माहेश्वरतन्त्र पटल ३९
माहेश्वरतन्त्र के पटल ३९ में
श्रीकृष्ण की दिव्य लीला में स्वामिनी की खिन्नता कारण और रहस्य लीला का विवेचन का
वर्णन है।
माहेश्वरतन्त्र पटल ३९
Maheshvar tantra Patal 39
माहेश्वरतन्त्र ज्ञानखण्ड पटल ३९
नारदपञ्चरात्रान्तर्गतम्
माहेश्वरतन्त्र उन्तालिसवाँ पटल
माहेश्वरतन्त्र एकोनचत्वारिंश पटल
अथ एकोनचत्वारिंशं पटलम्
पार्वत्युवाच-
भगवन् देवदेवेश दिव्यज्ञानविशारद ।
अत्याश्चर्यकरी प्रोक्ता कथा ते
जीवदुर्लभा ॥ १ ॥
पार्वती ने कहा- हे भगवान्,
देवदेवेश, दिव्यज्ञान के विशेषरूप से ज्ञाता,
आप ने अत्यन्त आश्चर्यान्वित कर देने वाली और जीवों के लिए दुर्लभ
कथा कही है ।। १ ।।
प्रादुर्भवन्ति देवेश सर्गेस्मिन्
देवदानवाः ।
मनुष्यलोके पि च ते सम्भवन्ति
यदृच्छया ॥ २ ॥
हे देवेशि ! इस सृष्टि में देव और
दानव दोनों ही उत्पन्न होते हैं । वे इस मृत्यलोक में भी अपनी इच्छा से जन्म लेते
हैं ॥ २ ॥
देवाः क्षमार्जवोपेताः
दयादाक्षिण्यसंयुताः ।
जितेन्द्रिया जितक्रोधा
दम्भमात्सर्य वज्जिताः ॥ ३ ॥
उनमें से देव क्षमा और आर्जव,
सरलता से युक्त होते हैं और उनमें दया तथा दाक्षिण्य [=उदारता ]
होती है', 'वे जितेन्द्रिय एवं क्रोध को भी जीतने वाले होते
हैं। वे अहङ्कार एवं ईर्ष्या से रहित होते हैं ।। ३ ॥
अलोलुपाः सुशीलाश्च
श्रद्धाभक्तिसमन्विताः ।
जिज्ञासवो दढाभ्यासा
वेदशास्त्रार्थचिन्तकाः ॥ ४ ॥
वे लालची नहीं होते एवं वे सुशील
तथा श्रद्धा-भक्ति से युक्त होते हैं । वे जिज्ञासु, दृढ अभ्यास करने वाले और वेदशास्त्र के अथों का चिन्तन करने वाले होते हैं
॥ ४ ॥
तेषापि महादेव
तत्त्वमेतत्सुदुर्लभम् ।
किं पुनर्दानवांशानां परद्रोहरतात्मनाम्
।। ५॥
उनमें भी,
हे महादेव, यह 'तत्त्व'
दुर्लभ है तो फिर इन दानवों में, जो दूसरे से
द्रोह करने में ही सदेव रत है यह कहाँ प्राप्त होगा ? ।। ५
।।
नास्तिकानां च धूर्तानां कृतानां
दुरात्मनाम् ।
वेदार्थदूषकानां व
देहादिष्वर्थमानिनाम् ॥ ६ ॥
नास्तिक [ जो वेद में एवं ईश्वर में
आस्था नहीं रखते ], धूर्त, कृतघ्न [किसी का उपकार न मानने वाले] दुरात्मा, वेद
के अर्थ को अन्यथा करके कहने वाले और देह आदि में ही आस्था रखने वालों को कहाँ यह
तत्त्व ज्ञान प्राप्त होगा ? ।। ६ ।।
बैडालिकानामक्षपादशापविभ्रष्टचेतसाम्
।
सौगतानाञ्च वौद्धानां
दिगम्बरमतस्पृशाम् ॥ ७ ॥
जैनमाध्यमिकानां च चार्वाकाणां
दुरात्मनाम् ।
वेदशास्त्रोज्झितानां च न मुक्तिः
क्वापि विश्रुता ॥ ८ ॥
वैडालिक वृत्ति में लीन [ घर-घर में
छीना झपटी करके जीने वाले ], अक्षपाद
[गौतम] के शाप से भ्रष्ट हुए चित्त वालों को, सुगत (बुद्ध)
