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चीनाचार तन्त्र पटल १

चीनाचार तन्त्र पटल १

चीनाचार तन्त्र पटल १ में देवी पार्वती द्वारा भगवान् शंकर से महाचीन क्रमाचार के विषय में पूछना और  महर्षि वशिष्ठजी का नीलांचल पर्वत पर वैदिक विधि से तारा देवी की आराधना करने तथा देवी का प्रसन्न नहीं होने पर देवी तारा को शाप देने का वर्णन है।

चीनाचार तन्त्र पटल १

चीनाचारतन्त्रम् प्रथमः पटलः

Chinachar tantram chapter 1

चीनाचार तंत्र पहला पटल

चीनाचारतन्त्र प्रथम पटल

चीनाचारतन्त्रम्

प्रथमः पटलः

।। ॐ नमस्तारिण्यै । ।

चीनाचारतन्त्र पटल एक

अथ प्रथमः पटलः

श्रीदेव्युवाच

महाचीनक्रमाचारः सूचितो न प्रकाशितः ।

इदानीं श्रोतुमिच्छामि यदि तेऽस्ति कृपा मयि ॥ 1

इति पृष्टः पुरा देव्या कैलासशिखरे हरः ।

चिन्तयामास मनसा किञ्चिदाकुलितेक्षणः ॥ 2

श्री देवी पार्वती ने भगवान् शिव से कहा कि- हे देव! महाचीनक्रमाचार आपने सूचित तो किया है; परन्तु प्रकाशित नहीं किया। यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो इस समय मैं सुनना चाहती हूँ। ऐसा प्राचीन काल में देवी पार्वती ने शिव से पूँछा-तब कैलास की चोटी पर कुछ आंखें बन्द करते हुए भगवान् शिव ने मन से चिन्तन किया ।।1-2 ।।

इयमुत्कण्ठिता भूयो भूयः प्रेरयति प्रिया ।

चीनाचारक्रमं वक्तुं न प्रकाश्यः कथं मया ॥३॥

इस प्रकार चीनाचार को जानने के लिए उत्कण्ठित पार्वती भगवान् शिव को बार-बार चीनाचारक्रम को बताने के लिए प्रेरित कर रही थीं और कह रही थीं कि मेरे द्वारा वह कभी भी प्रकाशित नहीं किया जायेगा। कृपया आप बताइये ॥। 3

अतिगुह्यतरः सोऽपि ह्याचारः सिद्धिदायकः ।

स्त्रीणां चञ्चलया बुद्ध्या कथं गोप्तुं हि शक्यते ॥4

इति सञ्चिन्त्य मनसा पुनराह महेश्वरी ।

महाचीनक्रमाचारं ब्रूहि में परमेश्वर ॥5

शंकर जी ने कहा कि वह चीनाचारक्रम अत्यन्त गुह्यतर (छिपाने योग्य) आचार है और सिद्धि प्रदान करने वाला है तथा स्त्रियों की चञ्चल बुद्धि होती है, वे कैसे उसे गुप्त रख सकती हैं? ऐसा मन से विचार कर पार्वती पुन: कहा कि हे महेश्वर मैं जानती हूं कि स्त्रियों की बुद्धि चञ्चल होती है, वे गुप्त नहीं रख सकतीं, यह जानते हुए मैं आपसे पूंछ रहीं हूं अर्थात् गुप्त रखूंगी ही इसलिए आप मुझे चीनाचार क्रमाचार को बताइये॥4-5

