लक्ष्मी हृदय स्तोत्र
भार्गव ऋषि द्वारा रचित धन,
समृद्धि, सौभाग्य और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति
के लिए पढ़ा जानेवाला लक्ष्मी हृदय स्तोत्र देवी लक्ष्मी को समर्पित स्तोत्र है,
इसका पाठ करने से दरिद्रता दूर होती है और ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
लक्ष्मीहृदयस्तोत्रम्
Lakshmi Hridaya Stotra
नारायण हृदय एवं लक्ष्मीहृदय स्तोत्र अथर्वणरहस्य
से उद्धृत माने गये हैं और परम्परा में इनके साथ-साथ पाठ का विधान कर एक विशिष्ट
प्रकार के पुरश्चरण के द्वारा सुख-शान्ति एवं समृद्धि की बात कही गयी है।
नारायणस्तोत्र के पाठ की विधि के क्रम में इस लक्ष्मीहृदय स्तोत्र का उल्लेख हुआ
है और कहा गया है कि इसके साथ नारायणहृदय स्तोत्रमन्त्र भी सभी अभीष्ट फलों को
देनेवाला है । नारायणहृदय के बिना यदि लक्ष्मीहृदयस्तोत्र का पाठ करते हैं तो सभी
किया हुआ निष्फल हो जाता है और लक्ष्मी क्रुद्ध हो जाती है।
लक्ष्मीहृदयम् स्तोत्र
आचम्य,
प्राणायाम्य। देशकालौ सङ्कीर्त्य 'श्रीलक्ष्मीनारायणप्रसादेन
ममाऽभीष्टकामना-सिद्ध्यर्थम् अद्यप्रभृत्यमुकदिनपर्यन्तं सङ्करीकरण रीत्या
सम्पुटीकरणरीत्या पुरश्चरणरीत्या सकृदा वर्तनपाठरीत्या वा लक्ष्मीनारायणहृदयजपाख्य
कर्म करिष्ये' इति सङ्कल्प्य न्यासादि कुर्यात् ।
आचमन एवं प्राणायाम कर,
स्थान एवं समय का उच्चारण कर "श्रीलक्ष्मी एवं नारायण की कृपा
से अपनी कामना की सिद्धि के लिए आज से लेकर उस दिन तक लगातार पाठ की विधि से
सम्पुट विधि से अथवा पुरश्चरण की विधि से एक बार या अनेक बार लक्ष्मीनारायण हृदय
जप नामक कर्म मैं करूँगा" ऐसा संकल्प कर न्यास आदि करें।
विनियोगः
अस्य
श्रीमहालक्ष्मीहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य भार्गव ऋषिः,
आद्यादि- श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, अनुष्टुबादि
- नानाछन्दासि श्रीर्बीजम् ह्रीं शक्तिः ऐं कीलकम्
श्रीमहालक्ष्मीप्रसादसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ।
इस महालक्ष्मीहृदयस्तोत्र मन्त्र के
ऋषि भार्गव हैं; आद्या आदि श्री महालक्ष्मी
देवता हैं अनुष्टुप् आदि अनेक छन्द हैं; बीज मन्त्र श्रीः
ह्रीं शक्ति है 'ऐं' कीलक मन्त्र है,
श्री महालक्ष्मी की कृपा की सिद्धि के लिए जप में इसका विनियोग
(प्रयोग) है।
ऋष्यादिन्यासः
ॐ भार्गवऋषये नमः,
शिरसि । इस मन्त्र से
अंगूठा एवं कनिष्ठा छोड़कर शेष तीन अंगुलियों से शिर का स्पर्श करें।
अनुष्टुबादि नानाछन्दोभ्यो नमो,
मुखे। उक्त रीति से मुख
का स्पर्श करें।
आद्यादि-श्रीमहालक्ष्म्यै देवतायै
नमो, हृदये ।
हृदय का स्पर्श करें।
श्रीं बीजाय नमो गुह्ये।
गुह्य प्रदेश का स्पर्श करें।
ह्रीं शक्तये नमः,
पादयोः । दोनों पैरों का
स्पर्श करें।
ऐं कीलकाय नमः,
सर्वाङ्ग । शरीर के सभी
अंगों का स्पर्श करें।
करन्यासः
ॐ श्रीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ऐं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ श्रीं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
हृदयादिन्यासः
ॐ श्रीं हृदयाय नमः ।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा ।
ॐ ऐं शिखायै वषट् ।
ॐ श्रीं कवचाय हुम् ।
ॐ ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ ऐं अस्त्राय फट्
दिग्बन्धः
'ॐ श्रीं ह्रीं ऐं'
इति दिग्बन्धः ।
ध्यानम्
हस्तद्वयेन कमले धारयन्तीं स्वलीलया
।
हारनूपुरसंयुक्तां लक्ष्मीं देवीं
विचिन्तये ॥
अपनी लीला के द्वारा दोनों हाथों
में कमल धारण करनेवाली, हार और पायल से
युक्त देवी लक्ष्मी का ध्यान करता हूँ।
इस प्रकार ध्यान कर मन ही मन उनकी पूजाकर
प्रार्थना करें।
इति ध्यात्वा मानसोपचारैः सम्पूज्य,
शंख-चक्र-गदाहस्ते शुभ्रवर्णे
सुवासिनि ।
मम देहि वरं लक्ष्मि !
सर्वसिद्धिप्रदायिनि ॥
शंख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाली शुभ्रवर्ण एवं सुगन्धि से युक्त हे लक्ष्मी,
आप सभी प्रकार की सिद्धि देने वाली हैं, मुझे
वर प्रदान करें।
इति सम्प्रार्थ्य,
'ॐ श्रीं ह्रीं ऐं
महालक्ष्म्यै कमल धारिण्यै सिंहवाहिन्यै स्वाहा'।
इति मन्त्रं जप्त्वा पुनः पूर्ववद्
हृदयादि - षडङ्गन्यासं कृत्वा स्तोत्रं पठेत्।
इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र का जप
करें 'ॐ श्रीं ह्रीं ऐं महालक्ष्म्यै कमलधारिण्यै सिंहवाहिन्यै स्वाहा' । पुनः हृदयादि षडङ्गन्यास करें।
श्रीलक्ष्मी हृदयं स्तोत्र
॥श्रीलक्ष्मी हृदय
स्तोत्रम्॥
वन्दे लक्ष्मीं परशिवमयीं
शुद्धजाम्बूनदाभां
तेजोरूपां कनकवसनां सर्वभूषोज्ज्वलाङ्गीम्।
बीजापूरं कनककलशं हेमपद्मं दधानाम्
।
आद्यां शक्तिं सकलजननीं
विष्णुवामाङ्कसंस्थाम् ॥ १ ॥
परम मङ्गलमयी,
शुद्ध सोने के समान कान्तिवाली, तेज: स्वरूपा,
सुनहले रंग का वस्त्र धारण करनेवाली, सभी
प्रकार के आभूषणों से चमकते हुए अंगों वाली, कमल और स्वर्ण
कलश धारण करनेवाली, सब की जननी, आद्या
शक्ति, विष्णु के वाम भाग में गोद में बैठनेवाली लक्ष्मी की
वंदना करता हूँ।
श्रीमत्सौभाग्य-जननीं
स्तौमि
लक्ष्मीं सनातनीम् ।
सर्वकाम-फलावाप्ति-
साधनैक-
सुखावहाम् ॥ २ ॥
सुन्दर भाग्य उत्पन्न करनेवाली,
अनादि काल से रहनेवाली, उस लक्ष्मी को प्रणाम
करता हूँ, जो सभी प्रकार की कामनाओं का फल पाने का एक मात्र
उपाय है और सुख देनेवाली हैं।
स्मरामि नित्यं देवेशि ! त्वया
प्रेरितमानसः ।
त्वदाज्ञां शिरसा धृत्वा भजामि
परमेश्वरीम् ॥३॥
