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परशुराम स्तुति

परशुराम स्तुति

परशुराम स्तुति भगवान परशुराम की महिमा, वीरता और धर्मपरायणता का गुणगान करती है, जिसमें उन्हें रेणुका के पुत्र, क्षत्रियों का संहारक, देवताओं और ऋषियों के प्रिय, तथा ज्ञानी और शूरवीर योद्धा के रूप में वर्णित किया गया है, इस स्तुति में उनकी शक्ति, तपस्या और दुष्टों का नाश करने के गुणों का स्मरण किया जाता है, जो भक्तों को मानसिक शांति और शक्ति प्रदान करती है। 

परशुराम स्तुति

श्रीपरशुराम स्तुति

Parashuram stuti

परशुरामस्तुतिः

परशुराम स्तवन

परशुरामस्तुती

कुलाचला यस्य महीं द्विजेभ्यः प्रयच्छतः सोमदृषत्त्वमापुः ।

बभूवुरुत्सर्गजलं समुद्राः स रैणुकेयः श्रियमातनीतु ॥ १॥

जब (पिता जमदग्नि) ने कुलपर्वतों सहित पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर दी, तो वे (पर्वत) सोम-रत्न (या चंद्रमा-जैसे) हो गए और वे रैणुकेय (रेणुका के पुत्र परशुराम) अपनी शोभा (शौर्य) बढ़ाने के लिए समुद्रों से उत्पन्न जल के समान (उत्साहित होकर) प्रकट हुए।

नाशिष्यः किमभूद्भवः किपभवन्नापुत्रिणी रेणुका

नाभूद्विश्वमकार्मुकं किमिति यः प्रीणातु रामत्रपा ।

विप्राणां प्रतिमन्दिरं मणिगणोन्मिश्राणि दण्डाहतेर्नांब्धीनो

स मया यमोऽर्पि महिषेणाम्भांसि नोद्वाहितः ॥ २॥

परशुराम के क्रोध से क्या शिव, क्या ब्रह्मा, क्या रेणुका (माता) और क्या विश्व का धनुष (शिवधनुष) सभी भयभीत हुए, वेदों ने उन्हें ब्रह्मा, शिव से श्रेष्ठ माना और यक्षों ने भी उनके डर से महिषासुर के रक्त से समुद्र को नहीं भरा, क्योंकि उन्होंने सभी क्षत्रियों का नाश किया, यह सब परशुराम के तेज के कारण हुआ।

पायाद्वो यमदग्निवंशतिलको वीरव्रतालङ्कृतो

रामो नाम मुनीश्वरो नृपवधे भास्वत्कुठारायुधः ।

येनाशेषहताहिताङ्गरुधिरैः सन्तर्पिताः पूर्वजा

भक्त्या चाश्वमखे समुद्रवसना भूर्हन्तकारीकृता ॥ ३॥

जो यमदग्नि वंश के दीपक, वीर व्रत से सुशोभित, राजाओं का वध करने वाले, चमकते कुल्हाड़े धारण करने वाले, जिन्होंने अपने पूर्वजों को शत्रुओं के रक्त से तृप्त किया और अश्वमेध यज्ञ के लिए पृथ्वी को समुद्र-वसना (समुद्र तक फैला हुआ) बनाया, ऐसे मुनीश्वर राम (परशुराम) आपकी रक्षा करें।

द्वारे कल्पतरुं गृहे सुरगवीं चिन्तामणीनङ्गदे पीयूषं

सरसीषु विप्रवदने विद्याश्चतस्रो दश ।

एव कर्तुमयं तपस्यति भृगोर्वंशावतंसो मुनिः

पायाद्वोऽखिलराजकक्षयकरो भूदेवभूषामणिः ॥ ४॥

वे अपने द्वार पर कल्पवृक्ष (इच्छापूर्ति), घर में कामधेनु (सुरगवी), कलाई में चिन्तामणि, तालाबों में अमृत, और ब्राह्मणों के मुख में दस विद्याएँ प्रदान करते हैं, और ऐसे ही तपस्या करते हैं; वे सभी राजाओं का नाश करने वाले, ब्राह्मणों के भूषण (भूदेवभूषामणि) और भृगु वंश के श्रेष्ठ मुनि हैं, जो आपकी रक्षा करें।

॥ इति परशुराममस्तुतिः ॥

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