श्रीशिव उवाच

अलं यत्नैरत्नं यत्नैरत्नं यत्नैर्महेश्वरि ।

चीनाचारक्रमं श्रोतुं विरता भव पार्वति ॥6

स एव परमाचारो न प्रकाश्यः कदाचन ।

गुह्याद् गुह्यतरः साक्षात्तत्त्वध्यानमयः शिवे ॥7

स्त्रीस्वभावेन देवेशि शश्वन्मां परिपृच्छसि ।

लक्षवारं वारिताऽपि श्रोतुमिच्छसि शङ्करि ॥8

जब पार्वती ने जानने का अत्यधिक प्रयास किया, तब भगवान् शिव ने कहा कि हे महेश्वरि ! अधिक यत्न मत करो, अधिक यत्न मत करो और चीनाचार क्रम को सुनने को विरत हो जाओ। अर्थात् उसे सुनने का प्रयास मत करो; क्योंकि हे पार्वति ! यह वही परम आचार है, जिसे कभी भी किसी को नहीं बताना है; क्योंकि यह गुप्त से गुप्ततर है। वह साक्षात्तत्त्व और ध्यानमय तत्त्व है। हे देवेशि ! स्त्री स्वभाव के कारण तुम बार-बार मुझसे पूंछ रही हो । लाखों बार मेरे रोकने पर भी तुम सुनना चाहती हो ॥ 6-8

श्रीदेव्यावाच

यदि चीनक्रमाचारं न मे कथयसि प्रभो ।

प्राणत्यागं करिष्यामि पुरतस्ते न संशयः ॥9

तब श्री पार्वती ने कहा कि हे महादेव यदि तुम चीनाचारक्रम को नहीं कहते हो तो तुम्हारे ही सामने प्राण त्याग दूंगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है ।। 9

इत्युक्तः शैलतनयां रुद्रः कारुणिको महान् ।

महाचीनक्रमाचारं गदितुञ्च प्रचकमे ॥10

ऐसा जब पार्वती ने कहा, तब ऐसा कही हुई शैलपुत्री पार्वती को महान् कारुणिक भगवान् शिव ने महाचीनक्रमाचार को बताना प्रारम्भ कर दिया ॥10

सर्वदा गोप्य एवायमाचारः सिद्धिदायकः ।

तवानुरोधादेवाह कथयामि महेश्वरि ॥11

भगवान् शिव ने कहा कि हे शिवे ! यह महाचीन क्रमाचार सर्वदा ही गोपनीय है और सिद्धि देने वाला है। तुम्हारे अनुरोध करने पर ही मैं तुम्हें बता रहा हूं।।11।।

ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽतीव संयमी ।

तारामाराधयामास पुरा नीलाचले मुनिः ॥ 12

जपन् सन्तारिणीं विद्यां कामाख्यायोनिमण्डले ।

गमयामास वर्षाणामयुतं ध्यानतत्परः ॥ 13

ब्रह्मा के मानस पुत्र वशिष्ठ अत्यन्त संयमी थे। प्राचीन काल में उन वशिष्ठ मुनि ने नील पर्वत पर तारा देवी की आराधना की। तब कामाख्या योनि मण्डल में सन्तारिणी विद्या का जप करते हुए ध्यान में लीन होकर उन्होंने दश हजार वर्ष बिता दिये ।।12-13

वर्षायुतेन तस्यैवं चिरमाराधिता सती ।

नानुग्रहं चकारासौ तारा संसारतारिणी ॥14

इस प्रकार दश हजार वर्ष तक की चिर आराधना की जाती हुई संसारतारिणी सती तारा ने उन वशिष्ठ पर कृपा नहीं की ।।14 ।।

अथासौ पितरं गत्वा ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।

कोपेन ज्वलितो विद्यां तत्याज पितुरन्तिके ॥15

इसके बाद वे वशिष्ठ अपने पिता परमेष्ठी, ब्रह्माजी के पास गये और वहाँ जाकर क्रोध से जलते हुए वशिष्ठ ने पिता के पास आकर विद्या को छोड़ दिया ॥15

द्वादशादित्यसङ्काशं तपोभिर्ज्वलितं मुनिम् ।

ब्रह्मा स च मुनिं प्राह शृणु पुत्र वचो मम ॥16

तब बारह सूर्य के समान तप से जलते हुए मुनि वशिष्ठ से उन ब्रह्मा ने कहा कि हे पुत्र ! मेरी बात सुनो ।।16।।