हे देवों की भी देवी,
आपने ही हमें इस ओर प्रेरित किया, आप की ही
आज्ञा सर माथे पर रखकर हमेशा आपका स्मरण करता हूँ और परम देवी को भजता हूँ।
समस्त सम्पत्-सुखदां महाश्रियं
समस्त - सौभाग्यकरीं महाश्रियम् ।
समस्त - कल्याणकारी महाश्रियं
भजाम्यहं ज्ञानकारी महाश्रियम् ॥४॥
सभी प्रकार की सम्पत्ति और सुख
देनेवाली,
सभी प्रकार के सौभाग्य प्रदान करनेवाली, सभी
प्रकार का कल्याण करनेवाली तथा ज्ञान उत्पन्न करनेवाली महालक्ष्मी को मैं भजता हूँ
।
विज्ञानसम्पत्सुखदां सनातनीं
विचित्र वाग्भूतिकरीं मनोहराम् ।
अनन्त-सम्मोद-सुखप्रदायिनीं
नमाम्यहं भूतिकरीं हरिप्रियाम् ॥५॥
विज्ञान,
सम्पत्ति एवं सुख देनेवाली, वाणी सम्बन्धी
अद्भुत ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली, सनातनी, मन को लुभानेवाली, जिनके द्वारा दिये गये हर्ष और
सुख कभी नष्ट नहीं होते ऐसी ऐश्वर्य देनेवाली तथा विष्णु की प्रिया लक्ष्मी को
प्रणाम करता हूँ ।
समस्त भूतान्तर-संस्थिता
त्वं समस्त
भोक्त्रीश्वरि ! विश्वरूपे !।
तन्नास्ति यत्त्वद्वरिक्तवस्तु
त्वत्पादपद्मं प्रणमाम्यहं श्रीः ॥६॥
हे लक्ष्मी,
आप सभी प्राणियों के भीतर निवास करती हैं, सभी
प्रकार का भोग करनेवाली हैं, ईश्वरी हैं और समस्त जगत आपका
ही स्वरूप है। आपसे भिन्न कोई वस्तु इस संसार में नहीं है। हे लक्ष्मी, तुम्हारे चरण कमलों में प्रणाम करता हूँ ।
दारिद्र्य - दुःखौघ - तमोपहन्त्रि !
त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ।
दीनार्तिविच्छेदन हेतुभूतैः
कृपाकटाक्षैरभिषिञ्च मां श्रीः ॥ ७ ॥
दरिद्रता,
दुःखों के समूह और अन्धकार का नाश करनेवाली हे लक्ष्मी, अपना चरण-कमल मेरी ओर बढ़ावें। दीनता और दुःख को उखाड़ फेंकनेवाली अपनी
कृपा दृष्टि से मुझे नहलावें ।
अम्ब! प्रसीद करुणा-सुधयाऽऽर्द्रदृष्ट्या
मां त्वत्कृपाद्रविणगेहमिमं कुरुष्व ।
आलोकय प्रणतहृद्गतशोकहन्त्रि !
त्वत्पादपद्मयुगलं प्रणमाम्यहं श्रीः ॥ ८ ॥
हे माता,
अपनी करुणा रूपी अमृत धारा सी भीगी हुई नजर से मेरे ऊपर प्रसन्न
हों। इस घर को अपनी कृपा रूपी सम्पत्ति से भर दो और उसे चमका दो । विनती करने
वालों के हृदय में स्थित शोक को मार भगाने वाली हे लक्ष्मी आपके दोनों चरण-कमलों
को मैं प्रणाम करता हूँ।
शान्त्यै नमोऽस्तु शरणागतरक्षणाय
कान्त्यै नमोऽस्तु कमनीयगुणाश्रयायै ।
क्षान्त्यै नमोऽस्तु दुरितक्षयकारणायै
धात्र्यै नमोऽस्तु धनधान्यसमृद्धिदायै ॥ ९ ॥
शरण में आये हुए प्राणियों की रक्षा
करनेवाली शान्तिरूपिणी, सुन्दर गुणों का
आधारस्वरूपा कान्तिरूपिणी, पापों का नाश करनेवाली
शान्तिरूपिणी और धन, धान्य तथा समृद्धि देनेवाली पोषण
करनेवाली माता के रूप में लक्ष्मी को प्रणाम करता हूँ ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शशिशेखरसंस्तुतायै
रत्यै नमोऽस्तु रजनीकरसोदरायै ।
भक्त्यै नमोऽस्तु भवसागरतारिकायै
मत्यै
नमोऽस्तु मधुसूदनवल्लभायै ॥१०॥
भगवान् शिव भी जिनकी प्रशंसा करते
हैं ऐसी शक्ति को, चन्द्रमा की सोदर
बहन रति के स्वरूप में लक्ष्मी को संसार रूपी सागर को पार लगाने वाली भक्ति रूपा
लक्ष्मी को तथा भगवान् विष्णु की प्रिया के रूप में मति रूपा लक्ष्मी को प्रणाम है
।
लक्ष्म्यै नमोऽस्तु शुभलक्षणलक्षितायै
सिद्धयै नमोऽस्तु शिवसिद्धसुपूजितायै ।
धृत्यै नमोऽस्त्वमितदुर्गतिभञ्जनायै
गत्यै नमोऽस्तु वरसद्गतिदायिकायै ॥११॥
शुभ लक्षणों से पहचानी जानेवाली 'लक्ष्मी' को शिव और सिद्धों द्वारा पूजित 'सिद्धि' को असीम दुर्गति को नाश करनेवाली 'धृति' को और वर एवं उत्तम गति देनेवाली 'गति' को प्रणाम करता हूँ।
दैव्यै नमोऽस्तु दिवि देवगणार्चितायै
भूत्यै नमोऽस्तु भुवनार्तिविनाशानायै ।
दात्र्यै नमोऽस्तु धरणीधरवल्लभायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ १२ ॥
स्वर्ग में देवताओं द्वारा पूजित
देवी को प्रणाम। तीनों लोकों के दुःखों का विनाश करनेवाली
'भूति' देवी को प्रणाम । पृथ्वी का भार
उठानेवाली विष्णु की प्रिया दात्री देवी को प्रणाम । पुरुषोत्तम विष्णु की प्रिया 'पुष्टि' देवी को प्रणाम ।
सुतीव्र- दारिद्र्य-विदुःखहन्त्र्यै
नमोऽस्तु ते सर्वभयापहन्त्र्यै ।
श्रीविष्णु-वक्षःस्थल-संस्थितायै
नमो नमः सर्वविभूतिदायै ॥ १३ ॥
तीव्र दरिद्रता और विशेष प्रकार के
दुःखों तथा भय का नाश करनेवाली हे देवी आपको प्रणाम। श्रीविष्णु के वक्षःस्थल पर
अवस्थित रहनेवाली तथा सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली देवी को प्रणाम।
जयतु जयतु लक्ष्मीर्लक्षणालङ्कृताङ्गी
जयतु जयतु पद्मा पद्मसद्माभिवन्द्या ।
जयतु जयतु विद्या विष्णुवामाङ्कसंस्था
जयतु जयतु सम्यक् सर्वसम्पत्करी श्रीः ॥ १४ ॥
उत्तम चिह्न्नों से शोभित अंगों
वाली लक्ष्मी की जय हो। कमल में निवास करनेवाली तथा सबके द्वारा पूजित 'पद्मा' की जय हो। विष्णु की बायीं गोद में बैठनेवाली
विद्या की जय हो। सभी प्रकार की सम्पत्ति देनेवाली श्री की जय हो ।
जयतु जयतु देवी देवसङ्घाभिपूज्या
जयतु जयतु भद्रा भार्गवी भाग्यरूपा ।
जयतु जयतु नित्या निर्मलज्ञानवेद्या
जयतु जयतु सत्या सर्वभूतान्तरस्था ॥ १५ ॥
देवों के समूह से पूजित देवी की जय
हो। भृगु की पुत्री और भाग्य की देवी भद्रा की जय हो । निर्मल ज्ञान द्वारा पहचानी
जानेवाली देवी 'नित्या' की
जय हो और सभी प्राणियों की अन्तरात्मा में निवास करनेवाली देवी सत्या की जय हो ।
जयतु जयतु रम्या रत्नगर्भान्तरस्था
जयतु जयतु शुद्धा शुद्धजाम्बूनदाभा
