माहेश्वरतन्त्र पटल ३८
माहेश्वरतन्त्र के पटल ३८ में कृष्ण
कथा की महिमा, सखियों के साथ
दिव्यलीला कथा का वर्णन है।
माहेश्वरतन्त्र पटल ३८
Maheshvar tantra Patal 38
माहेश्वरतन्त्र ज्ञानखण्ड पटल ३८
नारदपञ्चरात्रान्तर्गतम्
माहेश्वरतन्त्र अड़तीसवाँ पटल
माहेश्वरतन्त्र अष्टत्रिंश पटल
अथ अष्टत्रिंशं पटलम्
पार्वत्युवाच-
देवेश परमेशान सुरासुरनमस्कृत ।
कथेयं सुमहत्पुण्या सुधास्वादीयसंस्तुता
॥ १ ॥
पार्वती ने कहा- हे देवेशि ! हे
परमेशान ! हे देवों और असुरों से नमस्कृत! यह कथा महा- पुण्य वाली तथा अमृत से
परिपूर्ण है ।। १ ।।
तथापि देवदेवेश त्वद्वाक् पीयूषपानजा
।
तृप्तिर्न जायते सम्यक्
शुश्रूषाकुलचेतसः ॥ २ ॥
हे देवेशि ! आपके वाणी रूप अमृत का
पान हमने किया; तथापि सेवाशुश्रूषा के लिए
व्याकुल चित्त मुझे इस कथा से तृप्ति नहीं मिल रही है ।। २ ।।
कथाश्रवणजानन्दो न मुक्तावपि दृश्यते
।
कस्तं विहाय मोहेन निजायुः
प्रविलापयेत् ॥ ३ ॥
कथा के श्रवण से उत्पन्न आनन्द से
मैं अपने को मुक्त भी हुआ नहीं देख रही हूँ। कौन है जो उस कथामृत को मोहवश छोड़कर
अपनी आयु को व्यर्थ ही व्यतीत करेगा ।। ३ ।।
ते मन्दभाग्याः कुधियो दुराचारपरा
हि ते ।
यैर्न लब्धा क्षणमपि कथा कर्णसुधा
सती ॥ ४ ॥
वे कुत्सित बुद्धि वाले लोग दुराचार
परायण होकर मन्द माग्य के व्यक्ति हैं जो क्षणभर, भी कथामृत का पान नहीं कर सके ।। ४ ।।
सार्द्धत्रिकोटितीर्थानि ऋषयो
मन्त्रदेवताः ।
यत्र कृष्णकथावादस्त्रंवायान्ति
निश्चितम् ।। ५ ।।
जहाँ कृष्ण कथा होती है वहाँ साढ़े
तीन करोड़ तीर्थ, ऋषि मन्त्र और
देवता गण निश्चित ही आते हैं ॥ ५ ॥
तस्मादनुग्रहीतास्मि भवता
करुणात्मना ।
कथां कथयता रम्यां
कृष्णस्यानन्दरूपिणः ॥ ६ ॥
इसलिए,
हे करुणापरायण ! मैं आपकी अनुगृहीत हूँ । आनन्दरूप कृष्ण की रम्य
कथा आपने कहकर मुझे अनुगृहीत किया है ।। ६ ।।
पुनः कथय देवेश कथामानन्दकारिणीम् ।
चतुःषष्टिमहास्तंभराजराजितभूमिकाम् ॥
७ ॥
अधिष्ठाय प्रियेणेताः सङ्गताश्च
किमाचरन् ।
तद्वदस्व महेशान यदि तेनुग्रहो मयि
॥ ८ ॥
हे देवेश ! अतः आप पुनः आनन्दकरी
कथा को कहें। चौसठ स्तम्भों वाले सिंहासन पर प्रिया (राधा) के साथ बैठकर उन सखी
समुदाय ने क्या-क्या आचरण किए ? उन आनन्द को,
हे महेशान! यदि मेरे ऊपर अनुग्रह हो तो, आप
आगे कहें ।। ७-८ ॥
शिव उवाच-
शृणु पार्वति वक्ष्यामि यत्पृष्टोहं
सुलोचने ।
यस्य श्रवणमात्रेण जायते रतिरुत्तमा
। ९ ।।
शिव ने कहा- हे पार्वति ! हे
सुलोचने ! आपने जो पूछा है उसे मैं कहता हूँ, सुनिए
। जिसको सुनने मात्र से भगवान् में उत्तम रति हो जाती है ।। ९ ।।
