चीनाचार तन्त्र
चीनाचार तन्त्र हिन्दू तंत्र का ही
एक हिस्सा है, जिसे बौद्ध तंत्र (वज्रयान) के
साथ घुलमिल जाने के कारण शिवाचार से बदलकर चीनाचार कहा गया, ताकि
मूल भारतीय पहचान छिपी रहे, जिसमें माँ तारा (महाविद्या) की
उपासना मुख्य है और इसमें महाचीन (चीन/तिब्बत) से आए ज्ञान
का उल्लेख होता है, जो वास्तव में शिव तत्त्व का ही एक रूप
है, यह प्राचीन तंत्र परंपरा की गहरी समझ और उसके समन्वय का प्रतीक है।
चीनाचारतन्त्र
चीनाचार तन्त्र एक विशिष्ट तन्त्र
है। इसके अध्ययन से पता चलता है कि यह तन्त्र महात्मा बुद्ध के द्वारा चीन देश ले
जाया गया था, वहीं पर यह तन्त्र रहा होगा। इस
ग्रन्थ में भी इसी प्रकार का वर्णन मिलता है। इस तन्त्र में देवी पार्वती
देवाधिदेव भगवान् शंकर से महाचीन क्रमाचार के विषय में पूछती हैं कि यह महाचीनाचार
क्या है तथा इसकी साधना किस प्रकार ? इस प्रश्न का उत्तर
देने से पहले भगवान् शंकर उन्हें इस तन्त्र को अत्यन्त गुप्त रखने को कहते हैं और
फिर बताते हैं कि पूर्वकाल में महर्षि वशिष्ठ ने नीलांचल पर स्थित कामाख्या तीर्थ
पर तारा की आराधना की, तब तारा की कृपा प्राप्त कर वशिष्ठ
ब्रह्मा जी के पास गये, वहाँ वशिष्ठ ने वैदिक विधि से तारा
देवी की आराधना की, परन्तु सिद्धि प्राप्त नहीं हुई। ब्रह्मा
जी द्वारा प्रेरित वशिष्ठ ने पुनः आराधना की, फिर भी देवी
प्रसन्न नहीं हुईं, तब वशिष्ठ ने तारा देवी को शाप दे दिया।
उसके बाद उस शाप के बाद तारादेवी ने कहा कि भगवान् विष्णु के पास जाकर तारा उपासना
क्रम को ग्रहण कीजिये। तब विष्णु के अवतार वशिष्ठ ने भगवान् बुद्ध, जो उस समय चीन देश में थे, उनके पास जाकर महाचीनाचार
क्रम को पूछा।
भगवान् बुद्ध ने बताया कि अकेले में,
श्मशान में, निर्जन घर में, चौराहे पर अथवा शवासन पर तारा देवी की आराधना की जा सकती है, यही कुलधर्म है। महाचीनाचार क्रम में मदिरा और स्त्री ये दो ही प्रधान हैं,
उसी समय उन्होंने वशिष्ठ को सुराशाप विमोचन विधि भी बतायी। सुराशाप
की एक विस्तृत कथा है, जो इस तन्त्र में वर्णित है।
चीनाचार क्रम से तारा देवी की
आराधना में सभी अभीष्ट सिद्धियों का वर्णन, कुलधर्म
निर्माण विधि और उसका माहात्म्य वर्णन करते हुए बताया कि एक नीच व्यक्ति भी यदि वह
कुलज्ञानी है अर्थात् कौलमतानुयायी है तो वह ब्राह्मण से भी महान् है।
श्वपचोऽपि कुलज्ञानी
ब्राह्मणादतिरिच्यते ।
उसके बाद उन्होंने मदिरापान कर
स्त्रीसम्भोगविषयिणी शंका का भी समाधान किया और सभी आराधनाओं एवं पूजा पद्धतियों
में कौलाचार (वाम मार्ग) की सबसे उत्तमता बतायी तथा चीनाचार में मदिरापान और
परस्त्रीसेवन कोई पाप नहीं है, यह भी बताया।
इसके बाद दारुवन में रहते हुए
महर्षि वशिष्ठ ने महाचीनाचार विधि से तारा देवी की आराधना की और धन्य हो गये। उसके
बाद तारा के समाराधन में नव पुष्पों का वर्णन है और अन्त में तारा समाधान के