।
जयतु जयतु कान्ता
कान्तिमद्धासिताङ्गी
जयतु जयतु कान्ता शीघ्रमागच्छ
सौम्ये ! ॥ १६ ॥
पृथ्वी के अन्दर रहनेवाली देवी 'रम्या' की जय हो। शुद्ध जाम्बूनद के समान कान्तिवाली
देवी 'शुद्धा' की जय हो। कान्तिमती और
चमत्कार भरे अंगों वाली देवी कान्ता की जय हो। हे सौम्य मूर्तिवाली शीघ्र मेरे पास
आवें।
यस्याः कलाद्याः कमलोद्धवाद्याः
रुद्राश्च शक्रप्रमुखाश्च देवाः ।
जीवन्ति सर्वा अपि शक्तयस्ताः
प्रभुत्वमाप्ताः परमायुषस्ते ॥ १७ ॥
जिसकी कृपा से कला आदि देवियाँ,
ब्रह्मा आदि देव, एकादश रुद्र एवं इन्द्र आदि
देवतागण और उनकी शक्तियाँ अस्तित्व में हैं, प्रभु कहलाते
हैं और परम आयु पाते हैं ।
लिलेख निटिले विधिर्मम लिपिं विसृज्यान्तरं
त्वया विलिखितव्यमेतदिति
तत्फलप्राप्तये ।
तदन्तरफले स्फुटं कमलवासिनि
श्रीरिमां
समर्पय समुद्रिकां
समलभाग्यसंसूचिकाम् ॥ १८ ॥
विधाता ने मेरे ललाट पर दूसरी ही
लिपि लिख दी है उसका फल पाने के लिए आपको लिखना है। हे कमल में निवास करनेवाली
इसके फल में समुद्र से उत्पन्न रत्न समूह जिससे मलिन भाग्य सूचित होता है उसका
त्याग करें।
कलया ये यथा देवी जीवन्ति सचराऽचराः
।
तथा सम्पत्करी लक्ष्मीः सर्वदा
सम्प्रसीद मे ॥ १९ ॥
हे देवी,
जिस प्रकार आपकी कला से स्थावर और जङ्गम प्राणी जीवित रहते हैं उसी
प्रकार सम्पत्ति प्रदान करनेवाली लक्ष्मी हमेशा मेरे ऊपर प्रसन्न हों ।
यथा विष्णुर्ध्रुवो नित्यं स्वकलां
सन्निवेशयत् ।
तथैव स्वकलां लक्ष्मि ! मयि सम्यक्
समर्पय ॥ २० ॥
जैसे अविचल विष्णु हमेशा अपनी कला
स्थापित करते हैं उसी प्रकार हे लक्ष्मी अपनी कला मुझमें अर्पित करें।
सर्वसौख्यप्रदे देवि ! भक्तानामभयप्रदे।
अचलां कुरु यत्नेन कलां मयि
निवेशिताम् ॥२१॥
सभी प्रकार का सुख देनेवाली,
भक्तों को अभय देनेवाली हे लक्ष्मी ! मुझमें स्थापित अपनी कला को
यत्नपूर्वक अटल रखें ।
मुदास्तां मद्भाले परमपदलक्ष्मीः
स्फुटकला
सदा वैकुण्ठश्रीर्निवसतु कला मे
नयनयोः ।
वसेत् सत्ये लोके मम वचसि
लक्ष्मीर्वरकला
श्रियः श्वेतद्वीपे निवसतु कला
मेऽस्तु करयोः ॥२२॥
मेरे ललाट पर परमपद स्वरूपा और खिली
हुई कलावाली लक्ष्मी प्रसन्नतापूर्वक निवास करें। मेरी आँखों में वैकुण्ठ की
लक्ष्मी निवास करें। सत्यलोक में रहनेवाली और वर प्रदान करनेवाली कला की लक्ष्मी
मेरी वाणी में वास करें और श्वेत द्वीप में रहने वाली लक्ष्मी की कला मेरे दोनों
हाथों में वास करे ।
तावन्नित्यं ममाङ्गेषु क्षीराब्धौ
श्रीकला वसेत् ।
सूर्याचन्द्रमसौ
यावद्यावल्लक्ष्मीपतिः श्रिया ॥ २३ ॥
क्षीर सागर में रहनेवाली लक्ष्मी की
कला मेरे सभी अंगों में तबतक निवास करे जबतक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे और जबतक
लक्ष्मी के साथ विष्णु रहेंगे ।
सर्वमङ्गलसम्पूर्णा सर्वैश्वर्य -
समन्विता ।
आद्यादिश्रीमहालक्ष्मीस्त्वत्कला
मयि तिष्ठतु ॥ २४ ॥
सभी प्रकार के मङ्गलों से परिपूर्ण,
सभी ऐश्वर्यों से युक्त आद्या आदि महालक्ष्मी, आपकी कला मुझमें वास करे।
अज्ञानतिमिरं हन्तुं
शुद्धज्ञानप्रकाशिका ।
सर्वैश्वर्यप्रदा मेऽस्तु त्वत्कला
मयि संस्थिता ॥ २५ ॥
अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने के
लिए शुद्ध ज्ञान को प्रकाशित करनेवाली, सभी
प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली आपकी कला मुझ में निवास करे ।
अलक्ष्मी हरतु क्षिप्रं तमः
सूर्यप्रभा यथा ।
वितनोतु मम श्रेयस्त्वत्कला मयि
संस्थिता ॥ २६ ॥
सूर्य का प्रकाश जिस प्रकार अन्धकार
को दूर भगाता है उसी प्रकार लक्ष्मी मेरी दरिद्रता को दूर करें। मेरी उन्नति करें।
हे लक्ष्मी आपकी कला मुझमें निवास करे ।
ऐश्वर्य –
मंगलोत्पत्तिस्त्वत्कलायां निधीयते ।
अहं तस्मात्कृतार्थोऽस्मि
पात्रमध्यस्थिते त्वयि ॥२७॥
ऐश्वर्य एवं मंगल आपकी कला में टिकी
हुई है जबतक आप इस पात्र में हैं तब तक मैं उससे कृतार्थ हूँ ।
भवदावेश- भाग्योऽहं भाग्यवानस्मि
भार्गव ।
त्वत्प्रसादात्पवित्रोऽहं
लोकमातर्नमोऽस्तु ते॥ २८ ॥
आपका आदेश ही मेरा सौभाग्य है। हे
भृगु पुत्री इस प्रकार से मैं भाग्यवान् हूँ। आपकी कृपा से मैं पवित्र हूँ,
हे तीनों लोको की माता, आपको प्रणाम ।
पुनासि मां त्वं कलयैव यस्मादतः
समागच्छ ममाऽग्रतस्त्वम् ।
परं पदं श्रीर्भव सुप्रसन्ना
मय्यच्युतेन प्रविशादिलक्ष्मीः ॥२९॥
हे आदि लक्ष्मी,
चूँकि अपनी कला से आप मुझे पवित्र करती हैं अतः आप मेरे सामने आयें।
हे लक्ष्मी, मेरे ऊपर प्रसन्न हों और भगवान् विष्णु के साथ
मेरे पास आयें ।
श्रीवैकुण्ठस्थिते लक्ष्मीः समागच्छ
ममाऽग्रतः ।
नारायणेन सह मां कृपादृष्ट्या
विलोकय ॥ ३० ॥
नारायण के साथ श्री वैकुण्ठ में
रहनेवाली लक्ष्मी मुझे दर्शन दें और मेरे ऊपर अपनी कृपा-दृष्टि डालें ।
सत्यलोकस्थिते लक्ष्मीस्त्वं
ममाऽऽगच्छ सन्निधिम् ।
वासुदेवेन सहिता प्रसीद वरदा भव ॥३१॥
वासुदेव के साथ सत्यलोक में
रहनेवाली लक्ष्मी आप मुझे दर्शन दें, मेरे
ऊपर प्रसन्न हों और वरदान दें।
श्वेतद्वीपस्थिते लक्ष्मीः
शीघ्रमागच्छ सुव्रते।
विष्णुना सहिते देवि ! जगन्मातः
प्रसीद मे ॥३२॥
हे सुव्रते,
हे विष्णु के साथ श्वेतद्वीप में रहनेवाली लक्ष्मी, हे संसार की माता, आप प्रसन्न हों ।
क्षीराम्बुधिस्थिते लक्ष्मीः
समागच्छ स-माधवे ।
त्वत्कृपादृष्टिसुधया सततं मां
विलोकय ॥ ३३ ॥
हे क्षीर सागर में निवास करनेवाली
पवित्र लक्ष्मी, आप आयें और अपनी कृपा पूर्ण
अमृत दृष्टि से मुझे हमेशा देखें।
रत्नगर्भस्थिते लक्ष्मि !