नीलाद्रिशिखरादेत्य निजं धाम
परात्परः ।
रत्नसिंहासने तस्यो नवरत्नविभूषिते
॥ १० ॥
अपने धाम नीलाचल शिखर से आकर
परात्पर ब्रह्म श्रीकृष्ण नौ रत्नों से विभूषित रत्न के सिहासन पर बैठे हैं ।। १०
।।
सिंहासनस्य परितो मण्डलाकारसंस्थितः
।
प्रफुल्लनयनाम्भोजाः पश्यन्ति स्म
प्रियं मुदा ।। ११ ।।
मण्डलाकार रूप से सिहासन को चारों
ओर से घेर कर विद्यामान सखियाँ प्रसन्न होकर अपने प्रफुल्लित नयन कमलों से प्रिय
को देख रही हैं ।। ११ ।।
पूर्णानन्दं पूर्णकामं तत्र काचन
योषितः ।
राजोपचार विधिना ह्युपतस्थुर्मुदान्विताः
।। १२ ।।
पूर्ण आनन्द में विभोर एवं पूर्णकाम
कोई युवति राजोपचार की विधि से अत्यन्त प्रसन्नता के साथ प्रिय श्री कृष्ण के पास
आई ।। १२ ।।
शरच्चन्द्रप्रभागौरं मुक्तामणिविभूषितम्
।
रत्नदण्डमनोहारि मिहिला छत्रमादध ।।
१३ ।।
शरदकालीन चन्द्र की प्रभा के समान
धवल वर्ण के तथा मुक्ता एवं मणि से विभूषित और रत्नजटित मनोहारी छत्र को उसने आकर
पकड़ लिया ।। १३ ।।
माणिक्यखचितस्वर्णदण्डचामरचालने ।
उपतस्थो महाभागा चन्द्रलेखा
मनस्विनी ।। १४ ।।
माणिक्य से जड़े हुए सुवर्ण के दण्ड
वाले चामर को चलाने के लिए महाभागा मनस्विनी चन्द्रलेखा भी पास आ गई ।। १४ ।
सुवर्णसूत्रविद्योतच्चन्द्र
कार्पितमौक्तिकम् ।
मयूरव्यजन धृत्वा करे चित्रा परामृशत्
।। १५ ।।
सुवर्ण के सूत्र से चमकीले चन्द्र
और मौक्तिक जड़े हुए मयूरपङख हाथ में धारण किए हुए चित्रा परामृश करती हैं ।। १५
।।
हिमांशु मण्डलप्रख्यं दर्पणं
स्वर्णभूषितम् ।
रत्नचित्र करे धत्वा
तस्थावानन्दमञ्जरी । १६ ।।
चन्द्रमण्डल के समान स्वर्ण से
भूषित तथा रत्नों से जटित विचित्र लगने वाले दर्पण (=आइने) को हाथ में धारण किए
हुए आनन्दमञ्जरी वहाँ आती है ।। १६ ।।
सुगन्धद्रव्य
सम्भिन्नास्ताम्बूलदलवीटिकाः ।
रत्नपात्र समादाय तस्थो मदनमेखला ।।
१७ ॥
सुगन्ध द्रश्य से युक्त पान की बीड़ा
रत्न जटित पात्र में लेकर मदनमेखला वहाँ खड़ी है ।। १७ ।।
शतयोजन संसर्पि दिव्यचन्दनपूरितम् ।
रत्नपात्र करे घत्वा तस्थो
भवनमालिनी ॥ १८ ।।
सौ योजन तक सुगन्ध को फैलाने वाली
दिव्य चन्दन से परिपूर्ण रत्नजटित थाल हाथ में लिए भुवनमालिनी वहाँ खड़ी है । १८ ॥
मुक्ताजटितसौवर्णभृङ्गारजलपूरितम् ।
माणिक्यनालमादाय रत्न रेखा
पुरःस्थिता ।। १९ ।।
मुक्ता जति (घड़े में) स्वर्णिम
भृङ्गार के जल से परिपूर्ण माणिक्य के नाल को लेकर रत्नरेखा सामने उपस्थित है ।।
१९ ।।
शरच्चन्द्रांशुधवलं दशावलितमौक्तिकम्
।
हस्तवासः करेधृत्वा पुरस्तयो
विहारिणी ।। २० ।।
शरदकालीन चन्द्र की किरणों के समान