तत्त्वज्ञानमयीं विद्यां तारा भुवनतारिणीम् ।

आराध्य त्वं श्रीचरणं सिद्धियुक्तेन चेतसा ॥17

ब्रह्मा जी ने कहा कि तारा विद्या पाप से तारने वाली है और तत्त्वज्ञानमयी है। इसलिए तुम भुवनतारिणी तत्त्वज्ञानमयी तारा विद्या के श्रीचरण की सिद्धियुक्त चित्त से आराधना करो ।।17।।

अस्याः प्रसाददेवाहं भुवनानि चतुर्दश ।

सृजामि चतुरो वेदान् कल्पयामि च लीलया ॥18

एनामेव समाराध्य विद्यां भुवनतारिणीम् ।

तत्त्वज्ञानमयो विष्णुर्भुवनं पालयत्यसौ ॥19

संहारकाले च हरो रुद्रमूर्तिधरः परः ।

तामेव तारामाराध्य संहरत्यखिलं जगत् ॥20

इसी के प्रसाद से मैं चौदह लोकों की रचना करता हूं तथा इसकी ही लीला से मैं चारों वेदों की कल्पना करता हूं। इसी भुवनतारिणी विद्या की सम्यक् प्रकार से आराधना कर तत्त्वज्ञानी भगवान् विष्णु इस भुवन (चौदह लोकों) का पालन करते हैं तथा उसी तारा विद्या की आराधना करके रुद्रमूर्तिधारण करने वाले भगवान् शिव सृष्टि के संहारकाल में समस्त संसार का संहार करते हैं ॥18-20

इत्युक्तो ब्रह्मणा योगी वशिष्ठः साधकोत्तमः ।

स्वपित्रे कथयामास सर्वमाराधनक्रमम् ॥21

ऐसा जब ब्रह्मा जी ने कहा-तब उत्तम साधक योगी वशिष्ठ ने अपने पिता ब्रह्माजी से सब आराधना क्रम जानने को कहा ।। 21।।

वशिष्ठ उवाच

देवानामादिभूतस्त्वं सर्वविद्यामय प्रभो ।

कथं दत्ता दुराराध्या विद्यामल्पमियं त्वया ॥ 22 ।।

सहस्त्रवत्सरं पूर्वमियमाराधितो प्रभो ।

नीलाचले निवसता हविष्यं भुञ्जता मया ॥ 23

तथापि तातः तारिण्याः करुणा मयि नाभवत् ।

ततो गण्डूषमात्रन्तु काले काले पिबन् जलम् ॥24

आराधयामि तां देवीं वत्सराणां सहस्रकम् ।

ततोऽपि यदि नैवाभूत् तारिण्याः करुणा मयि ॥25

तदाहमेकपादेन तिष्ठन्नीलाचलोपरि।

परं समाधिमास्थाय निराहारो दृढव्रतः ॥26

तामेव केवलं ध्यायन् जपन् तामेव सर्वदा ।

अतिवाहितवान् वर्षं सहस्राष्टकमुतमम् ॥27

वशिष्ठ ने कहा कि हे मेरे पिता ब्रह्माजी आप देवताओं में आदि भूत है अर्थात् सभी देवताओं से पहले पैदा हुए हैं तथा हे प्रभो ! आप सभी विद्याओं से युक्त हैं। कैसे आपने इस कठिनाई से आराधना करने योग्य विद्या को बहुत कम माना । हे प्रभो ! हजार वर्ष पूर्व नीलपर्वत पर निवास करते हुए तथा केवल हविष्य का भोजन करते हुए मैंने इस विद्या की आराधना की थी, फिर भी हे प्रभो ! तारिणी देवी की करुणा मेरे ऊपर नहीं हुई, उसके बाद समय-समय पर मुट्ठी भर जल पीते हुए हजारों वर्ष तक आराधना करता रहा, उसके बाद भी यदि तारिणी देवी की मुझ पर करुणा नहीं हुई। तब मैंने बिना कुछ खाये नीलाचल पर एक पैर पर खड़े रहते हुए पर समाधि धारण करके दृढ़व्रत किया और उन तारिणी देवी का सर्वदा ध्यान करते हुए उनका ही सर्वदा जप करते हुए आठ हजार वर्ष से भी अधिक वर्ष बिता दिये ।। 22-27।।