परिपूर्णहिरण्मयि ।
समागच्छ समागच्छ स्थित्वाऽऽशु पुरतो
मम ॥३४॥
हे रत्नों से भरे सागर में रहनेवाली
लक्ष्मी,
हे अलंकारों से अलंकृत लक्ष्मी, आप शीघ्र आयें, शीघ्र आयें और आकर अपना पवित्र दर्शन दें ।
स्थिरा भव महालक्ष्मीर्निश्चला भव
निर्मले ।
प्रसन्ने कमले देवि! प्रसन्नहृदया
भव ॥ ३५ ॥
हे पवित्र लक्ष्मी,
आप मेरे पास आकर बहुत काल तक स्थिर और निश्चल रहें । हे सदा प्रसन्न
रहनेवाली लक्ष्मी, आप मेरे ऊपर भी प्रसन्न हृदय वाली हो
जायें।
श्रीधरे ! श्रीमहाभूते !
त्वदन्तःस्थं महानिधिम् ।
शीघ्रमुद्धृत्य पुरतः प्रदर्शय
समर्पय ॥ ३६ ॥
हे शोभामयी,
हे महाभूते, आप में सारी निधियाँ भरी हैं। उन
निधियों को आप शीघ्र निकाल कर मुझे दिखायें और मुझे प्रदान करें।
वसुन्धरे ! श्रीवसुधे ! वसुदोग्धि !
कृपां मयि ।
त्वत्कुक्षिगतसर्वस्वं शीघ्रं मे
सम्प्रदर्शय ॥ ३७ ॥
हे वसुओं को धारण करनेवाली वसुन्धरे,
हे श्री वसुधे, हे वसुओं को देने वाली वसु
दोग्घ्रि, अपनी कृपा मुझे प्रदान करें। अपने गर्भगत समस्त
रमणीय निधियां मुझे शीघ्र दिखायें ।
विष्णुप्रिये ! रत्नगर्भे !
समस्तफलदे ! शिवे ।
त्वद्गर्भगतहेमादीन् सम्प्रदर्शय
दर्शय ॥ ३८ ॥
हे विष्णुप्रिये,
हे रत्नगर्भे, हे सभी फलों को देनेवाली,
हे कल्याणी, अपने गर्भ गत समस्त स्वर्णदिकों
को भलीभाँति मुझे दिखायें, अवश्य दिखायें ।
रसातलगते लक्ष्मीः शीघ्रमागच्छ मे
पुरः ।
न जाने परमं रूपं मातमें
सम्प्रदर्शय ॥ ३९ ॥
हे पातालवासिनी लक्ष्मी,
आप शीघ्र मेरे आगे आयें। हे माता मैं आपके परम रूप को नहीं जानता
हूँ, उसे दिखायें।
आविर्भव मनोवेगाच्छीघ्रमागच्छ मे
पुरः ।
मां वत्स ! भैरहेत्युक्त्वा कामं
गौरिव रक्ष माम् ॥४०॥
बहुत जल्द ( मन के समान वेग से) आप
प्रकट हों और मेरे आगे आयें। गौ जैसे अपने बछड़े की रक्षा करती है,
उसी तरह तुम नहीं डरो" ऐसा कहकर आप भी मेरी भरपूर रक्षा करें।
देवि ! शीघ्रं समागच्छ
धरणीगर्भसंस्थिते ।
मातस्त्वद्भृत्यभृत्योऽहं मृगये
त्वां कुतूहलात् ॥ ४१ ॥
हे पाताल वासिनी देवी,
शीघ्र आयें। आपके दासों में मैं भी एक दास हूँ। बड़ी कुतूहलता से
मैं आपको खोज रहा हूँ।
उत्तिष्ठ जागृहि त्वं मे समुत्तिष्ठ
सुजागृहि ।
अक्ष्यान् हेमकलशान् सुवर्णेन
सुपूरितान् ॥ ४२ ॥
निक्षेपानमे समाकृष्य समुद्धृत्य
ममाऽग्रतः ।
समुन्नतानना भूत्वा समाधेहि
धरान्तरात् ॥४३॥
आप जाग जायें माता और मेरी भी
तन्द्रा दूर करे दें सोने से भरे हुए बड़े-बड़े स्वर्ण कलश पृथ्वी के गर्भ से लाकर
मेरे आगे रख दें। मैं आपसे बड़े विनीत भाव में प्रार्थना करता हूँ।
मत्सन्निधिं समागच्छ
मदाहितकृपारसात्।
प्रसीद श्रेयसां दोग्धि !
