चीनाचार तन्त्र पटल २
चीनाचार तन्त्र पटल २ में भगवान्
बुद्ध ने वशिष्ठ मुनि से महाचीनक्रम के आचार तथा तारिणी देवी का भजन-पूजन का वर्णन
किया है।
चीनाचारतन्त्रम् द्वितीयः पटलः
Chinachar tantram chapter 2
चीनाचार तंत्र दूसरा पटल
चीनाचारतन्त्र द्वितीय पटल
चीनाचारतन्त्रम्
द्वितीयः पटलः
।। ॐ तारणि देव्यै नमः ।।
चीनाचारतन्त्र पटल दो
अथ द्वितीयः पटलः
ततः प्रणम्य तां देवीं वशिष्ठोऽसौ महामुनिः ।
जगामाचारविज्ञानवाञ्छया बुद्धरूपिणम् ॥1॥
सन्दर्भ- प्रथम पटल में तारिणी देवी
ने वशिष्ठ मुनि ने कहा कि तुम शुद्ध रूप से विष्णु के पास जाओ और उनके बताये गये
आचार द्वारा मेरी आराधना करो तो मैं तुम पर प्रसन्न हो जाऊंगी।
"उसके बाद उन देवी तारिणी को
प्रणाम कर वे मुनि वशिष्ठ आचार के विशेष ज्ञान की इच्छा से अर्थात् महादेवी तारिणी
को प्रसन्न करने की कला को जानने की इच्छा से बुद्धरूपी विष्णु के पास गये "
।। 1 ।।
ततो गत्वा महाचीने देशे स
मुनिपुङ्गवः ।
ददर्श हिभवत्पार्श्वे
साधकेश्वरसेवितम् ॥ 2 ॥
रणज्जघनरावेण रूपयौवनशालिना ।
मदिरामत्तचित्तेन विलासोल्लसितेन ॥3
॥
शृङ्गारपरिवेशेन जगन्मोहनकारिणा ।
भयलज्जाविहीनेन देवीध्यानपरेण च ॥4॥
कामिनीनां सहस्त्रेण
परिवारितमीश्वरम् ।
मदिरापानसञ्जातं रक्तमन्थरलोचनम् ॥5॥
दूरादेव विलोक्य तं वशिष्ठो
बुद्धरूपिणम् ।
विस्मयेन समाविष्टः स्मरन्
संसारतारिणीम् ॥6॥
उसके बाद उन मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ ने
महाचीन देश में जाकर हिमालय के पास में साधकेश्वरों से सेवित बुद्धरूप वाले विष्णु
को देखा,
किस स्थिति में देखा? यह आगे बताते हैं।
जंघाओं की रगड़ की ध्वनि वाली रूप
और यौवन से युक्त मदिरा से मत्त चित्तवाली, भोग-विलास
(संभोग) के लिए पूरी तरह उल्लसित, शृंगार की हुई, अपने श्रृंगार के परिवेश से संसार को मोहित करने वाली, भय और लज्जा से विहीन, देवी के ध्यान में लीन,
हजारों कामिनियों से घिरे हुए, मदिरा का पान
किये हुए तथा मदिरा के नशे के कारण जिनके लाल नेत्र कभी खुल और बन्द हो रहे थे।
ऐसे उन संसार तारिणी देवी का स्मरण करते हुए महात्मा बुद्धरूपी ईश्वर को दूर से ही
देखकर मुनि वशिष्ठ आश्चर्य चकित हो गये।। 2-6।।
विशेष-अर्थात्
ब्रह्मा जी के निर्देश के अनुसार जब महर्षि वशिष्ठ चीन देश गये,
तब उन्होंने भगवान् विष्णु के अवतार महात्मा बुद्ध को उन तारा देवी का
स्मरण करते हुए देखा।
किमिदं क्रियते कर्म विष्णुना
बुद्धरूपिणा ।
वेदवादविरुद्धोऽयमाचारः सम्मतो मम ॥
7 ॥
कामिनियों से घिरे हुए बुद्धरूपी