महात्म्य वर्णन के साथ इस तन्त्रग्रन्थ की समाप्ति होती है।
चीनाचार तन्त्र की विशेषतायें
मद्यपान के विषय में—यह तो सर्वविदित है कि मद्यपान अपराध है। तथा उसका सेवन स्वास्थ्य के लिये
हानिकारक है; परन्तु यदि उसे दवा के रूप में लिया जाये तो
निश्चित ही स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। अतः इस ग्रन्थ में मद्यपान केवल पूजाकाल
में ही बताया गया है। अन्य काल में सुख की कामना से नहीं लेना है। जिसकी पुष्टि
हिन्दूधर्मशास्त्र मनुस्मृति भी करती है—
पूजाकालं विना नैव सुरा पेया च
साधकैः ।।
पूजा के समय के बिना मदिरा का पान
कभी नहीं करना चाहिए। पूजा के बिना मांस और मदिरा का पान नहीं करना चाहिये। ऐसा
हमारे उत्तम धर्म शास्त्र मनुस्मृति में भी लिखा हुआ है। देखिये-
न मांस भक्षणे दोषो न मद्ये न च
मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिश्च
महाफलाः ।। - मनु. 5/56
यही नहीं इस ग्रन्थ में तो यह भी
कहा गया है कि-
आयुष्यं हीयते दृष्ट्वा पीत्वा तु
पशुनां व्रजेत् ।
सौत्रामण्यां कुलाचारे ब्राह्मणः
प्रपिबेत् सुराम् ।।
अन्यत्र कामतः पीत्वा प्रायश्चित्ती
भवेन्नरः ।
अर्थात् पूजा के समय के अलावा मदिरा
(सुरा) को देखकर आयु नष्ट होती है तथा पीकर पशुता आती है। अतः सौत्रामणी और
कुलाचार में ही ब्राह्मण को सुरा पान करना चाहिए। अन्य समय पीकर प्रायश्चित करना
चाहिए।
श्लोक में यह बहुत ही रहस्य की बात
कही गयी है कि कुलाचार अथवा सौत्रामणी याग के अलावा समय में सुरा को देखने से ही
आयु नष्ट होती है और पीकर पशुता आती है अर्थात् मनुष्य पशु बन जाता है। यह तो देखा
ही जा रहा है।
अन्यत्र काम (इच्छा) से पीकर मनुष्य
प्रायश्चित्ती होना चाहिए अर्थात् सौत्रामणी व्रत में और कुलाचार के समय ही
सुरापान करना चाहिए। इच्छावश अन्य समय करने पर मनुष्य को प्रायश्चित्त करना चाहिए
तथा प्रायश्चित्त तो बहुत घोर पाप का किया जाता है, अतः अन्य समय में सुरापान करना घोर पाप है।
चीनाचार में नारी पूजा —
चीनाचार में सिद्धि स्त्री मैथुन
द्वारा ही बतायी गयी है। इसमें सम्भोग में नारी सन्तुष्टि का रहस्य भी छिपा हुआ है;
क्योंकि जीवन में सुखसमृद्धि लाने के लिये यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण
है; क्योंकि नारी घर की लक्ष्मी होती है, उसकी पूजा होनी ही चाहिये। जैसे भी हो, उसे प्रसन्न
रखना मनुष्य को स्वहितार्थ परमावश्यक है। इसीलिये तो इस तन्त्र में कहा गया है कि
पूजा में स्त्री से द्वेष नहीं करना चाहिये-
स्त्रीद्वेषो नैव कर्त्तव्यो
विशेषात् पूजनं स्त्रियः ।
स्त्रियों पर प्रहार नहीं करना
चाहिए,
उनकी कभी निन्दा नहीं करनी चाहिए, उनके साथ
सर्वथा कभी कुटिलता नहीं करनी चाहिए और न ही उनका सर्वथां अप्रिय करना चाहिए।
किसी भी प्रकार से स्त्रियों पर
प्रहार,
किसी प्रकार से उनकी निन्दा, किसी भी प्रकार