लक्ष्मीर्मे नयनाग्रतः ॥ ४४ ॥
आप मेरे लिए कृपामयी होकर मेरे निकट
आयें। हे कल्याण दायिनी देवी, लक्ष्मी,
प्रसन्न हों और मेरी आँखों को तृप्त करें ।
अत्रोपविश लक्ष्मीस्त्वं स्थिरा भव
हिरण्मयि ।
सुस्थिरा भव सम्प्रीत्या प्रसीद
वरदा भव ॥४५ ॥
हे शोभामयी लक्ष्मी,
आप यहाँ आकर स्थिर होकर बैठें, प्रेम पूर्वक
यहाँ टिकी रहें और प्रसन्न होकर वरदान दें।
आनीय त्वं तथा देवि ! निधीन्मे
सम्प्रदर्शय ।
अद्य क्षणेन सहसा दत्वा संरक्ष मां
सदा ॥ ४६ ॥
हे देवी,
आप अपना भण्डार लाकर मुझे दिखायें और इस क्षण ही अपना संरक्षण मुझे
प्रदान करें।
मयि तिष्ठ तथा नित्यं यथेन्द्रादिषु
तिष्ठसि ।
अभयं कुरु मे देवि ! महालक्ष्मीर्नमोऽस्तु
ते ॥ ४७ ॥
आप इन्द्रादिकों के यहाँ जैसे स्थिर
भाव से रहतीं हैं मेरे पास भी उसी भाव से रहें। हे देवी,
आप मुझे अभय कर दें। हे महालक्ष्मी, आपको
प्रणाम है ।
समागच्छ महालक्ष्मीः
शुद्धजाम्बूनदप्रभे ।
प्रसीद पुरतः स्थित्वा प्रणतं मां
विलोकय ॥ ४८ ॥
हे सोने के समान कान्ति वाली
लक्ष्मी आयें, आप प्रसन्न हों और मुझ विनीत पर
कृपा दृष्टि डालें।
लक्ष्मीर्भुवं गता भासि यत्र यत्र
हिरण्मयी ।
तत्र तत्र स्थिता त्वं मे तव रूपं
प्रदर्शय ॥ ४९ ॥
हे लक्ष्मी,
पृथ्वी के गर्भ में जहाँ-जहाँ सुवर्ण पड़े हैं, वहाँ-वहाँ ठहर कर आप मुझे उसे दिखायें ।
क्रीडसे बहुधा भूमौ परिपूर्णा
हिरण्मयी ।
मम मूर्धनि ते हस्तमविलम्बितमर्पय ॥
५० ॥
हे शोभा शालिनी,
आपसे परिपूर्ण व्यक्ति पृथ्वी पर अनेक प्रकार से सदा खेलते रहते
हैं। हे माता, मेरे माथे पर भी आप अपना वही हाथ शीघ्र रखें ।
फलभाग्योदये लक्ष्मीः समस्त
पुरवासिनि !
प्रसीद मे महालक्ष्मीः
परिपूर्णमनोरथे ! ॥५१ ॥
सुन्दर फल देनेवाली,
भाग्य का उदय करनेवाली और सर्वत्र व्याप्त महालक्ष्मी, मेरे ऊपर प्रसन्न हों और मनोरथ को पूर्ण करें ।
अयोध्यादिषु सर्वेषु नगरेषु
समास्थिते ।
वैभवैर्विविधैर्युक्ता समागच्छ
बलान्विते ॥ ५२ ॥
अयोध्या आदि सभी नगरों में वास
करनेवाली देवी, अनेक विभवों से युक्त अत्यन्त
बलवती लक्ष्मी आयें ।
समागच्छ समागच्छ ममाऽग्रे भव
सुस्थिरा ।
करुणारस - निष्यन्द - नेत्रद्वय
विलासिनि ॥ ५३ ॥
जिसकी सुन्दर दोनों आँखों से करुणा
की धारा हमेशा बहती रहती है, ऐसी देवी,
आयें, आयें और आकर मेरे आगे अचल हो ठहरें ।
संविधत्स्व महालक्ष्मीस्त्वत्पाणिं
मम मस्तके ।
करुणासुधा मां त्वमभिषिञ्च
स्थिरीकुरु ॥५४॥
हे महालक्ष्मी,
आप अपने हाथ मेरे मस्तक पर रखें और अपने करुणामृत से सिञ्चित कर
स्थिरता प्रदान करें।
सर्वराजगृहे लक्ष्मीः समागच्छ
मुदान्विते ।
स्थित्वाऽऽशु पुरतो मेऽद्य
प्रसादेनाऽभयं कुरु ॥ ५५ ॥
हे सभी राजाओं के घर में विराजमान
प्रसन्न लक्ष्मी आयें, शीघ्र आकर आगे
ठहरें और अपने आशीर्वाद से मुझे अभय करें ।
सादरं मस्तके हस्तं मम त्वं
कृपयाऽर्पय ।
सर्वराजगृहे लक्ष्मीस्त्वत्कला मयि
तिष्ठतु ॥ ५६ ॥
कृपा पूर्वक अपने पूजनीय हाथ मेरे
मस्तक पर रखें। हे सभी राजाओं के घर में विराजमान लक्ष्मी,
आपकी कला मुझमें प्रतिस्थापित हो ।
आद्यादि-श्रीमहालक्ष्मीर्विष्णुवामाङ्कसंस्थिते!।
प्रत्यक्षं कुरु से रूपं रक्ष मां
शरणागतम् ॥५७॥
हे विष्णु की वामाङ्गिनी आद्या आदि
नामों से ख्यात महालक्ष्मी, मुझ शरण में आये
हुए को अपना रूप दिखायें।
प्रसीद मे महालक्ष्मी: सुप्रसीद
महाशिवे ! ।
अचला भव सम्प्रीत्या सुस्थिरा भव
मद्गृहे ॥ ५८ ॥
हे महालक्ष्मी,
हे महाशिवे, आप प्रसन्न हों, प्रसन्न हों। मेरे ऊपर आपकी प्रीति अचल रहे और आप मेरे घर में स्थिर हो
वास करें।
यावत्तिष्ठन्ति वेदाश्च
यावत्त्वन्नाम तिष्ठति ।
यावद्विष्णुश्च यावत्त्वं तावत्कुरु
कृपां मयि ॥ ५९ ॥
जबतक वेद हैं,
जबतक आपका नाम है, जबतक विष्णु हैं और जबतक आप
हैं। हे माता,तबतक आप मेरे ऊपर कृपा करें।
चान्द्री कला यथा शुक्ले वर्धते सा
दिने दिने ।
तथा दया ते मय्येव
वर्धतामभिवर्धताम् ॥६०॥
शुक्ल पक्ष की रात्री में चन्द्रमा
की कला जैसे दिन प्रतिदिन बढ़ती रहती है, उसी
तरह से आप की दया भी मेरे ऊपर क्रमशः बढ़ती रहे।
यथा वैकुण्ठनगरे यथा वै क्षीरसागरे
।
यथा मद्भवने तिष्ठ स्थिरं
श्रीविष्णुना सह ॥ ६१ ॥
जैसे वैकुण्ठ नगर में और जैसे क्षीर
सागर में विष्णु के साथ आप विराजमान हैं, मेरे
घर में भी आप उसी तरह स्थिर हो विराजमान रहें ।
योगिनां हृदये नित्यं यथा तिष्ठसि
विष्णुना ।
तथा मद्धवने तिष्ठ स्थिरं
श्रीविष्णुना सह ॥ ६२ ॥
योगियों के हृदय में आप जैसे विष्णु
के साथ विराजमान हैं, मेरे भवन में भी आप
उसी तरह विष्णु के साथ स्थिर हो विराजमान रहें ।
नारायणस्य हृदये भवती यथाऽऽस्ते
नारायणोऽपि तव हृत्कमले यथाऽऽस्ते ।
नारायणस्त्वमपि नित्यमुभौ तथैव
तौ तिष्ठतां हृदि ममाऽपि दयावति
श्रीः ॥ ६३ ॥
आप जैसे नारायण के हृदय में
विराजमान हैं, आपके हृदय कमल में भी नारायण
उसी तरह शोभायमान हैं। हे दयावती लक्ष्मी, उसी तरह आप दोनों