भगवान् विष्णु को देखकर आश्चर्य चकित मुनि वशिष्ठ ने कहा कि बुद्धरूपी विष्णु
द्वारा यह क्या किया जा रहा है तथा यह आचार तो वेदवाद के विरुद्ध है। यह मेरा
सम्मत है अर्थात् मेरे विचार से यह आचार तो वेद विरुद्ध है ।।7।।
इति चिन्तयतस्तस्य वशिष्ठस्य
महात्मनः ।
आकाशवाणी प्राहाशु मैवं चिन्तय
सुव्रत ॥ 8 ॥
आचार परमार्थोऽयं तारिणीसाधने मुने
।
एतद्विरुद्धाचारस्य मतेनासौ
प्रसीदति ॥ 9 ॥
यदि तस्याः प्रसादं
त्वमचिरेणाभिवाञ्छसि ।
एतेन चीनाचारेण तदा तां भज सुव्रत ॥10 ॥
महात्मा मुनि वशिष्ठ ऐसा ही सोच रहे
थे कि आकाशवाणी हुई कि सुन्दर व्रत करने वाले मुनि वशिष्ठ ऐसा मत विचार करो। हे
मुने! यह आचार तारिणी देवी को सिद्ध करने में परमार्थ रूप है अर्थात् परम अर्थ को
सिद्ध करने वाला है। इसे ही तारिणी साधन का आचार कहा जाता है। इसे जो तुम वेद
विरुद्ध आचार कह रहे हो तो इसी विरुद्ध आचार के मत से वह प्रसन्न होती है तथा
मुनिवर ! यदि तुम उस महादेवी तारिणी का प्रसाद (उनकी प्रसन्नता) शीघ्र चाहते हो तो
हे सुव्रत ! तब इसी चीनाचार द्वारा उन महादेवी का भजन करो ।। 8-10।।
आकाशवाणीमाकर्ण्य रोमाञ्चितकलेवरः ।
वशिष्ठो दण्डवद्भूमौ पपातातीव
हर्षितः ॥11॥
तथोत्थाय प्रणम्यासौ कृताञ्जलिपुटो
मुनिः ।
जगाम विष्णोः सान्निध्यं बुद्धरूपस्य
पार्वति ॥ 12 ॥
आकाशवाणी को सुनकर मुनि वशिष्ठ का
शरीर रोमाञ्चित हो गया और अत्यन्त हर्षित (प्रसन्न) होकर दण्ड के समान पृथ्वी पर
गिर गये। जैसे कोई डण्डा जमीन पर गिर जाता है, उसी
प्रकार वे भूमि पर गिर गये। फिर हे पार्वति ! वे मुनि वशिष्ठ उठकर दोनों हाथ जोड़कर
प्रणाम करके बुद्धरूप वाले विष्णु के पास गये ।।11-12 ।।
अथासौ तं समालोक्य मदिरामोदविह्वलः
।
प्राह बुद्धः प्रसन्नात्मा किमर्थं
त्वमिहागतः ॥13॥
इसके बाद उन मुनि वशिष्ठ को देखकर
मदिरा के चरमानन्द से विह्वल प्रसन्न आत्मा बुद्ध मुनि वशिष्ठ से बोले कि तुम यहाँ
पर किसलिए आये हो ।।13 ।।
अथ बुद्धं प्रणम्याह भक्तिनम्रो
महामुनिः ।
यदुक्तं तारिणीदेव्या निजाराधनहेतवे
॥14 ॥
इसके बाद बुद्ध को प्रणाम करके
भक्ति से नम्र उन महामुनि वशिष्ठ ने वह सब बता दिया, जो उपाय तारिणी देवी ने अपनी आराधना के लिए बताया था ।।14।।
तच्छ्रुत्वा भगवान्
बुद्धस्तत्त्वज्ञानमयो हरिः ।
वशिष्ठं प्राह संज्ञानं
चीनाचाराऽधिकारवान् ॥15॥
अप्रकाश्योऽयमाचारस्तरिण्याः सर्वदा
मुने ।
तव भक्तिवशादस्मि प्रकाशयामीह
तत्परः ॥16॥
तारिणी देवी के वचन को सुनकर
तत्त्वज्ञानमय चीनाचार पर पूर्ण अधिकार वाले, दुःखहरण
करने वाले भगवान् बुद्ध ने मुनि वशिष्ठ से सम्यक् ज्ञान को कहा कि हे मुनि वशिष्ठ!