के शिष्यों, बौद्धों और दिगम्बर जैन आदि अस्पृश्यों को [
श्वेताम्बर ] जैन, माध्यमक [ बौद्ध-मत ] चार्वाक और अन्य
दुरात्माओं को तथा वेद शास्त्र को छोड़ देने वालों की मुक्ति कहीं नहीं सुनीं गई ॥
८ ॥
यस्त्वया वासनासर्गस्तृतीयः
परिकीर्तितः ।
यदर्थमुपदेशोऽयं तत्वज्ञानस्य धूर्जटे
॥ ९ ॥
जो आपने तृतीय वासना सर्ग बतलाया है
हे घूर्जंटे जिसके लिए यह 'तत्व ज्ञान' का उपदेश दिया गया है ॥ ९ ॥
अह तु श्रवणादेव कृतार्थास्मीति मे
मतिः ।
प्राप्तिः सम्बन्धविषया नान्यथा तु
कदाचन ॥ १० ॥
मैं तो उसके श्रवण से ही कृतार्थ हो
गई हूँ मेरा यह विचार है । यदि इस ज्ञान की प्राप्ति हो जाय तो वह कभी भी निष्फल
नहीं होता ।। १० ।
तस्मान्मे श्रवणानन्दो रोचतेतितरां
प्रभो ।
अप्राप्य: श्रवणानन्दः पापग्रस्ते
दुरात्मभिः ॥ ११ ॥
अतः हे प्रभो ! मुझे श्रवण का
अत्यन्त आनन्द हो रुचिकर है। इसके श्रवण का आनन्द पापग्रस्त और दुरात्माओं का नहीं
प्राप्त होता ।। ११ ।।
तस्मात् संश्रोतुमिच्छामि प्रवक्तुं
यदि मन्यसे ।
न त्वया सदृशः
कचित्करुणामृत्तवारिधिः ॥ १२ ॥
अतः यदि आप कहना चाहते हैं तो मैं
इसे सुनना चाहती हूँ। करुणा के अमृत रूप समुद्र के समान आप जैसा (तस्ववेत्ता) और
कोई अन्य नहीं है ॥ १२ ॥
यत्त्वयोक्तं महादेव सर्वास्ताः
कृष्णयोषितः ।
प्रहषं परमं जग्मुनिषण्णां
स्वामिनीं विना ॥ १३ ॥
हे महादेव ! जो आपने उन श्री कृष्ण
की अङ्गनाओं के बारे में कहा है कि वे सभी स्वामिनी के बिना अत्यन्त हर्षान्वित
होकर भी खिन्न हुई ॥ १३ ॥
तत्र मे संशयो जातो देवदेव जगत्पते
।
स्वामिनीखेदमूलं मे कथयस्व यथातथम्
।। १४ ।।
हे देवदेव,
जगत्पते ! यहाँ मुझे सन्देह हो रहा है कि स्वामिनी के खेद का क्या
कारण था । जैसा हो वैसा ही आप मुझसे कहें ॥ १४ ॥
शिव उवाच-
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि
स्वामिनीखेदकारणम् ।
नेत्रबन्धात्मिका लीला
नीलाद्रिशिखरे कृता ।। १५ ।।
शिवजी ने कहा- हे देवि ! सुनो,
मैं स्वामिनी के खेद का कारण बतलाता हूँ- नीलाचल के शिखर पर भगवान्
श्री कृष्ण ने नेत्र बन्द करके खेल खेलने की लीला की ॥ १५ ॥
तत्रेन्दिरानाम हित्वा सुन्दरीत्यवदत्प्रियः
।
तदेन्दिरावदद्वाक्यं सुन्दरी न
भवाम्यहम् ।। १६ ।
वहाँ पर इन्दिरा नामक सखी को उसका
नाम छोड़कर भगवान् ने 'सुन्दरी' कह कर सम्बोधित किया । तभी इन्दिरा ने कहा- 'नहीं,
मैं सुन्दरी नहीं हूँ' ।। १६ ।।
नाम्नाहमिन्दिरा साक्षात्प्रियस्मि
प्राणनायक ।
तदा कृष्णोददद्वाक्यं शृण्वतीनां च
योषिताम् ।। १७ ॥
त्वयीन्दिरे सुन्दरीति श्रमः
सार्वदिको मम ।