मेरे हृदय में वास करें।
विज्ञानवृद्धिं हृदये कुरु श्रीः
सौभाग्यवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः ।
दयासु वृद्धिं कुरुतां मयि श्रीः
सुवर्णवृद्धि कुरु मे गृहे श्रीः ॥ ६४ ॥
हे लक्ष्मी,
मेरे हृदय में आप विज्ञान और दया की वृद्धि करें। घर में सौभाग्य और
सुवर्णादि की वृद्धि करें ।
न मां त्यजेथाः श्रितकल्पवल्लि
सद्धक्तचिन्तामणि- कामधेनो ।
विश्वस्य मातर्भव सुप्रसन्ना
गृहे
कलत्रेषु च पुत्रवर्गे ॥ ६५ ॥
हे माँ (लक्ष्मी) मैं आपका आश्रित
हूँ,
आपकी कल्पलता का सहारा है मुझे। मुझे मत छोड़ो माँ हे माँ, आप सद्भक्त की चिन्ता को दूर करने के लिए चिन्तामणि के समान हैं, आप मनोवांछित फलों को देनेवाली कामधेनु हैं। हे संसार की माता, आप मेरे घर के पुत्र वर्ग और पत्नी पर प्रसन्न हो।
आद्यादिमाये! त्वमजाण्डबीजं
त्वमेव
साकारनिराकृतिस्त्वम् ।
त्वया धृताश्चाऽब्जभवाण्डसङ्घाश्चित्रं
चरित्रं तव देवि ! विष्णोः ॥ ६६ ॥
हे पुरातनों में पुरातन माये आप ही
अण्डज - पिण्डजादि रूप हैं। आप ही साकार और निराकार हैं। हे माते,
आपने संसार के सारे जीवों को धारण कर रखा है। हे देवि, आपका चरित्र बड़ा ही विचित्र है।
ब्रह्मरुद्रादयो देवा वेदाश्चापि न
शक्नुयुः ।
महिमानं तव स्तोतुं मन्दोऽहं
शक्नुयां कथम् ॥६७॥
हे देवि,
ब्रह्मा, विष्णु, महेश
एवं चारो वेद भी आपकी महिमा का गान नहीं कर सके, फिर मुझ
मन्द बुद्धि की क्या विसात आपकी महिमा गा सकूँ।
अम्ब! त्वद्वत्सवाक्यानि
सूक्ताऽसूक्तानि यानि च ।
तानि स्वीकुरु सर्वज्ञे दयालुत्वेन
सादरम् ॥६८॥
हे माते,
हे सर्वज्ञे, आप पुत्र के सारे भले-बुरे (साधु
- असाधु) वचनों को दयालु भाव से सादर स्वीकार करें ।
भवतीं शरणं गत्वा कृतार्थाः स्युः
पुरातनाः ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा त्वामहं शरणं
व्रजे ॥ ६९ ॥
हे माते,
आपकी शरण में जाकर मेरे सारे पूर्वज धन्य-धन्य हो गये। मन में यही
सोचकर मैं भी आपकी शरण में आया हूँ।
अनन्ता
नित्यसुखिनस्त्वद्भक्तास्त्वत्परायणाः ।
इति वेदप्रमाणाद्धि देवि ! त्वां
शरणं व्रजे ॥ ७० ॥
हे माते,
आप में अनुरक्त अनन्त भक्त नित्य आपकी शरण में जाकर सुखी हो गये,
ऐसा वेदों में प्रमाण है। हे देवि मैं भी इसी कारण आपकी शरण में आया
हूँ ।
तव प्रतिज्ञा मद्भक्ता न
नश्यन्त्विति वै क्वचित् ।
इति सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य
प्राणान्संधारयाम्यहम् ॥ ७१ ॥
(हे माता) आपकी प्रतिज्ञा है कि
मेरे भक्त कभी विनाश को प्राप्त नहीं करते, यही सोंच सोंच मैं
जीवित हूँ ।
त्वदधीनस्त्वहं मातस्त्वत्कृपा मयि
विद्यते ।
यावत् सम्पूर्णकामः स्यां तावद्देहि
दयानिधे ! ॥७२॥
हे दयानिधि माते,
मैं आपके अधीन हूँ। मेरे सारे मनोरथ जब तक पूर्ण नहीं हो जाये,
आपकी कृपा मुझ पर बनी रहे।
क्षणमात्रं न सक्नोमि जीवितुं
त्वत्कृपां विना ।
न जीवन्तीह जलजा जलं त्यक्त्वा
जलग्रहाः ॥७३॥
जैसे जल में रहनेवाले सारे जलज जल
को छोड़कर इस संसार में जीवित नहीं रह सकते, उसी
तरह हे माते मैं भी आपकी कृपा के बिना क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकता ।
यथा हि पुत्रवात्सल्याज्जननी
प्रस्तुतस्तनी ।
वत्सं त्वरितमागत्य संप्रीणयति
वत्सला ॥७४॥
जैसे पुत्र वत्सला माता अपने पुत्र
के लिए सदा छाती (स्तन) प्रस्तुत रखती है; उसी
तरह है। वत्सला माता, आप भी आयें और अपने इस पुत्र के लिए
अपना प्रेम उड़ेल दें।
यदि स्यां तव पुत्रोऽहं माता त्वं
यदि मामकी ।
दयापयोधरस्तन्य- सुधाभिरभिषिञ्च माम्
॥७५॥
यदि मैं आपका पुत्र हूँ और आप मेरी
माता हैं,
तो हे माता, अपनी छाती के ( स्तन के ) दया रूप
दुग्धामृत से मुझे नहला दें ।
मृग्यो न गुणलेशोऽपि मयि
दोषैकमन्दिरे ।
पांसूनां वृष्टिविन्दूनां दोषाणां च
न मे मितिः ॥ ७६ ॥
मैं दोष का मन्दिर हूँ। गुण का लेश
भर भी खोजने पर मुझे में नहीं मिलेगा और उन दोषों को दूर करने के लिए पवित्र वर्षा
के एक जल विन्दु के समान भी मेरी मति नहीं है ।
पापिनामहमेवाग्रयो दयालूनां
त्वमग्रणीः ।
दयनीयो मदन्योऽस्ति त्व कोऽत्र
जगत्त्रये ॥ ७७ ॥
पापियों में मैं अग्रणी हूँ और आप
दयालुओं में अग्रणी हैं। इस समय तीनों लोकों में मेरे सिवा आपके लिए और कौन दया का
पात्र है ।
विधिनाऽहं न सृष्टश्चेन्न स्यात्तव
दयालुता ।
आमयो वा न सृष्टश्चेदौषधस्य वृथोदयः
॥ ७८ ॥
ब्रह्मा यदि मुझे बनाया न होता तो
आपकी दयालुता किस पर होती । ठीक उसी तरह, जैसे
रोग नहीं होते तो औषधियों का क्या होता है?
कृपा मदग्रजा किं ते अहं किं वा
तदग्रजः ।
विचार्य देहि मे वित्तं तव देवि !
दयानिधे ! ॥ ७९ ॥
क्या कृपा मेरी अग्रजा है या मैं
कृपा का अग्रज हूँ। ऐसा विचार कर हे माता, हे
दया निधि, मुझे धन-धान्य से भर दें ।
माता पिता त्वं गुरु-सद्गतिः
श्रीः
त्वमेव संजीवनहेतुभूता ।
अन्यन्न मन्ये जगदेकनाथे!