वैसे तो तारिणी देवी का आचार सर्वदा प्रकाशित करने योग्य नहीं है; परन्तु मैं तुम्हारी भक्ति के वश में हूँ, इसलिए
यहाँ तत्पर होकर प्रकाशित कर रहा हूँ।। 15-16।।
विशेष-
इस पाण्डुलिपि में 'चीनाचारोऽधिकारवान्'
शब्द है, जो उचित नहीं है तथा दूसरी
पाण्डुलिपि में 'चीनाचाराधिकारवान्' शब्द
है, जो उचित है।
बुद्ध उवाच
अथाचारविधिं वक्ष्ये तारादेव्याः
समृद्धिदम् ।
यस्यानुष्ठानमात्रेण भवाब्धौ न
निमज्जति ॥17॥
भगवान् बुद्ध ने कहा हे मुनि
वशिष्ठ! मैं तुम्हें समृद्धि प्रदान करने वाली तारा देवी की आचार विधि (उन्हें
प्रसन्न करने की विधि) बताऊंगा। यह ऐसी विधि है, जिसके अनुष्ठान मात्र से मनुष्य भवसागर में नहीं डूबता है अर्थात् भवसागर
को पारकर स्वर्ग प्राप्त कर ही लेता है ।।17।।
समस्तशोकशमनमानन्दाब्धिनिपातनम् ।
तत्त्वज्ञानमयं साक्षाद्
विमुक्तिफलदायकम् ॥18 ॥
यह तारा देवी को प्रसन्न करने की
विधि समस्त शोकों को शान्त करने वाली और समस्त शोकों को शान्त कर आनन्द के सागर
में गिराने वाली तत्त्वज्ञानमय और साक्षात् विमुक्ति (मोक्ष) के फल को प्रदान करने
वाली है ।। 18 ।।
स्नानादि मानसं शौचं मनसश्च जपः
स्मृतः ।
पूजनं मानसं दिव्यं मानसं
तर्पणादिकम् ॥19॥
स्नान आदि से शारीरिक पवित्रता,
मन की पवित्रता तथा मन से और स्मरण, पूजन,
दिव्य मानस है तथा तर्पण आदि भी मन की क्रियायें हैं ।।19।।
सर्व एव शुभः कालो नाशुभो विद्यते
क्वचित् ।
न विशेषो दिवारात्रौ न सन्ध्याया
महानिशि ॥ 20 ॥
तथा इस तारा देवी को प्रसन्न करने
की विधि के लिए सभी समय शुभ है। वहाँ कही भी कुछ भी अशुभ नहीं है,
न तो दिन और रात में कुछ विशेष है, न सन्ध्या
विशेष है और न ही महारात्रि में कुछ विशेष है अर्थात् महादेवी तारिणी को प्रसन्नता
की विधि कभी भी कहीं भी की जा सकती है ॥ 20॥
वस्त्रासनस्थानगेहदेहस्पर्शादिवारिणः
।
शुद्धिं न कारयेदेव
निर्विकल्पमनाश्च यः ॥ 21 ॥
वस्त्र,
आसन, स्थान, घर, शरीर स्पर्श आदि वारिण हैं। अतः जिनके मन में कोई विकार नहीं है, उनको कोई शुद्धि नहीं करनी चाहिए। भाव यह है कि देवी आदि की पूजा के लिए
जो यह कहा जाता है कि पूजा के लिए ऐसा वस्त्र होना चाहिए। ऐसा बैठने का स्थान
अर्थात् मन्दिर आदि होना चाहिए। इस प्रकार का स्थान ऐसा घर हो। ऐसा शुद्ध शरीर हो
। इस प्रकार स्पर्श हो । यह सब तारा देवी की पूजा में आवश्यक नहीं; क्योंकि जिनके मन में कोई विकार नहीं है अर्थात् जो निर्विकल्प मन वाले
