उपनयन संस्कार
उपनयन संस्कार सोलह संस्कारों में
से एक प्रमुख संस्कार है, इसे यज्ञोपवीत या जनेऊ
संस्कार भी कहते हैं। इसमें द्विज को गायत्री मंत्र की दीक्षा जनेऊ धारण कराया
जाता है। इसी के साथ वेदारम्भ व समावर्तन संस्कार भी किया जाता है।
उपनयनसंस्कार
यज्ञोपवीत या जनेऊ संस्कार
उपनयन संस्कार की महिमा
‘उपनयन' शब्द
‘उप' उपसर्गपूर्वक 'नी' धातु से 'ल्यु' प्रत्यय करने पर निष्पन्न होता है। उप अर्थात् आचार्य के समीप नयन अर्थात्
बालक को विद्याध्ययन के लिये ले जाने को 'उपनयन' कहते हैं। बालक के पिता आदि अपने पुत्रादिकों को विद्याध्ययनार्थ आचार्य के
पास ले जायँ, यही उपनयन शब्द का अर्थ है । बालक में यह
योग्यता आ जाय इसलिये विशेष- विशेष कर्म द्वारा उसे संस्कृत किया जाता है, उसे संस्कृत करने का संस्कार ही उपनयन या यज्ञोपवीत-संस्कार है I इसी का नाम व्रतबन्ध भी है। इसमें यज्ञोपवीत धारणकर बालक विशेष - विशेष
व्रतों में उपनिबद्ध हो जाता है । द्विजों का जीवन व्रतमय होता है, जिसका प्रारम्भ इसी व्रतबन्ध – संस्कार से होता है। इस व्रतबन्ध से बालक
दीर्घायु, बली और तेजस्वी होता है –
'यज्ञोपवीतमसि
यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि दीर्घायुत्वाय बलाय वर्चसे'
(कौषीतकि ब्राह्मण) ।
संस्कारों में षोडश संस्कार मुख्य
माने गये हैं, उनमें भी उपनयन की ही सर्वोपरि
महत्ता है । उपनयन के बिना बालक किसी भी श्रौत-स्मार्त कर्म का अधिकारी नहीं होता
।
'न ह्यस्मिन् युज्यते
कर्म किञ्चिदामौञ्जिबन्धनात्' ( मनुस्मृ०
२ । १७१) ।
यह योग्यता उपनयन-संस्कार के अनन्तर
यज्ञोपवीत धारण करने पर ही प्राप्त होती है। उपनयन के बिना देवकार्य और पितृकार्य
नहीं किये जा सकते और श्रौतस्मार्त-कर्मों में तथा विवाह,
सन्ध्या, तर्पण आदि कर्मों में भी उसका अधिकार
नहीं रहता । उपनयन संस्कार से ही द्विजत्व प्राप्त होता है । उपनयन संस्कार में
समन्त्रक एवं संस्कारित यज्ञोपवीत- धारण तथा गायत्री – मन्त्र का उपदेश - ये दो
प्रधान कर्म होते हैं, शेष कर्म अंगभूत कर्म हैं। उपनयन का
अधिकार केवल द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) -को है। प्रथम माता के गर्भ से उत्पत्ति तथा द्वितीय जन्म
मौंजीबन्धन- उपनयनसंस्कार द्वारा होने से ब्राह्मण-क्षत्रिय – वैश्यों की द्विज
संज्ञा है—
मातुर्यदग्रे जायन्ते द्वितीयं
मौञ्जिबन्धनात् ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादेते
द्विजाः स्मृताः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति १ । ३९)
शंखस्मृति (१।६)- में कहा गया है कि ब्राह्मण,
क्षत्रिय और वैश्य–इन तीन वर्णों को द्विज
कहते हैं, इनका दूसरा जन्म यज्ञोपवीत- संस्कार से होता है—
ब्राह्मणः क्षत्रियोर्वैश्यस्त्रयो
वर्णा द्विजातयः ।
तेषां जन्मद्वितीयं तु विज्ञेयं मौञ्जिबन्धनात्॥
मौंजीबन्धन- संस्कार के अनन्तर
द्वितीय जन्म होने पर उनका पिता आचार्य होता है और माता गायत्री होती है—
(क)
आचार्यस्तु पिता
प्रोक्तः सावित्री जननी तथा ।
ब्रह्मक्षत्रविशाञ्चैव
मौञ्जिबन्धनजन्मनि ॥ (शंखस्मृति १।७)
(ख)
तत्र यद्
ब्रह्मजन्मास्य मौञ्जीबन्धनचिह्नितम् ।
तत्रास्य माता सावित्री पिता
त्वाचार्य उच्यते ॥ (मनुस्मृति २ । १७०)
ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि
ब्राह्मण माता – पिता के सविधि विवाह के अनन्तर उत्पन्न बालक ब्राह्मण है,
