह मैं हूँ) ऐसी स्थिति हो जाती है। उसके बाद उसका जीव हंस बन जाता है और उसका वह जीव स्वाहा, ऐसा हो जाता है और तीनों लोकों में वह जीव बहुत काल जीने वाला होता है, जरामुक्त होता है और सब पापों से विमुक्त हो जाता है। यही नहीं वह अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशत्व, वशित्व, कामावसायिता इन आठों सिद्धियों से सम्पन्न हो जाना चाहिए। यह सत्य है, सत्य है तथा इसकी सत्यता में कोई संशय नहीं है ॥38-40॥

इति ते कथितं गुह्यं सुराशापविमोचनम् ॥41॥

इत्येवं कथिता तुभ्यं यथा पूजा दिगम्बर ।

पूजयित्वा सकृद् देवीमुच्यते सर्वपातकैः ॥ 42॥

भगवान् शंकर ने पार्वती जी से कहा कि इस प्रकार मैंने तुमसे बुद्ध द्वारा बताये गये चीनाचार को कहा। यह अत्यन्त गोपनीय तथ्य है तथा यह सुरा को जो शाप दिया था, उसका मुक्त करना है। इस प्रकार मैंने तुमसे जैसी पूजा दिगम्बरी की होती है, वह बता दी है। अतः एक बार ही देवी की पूजा करके साधक समस्त पापों से छूट जाता है ।।41-42।।

एवं देवीमर्चयित्वा किमसाध्यं जगत्त्रय ।

हरौ प्रकुपिते वापि पूजयित्वा दिगम्बरीम् ॥43 ॥

इस प्रकार देवी की अर्चना करके तीनों लोको में मनुष्य के लिए कुछ भी असाध्य नहीं रहता अर्थात् सब कुछ साध्य हो जाता है। भगवान् हरि (विष्णु) के प्रकुपित हो जाने पर भी दिगम्बरी देवी की पूजा करके मनुष्य को सब कुछ साध्य हो जाता है ।।43।।

सृष्टिस्थितिलयादीनां कर्त्ताऽसौ जगदीश्वरः ।

रोगेभ्यो घोररूपेभ्यः पूजयित्वा विमुच्यते ॥44 ॥

संसार की रचना उसका पालन और फिर प्रलय आदि का करने वाला वह जगदीश्वर दिगम्बरी की पूजा कर रोगों से और घोर रूपों से विमुक्त हो जाता है ।। 44।।

अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत् ।

आरभ्य शुक्लप्रतिपद् यावद् पञ्चदशी भवेत् ॥45 ॥

प्रत्यहं पूजयेद् यस्तु तिथिसंख्यां दिगम्बरीम् ।

मन्त्रसिद्धिर्भवेत् तस्य सत्यं सत्यं न संशयः ॥46॥

जो व्यक्ति शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ करके पन्द्रवीं तिथि अर्थात् अमावस्या तक जो इस दिगम्बरी की पूजा करता है, वह यदि पुत्रहीन है तो पुत्र प्राप्त करता है, यदि दरिद्र है तो धनवान् हो जाना चाहिए। जो व्यक्ति प्रतिदिन तिथि संख्या वाली दिगम्बरी की पूजा करे तो उसकी अवश्य मन्त्रसिद्धि होनी चाहिए। यह सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है ।। 45-46।।

वीरसाधनकर्माणि दुःखसाध्यानि केवलम् ।

सुखसंसाधनं ह्येतत् तव स्नेहात् प्रकाशितम् ॥47 ॥

गोपनीयं प्रयत्नेन पुत्रेभ्योऽपि न दर्शयेत् ।

इत्येतत् कथितं तुभ्यं पूजाविधिमनुत्तमम् ।

साधनं सर्वथा चैनं गोपयेन्मातृजारवत् ॥48 ॥

ये उपर्युक्त जो साधन बताये गये हैं, वे वीर पुरुषों के साधन कर्म हैं तथा ये केवल बहुत बड़े दुःख से साध्य होने वाले है अर्थात् ये आसान नहीं है, बहुत ही कठिन है; परन्तु ये सिद्ध हो जाने पर निश्चय ही सुख के साधन हैं; परन्तु इन्हें प्रयत्न पूर्वक गुप्त रखना चाहिए। इन्हें पुत्रों को नहीं दिखाना चाहिए।

इस प्रकार यह शंकर जी ने पार्वती जी से कहा कि मैंने तुम्हें यह ऐसी पूजा विधि बतायी है, जो सबसे उत्तम है; परन्तु इस साधन को माता के यार के समान सब प्रकार से गुप्त रखना चाहिए ।।47-48।।

इति महाचीनाचारतन्त्रे सर्वाचारसारोत्तमोत्तमे महाचीनक्रमे तृतीयः पटलः ।।

आगे जारी..........चीनाचारतन्त्र पटल 4

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