घवल मौक्तिक वस्त्र से परिवेष्टित हस्त सुगन्ध को हाथ में लेकर विहारिणी सम्मुख
खड़ी है ।। २० ।।
स्वर्णपात्रे स्थितं दिव्यं
नानास्वादुरसान्वितम् ।
आनन्दभोगमादाय माधुरी दक्षिणे
स्थिता ॥ २१ ॥
अनेक प्रकार के सुस्वाद रसों से
युक्त दिव्य आनन्दभोग को सोने की थाल में लेकर माधुरी सिंहासन के दाहिने ओर खड़ी
है ।। २१ ।।
लीलावचांसि यानीह प्रवक्त
पुरुषोत्तमः ।
तानि श्लाघयितुं तस्थौ
सुन्दरीशानकोणगा ।। २२ ।।
पुरुषोत्तम प्रभु जिन लीला वचनों को
यहाँ कहते हैं उनकी प्रशंसा के लिए सुन्दरी सिहासन के ईशानकोण में खड़ी है ।। २२
।।
माध्वी मृदङ्गघोषेण वीणयाशावती सती
।
विद्युल्लता तथा
तन्त्रीरवेणातिरच्युता ॥ २३ ॥
मृदङ्ग के घोष से माध्वी,
अशावती अपनी वीणा से तथा विद्युल्लता अति रस से पूर्ण तन्त्री के रव
से मुक्तः वहाँ उपस्थित है ।। २३ ।
वंशीवाद्यन लावण्यलहरी ललिताकृतिः ।
रागरङ्गा विनोदार्थ प्रयुक्तपरिभाषया
॥ २४ ॥
ललित आकृति वाली लावण्यलहरी वंशी
वाद्य के द्वारा तथा तथा रागरङ्गा नामक कोई सखी मनोविनोद के लिए तरह-तरह की बाताओं
को कहती हुई वहाँ उपस्थित हैं ।। २४ ।।
रागविद्यासु कुशला रागिणी
रागविद्यया ।
उपतस्थु महाभागाः कृष्ण परमपुरुषम्
।। २५ ।।
रागरागिनियों की विद्या में कुशल
रागिणी अपनी राग विद्या के द्वारा प्रसन्न करती हुई महान् सौभाग्यवाली रागिणी
श्रेष्ठ पुरुष श्रीकृष्ण के पास आती हैं ।। २५ ।
ततो नाना विद्यां चक्रर्लीलां
हास्यरसाधिकाम् ।
तदन्ते प्रियमाभाष्य वप्रच्छुस्ताः
समुत्सुकाः ।। २६ ।।
इसके बाद वहाँ अधिकतर हास्य रस से
परिपूर्ण नाना प्रकार की लीला होती है । अन्त में प्रिय से बालने के लिए उत्सुक उन
सखियों ने श्रीकृष्ण से पूछा ।।२६।।
सख्य ऊचु:-
भोनाथ पुरुषश्रेष्ठ प्रियस्त्वं च
वयं प्रियाः ।
प्रियवभाजां या प्रीतिनं चोपाधिकृता
भवेत् ।। २७ ।।
सखियों ने कहा- हे नाथ ! हे पुरुषों
में श्रेष्ठ ! आप हमारे प्रिय हैं और मैं आप की प्रिया हूँ । आप मुझे वह प्रीति
प्रदान करें जो प्रिय को प्रसन्न करने वाली हो और प्रिय को लुभाने वाली हो । २७ ।।
यद्युपाधिकृता प्रीतिस्तदा रूपं न
सिद्ध्यति ।
तस्मात्प्रमवतीनां नो यथावद्वमर्हसि
॥ २८ ॥
वस्तुतः रूप की सिद्धि तब तक नहीं
होती जब तक उपाधिकृत प्रीति न हो । इसलिए हम प्रेम करने वाली सखियाँ आपसे वैसा
बोलने में समर्थ होवें ।। २८ ।।
विषय मत्युग्रहैतुकमनामयम् ।
त्वय्येवास्माकमतुलं प्रेम
विद्योतते प्रिय ॥ २९ ॥
हे प्रिय ! विना वाणी का विषय हुए,
अत्यन्त उग्र, अहेतुक तथा अनामय हमारा अतुलनीय
प्रेम आप पर प्रगट हो रहा है ।। २९ ।।
शब्दोपाधौ कथं तच्च घतुं शक्ता वयं
स्त्रियः ।