ज्ञात्वापि त्वामिन्दिरेति क्षणादेव
भ्रमद्धिया ।
जल्पितं सुन्दरीत्येतन्मयोक्तमवधार्यताम्
॥ १८ ॥
हे प्राणनायक । इन्दिरा नामक में
साक्षात भगवान की प्रिया है। तब कृष्ण ने उन स्त्रियों की बातों को सुनते हुए कहा-
'हे इन्दिरे ! तुम सुन्दरी हो' इस प्रकार हमें सर्वदा
ही भ्रम रहा है । तुम्हें यह जानकर भी कि 'तुम इन्दिरा'
हो । फिर भी हमारी बुद्धि के क्षणमात्र के भ्रम के कारण मैंने
तुम्हें 'सुन्दरी' कह दिया है- ऐसा
जानो ।। १७-१८।।
इत्येतद्वचनं श्रुत्वा सुन्दरीगौरवात्मकम्
।
किञ्चित्कलुषचित्ताभूत्
सखीमण्डलमध्यतः ।। १९ ।।
इस प्रकार के वचनों को सुनकर गौर
वर्णा सुन्दरी का चित्त उन सखियों के समूह के मध्य कुछ कलुषित हो गया ।। १९ ।।
सर्वास्वतासु घटते समः स्नेहः
प्रियस्य हि ।
सुन्दर्यामधिकं प्रेम हेतुना केन
युज्यते ॥ २० ॥
इन सभी सखियों में प्रिय का स्नेह
तो समान बना रहता है फिर किस कारण से 'सुन्दरी'
पर अधिक प्रेम हो ? ।। २० ।।
सखीनां चापि सर्वासामहमेका वराङ्गना
।
मत्तः किमधिका जाता सौन्दर्यादिगुणादिभिः
॥२१॥
फिर सभी सखियों में क्या मैं हो एक
वराङ्गना [ सुन्दरी ] हूँ। सौंदर्य आदि गुणों से मुझसे और कोई अधिक क्या नहीं है !
।। २१ ।।
स्वामिनीत्थं विमृष्य स्वे हृदये
प्रेमपूरिते ।
तस्थौ समाहितमतिगूं हयामास हृद्गतम्
।। २२ ।।
इस प्रकार से स्वामिनी (राधा) अपने प्रेमपूरित
हृदय में विचार विमर्श करके हृद्गत भावों को हृदय में ही छिपाकर तथा समाहितचित्त
होकर चुपचाप वहाँ से चली गई ।। २२ ।
ततो नीलाद्रिशिखरादागत्य मणिसद्मनि
।
प्रियाभिर्वेष्टितस्तत्र संस्थितः
पुरुषोत्तमः ॥ २३ ॥
इसके बाद नीलाचल के शिखर से आकर उस
मणिनिर्मित गृह में भगवान् पुरुषोत्तम अपनी प्रियाओं से घिरे हुए थे ।। २३ ।।
तत्र प्रियाभिः सम्प्रश्ने कृते
दर्पणमादिशत् ।
आदाय दर्पणं सख्यस्तर्कयन्त्यो मुदं
ययुः ॥ २४ ॥
वहाँ पर प्रियाओं के प्रश्न पूछने
पर उन्होंने दर्पण लाने के लिए आदेश दिया । तब सखियाँ दर्पण लेकर आपस में विचार
विमर्श करते हुए बड़ी ही प्रसन्नता से वहाँ पहुँची ।। २४ ।।
स्वबुध्या सुन्दरी चापि सखीचित्तं
समादधे ।
तत्समाहितमाकर्ण्य प्रसन्नः
पुरुषोत्तमः ॥ २५ ॥
सुन्दरी (राधा) ने भी अपनी बुद्धि
से सखी [ भगवान् कृष्ण ] को चित्त में ध्यानस्थ किया।
उसको समाहित [ ध्यानस्थ ] हुआ जानकर परम पुरुष परमात्मा भगवान् कृष्ण बड़े ही
प्रसन्न हुए ।। २५ ।।
व्यक्तीकुर्वन्निज प्रेम प्रोवाच
वचनं तदा ।
अन्वर्थं साध्वी ते नाम सुन्दरीति
मम प्रियम् ।। २६ ।।
उन्होंने अपने प्रेम को व्यक्त करते
हुए तब इस प्रकार वचन कहे — 'हे साध्वि !
