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मल्लारि माहात्म्य

मल्लारि माहात्म्य

श्रीमल्लारि माहात्म्य भगवान शिव के अलौकिक दिव्य स्वरूप मल्लारि की स्तुति है, श्री मल्हारी अथवा मल्लारी भगवान खंडोबा का ही दूसरा नाम है, जो महाराष्ट्र के एक प्रमुख देवता हैं और भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं, जिन्होंने मणि और मल्ल नामक राक्षसों का वध किया था; उन्हें खंडेराव, मल्हार और मल्हारी-मार्तंड के नाम से भी जाना जाता है, यहाँ साथ में एकश्लोकी मल्लारीमाहात्म्य भी दिया जा रहा है।

मल्लारि माहात्म्य

श्रीमल्लारिमाहात्म्यम्

ध्यानम्

हेमाम्भोजप्रवालप्रतिमनिजरुचिं चारुखट्वाङ्गपद्मौ

चक्रं शक्तिं सपाशं सृणिमतिरुचिरामक्षमालां कपालम् ।

हस्ताम्भोजैर्दधानं त्रिनयनविलसद्वेदवक्त्राभिरामं

मार्ताण्डं वल्लभार्धं मणिमयमुकुटं हारदीप्तं भजामः ॥

जो अत्यंत तेजस्वी, आयुधों से युक्त, त्रि-नेत्रधारी, वेद-मुख वाले, अर्धनारीश्वर रूप में अपनी प्रिया के साथ विराजमान हैं और अपने दिव्य आभूषणों से प्रकाशित हो रहे हैं, ऐसे मार्ताण्ड मल्लारी (मल्हार/मल्हारी) देव का हम ध्यान करते हैं।  

श्रीमल्लारि माहात्म्य

मकुटमणिमयूखप्रोज्झिताशेषरत्नं

विमलशशिकलाङ्कं सुन्दरेन्दीवराक्षम् ।

अनुकृतशशितेजः कुण्डलं चारुहासं

प्रकटदशनशोभानिर्जितानेकहीरम् ॥ १॥

उनके मुकुट से निकलने वाली किरणें अन्य रत्नों को फीका करती हैं, चंद्रमा-कला से युक्त, सुंदर कमल-नेत्र, चंद्रमा के तेज की नकल करते कुंडल, मोहक मुस्कान और चमकते दांत जो हीरों को भी लज्जित करते हैं ।

अभिनवमणिमुक्ताहारचाम्पेयमाला

विविधकुसुमगुच्छैः शोभिवक्षःस्थलाढ्यम् ।

सफणपवनभुग्दोर्दण्डभूषाभिरामं

करडमरुनिनादैः पूरितव्योमगर्भम् ॥ २॥

जिनके वक्षस्थल पर नवीन मणियों, मोतियों और चम्पा के फूलों से सुशोभित हार है, भुजाओं पर सर्प और वायु से सुशोभित आभूषण हैं, और उनके कर (हाथों) में डमरू की ध्वनि से आकाश गूंज रहा है।

त्रिभुवनजगदीशं पीतकौशेयवासं

दनुजदहनदक्षं प्रस्फुरत्खड्गहस्तम् ।

भुजगफणसुगुप्तैर्भूषणैर्न्यस्तभूषं

प्रणतसुरकिरीटव्याप्तपादारविन्दम् ॥ ३॥

जो तीनों लोकों के स्वामी, पीले रेशमी वस्त्र धारण किए हुए, राक्षसों को जलाने में निपुण, चमकती हुई तलवार हाथ में लिए, नागफणों के आभूषणों से सुशोभित (जो उनके चरणों में रखे हैं), और नतमस्तक देवताओं के मुकुटों से सुशोभित चरणों वाले हैं।

सितहयवरपत्रं हारसम्भूषिताङ्गं

परिवृतमतिघोरैः सप्तभिः सारमेयैः ।

कनकगिरिसमाभं नैशचूर्णाभिरामं

सकलनिगमगुह्यं नौमि मल्लारिदेवम् ॥ ४॥

मैं सफेद घोड़ों के श्रेष्ठ रथ पर सवार, मोतियों के हारों से सुशोभित अंग वाले, सात भयानक कुत्तों (श्वानों) से घिरे हुए, सोने के पर्वत के समान दिखने वाले, राख की भस्म (विभूति) से सुंदर सुशोभित होने वाले और सभी वेदों के गूढ़ रहस्य को जानने वाले, मल्लारिदेव (भगवान) को नमन करता हूँ।

इति श्रीमल्लारिमाहात्म्यं सम्पूर्णम् ।

एकश्लोकी मल्लारीमाहात्म्यम्

पूर्वं धर्मसुतास्तपोवनगता मल्लेन सन्तर्जिता

जिष्णुंविष्णुमतीत्य शम्भुमभजन् तेनावतीर्य क्षितौ ।

तत्रोल्का मुखमुख्य दैत्य निवहं हत्वामणिं मल्लकं

देवः प्रेमपुरेऽर्थीतोऽवतु वसन् लिङ्गं द्वयात्माऽर्थदः ॥

जो पहले धर्मपुत्र (पांडव) तपवन में तपस्या कर रहे थे और उन्हें मल्लक नामक राक्षस ने परेशान किया, जिसे इंद्र और विष्णु भी नहीं हरा सके; तब उन्होंने शिव की आराधना की, शिव ने अवतार लेकर मल्लक और अन्य राक्षसों (उल्कामुख) का वध किया और प्रेमपुर (कोल्हापुर) में लिंग रूप में वास करते हुए भक्तों को वरदान देते हैं।

इतिश्री एकश्लोकी मल्लारिमाहात्म्यम् सम्पूर्णम् ।

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