तस्मात्तत्प्रकटीक न समर्थाः कदाचन ॥
३० ॥
हम स्त्रियाँ उस अलौकिक प्रेम को
शब्द्र के बन्धन में बांधकर धारण करने में समर्थ नहीं हैं । इसीलिए हम उत्कट प्रेम
को प्रगट करने में हम समर्थ भी नहीं हैं ॥ ३० ॥
स्वयंवेद्यमिदं भाति कथं वाचा प्रचक्ष्महे
।
अस्मासु यद्भवेत्प्रेम त्वदीयं
पुरुषोत्तम ।। ३१ ।।
अधिकं वा समं न्यूनं कथं विद्मः
प्रिया वयम् ।
त्वमेव वाचा तद्ब्रूहि तारतम्यविदो
वयम् ।। ३२ ।।
यह प्रेम तो स्वयं जानने योग्य
(अनुभूति) है। इसे हम कैसे वाणी से कह सकती हैं । अतः हे पुरुषोत्तम ! जो प्रेम
आपका हमारे ऊपर होवे बह अधिक है या अतः हमलोगों से आप ही न्यून है हम आपको प्रिया
भी कैसे जान सकती हैं । वाणी से कहिए । हमलोग उस तारतम्य परम्परा की ज्ञाता है,
हमलोग जान लेंगी ।। ३१-३२ ।।
सखीनामपि सर्वासां स्वस्वप्र
मनिरूपणे ।
विवादः शान्तिमाप्नोति
त्वत्प्रेमश्रवणेन च ।। ३३ ।।
सभी सखियाँ भी अपने-अपने प्रेम के
निरूपण में तथा आपके प्रेम के श्रवण में विवाद करती हुई शान्ति प्राप्त करती हैं
।। ३३ ॥
इति श्रुत्वा वचस्तासां परात्मा
पुरुषोत्तमः ।
नवाग्वृत्तिव्यक्तियोग्य ज्ञात्वा
प्रमाब्रवीद्वचः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार उनके इन वचनों को सुनकर
श्रेष्ठ आत्मा पुरुषोत्तम ने प्रेम वाक् वृत्ति से प्रगट करने योग्य नहीं है,
यह जानकर प्रेमपूर्ण वाणी से कहा ॥ ३४ ॥
श्रीकृष्ण उवाच-
भवतीभिर्यदुक्तं भो तत्तथैव न संशयः
।
स्वसंवेद्यमिदं प्रेम न वाचा
वक्तुमहति ॥ ३५ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा- हे सखियो ! जो आप
ने यह कहा कि प्रेम वाणी से प्रगट करने योग्य नहीं है,
वह तो स्वसंवेद्य है। यह तो वैसा ही है । इसमें कोई संशय नहीं है ।।
३५ ।।
रम्यं मनोहरैर्भाव लेक्षणीय भवेदपि
।
प्रेम रत्यात्मकं सख्यो रतिरेव
रसोस्म्यहम् ॥ ३६ ॥
फिर भी रमणीय एवं मनोहर भावों से यह
प्रगट करने वाला होता है। हे सखियो ! प्रेम रत्यात्मक ( परस्पर करने योग्य ) है और
वह रति रूप रस में ही हूँ ।। ३६ ।।
तस्मान्मदात्मकं प्रोम ज्ञातव्यमिह सर्वथा
।
मत्स्वरूपं तु को वेत्ति को वा
वक्तुं समीहते ॥ ३७ ॥
इसलिए मेरे पर प्रगट करने वाले
प्रेम को तुम्हें अवश्य जानना चाहिए । मेरे (रति रूप रस के) स्वरूप को कौन जानता
है और (उस अगाध प्रेम को) कहने में कौन समर्थ है ॥ ३७ ॥
निषेधमुखतो वेदा वर्णयन्ति विशारदाः
।
कथमन्ये वराकास्तु कालावच्छेदमत्तयः
॥ ३८ ॥
प्रेम को जानने वाले वेद इसका वर्णन
निषेध वाक्यों के द्वारा ( नेति नेति - यह नहीं है, यह नहीं ) करते हैं। तब काल की सीमा में आबद्ध अन्य मनुष्य इसे कैसे कह