त्वमेव
सर्वं मम देवि ! सत्ये ॥ ८० ॥
संसार की एक मात्र स्वामिनी,
तुम्हीं माता, पिता, गुरु
और उत्तम गति हो; तुम्हीं हमारे जीवन का कारण हो मैं दूसरे
को कुछ भी नहीं मानता हूँ। हे सत्या देवी, तुम्ही मेरी सब
कुछ हो ।
आद्यादिलक्ष्मीर्भव सुप्रसन्ना
विशुद्ध-विज्ञान- सुखैकदोग्ध्री ।
अज्ञानहन्त्री त्रिगुणातिरिक्ता
प्रज्ञाननेत्रा
भव सुप्रसन्ना ॥ ८१ ॥
हे आद्या आदि लक्ष्मी,
मेरे ऊपर प्रसन्न हो । विशुद्ध ज्ञान और सुख रूपी दूध देने वाली गाय
के समान देवी, अज्ञान का नाश करनेवाली, सत्त्व, रज और तमोगुण इन तीनों से परे तथा उत्कृष्ट ज्ञान
रूपी नेत्रोंवाली, मेरे ऊपर प्रसन्न हों ।
अशेष- वाग्जाड्य-मलापहन्त्री
नवं
नवं स्पष्टसुवाक्प्रदायिनी ।
ममेह जिह्वाग्र- सुरङ्ग-नर्तकी
भव
प्रसन्ना वदने च मे श्रीः ॥ ८२ ॥
वाणी सम्बन्धी सभी प्रकार की जड़ता
तथा दोषों का नाश करनेवाली, नवीन और स्पष्ट
वाणी प्रदान करनेवाली, मेरी जिह्वा के अग्रभाग रूपी सुन्दर
रंगमञ्च पर नृत्य करनेवाली वास करें।
समस्तसम्पत्सु विराजमाना
समस्ततेजश्च विभासमाना।
विष्णुप्रिये ! त्वं भव दीप्यमाना
वाग्देवता मे वदने प्रसन्ना ॥८३॥
हे वाणी की देवी,
सभी सम्पत्तियों में तुम्हीं विराजमान रहती हो, सभी ज्योतियों में तुम्हीं तो चमकती हो, हे विष्णु
की प्रिया, खूब चमको और मेरे मुख पर प्रसन्न होओ ।
सर्वार्थदा सर्वजगत्प्रसूतिः
सर्वेश्वरी सर्वभयापहन्त्री ।
सर्वोन्नता त्वं सुमुखी भव
श्रीहिरण्मयी मे नयने प्रसन्ना ॥ ८४ ॥
सभी प्रकार के प्रयोजनों का फल
देनेवाली,
सभी प्राणियों की माता, सबकी स्वामिनी, सभी प्रकार के भय का नाश करने वाली, सबसे ऊपर
रहनेवाली, सुन्दर मुखवाली स्वर्णमयी लक्ष्मी मेरी आँखों पर
प्रसन्न हों।
सर्वप्रदर्शे सकलार्थदे त्वं
प्रभासु लावण्यदयाप्रदोग्ध्री ।
सुवर्णदे त्वं सुमुखी भव
श्रीर्हिरण्मयी
मे नयने प्रसन्ना ॥ ८५ ॥
सब कुछ दिखाने वाली,
सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली, ज्योति में
लावण्य और दया का संचार करने वाली, सुवर्ण देनेवाली, सुन्दर मुखवाली हे देवी स्वर्ण मयी लक्ष्मी, मेरी
आँखों पर प्रसन्न हों ।
समस्त-विघ्नौघ-विनाश-कारिणी
समस्तभक्तोद्धरणे विचक्षणा ।
अनन्त-सौभाग्य-सुखप्रदायिनी
हिरण्मयी
मे नयने प्रसन्ना ॥८६॥
सभी प्रकार की बाधाओं के समूह का
नाश करनेवाली सभी भक्तों का उद्धार करने में कुशल, अनन्त सौभाग्य का सुख देने वाली, स्वर्णमयी लक्ष्मी,
मेरे ऊपर प्रसन्न हों ।
देवि ! प्रसीद दयनीयतमाय मह्यं
देवाधिनाथ - भवदेव-गणाभिवन्द्ये ।
मातस्तथैव भव सन्निहिता दृशोर्मे
प्रीत्या समं मम मुखे भव सुप्रसन्ना ॥८७॥
हे देवी,
मैं सबसे अधिक दयनीय हूँ, मेरे ऊपर प्रसन्न
हों। देवों के स्वामी भगवान् शिव की वन्दनीया हे माता, उसी
प्रकार आप मेरी आँखों के निकट प्रेम पूर्वक वास करें और मेरे मुख पर प्रसन्न हों।
मां वत्स भैरभयदानकरोऽर्पितस्ते
मौलौ ममेति मयि दीनदयानुकम्पे ।
मातः ! समर्पय मुदा करुणाकटाक्षं
माङ्गल्यबीजमिह नः सृज जन्म मातः ॥
८८ ॥
'हे वत्स ! डरो मत' इस भाव से अभय प्रदान करने वाला हाथ मेरे मस्तक पर हो। दीन-दु:खियों पर
दया करनेवाली हे मातः आप प्रसन्न होकर मुझ पर करुणा भरी आँखों से तिरछी नजर डालें।
और हम सब के मंगल के लिए बीज डालें ।
कटाक्ष इह कामधुक् तव मनस्तु
चिन्तामणिः
करः सुरतरुः सदा
नवनिधिस्त्वमेवेन्दिरे ।
भवेत्तव दयारसो मम रसायनं चाऽन्वहं
मुखं तव
कलानिधिर्विविधवाञ्छितार्थप्रदम् ॥ ८९ ॥
हे माता,
आपकी तिरछी नजर से सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती है; आपका मन सभी प्रकार की चिन्ता को दूर करने वाली मणि है। आपका हाथ
कल्पवृक्ष के समान सब कुछ देनेवाला है। हे लक्ष्मी, आप स्वयं
नौ सिद्धियाँ हैं। आपकी दया का मेरे लिए जीवनदायक रसायन है। आपका मुख सभी कलाओं का
सागर है, जिससे अनेक प्रकार की कामनाएँ पूर्ण हो जाती है ।
यथा रसस्पर्शनतोऽयसोऽपि
सुवर्णता
स्यात् कमले तथा ते ।
कटाक्ष संस्पर्शनतो जनानाम-
मङ्गलानामपि मंगलत्वम् ॥ ९० ॥
हे लक्ष्मी,
जैसे रसायन के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है, उसी प्रकार तुम्हारी तिरछी नजर पड़ते ही लोगों का अमंगल भी मंगल बन जाता
है ।
देहाति नास्तीति वचः प्रवेशाद्
भीतो
रमे! त्वां शरणं प्रपद्ये ।
अतः सदाऽस्मिन्नभयप्रदा त्वं
सहैव
पत्या मयि सन्निधेहि ॥ ९१ ॥
हे लक्ष्मी,
'इस शरीर के आगे कुछ भी नहीं है' इस अज्ञानमयी
वाणी सुनने के कारण मैं भयभीत होकर आपकी शरण में आया हूँ अतः हमेशा अभय प्रदान
करनेवाली लक्ष्मी आप अपने पति के साथ मुझमें वास करें।
कल्पद्रुमेण मणिना सहिता सुरम्या
श्रीस्ते कला मयि रसेन रसायनेन ।
आस्तां यतो मम च दृशिरपाणिपाद-
स्पृष्टाः सुवर्णवपुषः स्थिरजङ्गमाः
स्युः ॥९२॥
हे देवी! कल्प वृक्ष,
मणि, रस एवं रसायन के साथ आपकी सुन्दर कला
मुझमें वास करे जिससे मेरी दृष्टि, सिर, हाथ और पैर के भी स्पर्श से इस संसार के स्थावर और जंगम सोने के समान बन
जाएँ ।
आद्यादि-विष्णोः स्थिरधर्मपत्नी
त्वमेव पत्या मयि सन्निधेहि ।
आद्यादि-लक्ष्मि ! त्वदनुग्रहेण
पदे पदे मे निधिदर्शनं स्यात् ॥ ९३ ॥
आद्य आदि विष्णु की सदा पत्नी बनी
रहनेवाली,
तुम ही अपने पति के साथ मुझमें वास करो । हे आद्या आदि लक्ष्मी,