तुम्हारा 'सुन्दरी' यह नाम अन्वर्थक है
क्योंकि यह मुझे बहुत प्रिय है ।। २६ ।।
त्वं मे प्राणाधिका चासि सर्वस्व मे
त्वमेव हि ।
वधीनोम्यहं साध्वि
प्रेमपाशनियन्त्रितः ।। २७ ।।
तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय
हो क्योंकि तुम्हीं मेरा सब कुछ हो । अत: हे साध्वि ! मैं तुम्हारे अधीन हूँ।
तुम्हारे प्रेम रूपी बन्धन से नियन्त्रित हूँ ।। २७ ।।
त्वयोक्तं यन्मयोक्तं तत्त्वदृष्टं
तन्मयेक्षितम् ।
यत्त्वयाङ्गीकृतं साध्वि
मयाप्यङ्गीकृतं हि तत् ॥ २८ ॥
तुमने जो कुछ कहा और जो मेरे द्वारा
कहा गया है । मैं उसको तत्त्व दृष्टा देखता हूँ और हे साध्वि ! जो तुमने अङ्गीकार
किया है उसे ही मैंने भी अङ्गीकार किया है ।। २८ ।
आवयोरन्तरं नास्ति यः करोति स पातकी
।
इत्यादिवचनं श्रुत्वा सुन्दरीप्रेमसूचकम्
।। २९ ॥
उत्तम्भयन्ती भ्रूवल्लीमीषत्कलुषितेक्षणा
।
वतिग्रीवमवदत्स्वामिनी स्फुरिताधरा
॥ ३० ॥
एषा सखीसहस्राणां सुन्दरी
सुन्दरप्रिया ।
किं कार्यं
विद्यतेऽस्माभिणरूपविपर्ययात् ॥ ३१ ॥
हमारे और तुम्हारे में कोई अन्तर
नहीं है और जो अन्तर करता है वह पापी है । इस प्रकार के सुन्दरी के लिए प्रेम सूचक
वचनों को सुनकर किंचित कलुषित चितवन से भ्रूकुटि को चढ़ाती हुई ओंठों को बुदबुदाकर
एवं टेढ़ी गर्दन करके स्वामिनी ने कहा – इन
हजारों सखियों के बीच यह सुन्दरी ही श्यामसुन्दर की प्रिया है गुण और रूप के इस
प्रकार के उलट फेर के लिए हम लोग क्या करें ।। २९-३१ ।।
सुन्दर्येव प्रियंका चेदसुन्दर्यः
कथं प्रियाः ।
भवन्ति सुन्दरास्यास्य मादृश्यों
वामलोचना ।। ३२ ।।
फिर जब एक ही सुन्दरी तो प्रिय हो
सकती है। तो हम लोगों के जैसी वामलोचना असुन्दरी कैसे प्रिय होगी ?
॥ ३२ ॥
एवं वक्रोक्तिमाश्राव्य सखीनां
पुरतः प्रियम् ।
अगमत्सहसोत्थाय निजकेलिगृहान्तरम् ॥ ३३ ॥
इस प्रकार की प्रिय की व्यंग्य
उक्ति को सखियों के ही सामने सुनकर वह सुन्दरी एकाएक उठकर अपने केलिगृह में चली गई
॥ ३३ ॥
सम्प्रेषयामास तदा कृष्ण : कमललोचनः
।
प्रिया माननिरासार्थं दूतीं नाम्ना
कलावतीम् ॥ ३४ ॥
तब कमल के पुष्प के समान नयनों वाले
भगवान् श्री कृष्ण ने कलावती नामक दूती को अपनी प्रिया के मान के उपशम के लिए भेजा
।। ३४ ।।
सन्धि कार्यककुशलां
स्मितपूर्वाभिभाषिणीम् ।
सदुक्तिचतुरां धीरा
युक्तिवादविचक्षणाम् ।। ३५ ।।
कलावती सन्धिकार्य में अत्यन्त कुशल
थी। वह पहले हँसकर बोलने वाली, अच्छी-अच्छी
उक्तियाँ बोलने में चतुर, धीर और युक्तिपूर्वक बात करने में
विचक्षणा थी ॥ ३५ ॥
कलावती ततो गत्वा दृष्टवा मानवतीं च
ताम् ।
निजकेलिगहे रम्ये स्थितामेकाकिनीं
रह ॥ ३६ ॥
नानामन्त्रप्रयोगैश्च विषवेगं यथा