सकते हैं ॥ ३८ ॥
मत्स्वरूपमिदं प्रेम न शब्दविषयं
भवेत् ।
तस्मान्मयापि नो वक्तुं
शक्यतेऽन्यस्य का कथा ।। ३९ ।।
मेरा यह प्रेम स्वरूप शब्द का विषय
नहीं बन सकता है । अतः मैं भी इसे नहीं कह सकता। तब अन्य जन कैसे कहने में समर्थ
हो सकते हैं ? ।। ३९ ।।
एवं ताः प्रत्युदीर्याय दर्पणं
स्वपुरः स्थितम् ।
आदाय ताभ्यः प्रायच्छत्सन्मुखं
पुरुषोत्तमः ॥ ४० ॥
इस प्रकार उनसे कहकर अपने सामने
स्थित दर्पण को लेकर पुरुषोत्तम ने उन्हें सम्मुख दे दिया ॥ ४० ॥
मदत्ते प्रियेणास्मिन् दर्पणे
योषितां तदा ।
पश्यन्तीनां मुखाब्जानि वितर्कः
सुमहानभूत् ।। ४१ ।।
तब प्रिय कृष्ण द्वारा प्रेम से
प्रदत्त उस दर्पण में उन उन सखियों ने अपने-अपने मुखकमलों को देखते हुए महान् तर्क
युक्त भावों को प्रगट किया ।। ४१ ॥
प्रमप्रश्नोत्तर वक्तुमात्मदर्शः
प्रदर्शितः ।
किं सूचितमनेनेति कथं विज्ञायते हि
तत् ।। ४२ ।।
इस प्रकार प्रेम के प्रश्नों तथा
उत्तरों को कहने के लिए उन्होंने आत्म-दर्पण को प्रदर्शित किया। इस दर्पण से क्या
सूचित हुआ और उससे क्या ज्ञान हुआ (इसे कौन कहेगा ) ?
॥ ४२ ॥
स्वच्छ दर्पणवत् प्र म स्वकीय वक्ति
कि प्रभुः ।
प्रतिबिम्बवदस्माकं बिम्बवत्स्वीयमित्युत
।। ४३ ।।
दर्पण के समान अपने स्वच्छ प्रेम को
कौन कहने में समर्थ है। क्योंकि स्वकीय बिम्ब के समान हमारा प्रतिबिम्ब है ।। ४३
।।
अथवा दर्पणे यद्वत् यथारूपं च
दृश्यते ।
तथा भवेत् मनिभ मदीयमिति सूचितम् ॥
४४ ॥
अथवा दर्पण में जैसा दिखाई पड़ता है
मेरा प्रेम भी उसके ऊपर वैसा ही होता है ॥ ४४ ॥
प्रेमभेदनिरासार्थ मैक्यसंसूचनाय किम्
।
रूपस्य प्रतिरूपस्य यथा
तद्वद्भवेन्न किम् ।। ४५ ।।
प्रेम-भेद को बताने के लिए और उस प्रेम
में एकीकृत भाव को प्राप्त प्रेमी के रूप तथा प्रतिरूप के जो भाव जैसे होते हैं
क्या वैसे वे नहीं होते ? ।। ४५ ।।
इति संशयमग्नं स्वं सखीवर्गं
परात्परः ।
भवतीनामय तर्कों मदाशयनिरूपकः ।। ४६
।।
इस प्रकार परात्पर परब्रह्म के विषय
में संशयमग्न अपने सखी वर्ग का यह तर्क मेरे आशय का निरूपण करने वाला है ॥ ४६ ॥
न मया विद्यते भेदो युष्माकं च
मनागपि
अहं यूयं यूयमहमित्येषा मे मतिः
प्रियाः ॥ ४७ ॥
मैं आप में अपने प्रेम के कुछ भी
भेद को नहीं जानता क्योंकि मैं तुझमें हूँ और तुम मुझमें हो - इस प्रकार मेरी
प्रिया बुद्धि है ॥४७॥
अभेदसूचनार्थाय दर्पणो वः पुरोधृतः
।
इति प्रहर्षजनकैर्वचोभिः समनन्दयत्
॥ ४८ ॥
हमारे और तुम्हारे में अभेद (
सम्बन्ध ) है - इसी को दिखलाने के लिए आप के सामने हमने दर्पण रखा है। इस प्रकार
