सरस्वती स्तोत्र
सरस्वती स्तोत्र जैन और हिन्दू
परंपराओं में विद्या की देवी की स्तुति के लिए पढ़ा जाता है, जो देवी सरस्वती की महिमा का वर्णन करता है । देवी सरस्वती ज्ञान और
प्रकाश के अनंत स्रोत और सभी अंधकार को मिटाकर विद्या प्रदान करने वाली है ।
श्री सरस्वती स्तोत्रम्
Sarasvati stotram
जैन संप्रदायांतर्गत् सरस्वती स्तोत्र
सरस्वतीस्तोत्र
सरस्वती स्तोत्रं
चन्द्रार्क कोटिघटितोज्ज्वल दिव्य-
मूर्ते,
श्री चन्द्रिकाकलित निर्मल
शुभ्रवस्त्रे ।
कामार्थदायि कलहंस समाधि रूढे,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष देवि
।। १ ।।
करोड़ों सूर्य और चन्द्रमा के
एकत्रित तेज से भी अधिक तेज धारण करने वाली चन्द्रकिरण के समान अत्यन्त स्वच्छ एवं
श्वेत वस्त्र को धारण करने वाली, सकल
मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली तथा कलहंस पक्षी पर आरुढ़ दिव्यमूर्ति श्री सरस्वती
देवी! हमारी प्रतिदिन रक्षा करें।
देवा सुरेन्द्र नतमौलि मणि प्ररोचि:,
श्री मन्जरी निविड़ रंजित पाद पद्मे
।
नीलालके प्रमदहस्ति समानयाने,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष देवि
।।२।।
जिनके चरण कमलों में देवेन्द्र
नतमस्तक हैं, देवों के मस्तक में लगे हुए
किरीटों के ऊपर बहुमूल्य रत्नों की प्रभा से जिनके चरण सुशोभित हैं, जिनके केश नीलवर्ण हैं तथा जिनकी गति मदोन्मत्त हाथी के समान मन्द है,
ऐसी श्रीसरस्वती देवी! हमारी नित्यप्रति रक्षा करें 1
केयूर- हार-मणिकुण्डल-मुद्रिकाद्यै:,
सर्वांग भूषण नरेन्द्र मुनीन्द्र
वंद्ये ।
नाना-सुरत्न वर निर्मल-मौलियुक्ते,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष देवि
।। ३ ।।
जिनका सर्वांग बाजूबन्द,
हार, मणियों के कुण्डल और मुद्रिका आदि
आभूषणों से आभूषित हैं, राजाओं और मुनियों से जो वन्दनीय हैं,
नाना प्रकार के उत्तम रत्नों से युक्त मुकुट से जिनका मुखमण्डल
सुशोभित है, ऐसी सरस्वती देवी! हमारी रक्षा करें।
मञ्जीर कोत्कनक कंकण किंकणीनां,
कांच्याश्च संकृतरवेण विराजमाने ।
सद्धर्म वारिनिधि संतत वर्द्धमाने,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष देवि
।। ४ ।।
जो स्वर्ण के तोड़े,
कंकण और घुंघुरुओं तथा कमर- बन्धों की झंकार करती हुई विराजमान हैं,
भगवान् जिनेन्द्र द्वारा प्रतिपादित अहिंसा प्रधान धर्मरूपी समुद्र
को निरन्तर बढ़ाने वाली हैं- ऐसी हे सरस्वती देवी! आप हम सबकी रक्षा करें ।
कंकेलि पल्लव विनिंदित पाणि युग्मे,
पद्मासने दिवस पद्म समान वक्त्रे ।
जैनेन्द्र वक्त्र भव दिव्य समस्त
भाषे,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष देवि
।।५।।
जिन्होंने अपने सुकोमल करों से
अशोकवृक्ष के कोमल पत्तों को भी तिरस्कृत कर दिया है,
जिनका आसन कमल का है, जिनका मुख मण्डल दिन में
विकसित होने वाले कमल के समान अत्यन्त सुन्दर है और जो भगवान् जिनेश्वर के मुख से
उत्पन्न होने वाली सर्वभाषामयी स्वरूप में प्रकट हुई हैं, ऐसी
सरस्वती देवी! सदा हमारी रक्षा करें।
अर्द्धन्दु मण्डित जटा ललित स्वरूपे,
शास्त्र प्रकाशिनि समस्त कलाधिनाथे
।
चिन्मुद्रिका जप सरामय पुस्तकांके,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष देवि
।। ६ ।।
अर्द्धचन्द्र से विभूषित जटा के
संयोग से जिनका स्वरूप अत्यन्त मनोहर है, जो
सम्पूर्ण शास्त्रों को प्रकाश करने वाली हैं, जो समस्त कलाओं
की स्वामिनी हैं और जिनकी ज्ञानमुद्रा, जपमाला, अभयदान तथा पुस्तक ही जिनके लक्षण हैं, ऐसी श्री
सरस्वती देवी ! सदा हमारी रक्षा करें ।
डिंडीरपिंड हिम शंख सिताग्रहारे,
पूर्णेन्दु बिम्बरुचि शोभित
दिव्यगात्रे ।
चांचल्यमान मृगशाव ललाट नेत्रे,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष
देवि ॥७॥
समुद्र के फेन अथवा बर्फ के समान
अत्यन्त सफेद हार जिनके कण्ठ में है, जिनका
शरीर पूर्णिमा के चन्द्रबिम्ब के समान अत्यन्त सुशोभित है, तथा
जिनके नेत्र कमल मृग के छोटे छोटे बच्चों के समान चंचल हैं,
ऐसी हे सरस्वती देवी! तुम हमारी सदा रक्षा करो।
पूज्ये पवित्र करणोन्नत कामरूपे,
नित्यं फणीन्द्र गरुड़ाधिप
किन्नरेन्द्रः ।
विद्याधरेन्द्र सुरयक्ष समस्त
वृन्दैः,
वागीश्वरि प्रतिदिनं मम रक्ष देवि
।।८।।
जो सभी को पवित्र करने वाली उन्नत काम स्वरूप हैं, जो नागराज, गरुड़राज, किन्नरेन्द्र, विद्याधरराज, देवेन्द्र, यक्ष आदि समस्त देवों के समुदाय से सदा पूजनीय हैं, ऐसी हे सरस्वती देवी तुम सदा हमारी रक्षा करो।
॥ इति श्रीसरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्ण ॥

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