भिषक् ।
वाक्प्रयोगैरभिनर्वसन वेगं न्यवारयत्
।। ३७ ।।
तब कलावती ने वहाँ जाकर उसे मानवती
रूप में अपने रम्य केलिगृह में एकान्त में अकेले बैठी देखकर नाना प्रकार के चातुर्यपूर्ण
उक्ति एवं हाव भाव से, अपने नवीन नवीन
वाक्य प्रयोगों से उसके मान के वेग को उसी प्रकार मनाकर शान्त किया जैसे वैद्य
विषवेग का शान्त कर देता है ।। ३६-३७ ।।
प्राणादप्यधिके साहिव किमेतदुचितं
प्रिये ।
त्वं पत्युः प्राणसदशी पतिः
प्राणसमस्तव ॥ ३८ ॥
हे साध्वि! तुम तो प्राण से भी अधिक
प्रिय हो । हे प्रिये ! क्या यह (मान) उचित है । जबकि तुम पति के प्राण के सदृश
हो और पति तुम्हारे प्राण के समान हैं ।। ३८ ॥
सखीवर्ग समस्तोsपि इन्द्रियाणीव देहिनः ।
त्वमात्मेव प्रियस्यासि वव
मानावसरस्तव ॥ ३९ ॥
शरीर में विद्यमान इन्द्रियों के
समान समस्त सखी समुदाय है । तुम तो प्रिय की आत्मा ही हो। तब फिर मान का अवसर कहाँ
है ।। ३९ ।।
पूर्णानन्दे पूर्णकामे गिरः
प्रियतमे सति ।
वक्तु परुषो योग्यो यथा धूर्त शठे
खले ॥ ४० ॥
पूर्ण आनन्द में तथा पूर्ण कामनाओं
में वाणी प्रियतम में ही विद्यमान होती है । अत: यह उचित नहीं है कि तुम कठोर बचन
उन्हें कहो । जिस प्रकार एक धूर्त एवं शठ या खल के प्रति कहा जाय ॥ ४० ॥
बिम्बाधरस्फुरणतो ध्रुवोरुत्तम्भनादपि
।
लौहित्याद्गलभित्त ेश्च मानस्ते
लक्ष्यते गुरुः ॥ ४१ ।।
लाल-लाल ओष्ठों का स्फुरण,
क्रोध में भौंहों का चढ़ जाना, अत्यन्त ललाई-
के कारण कपोल का ऊपरी भाग मान करने से मोटा दिखलाई पड़ रहा है ।। ४१ ।।
अन्तस्तापोष्णनिश्वासो
दहत्यधरपल्लवम् ।
मिथ्या ग्लापयसे चाङ्गलतिका
मानवह्निना ॥ ४२ ॥
तुम्हारे अधर रूपी पल्लव को
अन्तःकरण के ऊष्ण निश्वास जला रहे हैं । अतः हे सखि ! तुम व्यर्थं ही मान रूप
अग्नि से अपने अङ्ग लता को झुलसा रही हो ।। ४२ ।।
दुःसहः क्षणविश्लेषः प्रियस्याननपङ्कजम्
।
अदृष्ट्वा यत्त जीवेत तस्माच्च भरण
वरम् ॥ ४३ ॥
प्रिय के मुखकमल का भर भी विश्लेष
अत्यन्त दुःखद है। अतः प्रिय को देखे जो तुम जी रही हो उससे तो मर जाना ही अच्छा
है । ४३ ॥
सखीनां च सहस्राणि सन्ति
यद्यप्यनेकशः ।
त्वय्येव रमते चित्त कौमुद्यामिव
शीतगोः ॥ ४४ ॥
यद्यपि अनेक प्रकार की और सहस्रों
सखियाँ यहाँ विद्यमान हैं। फिर भी प्रिय तुम्हारे में ही उस प्रकार लगा हुआ है जिस
प्रकार चाँदनी में चन्द्रमा की शीतलता विद्यमान रहती है ॥ ४४ ॥
मान्यो मानिनि नायकः प्रमदया वाक्यः
सुधासन्निर्भ-
वाच्यः कोमलपाणिपङ्कजपुट
बनाभिवन्द्यः सदा ।
तद्वाक्यं प्रियमप्रियं न हृदये
धार्यं सतीनामयं,
स्वाचारः कथितो मया तमनु कि
त्यक्त्वा वृथा तप्यसे ॥। ४५ ॥
हे मानिनि ! माननीय नायक श्रीकृष्ण