के आनन्द-विभोर कर देने वाले वचनों से उन्हें श्रीकृष्ण भगवान् ने आनन्दित किया ॥
४८ ॥
शिव उवाच-
एवमानन्दिताः सर्वाः श्रुत्वा वाचः
सुशोभनाः ।
प्रहर्षवेगविवशाः कृष्णस्य
मुखपङ्कजम् ।। ४९ ।।
अङ्गुष्ठतर्जनीभ्यां गृहीत्वा
चिबुकस्थलम् ।
चचम्बुः परया प्रीत्या सत्कारं
गताः॥ ५० ॥
आलिलिङ्गुस्तथा चान्याः प्रशसं
सुस्तथापराः ।
त्वय्येतदुचितं नाथ यत्प्रियाणां
प्रियङ्कराः ॥ ५१ ॥
इत्याहरपराः सख्यः प्रेमनिभिन्नमानसाः
।
शिव ने कहा- इस प्रकार के वचनों को
सुनकर वे सभी सखियाँ भी बहुत आनन्दित हुई और अत्यन्त आनन्द के वेग से विवश होकर
अपने अंगूठे और तर्जनी से कृष्ण के मुखकमल के चिबुक स्थल(गाल) को पकड़कर चूम लिया
। अत्यन्त प्रीति के कारण उन्हें सीत्कार करके चूमती हुई वे अपनी लज्जा को भूल गई।
एक दूसरे का उन्होंने आलिङ्गन किया तथा एक दूसरी की प्रशंसा की। हे नाथ ! प्रिय
लोगों को आनन्द प्रदान करने वाले आप के लिए यह उचित ही है। इस प्रकार के वचनों को एकीकृत
मन वाली होकर उन सखियों ने प्रेम में परस्पर एक दूसरे से कहा ।। ४९-५० ॥
एतस्मिन्नन्तरे नाम्ना सुन्दरीति
वराङ्गना ॥ ५२ ॥
स्मितपूर्वमुवाचेदं वचनं
प्रेमगर्विता ।
इसी समय सुन्दरी नामक श्रेष्ठ
अङ्गना ने प्रेम से गर्वीली होकर मुस्कुराते हुए इन वचनों को कहा ॥ ५२-५३ ।।
सुन्दर्युवाच-
भवतीनामयं तर्कों यद्यपि
प्रियसम्मतः ।। ५३ ।।
तर्कशेषस्तथाप्यस्ति न प्रियेण
प्रकाशितः ।
भवतीभिः स्वमत्यापि स च नावगतः परम्
॥ ५४ ॥
सुन्दरी ने कहा- आप लोगों का यह
तर्क ( भाव ) यद्यपि प्रिय सम्मत है तथापि कुछ तर्क अभी शेष रह गया है जो हमारे
प्रिय श्रीकृष्ण द्वारा नहीं कहा गया है। आप लोगों ने भी अपनी बुद्धि से उस तर्क
(भाव) को अभी नहीं जाना है ।। ५३-५४ ।।
स्वीयोपरि प्रेम कीदृगिति पृष्टे
प्रियेण हि ।
आत्मदर्शी दर्शितो वस्तत्र वक्ष्ये
प्रियाशयम् ।। ५५ ।।
क्योंकि स्वयं पर प्रिय का कैसा
प्रेम है प्रिय द्वारा ऐसा पूछने पर अपना आदर्श (दर्पण) जो उन्होंने आप को दिखा
दिया है उससे प्रिय का क्या आशय है ? यह
मैं कहती हूँ ।। ५५ ।।
आत्मादर्शे यथा सम्यक् स्वस्वरूपं
निरीक्षते ।
तदभावे स्वस्वरूपानुभवो नैव जायते
।। ५६ ।।
आत्मा के दर्पण में जैसे स्वयं के
स्वरूप का निरीक्षण सम्यक् रूप से किया जा सकता है और उसके अभाव में स्व-स्वरूप का
अनुभव नहीं होता ।। ५६ ।।
श्रतिगीतमिदं तद्वत्स्वरूपं मे
रसात्मकम् ।
मयानुभूयते सम्यक
प्रियारात्रसमाश्रयम् ॥ ५७ ॥
उसी प्रकार से यह श्रुति और गीत
मेरा रसात्मक स्वरूप है । प्रिया पात्र में समाश्रयण करके सम्यक रूप से इसे में
अनुभव करता हूँ ।। ५३ ।।
अन्यथा मत्स्वरूपस्य न ममानुभवः