जब उस बटुका ५ से ८ वर्ष की अवस्था में यज्ञोपवीत संस्कार होता है
तब वह द्विज (द्विजन्मा) कहा जाता है और वह वेदाध्ययन तथा यज्ञाग्निरूप धर्मकार्य
आदि करने का अधिकारी होता है । वेदज्ञान प्राप्त करने से 'विप्र'
तथा ये तीनों बातें होने से वह ' श्रोत्रिय'
कहलाता है-
जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः
संस्कारैर्द्विज उच्यते ।
विद्यया वापि विप्रत्वं त्रिभिः
श्रोत्रिय उच्यते ॥
इसीलिये द्विजों का दो बार जन्म
होता है और दो बार जन्म होने से ही द्विजसंज्ञा सार्थक होती है –
'द्विधा जन्म ।
जन्मना विद्यया च ।'
तैत्तिरीय संहिता ने बताया है कि
मनुष्य तीन ऋणों को लेकर जन्म लेता है –
१ - ऋषि ऋण,
२- देव ऋण तथा ३ - पितृ ऋण ।
इन तीन ऋणों से मुक्ति बिना
यज्ञोपवीत - संस्कार हुए सम्पन्न नहीं होती । मनुष्य यज्ञोपवीत-संस्कार के अनन्तर
विहित ब्रह्मचर्यव्रत का पालन कर ऋषियों के ऋण से मुक्त होता है,
यजन - पूजन आदि के द्वारा देव-ऋण से मुक्त होता है और गृहस्थधर्म के
पालनपूर्वक सन्तानोत्पत्ति से पितृ-ऋण से उऋण होता है । यदि यज्ञोपवीत-संस्कार न
हो तो इन तीनों कर्मों को करने का उसका अधिकार नहीं रहता, अतः
यज्ञोपवीत – संस्कार का बहुत महत्त्व है। इस संस्कार में मौंजीमेखला धारण करने के
कारण इसे मौंजीबन्धन संस्कार भी कहते हैं । यह संस्कार उसके ब्रह्मचर्यव्रत और
विद्याध्ययन का प्रतीक है।
यज्ञोपवीत से पूर्व तक कामाचार,
कामवाद तथा कामभक्षणजन्य दोष बालक को नहीं लगता तथा उसके कर्मों का
प्रत्यवाय भी नहीं बनता। इसीलिये कोई प्रायश्चित्तविधान भी नहीं रहता । यज्ञोपवीत-
संस्कार के अनन्तर उसे ब्रह्मचर्य, सदाचार, शौचाचार, भक्ष्याभक्ष्य आदि नियमों का सावधानीपूर्वक
पालन करना चाहिये । यम-नियम-संयमपूर्वक रहना चाहिये।*
(*आजकल कई लोग संयम-नियम पालन करने के डर से जनेऊ लेना
नहीं चाहते । यह उचित नहीं है। अपनी मनःस्थिति के अनुसार यथासम्भव नियम- पालन करते
हुए जनेऊ लेना अवश्य अनिवार्य है ।)
वास्तव में जितने भी संस्कार हैं,
वे सब द्विजत्व प्राप्ति के उपकारक हैं। यज्ञोपवीत के पूर्व के
जातकर्मादि संस्कार भी द्विजत्व प्राप्ति में सहयोगी हैं और उसके बाद के विवाहादि
संस्कार भी बिना यज्ञोपवीत- संस्कार हुए सम्पन्न नहीं होने चाहिये, इसलिये यह संस्कार बहुत ही उपयोगी है और आवश्यक है, किंतु
विडम्बना है कि वर्तमान में सबसे अधिक हानि इस यज्ञोपवीत-संस्कार की ही हो रही है
।
उपनयन-संस्कार कब करें-
आचार्य पारस्कर ने ब्राह्मण,
क्षत्रिय तथा वैश्य बालक के लिये क्रम से जन्म से अथवा गर्भ से आठ,
ग्यारह और बारह वर्ष उपनयन का मुख्य काल बताया है –
'अष्टवर्षं
ब्राह्मणमुपनयेद् गर्भाष्टमे वा ।
एकादशवर्षं राजन्यम्। द्वादशवर्षं
वैश्यम्' (पारस्करगृह्यसूत्र
२।२।१- ३) ।
यही समय मनुस्मृति ( २ । ३६ ) - में
भी निर्धारित किया गया है-
गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वीत
ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु
द्वादशे विशः ॥
उपनयन का गौणकाल- किसी कारणवश
मुख्यकाल में यज्ञोपवीत-संस्कार न हो सका हो तो ब्राह्मण बालक का सोलह,
क्षत्रिय बालक का बाईस तथा वैश्य बालक का चौबीस वर्षतक उपनयन
संस्कार हो जाना चाहिये, यह उपनयनकाल की चरमावधि है-
आषोडशाद्वर्षाद् ब्राह्मणस्यानतीतः
कालो भवति ।
आद्वाविंशाद्राजन्यस्य ।
आचतुर्विंशाद्वैश्यस्य॥ (पा०गृ०सू० २।५ ।
३६ –
३८ )