सदैव प्रसन्नता युक्त अमृत सदृश वाक्यों के द्वारा बात करने योग्य हैं और कमल के
पत्ते के समान कोमल हाथों को जोड़कर अभिवादन के योग्य हैं। उन श्री कृष्ण के वाक्य
चाहे प्रिय हों या अप्रिय हों हम सखियों को अपने हृदय में नहीं धारण करना चाहिए।
हमने अपनी बुद्धि से जो आचार की बात थी, कह
दी । अतः उन्हें छोड़कर व्यर्थ में क्यों रुष्ट हो रही हो ? ।।
४५ ।।
कि मानिनि बहूक्तेन कुरु मद्वचनं
यथा ।
गाढमान परिक्लिष्ट औदासिन्यं
व्रजेत्प्रियः ।। ४६ ।।
हे मानिनि ! बहुत क्या कहना ! जो
मैं कहती हूँ उसे करो । अधिक मान करने से खिन्न हुए प्रिय प्रिया के प्रति उदासीन
हो जाते हैं ।। ४६ ।।
तस्मान्मद्वचने श्रद्धां कृत्वा
तन्निकटं व्रज ।
विलम्बेन तु मानोऽयं परां कोटिं
गमिष्यति ॥ ४७॥
इसलिए मेरे वचनों में श्रद्धा करके
निकट चलो जाओ । यदि विलम्ब करोगी तो यह मान पराकाष्ठा को पहुँच जायगा ॥ ४७ ॥
प्रियस्त्वयि प्रयातायामकस्माज्जातकश्मल:
।
हास्यक्रीडारसावेशरहितो
वत्र्त्ततेधुना ॥ ४८ ॥
तुम्हारे अकस्मात् वहीं आ जाने पर
वे निर्मल हृदय हो जायेंगे । वे इस समय हास्य क्रीड़ा के रस के आवेग से रहित हैं
।। ४८ ।।
त्वामाह्वायितुमेवाहं प्रेषितास्मि
प्रियेण हि ।
आज्ञापयसि चेत्कान्ते
तमेवेहानयाम्यहम् ॥ ४९ ॥
क्योंकि उन प्रिय के द्वारा तुम्हें
बुला लाने के लिए मैं भेजी गई हूँ । अतः हे कान्ते ! यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं
उन्हें ही तुम्हारे पास लाऊं ॥ ४९ ॥
शिव उवाच -
श्रत्वा कलावतीवाक्यं स्वामिनी
मानमन्थरा ।
मानाद्रिशिखरात् किचिदुत्तीर्णा
वाक्यमब्रवीत् ।। ५० ।।
शिव ने कहा- कलावती के इन वचनों को
सुनकर स्वामिनी का मान कुछ कम हुआ और उसने मान की पराकाष्ठा से कुछ नीचे उतर कर इस
प्रकार वाक्यों को कहा ।। ५० ।।
स्वामिन्युवाच-
कलावति प्रिये मानो न कदापि मया
कृतः ।
सुन्दरी गुणमाहात्म्य श्रवणं मे विषादकृत
॥ ५१ ॥
स्वामिनी ने कहा- हे कलावती ! मैंने
प्रिय पर कदापि मान नहीं किया है। मुझे तो सुन्दरी के गुण एवं माहात्म्य के श्रवण
से विषाद हुआ है ।। ५१ ।।
ते चेत्प्रियस्त्वेकां सुन्दरीं
गुणगुम्फिताम् ।
कलावति तदा कार्यं किमस्माभिः
प्रियस्य हि ।। ५२ ॥
यदि वे सर्वगुण सम्पन्न सुन्दरी को
ही प्रिय मानते हैं तो हे कलावती ! हमें प्रिय को लेकर क्या करना है ।। ५२ ।।
इति मत्वाहमुत्थाय प्राप्तास्मि
भवनं रहः ।
सुखी भवतु सुन्दर्या गुणवत्त्या गुणी
प्रियः ।। ५३ ।।
यह सोचकर मैं वहाँ से उठकर इस
एकान्त स्थान में आ गई हूँ । प्रिय श्रीकृष्ण गुणवती सुन्दरी के गुणों से सुखी
रहें ।। ५३ ।।
कलावत्युवाच—
नाग्रहः सति कर्त्तव्यस्त्वया