हैं, उनको कोई शुद्धि नहीं करनी चाहिए ॥ 21 ॥
नात्र शुद्धयाद्यपेक्षास्ति न च
मद्यादिदूषणम् ।
सर्वथा पूजयेद् देवीमस्नातः
कृतभोजनः ॥22॥
इस तारा पूजा पद्धति में शुद्धि आदि
की कोई अपेक्षा नहीं है और न ही मद्य आदि से दूषित होना ही माना जाता है। स्नान
बिना किये अथवा भोजन किये हुए तथा सब प्रकार से देवी की पूजा करनी चाहिए। भाव यह
है कि जैसा कि अन्य पूजाओं में यह कहा जाता है कि अपना शरीर शुद्ध कर शुद्ध स्थान,
शुद्ध वस्त्र, शुद्ध घर में स्नानादि कर
निराहार पूजा करनी चाहिए; परन्तु यहां इस तारा देवी की पूजा
में इन सबको करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यहाँ देवी को बिना स्नान किये हुए भोजन
करने के बाद भी पूजा कर प्रसन्न किया जा सकता है। जैसा कि पूजा आदि में मद्य आदि
का निषेध किया जाता है। कहा जाता है कि मद्यादि (मद्य, मांस,
मत्स्य, मुद्रा और मैथुन) से पूजा दूषित हो
जाती है; परन्तु यहाँ तारा देवी की पूजा में इस सबसे कोई
दूषित होना नहीं हैं ।।22।।
महानिश्यशुचौ देशे बलिं मन्त्रेण
दापयेत् ।
स्त्रीद्वेषो नैव कर्त्तव्यो
विशेषात् पूजनं स्त्रियः ॥ 23
॥
महारात्रि (घोर रात्रि) में,
अपवित्र स्थान (मरघट) आदि में मन्त्र द्वारा बलि दिलानी चाहिए। पूजा
में स्त्री से द्वेष नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से स्त्रियों की पूजा करनी चाहिए
।। 23।।
तासां प्रहारनिन्दाञ्च
कौटिल्यमप्रियन्तथा ।
सर्वथा नैव कर्तव्यमन्यथा
सिद्धिरोधकृत् ॥24 ॥
अतः स्त्रियों पर प्रहार नहीं करना
चाहिए,
उनकी कभी निन्दा नहीं करनी चाहिए, उनके साथ
सर्वथा कभी कुटिलता नहीं करनी चाहिए और न ही उनका सर्वथा अप्रिय करना चाहिए।
यहाँ सर्वथा का अर्थ है-किसी भी
प्रकार से स्त्रियों पर प्रहार, किसी प्रकार
से उनकी निन्दा, किसी भी प्रकार उनका बुरा और किसी भी प्रकार
से उनकी कुटिलता नहीं करनी चाहिए। यदि उन पर प्रहार, उनकी
निन्दा, उन पर कुटिलता, उनका बुरा
करेगा तो उसकी सिद्धि में बाधा पैदा होगी। अर्थात् देवी की सिद्धि नहीं हो पायेगी
।। 24।।
स्त्रियो देवाः स्त्रियः प्राणाः
स्त्रिय एव विभूषणम् ।
स्त्रीसङ्गिना सदा भाव्यमन्यथा
स्वस्त्रिया सह ॥ 25 ॥
स्त्रियां ही देवता हैं,
स्त्रियां ही प्राण हैं और स्त्रियां ही विभूषण (गहना) हैं। अतः
स्त्रियों का साथ सदा होना चाहिए। अन्यथा अपनी स्त्री का साथ पूजा में सदैव होना