एवं दश सहस्रन्तु वर्षाणामहमीश्वरीम् ।

कामाख्यायोनिमाश्रित्य समाराधितवान् प्रभो ॥28

अद्याप्यनुग्रहस्तस्यास्तथापि नैव दृश्यते ।

अतस्त्यजामि दुःसाध्यां विद्यामेनां सुदुःखितः ॥29

इति तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मा लोकपितामहः ।

उवाच सान्त्वयन् पुत्रं वशिष्ठं मुनिनां वरम् ॥30

इस प्रकार हे प्रभो ! मैंने कामाख्या योनि का आश्रय लेकर दस हजार वर्ष तक ईश्वरी तारिणी की आराधना की, लेकिन इतने पर आज भी उन देवी की मेरे ऊपर कृपा-दृष्टि नहीं दिखाई दे रही है। अतः हे भगवन्! दुःखी हुआ मैं इस कठिनाई से सिद्ध होने वाली विद्या को छोड़ रहा हूँ। इस प्रकार अपने पुत्र वशिष्ठ के वचन को सुनकर लोक पितामह ब्रह्मा मुनियों में श्रेष्ठ अपने पुत्र वशिष्ठ को सान्त्वना देते हुए बोले ॥ 28-30

ब्रह्मोवाच

वशिष्ठ गच्छ पुत्र त्वं पुनर्नीलाचलं प्रति ।

तत्र स्थितां महादेवीमाराधय दृढव्रतः ॥31

कामाख्यायोनिमाश्रित्य जपतः परमेश्वरीम् ।

अचिराद् देवतासिद्धिर्भविष्यति न संशयः ॥32

एतस्याः सदृशी काचिद् विद्या नास्ति जगत्त्रये ।

इमां त्यक्त्वा पुनर्विद्यामन्यां कां संग्रहीष्यसि ॥33

हे पुत्र वशिष्ठ! तुम नील पर्वत की ओर चले जाओ और वहाँ स्थित होकर तुम दृढव्रत होकर महादेवी की आराधना करो तथा वहाँ पर कामाख्या योनि का आश्रय लेकर परमेश्वरी का जप करते हुए शीघ्र उस देवी की सिद्धि हो जायेगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसके समान तीनों लोकों में कोई विद्या नहीं है। अतः इस विद्या को छोड़कर फिर अन्य किस विद्या को ग्रहण करोगे ॥ 31-33

इति तस्यवचः श्रुत्वा प्रणम्य पितरं मुनिः ।

पुनर्जगाम कामाख्यायोनिमण्डलसन्निधिम् ॥34

तत्र गत्वा मुनिवरः पूजासम्भारतत्परः ।

आराधयन्महामायां वशिष्ठोऽतिजितेन्द्रियः ॥35

इस प्रकार ब्रह्माजी के वचन को सुनकर अपने पिता ब्रह्माजी को प्रणाम करके मुनि वशिष्ठ कामाख्या योनि मण्डल के पास पुनः गये और वहाँ जाकर इन्द्रियों को जीत लेने वाले मुनि वशिष्ठ मां तारिणी की आराधना करते हुए पूजा में तत्पर हो गये ॥ 34-35

अथाराधयतस्तस्य सहस्त्रं परिवत्सरान् ।

जग्मुस्तारामहादेवी पादाम्भो जानुवर्तिनः ॥36

इसके बाद महादेवी तारा की आराधना करते हुए महादेवी के अनुगामी वशिष्ठ को हजारों वर्ष बीत गये ॥36