क्वचित् ।
यथा धरागतं सूर्यो रसं
पीत्वाभिवर्षति ॥ ५८ ॥
तथा प्रियारसं मां च पीत्वा तद्भावपूरिताः
।
आनन्दयन्ति मामेव घनीभूतरसात्मकम्
।। ५९ ।।
अन्यथा मेरे स्वरूप का मुझे भी कभी
अनुभव नहीं होगा । जैसे पृथ्वी से जल को पोकर सूर्य वर्षा करते हैं उसी प्रकार
प्रिया के रस को पीकर और मुझ में उसी भाव से परिपूर्ण होकर वह घनीभूत रसात्मक
ब्रह्म मेरे में ही आनन्द लेते हैं ।। ५८-५९ ।
दर्पणछद्मना सख्यः अयमर्थोऽपि
सूचितः ।
इत्येतत्सुन्दरीवाक्यं श्रुत्वा
सख्योतिविस्मिताः ॥ ६० ॥
भगवानपि पूर्णात्मा
तदुक्तार्थममन्यत ।
दर्पण व्याज से सखियों ने इस अर्थ
को भी सूचित किया है। इस प्रकार के सुन्दरी के वाक्यों को सुनकर अन्य सखियाँ
अत्यन्त विस्मित हुई । पूर्णात्मा भगवान् श्रीकृष्ण ने भी इस अर्थ को मान लिया ।।
६०-६१ ॥
श्रीकृष्ण उवाच-
अन्वर्थ साधु ते नाम सुन्दरीति मम
प्रियम् ॥ ६१ ॥
त्वं मे प्राणाधिका चासि सर्वस्वं
मे त्वमेव हि ।
त्वदधनोऽस्म्यहं साध्वि
प्रेमपाशनियन्त्रितः ॥ ६२ ॥
श्रीकृष्ण ने कहा- तुम्हारा सुन्दरी
यह नाम ठीक ही अन्वर्थ है और मुझे प्रिय है। तुम मुझे प्राण से भी अधिक प्यारी हो
। अतः मेरा सर्वस्व भी तुम्हीं हो। हे साध्वि ! तुम्हारे प्रेम के पाश से
नियन्त्रित मैं अब तुम्हारे अधीन हूँ ।। ६१-६२ ।।
त्वदुक्तं यन्मयोक्तं तत्
त्वद्दृष्टं तन्मयेक्षितम् ।
यत्त्वयाङ्गीकृतं साध्वि
ममाप्यङ्गीकृतं हि तत् ॥ ६३ ॥
जो तुमने कहा- उसे मैंने कहा, जो तुमने देखा उसे मैंने देखा । हे साध्वि! जो तुमने अङ्गीकार किया मैंने भी उसे ही अङ्गीकार किया है ॥६३॥
आवयोरन्तरं नास्ति यः करोति स पाती ।
इत्येवं वचनं श्रुत्वा प्रियास्ताः
प्रियभाषितम् ।। ६४ ।।
प्रहर्षं परमं जग्मुविषण्णां
स्वामिनीं विना ।। ६५ ।।
हे सुन्दरि ! अब हमारे और तुम्हारे
बीच में कोई अन्तर नहीं है । यदि कोई भेद करता है तो वह पापी है। इस प्रकार के
प्रिया कृष्ण द्वारा भाषित उन प्रिय वचनों को सुनकर वे सखियाँ भी अत्यन्त आनन्द को
प्राप्त हुई। किन्तु स्वामिनो (राधा) के विना वे कुछ खिन्न मन वाली हो गई ।। ६४-६५
।।
इति श्रीमाहेश्वरतन्त्रे
उत्तरखण्डे शिवपार्वती सम्बादे अष्टत्रिंशं पटलम् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीनारदपाश्चरात्र
आगमगत 'माहेश्वरतन्त्र' के उत्तरखण्ड (ज्ञान खण्ड ) में माँ
जगदम्बा पार्वती और भगवान् शङ्कर के संवाद के अड़तीसवें पटल की डॉ० सुधाकर मालवीय
कृत 'सरला' हिन्दी व्याख्या समाप्त हुई
।। ३८ ।।
आगे जारी........ माहेश्वरतन्त्र पटल 39

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