चाहिए ।। 25।।
तद्धस्तावचितं पुष्पं तद्धस्तावचितं
जलम् ।
तद्धस्तावचितं द्रव्यं देवताभ्यो
निवेदयेत् ॥26॥
स्त्री के हाथ से देवी पर चढ़ाये
गये फूल,
स्त्री के हाथ से चढ़ाया गया जल, स्त्री के
हाथ से चढ़ाया गया द्रव्य, देवताओं के लिए निवेदन करना चाहिए
।।26।।
महाचीनद्रुमलतावेष्टितः साधकोत्तमः
।
रात्रौ यदि जपेन्मन्त्रं दुर्लभं
तस्य किं भवेत् ॥27॥
यदि महाचीन वृक्ष की लता से वेष्टित
उत्तम साधक रात्रि में दुर्लभ मन्त्र का जाप करे, उसे फिर संसार में क्या दुर्लभ है अर्थात् कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।।27।।
महाचीनद्रुमलतावेष्टनेन च यत् फलम् ।
तस्यापि षोडशांशेन कलां नार्हन्ति
ते शवाः ॥28॥
महाचीन वृक्ष की लता के वेष्टन
(लिपटने) से जो फल प्राप्त होता है,
उसके सोलहवें अंश से वे शव (मृत शरीर) कला को नहीं प्राप्त करते हैं ।।28।।
शवासनाधिकफलं लतागेहप्रवेशनम् ।
श्मशानालयमागत्य मुक्तकेशो दिगम्बरः
॥29॥
महाचीनद्रुमललतावेष्टित
मुक्तिमाप्नुयात् ।
जपस्थाने महाशङ्खं निवेश्योर्ध्वं
जपञ्चरेत् ॥30॥
स्त्रियं गच्छन् स्पृशन् पश्यन्
यत्र तत्रापि साधकः ।
भक्षंस्ताम्बूलमन्यांश्च
भक्ष्यद्रव्यान् यथारुचीन् ॥31॥
मुक्त्वाऽन्यशेषद्रव्याणि जप्त्वा
भुक्त्वा जपं चरेत् ।
दिक्कालनियमो नास्ति
स्थित्यादिनियमो न च ॥32॥
शवासन (मुर्दे) को आसन बनाकर
अर्थात् मुर्दे के ऊपर बैठकर साधना करने से अधिक फल लता गृह में प्रवेश करने से
होता है। इसलिए श्मशानालय (मरघट) आकर खुले केशों वाला बिल्कुल नग्न बदन तथा शरीर
पर महाचीन वृक्ष की लता पर वेष्टित शरीर वाला व्यक्ति मुक्ति प्राप्त करे। जप के
स्थान पर महाशंख को ऊपर रखकर जप करे। स्त्री के साथ गमन (संभोग) करते हुए,
उसे छूते हुए, उसे देखते हुए जहाँ-तहाँ
अर्थात् कहीं भी साधक पान तथा जिनको खाने की इच्छा हो, उन
द्रव्यों (पदार्थों) को खाते हुए तथा अन्य जो शेष द्रव्य हैं, जिन्हें खाने की इच्छा नहीं है, उन्हें छोड़ करके,
जप करके, भोजन करके, जप
करना चाहिए। अर्थात् जप करके भोजन करे अथवा खा करके जप करे इस विषय में कोई विशेष
प्रावधान नहीं है। अतः तारिणी देवी की पूजा में कोई दिशा और समय का नियम नहीं है
तथा न ही स्थिति अर्थात् बैठने का ही नियम है ॥ 29-32॥
जपे न कालनियमो नार्चादिषु बलिष्वपि
।
स्वेच्छाचारोऽत्र गदितः प्रचरेद्
घृष्टमानसः ॥33॥
जप में कोई समय का नियम नहीं है और