आषोडशाद् ब्राह्मणस्य सावित्री
नातिवर्तते ।
आद्वाविंशात् क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः
॥ (मनु० )
मुख्यकाल तथा गौणकाल के अतिक्रमण
होने पर यज्ञोपवीत-संस्कार की व्यवस्था- उपनयन के लिये विहित मुख्य काल तथा गौणकाल
के व्यतीत हो जाने पर वह द्विज बालक 'पतितसावित्रीक',
'सावित्रीपतित ' अथवा 'व्रात्य'
कहलाता है । अर्थात् वह संस्कार न होने से पतित हो जाता है, विगर्हित – निन्दित हो जाता है *
* (क) अत ऊर्ध्वं त्रयोऽप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।
सावित्रीपतिता व्रात्या
भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ (मनु० )
(ख)
सावित्रीपतिता व्रात्याः सर्वधर्मबहिष्कृताः ॥ ( शंखस्मृति २ ।९)
और सभी प्रकार के व्यवहार के अयोग्य
हो जाता है तथा धर्म-कर्मादि में उसका कोई अधिकार नहीं रहता । वह प्रायश्चित्ती हो
जाता है। ऐसे अनुपनीत के विषय में शास्त्र ने व्यवस्था दी है कि ऐसी स्थिति में '
अनादिष्टप्रायश्चित्त' करके वह पुनः संस्कार की
योग्यता प्राप्त कर लेता है । अतः 'व्रात्यस्तोम' प्रायश्चित्त करके उपनयन संस्कार करना चाहिये । यह व्रात्यस्तोम लौकिक
अग्नि में होता है, इस व्रात्यस्तोम की विधि कात्यायन
श्रौतसूत्र (२२ । ४) - में उपलब्ध है। अज्ञानतावश यदि यज्ञोपवीत नहीं किया गया हो
तो अधिक उम्र होने पर भी प्रायश्चित्त का संकल्प कर यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये ।
यथामङ्गलं वा सर्वेषाम्-
आचार्य पारस्करजी ने कुलपरम्परा का
समादर करते हुए बताया है कि उपर्युक्त बताये गये उपनयनकाल के लिये नियत मुख्य अथवा
गौण वर्षों में बालक का उपनयन न हो सके तो अपने कुलाचारानुकूल उपनयनकाल की सीमा के
अन्दर नवें, दसवें, ग्यारहवें,
बारहवें, तेरहवें, चौदहवें
और पन्द्रहवें वर्ष में भी उपनयनसंस्कार हो सकता है- 'यथामङ्गलं
वा सर्वेषाम् ' ( पा०गृ०सू० २।२।४) का तात्पर्य यह है कि
द्विजातियों को शास्त्रविहित उपनयनकाल के भीतर सुविधानुसार उपनयनसंस्कार अवश्य
सम्पन्न कर लेना चाहिये ।
कामनापरक यज्ञोपवीत-
ब्राह्मण बालक को विशेष
ब्रह्मतेजसम्पन्न बनाने की इच्छा हो तो पाँचवें वर्ष में,
बलाभिलाषी क्षत्रिय बालक का छठे वर्ष में तथा धनार्थी वैश्य बालक का
आठवें वर्ष में उपनयन करना चाहिये-
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य
पञ्चमे ।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे
वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥ (मनुस्मृति)
उपनयन-संस्कार और यज्ञोपवीत (जनेऊ)
- का अभेद सम्बन्ध-
उपनयन-संस्कार में मुख्य रूप से
यज्ञोपवीत धारण होता है, मौंजी, मेखला आदि भी धारण कराया जाता है, किंतु समावर्तन के
समय में उनके परित्याग की विधि है और फिर विवाह के अनन्तर गृहस्थाश्रम में प्रवेश
होता है, किंतु यज्ञोपवीत और शिखासूत्र यदि संन्यास धारण न
करे तो यावज्जीवन बने रहते हैं । अतः यज्ञोपवीत (जनेऊ) - के विषय में यहाँ कुछ
विचार प्रस्तुत हैं-
कात्यायनस्मृति (१।४) - में कहा गया
है—
सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च
।
विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न
तत्कृतम्॥
अर्थात् यज्ञोपवीत (जनेऊ) सदैव धारण
करना चाहिये और शिखा में ओंकाररूपिणी ग्रन्थि बाँधे रखनी चाहिये । शिखा -
सूत्रविहीन होकर (जनेऊ और चोटी न रखकर ) जो कुछ धर्म-कर्म किया जाता है,