तथापि तं प्रति प्रीता यदा नाभून्महेश्वरी ।

तदा रोषेण महता जज्वाल स मुनीश्वरः ॥37

फिर भी उनके प्रति महेश्वरी तारा जब प्रसन्न नहीं हुईं, तब वे महामुनि वशिष्ठ क्रोध से जलने लगे ॥37

ततो जलं समादाय तां शप्तुमुपचक्रमे ।

एतस्मिन्नन्तरे रुष्टमालोक्य तं मुनीश्वरम् ॥38

चचाल वसुधा सर्वा सशैलवनकानना ।

हाहाकारो महानासीद् दिवि देवेषु सर्वतः॥39

उसके बाद वे जल लेकर शाप देने के लिए उपक्रम करने लगे। इसी बीच उन मुनीश्वर वशिष्ठ को क्रोधित देखकर पर्वत वन और कानन के साथ समस्त पृथ्वी हिलने लगी तथा स्वर्ग में सभी देवताओं में महान् हाहाकार होने लगा ॥38-39

ततो बभूव परतस्तारा संसारतारिणी ।

वशिष्ठस्तां समालोक्य शशापातीव दारुणम् ॥40

उसके बाद संसार का उद्धार करने वाली महादेवी तारा वशिष्ठ मुनि के सामने उपस्थित हो गयी, तब वशिष्ठ ने उन्हें अत्यन्त कठिन शाप दिया ॥40

ततो देवी महामाया तारिणी सर्वसिद्धिदा ।

उवाच साधक श्रेष्ठं वशिष्ठं मुनिनां वरम् ॥41

रोषेण दारुणमनाः कथं मामशपद् भवान् ।

मदीयाराधनाचारं बुद्धरूपी जनार्दनः ॥ 42

एक एव विजानाति नान्यः कश्चन तत्त्वतः ।

वृथैव यामबाहुल्यः कालोऽयं गमितस्त्वया ॥43

विरुद्धाचारशीलेन मम तत्त्वमजानता ।

तद् बुद्धरूपिणो विष्णोः सन्निधिं याहि सम्प्रति ॥44

तेनोपदिष्टाचारेण मामाराधय सुव्रत ।

तदैव सुप्रसन्नास्मि त्वयि वत्स न संशयः ॥45

उसके बाद सभी सिद्धियों को देने वाली महामाया तारिणी देवी मुनियों में श्रेष्ठ तथा सबसे अच्छे साधक मुनि वशिष्ठ से बोली कि आपने क्रोध से इतना दारुण शाप क्यों दे दिया; क्योंकि मेरी आराधना के आचार को एक ही बुद्ध रूपी जनार्दन भगवान् विष्णु ही जानते हैं, अन्य कोई मुझे तत्त्व रूप से नहीं जानता। मेरे तत्त्व को न जानते हुए विरुद्ध व्यवहार करने के द्वारा तुमने व्यर्थ ही इतना अधिक समय गंवा दिया। अतः अब तुम इस समय मेरे उस आचरणशील तत्त्व को जानने वाले अर्थात् मुझे प्रसन्न करने की विद्या जानने वाले विष्णु के पास जाओ। अतः हे सुन्दर व्रत करने वाले पुत्र ! वहां उनके द्वारा बताये गये उपदेश के अनुसार आचरण (व्यवहार) से मेरी आराधना करो तभी हे सुन्दर व्रत करने वाले वत्स वशिष्ठ! मैं तुम पर प्रसन्न हो जाऊंगी ।।41-45।।

।। इति महाचीनाचारसारतन्त्रे सर्वाचारसारोत्तमोत्तमे महाचीनाचार क्रमे प्रथमः पटलः ।।

आगे जारी..........चीनाचारतन्त्र पटल 2

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