न ही उस महादेवी तारिणी की पूजा आदि में और बलि आदि में समय का कोई नियम है। यहाँ
स्वेच्छाचार कहा गया है। यह धृष्टमन वाले (उद्दण्ड) व्यक्ति द्वारा किया जाना
चाहिए ॥ 33॥
कृतार्थं मन्यमानस्तु
सन्तुष्टनिजमानसः ।
सुगन्धिश्वेतलौहित्यकुसुमैरर्चयेत् कुलम्
॥34॥
साधक को स्वयं को देवी का कृतार्थ
(अहसान) मानते हुए अपने मन में सन्तुष्ट होते हुए सुगन्धित श्वेत और लाल फूलों से
कुल की पूजा करनी चाहिए ॥ 34 ॥
बिल्वैर्मरुबकाद्यैश्च
तुलसीवर्जितैः शुभैः ।
एकलिङ्गे श्मशाने वा शून्यागारे
चतुष्पथे ॥35॥
तटस्थः साधयेद् योगी तारां
भुवनतारिणीम् ।
तारिणी दक्षिणा काली भैरवी सुन्दरी
तथा ॥36॥
महाचीनक्रमेणैताः सिद्ध्यन्त्येव न
संशयः ।
सुन्दरीभैरवीदेव्यः प्रकारोऽन्योऽपि
विद्यते ॥37॥
तारिणीदक्षिणासिद्धिर्नैव चीनक्रमं
विना ।
महाचीनक्रमाचारतत्परः साधकोत्तमः
॥38॥
बेलों (शिवफलों) से,
मरुबकों (मरुआ) आदि से शुभ तुलसी को छोड़कर एकलिङ्ग (अकेले) में
शूने घर में अथवा चौराहे पर तटस्थ (उदासीन) होकर भुवन तारिणी भवसागर से तारने वाली
देवी तारा की सिद्धि करनी चाहिए।
तारिणी,
दक्षिणा, काली, भैरवी
तथा सुन्दरी-ये सभी देवियां महाचीन क्रमाचार से ही सिद्ध होती हैं, इसमें संशय नहीं है। सुन्दरी भैरवी देवी का अन्य प्रकार भी है।
तारिणी और दक्षिणा की सिद्धि
चीनक्रम के बिना नहीं होती है, इसीलिए उत्तम
साधक को महाचीन क्रमानुसार में तत्पर रहना चाहिए ।।35-38।।
तारिणीपूजनं विद्याकुलकोटिं समुद्धरेत्
।
नृत्यन्ति पितरस्तस्य गाथां गायन्ति
ते मुदा ॥39॥
तारिणी देवी का पूजन,
विद्या को और परिवार को ऊंचा उठाता है। अर्थात् तारिणी देवी की पूजा
से मनुष्य विद्याओं में ऊंचा उठता है और परिवार से ऊंचा उठता है। परिवार में
सुख-समृद्धि रहती है। उसके पितर खुशी से नाचते और वे आनन्द पूर्वक अपने पुत्र की
गाथा गाते हैं ॥39॥
अपि नः स्वकुले कश्चित् कुलज्ञानी
भविष्यति ।
स धन्यः स चिरज्ञानी स कविः स च
पण्डितः ॥40॥
स कुलीनः स सुकृती स बली स च साधकः
।
स ब्राह्मणः स वेदज्ञः
सोऽग्निहोत्री स दीक्षितः ॥41 ॥
स तीर्थसेवी पीठेषु निवासी स च
मुक्तिभाक् ।
स व्रती सोमपायी स स यज्वा
सर्वमन्त्रिषु ॥42 ॥
स वैष्णवः स शैवश्च स सौरः स चर
गाणपः ।
महाचीनक्रमाचारैस्तारिणीं यः सदा
भजेत् ॥43॥
यही नहीं यह भी हो सकता है कि हमारे
कुल में यदि कोई कुलज्ञानी हो तथा जो तारिणी का भजन-पूजन करता हो अर्थात् जो कुल