आपकी कृपा से कदम कदम पर मुझे खजाने दीख जायें ।
आद्यादि - लक्ष्मीहृदयं पठेद्
यः स
राज्यलक्ष्मीरचलां तनोति ।
महादरिद्रोऽपि भवेद्धनाढ्यस्तदन्वये
श्रीः स्थिरतां प्रयाति ॥ ९४ ॥
आद्या आदि लक्ष्मी के हृदय स्तोत्र
का जो पाठ करते हैं उनकी स्थिर राज्यलक्ष्मी बढ़ती है। अत्यन्त निर्धन व्यक्ति भी
महान् धनी हो जाता है और उसके वंश में लक्ष्मी स्थिर होकर वास करती है।
यस्य स्मरणमात्रेण तुष्टा
स्याद्विष्णुवल्लभा ।
तस्याऽभीष्टं ददात्याशु तं पालयति
पुत्रवत् ॥ ९५ ॥
केवल स्मरण करने से जिस व्यक्ति पर
लक्ष्मी सन्तुष्ट हो जाती है उसकी कामना वह शीघ्र पूर्ण करती है और पुत्र के समान
उसका पालन करती है ।
इदं रहस्यं हृदयं सर्वकामफलप्रदम् ।
जपः पञ्चसहस्रं तु पुरश्चरणमुच्यते
॥ ९६ ॥
सभी मनोवांछित फलों को देने वालों
यह लक्ष्मी हृदय रहस्य है। इसका पाँच हजार बार जप पुरश्चरण कहलाता है।
त्रिकालमेककालं वा नरो
भक्तिसमन्वितः ।
यः पठेच्छृणुयाद्वाऽपि याति परमां
श्रियम् ॥ ९७॥
तीन बार या एक बार जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक
इसका पाठ करे या सुने उसे उत्तम लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।
महालक्ष्मीं समुद्दिश्य निशि
भार्गववासरे।
इहं श्रीहृदयं जप्त्वा पञ्चवारं धनी
भवेत् ॥ ९८ ॥
महालक्ष्मी के निमित्त शुक्रवार की
रात में इस लक्ष्मीहृदय का पाँच बार पाठ करने से वह धनवान् होता है ।
अनेन हृदयेनाऽन्नं गर्भिण्या
अभिमन्त्रिम् ।
ददाति तत्कुले पुत्रो जायते
श्रीपतिः स्वयम् ॥९९॥
गर्भवती को इस लक्ष्मीहृदय से
अभिमन्त्रित अन्न खिलाने पर कुल में पुत्र उत्पन्न होता है और वह स्वयं धनवान् हो
जाता है ।
नरेण वाऽथवा नार्या लक्ष्मीहृदयमन्त्रिते
।
जले पीते च तद्वंशे मन्दभाग्यो न
जायते ॥ १०० ॥
पुरुष अथवा नारी इस लक्ष्मीहृदय से
अभिमन्त्रित जल का पान करे तो उसके वंश में कोई व्यक्ति अभागा नहीं रहता है।
य आश्विने मासि च शुक्लपक्षे
रमोत्सवे सन्निहितैकभक्त्या ।
पठेत्तथैकोत्तरवारवृद्ध्या लभेत्
स
सौवर्णमयीं सुवृष्टिम् ॥ १०१ ॥
जो आश्विन मास के शुक्लपक्ष की
पूर्णिमा के दिन लक्ष्मी उत्सव में एकाग्र भक्ति पूर्वक एक बार पढ़े और एक सप्ताह
तक एक एक पाठ बढा कर करे उसके घर सोने की वर्षा होती है।
य एकभक्तोऽन्वहमेकवर्षे
विशुद्धधीः
सप्ततिवारजापी ।
स मन्दभाग्योऽपि रमाकटाक्षाद्
भवेत्
सहस्राक्ष-शताधिक-श्रीः ॥ १०२ ॥
जो लक्ष्मी में एकाग्र भक्ति के साथ
एक वर्ष तक शुद्ध भाव से सत्तर वार प्रतिदिन इसका पाठ करे वह अभागा भी लक्ष्मी की
एक नजर से इन्द्र से भी अधिक सम्पत्ति का स्वामी बन जाता है ।
श्रीशांघ्रिभक्तिं हरिदासदास्यं
प्रपन्नमन्त्रार्थ - दृढैकनिष्ठाम् ।
गुरो: स्मृतिं निर्मलबोधबुद्धिं
प्रदेहि मातः परमं पदं श्रीः ॥ १०३ ॥
हे माता,
भगवान् विष्णु में भक्ति, विष्णु के दासों की
दासता, मन्त्र के अर्थ की प्राप्ति, अटूट
आस्था, गुरु की स्मृति तथा निर्मल बुद्धि मुझे प्रदान करें
तथा मुझे परम पद की प्राप्ति भी हो ।
पृथ्वीपतित्वं पुरुषोत्तमत्वं
विभूतिवासं विविधार्थसिद्धिम् ।
सम्पूर्णकीर्ति बहुवर्षभोगं प्रदेहि
मे देवि ! पुनः पुनस्त्वम् ॥ १०४ ॥
हे माता,
मुझे भूमि का स्वामी बना दें, मुझे श्रेष्ठ
मनुष्य बनावें, मुझे ऐश्वर्य प्रदान करें और अनेक प्रकार की
कामनाओं को पूर्ण करें। हे माता, मुझे सम्पूर्ण ख्याति तथा
अनेक वर्षों तक भोग प्रदान करें।
वादार्थसिद्धिं बहुलोकवश्यं
वयः
स्थिरत्वं ललनासु भोगम् ।
पौत्रादिलब्धिं सकलार्थसिद्धिं
प्रदेहि मे भार्गवि ! जन्मजन्मनि ॥ १०५ ॥
हे भार्गवी,
मुझे जन्म-जन्मान्तर तक शास्त्रार्थ में जीत, अनेक
लोकों पर विजय, बहुत दिनों की युवावस्था तथा नारियों का भोग,
पौत्र आदि की प्राप्ति, सभी प्रकार की कामनाओं
की सिद्धि प्रदान करें ।
सुवर्णवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः
विभूतिवृद्धिं
कुरु मे गृहे श्रीः ।
विज्ञानवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः
सौभाग्यवृद्धिं कुरु मे गृहे श्रीः ॥ १०६ ॥
हे लक्ष्मी,
मेरे घर में सोना, ऐश्वर्य, ज्ञान एवं सौभाग्य की वृद्धि करें ।
ॐ यं हं कं लं पं श्रीः ।
ध्यायेल्लक्ष्मीं प्रहसितमुखीं
कोटिबालार्कभासां
विद्युद्वर्णाम्बरवरधरां भूषणाढ्यां
सुशोभाम् ।
बीजापूरं सरसिजयुगं बिभ्रतीं
स्वर्णपात्रं
भर्त्रा युक्तां मुहुरभयदां
मह्यमप्यच्युतश्रीः ॥ १०७ ॥
हँसते हुए मुखवाली,
करोड़ो उदीयमान सूर्य के समान चमक वाली, विद्युत
रंग के समान वस्त्र धारण करनेवाली, अनेक प्रकार के आभूषणों
से लदी हुई, कमलाक्ष, सोने का घड़ा तथा
दो कमल हाथों में धारण करनेवाली, पति विष्णु के साथ रहनेवाली
बार-बार अभय प्रदान करनेवाली लक्ष्मी का ध्यान करता हूँ। मुझे अटल सम्पत्ति प्रदान
करें।
गुह्माऽतिगुह्यगोत्री त्वं
गृहाणाऽस्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि
त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा ॥ १०८ ॥
अति गोपनीय मन्त्रों की रक्षा
करनेवाली हे देवी, मेरे द्वारा इस
किये गये जप को ग्रहण करें। इससे मुझे आपकी कृपा से सिद्धि मिले।
इत्यथर्वणरहस्ये लक्ष्मीहृदयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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