उनका बुरा और किसी भी प्रकार से उनकी कुटिलता नहीं करनी चाहिए। यदि उन पर प्रहार,
उनकी निन्दा, उन पर कुटिलता, उनका बुरा करेगा तो उसकी सिद्धि में बाधा पैदा होगी। अर्थात् देवी की
सिद्धि नहीं हो पोयगी ।
तासां प्रहारनिन्दाञ्च कौटिल्यमप्रियन्तथा
।
सर्वथा नैव कर्तव्यमन्यथा
सिद्धिरोधकृत् ।।
स्त्रियां ही देवता हैं,
स्त्रियां ही प्राण हैं और स्त्रियां ही विभूषण (गहना) हैं। अतः स्त्रियों
का साथ सदा होना चाहिए। यदि स्त्रियां न मिलें तो अपनी स्त्री का साथ पूजा में
सदैव होना चाहिए।
स्त्रियो देवाः स्त्रियः प्राणाः
स्त्रिय एव विभूषणम् ।
स्त्रीसङ्गिना सदा भाव्यमन्यथा
स्वस्त्रिया सह ।।
स्त्री के हाथ से देवी पर चढ़ाये
गये फूल,
स्त्री के हाथ से चढ़ाया गया जल, स्त्री के
हाथ से चढ़ाया गया द्रव्य, देवताओं के लिए निवेदन करना
चाहिए।
तद्धस्तावचितं पुष्पं तद्धस्तावचितं
जलम् ।
तद्धस्तावचितं द्रव्यं देवताभ्यो निवेदयेत्
।।
कौलाचार और कौलमहिमा –
कौलाचार में पञ्चतत्त्व प्रसिद्ध
हैं। अतः इसमें मद्य और मैथुन मुख्य है। अतः दोनों ही ध्यान केन्द्रित करने के
प्रमुख साधन हैं। इसीलिये विष्णु के अवतार महात्मा बुद्ध ने कहा है कि सबसे उत्तम
वेद है,
वेदों से वैष्णव (विष्णु को मानने वाले) उत्तम हैं, वैष्णवों से शैव (शिव के उपासक) उत्तम हैं, शैवों से
दक्षिण पन्थी उत्तम हैं, दक्षिणपन्थियों से कौल (कुलधर्म को
मानने वाले) उत्तम हैं और कौल से उत्तम कोई नहीं है तथा हे देवि यह गुप्त से भी
अधिक गुप्त है तथा यह सार से सार निकालकर बनाया गया है तथा ज्ञानकी मथानी से वेद
और आगम के सागर को मथ कर निकाला गया है। अतः कुलाचार क्रम से ही सिद्धि होती है।
अन्य किसी से नहीं होती।
सर्वेभ्यश्चोत्तमा वेदा वेदेभ्यो
वैष्णवः परः ।
वैष्णवात् परमं शैवं शैवाद्
दक्षिणमुत्तमम् ।
दक्षिणादुत्तमं कौलं कौलात् परतरं न
हि ।।
गुह्याद् गुह्यतरं देवि सारात्सारं
परात्परम् ।
मथित्वा ज्ञानमन्थेन वेदागममहार्णवम्
।
कुलाचारक्रमेणैव नं सिद्धिर्जायते
क्वचित् ।।
वैज्ञानिक रहस्य-
सुमेरु पर्वत की बर्फ के ऊपर जैसे
सूर्य मुख्यतर हैं। अर्थात् सुमेरु पर्वत पर जो बर्फरूपी जल है,
उसके कारण सूर्य है; अर्थात् सुमेरु पर्वत की
ऊंचाई पर बर्फ (जल) भला कैसे हो सकता है; परन्तु है। इसके
कारण सूर्य हैं अर्थात् सूर्य ही इतने ऊंचे सुमेरु पर्वत पर जल पैदा कर देते हैं
तथा जैसे सूर्य की गर्मी तथा उससे बर्फ की उत्पत्ति में महान् अन्तर है, उसी प्रकार इसकी समया तथा इसके कुल में महान् अन्तर है।
मेरुकार्यपयोमूर्ध्नि सूर्यो
मुख्यतरो यथा ।।
तथास्य समयाश्चास्य कुलस्य
महदन्तरम् ।
यहाँ यह वैज्ञानिक रहस्य है कि
पहाड़ की ऊँचाई पर सूर्य की किरणें सीधी न पड़कर बिखर जाती हैं,
इसलिये वहाँ गर्मी न रहने के कारण बर्फ जम जाती है। इससे यह सिद्ध
होता है कि तन्त्र लेखक को इस रहस्य का भी ज्ञान था।

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