पूजा जानकर करता हो तो वह धन्य है और बहुत ज्ञानी, वह कवि है और वह पण्डित होगा ही वह कुलीन, वह अच्छे
कर्म करने वाला वह बलवान् वह साधक, वह ब्राह्मण (ब्रह्म
ज्ञानी), वह वेद का ज्ञान रखने वाला, वह
यज्ञ करने वाला, वह दीक्षित, वह
तीर्थसेवी, सिद्धिपीठों में निवास करने वाला, वह मुक्ति का भोग करने वाला, वह व्रती, वह सोमपायी, वह सब मन्त्रियों में यज्वा (यज्ञ करने
वाला) वह वैष्णव, वह शैव, वह सौर तथा
वह गाणप (गणेश) होगा, जो महाचीनक्रम के आचारों से तारिणी
देवी का भजन करेगा ॥40-43॥
इति श्री महाचीनाचारसार तन्त्रे
सर्वाचार सारोत्तमोत्तमे महाचीनाचारक्रमे द्वितीयः पटलः ।।
अधिक पाठः
बुद्ध उवाच
स्त्रीसम्भोगेन कौलानां यदि मोक्षो
भवेदिह ।
सर्वेऽपि जन्तवो लोके मुक्ताः स्युः
स्त्री निषेवणात् ॥
अतः शृण्वन्तरं पुत्र शर्म (श्च?
) च महालय ।
मोक्षं ददामि भूतानामेतद्धर्मप्रवर्तिनाम्
॥
वृथा पानं यत्क्रियते सुरापानं
तदुच्यते ।
तन्महापातकायैव वेदादिषु निरूपितम्
॥
अब यहाँ यह प्रश्न उपस्थित होता है
कि स्त्री के सम्भोग करने से यदि कौलाचार करने वाले साधकों को इस संसार में मोक्ष
हो,
तब तो संसार में सभी प्राणी स्त्री के साथ सम्भोग करके मोक्ष
प्राप्त कर लेंगे तथा सभी करते ही हैं।
इसलिए हे पुत्र! घर और महाघर का
अन्तर सुनो-प्रत्येक प्राणी नित्य सम्भोग करते हैं। सम्भोग से ही संसार चल रहा है,
यह सामान्य है, जैसे घर सबके पास होता है;
परन्तु महाघर एक विशेष है, वह सबके पास नहीं
होता। उसी तरह महासम्भोग एक विशेष है, जो सभी नहीं करते हैं।
महासम्भोग जिसे कौलाचार भी कहा कहा जा सकता है, वह एक अलग ही
धर्म है।
बुद्ध रूप भगवान् विष्णु ने कहा कि
मैं इस महालय (महासम्भोग), कौलाचार
(महाचीनाचार) धर्म में प्रवृत्त पुरुषों को मोक्ष प्रदान करता हूँ। जैसे कि जो
वृथा बेकार रोजाना सुरा का पान करते हैं, वह सुरापान कहा
जाता है। वह सुरा का पान वेद आदि ग्रन्थों में महापाप के रूप में बताया गया है
अर्थात् ऐसे ही सुरा का पीना सुरापान कहा जाता है तथा वह सुरापान महापातक (महापाप)
माना गया है, वह सुरा पान यदि महाचीनाचार में विधिवत् देवी
की आराधना में किया जाता है तो वह मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है।
वशिष्ठ उवाच
त्वन्मुखात् श्रोतुमिच्छामि
कुलधर्मं विशेषतः ।
एतस्य हि विशेषज्ञस्तत्समो नास्ति
कश्चन ॥
तस्य धर्मस्य माहात्म्यं