सरलनायके ।
नायकाः सन्ति चत्वारः स्वलक्षणविलक्षिताः
॥ ५४ ॥
कलावती ने कहा- हे सखि ! तुम्हे
सीधे-सादे नायक श्रीकृष्ण में इस प्रकार का आग्रह नहीं करना चाहिए। वस्तुतः अपने
स्वकीय गुणों या अवगुणों के कारण चार प्रकार के नायक होते हैं ।। ५४ ।।
अनुकूलो दक्षिणश्च धृष्टश्च शठ एव च
।
एकपत्नीव्रतधरःअनुकूल उदीरितः ।। ५५
।।
१. अनुकूल,
२. दक्षिण (सरल या उदार प्रकृति के) ३. धृष्ट और ४. शठ । इनमें से
जो एक पत्नी में हो आसक्त होते हैं उसे 'अनुकूल' नायक कहा गया है ।। ५५ ।।
अन्यस्यां बद्धचित्तोऽपि पूर्वस्यां
स्नेहगौरवम् ।
न त्यजत्येव सततं स च दक्षिणनायकः ॥
५६ ॥
अन्य नायिकाओं में बद्धचित्त होकर
भी अपनी स्वकीय स्त्री में स्नेह की अधिकता का जो सदैव त्याग न करे वह दक्षिण नायक
कहा गया है ।। ५६ ।।
त्वमेका मम सर्वस्वं नान्या में
कामिनी प्रिया ।
समक्षमेवं वदति परोक्षं योऽपराधकृत्
॥ ५७ ॥
ज्ञातापराधः शपथान् कुरुते गूढचेष्टितः।
कुटिलं तं विजानीयान्नायकं
शठसंज्ञकम् ।। ५८ ।।
तुम्ही मेरी सब कुछ हो। मेरी अन्य
कामिनी प्रिय नहीं है इस प्रकार से - समक्ष में तो कहता है किन्तु परोक्ष में
अपराध करता है। अपराध के पता लग जाने पर जो अपनी रहस्यमय चेष्टाओं से शपथ आदि लेता
है उसे 'शठ' नामक- कुटिल नायक जानना चाहिए ।। ५७-५८ ॥
कृतदोषोऽपि निःशङ्कस्ताड्यमानो न
लज्जते ।
प्रत्यक्षेष्वपि दोषेषु मिथ्यावाक्
धृष्ट उच्यते ॥ ५९ ॥
दोषों के होने पर भी जो निःशङ्क
होकर प्रताड़ित किए जाने पर भी लज्जित न हो और अपराधों के प्रत्यक्ष हो जाने पर भी
मिथ्या वाणी जो बोले वह 'धृष्ट'-नायक होता है ।। ५९ ।।
एवं चतुर्विधेष्वेषु नायकेषु
मनस्विनि ।
अनुकूलो दक्षिणश्च कीर्त्यतेऽसौ तव
प्रियः ॥ ६० ॥
हे मनस्विनि ! इस प्रकार चारों
प्रकार के नायकों में यह तुम्हारे प्रिय श्रीकृष्ण- अनुकूल और दक्षिण नायक जाने
जाते हैं ॥ ६० ॥
शठोऽयं न धृष्टोऽयं किमुधा खिद्यसे
हृदि ।
इत्युक्ते विस्मयं प्राप्ता पुनः
प्राह कलावतीम् ॥ ६१ ॥
ये न तो शठ नायक हैं और न तो धृष्ट
नायक हैं। तब फिर तुम क्यों अपने हृदय में व्यर्थ ही खिन्न हो गई हो। इस प्रकार से
विस्मय को प्राप्त कलावती के कहने पर स्वामिनी ने पुनः कहा ॥ ६१ ॥
॥ इति माहेश्वतन्त्र उत्तरखण्डे
शिवोमासम्वादे एकोनचत्वारिंशंपटलम् ।। ३९ ।।
॥ इस प्रकार श्रीनारदपाचरात्र आगमगत
'माहेश्वरतन्त्र' के उत्तरखण्ड (ज्ञानखण्ड) में माँ
जगदम्बा पार्वती और भगवान् शङ्कर के संवाद के उन्तालीसवें पटल की डॉ० सुधाकर
मालवीय कृत 'सरला' हिन्दी व्याख्या
पूर्ण हुई ।। ३९ ॥
आगे जारी........ माहेश्वरतन्त्र पटल 40

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