सर्वधर्मोत्तमस्य च ।
वद मे परमेशान! यदि तेऽस्ति कृपा
मयि ।।
वशिष्ठ ने कहा कि भगवन्! मैं
विशेषत: आपके मुख से कुलधर्म सुनना चाहता हूँ। इस कुलधर्म को विशेष रूप से जानने
वाला तुम्हारे समान दूसरा कोई भी नहीं है। अतः हे प्रभो परमेशान! यदि आपकी मुझ पर
कृपा दृष्टि है तो उस सर्वोत्तम कुलधर्म का माहात्म्य मुझे बतलाइये।
श्रीभगवानुवाच
मुने! शृणु प्रवक्ष्यामि यन्मां
त्वं परिपृच्छसि ।
तस्य श्रवणमात्रेण योगिनां च प्रियो
भवेत् ॥
शिवब्रह्मगुहादीनां न मया कथितं
पुरा ।
कथयामि तव स्नेहाच्छृणुष्वैकाग्रमानसः
॥
पारम्पर्यक्रियायाश्च अतिगुप्तं
महाद्भुतम् ।
अकथ्यं परमेशानं तथापि कथयामि ते ॥
बुद्ध रूप श्री विष्णु भगवान् ने
कहा कि हे मुनि! यदि तुम मुझसे पूंछना चाहते हो तो मैं तुम्हे बताऊंगा और उसके
सुनने मात्र से तुम योगियों के प्रिय हो जाओगे ।। शिव,
ब्रह्मा, गुह आदि को भी मैंने यह नहीं बताया
है। मैं तुम्हें तुम्हारे प्रति प्रेम के कारण बता रहा हूँ, अतः
हे मुनि ! एकाग्रचित्त होकर सुनो- परम्परा की क्रिया वाला अर्थात् इसकी तो परम्परा
ही चली आ रही; क्योंकि यह सब प्राणियों का विहित कर्म है तथा
इसे गुप्त माना गया है; परन्तु यह गुप्त है तो फिर महा
अद्भुत है। सभी प्राणी इसके शिकार हैं, फिर भी यह अकथ्य है।
कहने योग्य नहीं है, तथापि हे परमेशान मुनि ! मैं तुम्हें
बताता हूँ।
सर्वेभ्यश्चोत्तमा वेदा वेदेभ्यो
वैष्णवः परः ।
वैष्णवात् परमं शैवं शैवाद्
दक्षिणमुत्तमम् ।
दक्षिणादुत्तमं कौलं कौलात् परतरं न
हि ॥
गुह्याद् गुह्यतरं देवि सारात्सारं
परात्परम् ।
मथित्वा ज्ञानमन्थेन
वेदागममहार्णवम् ।
कुलाचारक्रमेणैव न सिद्धिर्जायते
क्वचित् ॥
बुद्ध रूप भगवान् ने कहा कि सबसे
उत्तम वेद है, वेदों से वैष्णव (विष्णु को
मानने वाले) उत्तम हैं, वैष्णवों से शैव (शिव के उपासक)
उत्तम हैं, शैवों से दक्षिण पन्थी उत्तम हैं, दक्षिणपन्थियों से कौल (कुलधर्म को मानने वाले) उत्तम हैं और कौल से उत्तम
कोई नहीं है तथा हे देवि यह गुप्त से भी अधिक गुप्त है तथा यह सार से सार निकालकर
बनाया गया है तथा ज्ञान की मथानी से वेद और आगम के सागर को मथ कर निकाला गया है।
अतः कुलाचार क्रम से ही सिद्धि होती है। अन्य किसी से नहीं होती।
॥इति चीनाचार तन्त्रे द्वितीयः पटलः
।।
आगे जारी..........चीनाचारतन्त्र पटल 2

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