वह निष्फल होता है ।
सामान्य अर्थों में यज्ञोपवीत तीन
तागों के जोड़ में लगी ग्रन्थियों से युक्त सूत की एक माला है,
जिसे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य धारण करते
हैं। वैदिक अर्थों में यज्ञोपवीत शब्द 'यज्ञ' और 'उपवीत' – इन दो शब्दों के
योग से बना है, जिसका अर्थ है – 'यज्ञ से
पवित्र किया गया सूत्र' । साकार परमात्मा को 'यज्ञ' और निराकार परमात्मा को 'ब्रह्म' कहा गया है- इन दोनों को प्राप्त करने का
अधिकार दिलानेवाला यह सूत्र यज्ञोपवीत है । ब्रह्मसूत्र, सवितासूत्र
तथा यज्ञसूत्र इसी के नाम हैं। स्मृतिप्रकाश में इसके ब्रह्मसूत्र नाम की सार्थकता
के विषय में कहा गया है—
सूचनाद् ब्रह्मतत्त्वस्य
वेदतत्त्वस्य सूचनात् ।
तत्सूत्रमुपवीतत्वाद्
ब्रह्मसूत्रमिति स्मृतम् ॥
अर्थात् यह सूत्र द्विजाति को ब्रह्मतत्त्व
और वेदज्ञान की सूचना देता है, इसीलिये इसे 'ब्रह्मसूत्र' कहा गया है। I
यज्ञोपवीत का प्रादुर्भाव-
यज्ञोपवीतकी उत्पत्ति और उसके धारण की
परम्परा अनादिकाल से ही है। इसका सम्बन्ध तो उस काल से है,
जब मानव सृष्टि हुई थी। उस समय सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी स्वयं
यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। इसीलिये यज्ञोपवीत धारण करते समय यह मन्त्र पढ़ा जाता
है-
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं
प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं
यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा
यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ।
इस मन्त्र में बताया गया है कि शुभ
कर्मानुष्ठानार्थ बनाये गये, अत्यन्त
पवित्र, ब्रह्मा के द्वारा आदि में धारण किये गये, आयुष्य को प्रदान करनेवाले, सर्वश्रेष्ठ, अत्यन्त शुद्ध यज्ञोपवीत को मैं धारण करता हूँ । यह मुझे तेज और बल प्रदान
करे । बह्मसूत्र ही यज्ञोपवीत है, मैं ऐसे यज्ञोपवीत को धारण
करता हूँ ।
साररूप में यह मन्त्र यज्ञोपवीत की
उत्पत्ति का स्पष्ट संकेत देता है । देवता भी यज्ञोपवीत धारण करते हैं,
ग्रन्थों में भगवान् श्रीराम, भगवान्
श्रीकृष्ण के यज्ञोपवीत-संस्कार का बड़ा ही भव्य वर्णन आया है। वैदिक ग्रन्थों में
इसका उल्लेख होने से यह किन्हीं परवर्ती ऋषियों द्वारा निर्मित सूत्र नहीं है।
यज्ञोपवीत – निर्माण की विशेष प्रक्रिया शास्त्रों में बतायी गयी है। इससे स्पष्ट
होता है कि यह माला - जैसा दिखनेवाला सूत नहीं है, अपितु यह
ब्रह्मतेज को धारण करनेवाला तथा समस्त देव एवं पितृकर्मों को सम्पादित कर सकने की
योग्यता प्रदान करनेवाला देवसूत्र है।
यज्ञोपवीत क्या है ?
-
यज्ञोपवीत स्वयं अथवा ब्राह्मण कन्या
या साध्वी ब्राह्मणी के हाथों से काते गये कपास के सूत के नौ तारों को तीन-तीन
तारों में बँटकर (उमेठकर) बनाये गये तीन सूत्र को ९६ चौओं के नाप में तीन वृतों की
तैयार की गयी माला है, जिसके मूल में
ब्रह्मग्रन्थि लगाकर गायत्री और प्रणवमन्त्रों से अभिमन्त्रित किये जाने के
पश्चात् 'यज्ञोपवीत' नाम दिया गया है।
इसे निश्चित आयु, काल (समय) और विधान के साथ द्विज बालकों
(बटुक)-को ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य और वानप्रस्थ – इन तीन आश्रम-व्यवस्था में श्रौत और स्मार्तविहित कर्म करने हेतु पिता,
आचार्य या गुरु द्वारा गायत्रीमन्त्र के साथ धारण कराया जाता है ।
इसी के साथ बालक का दूसरा जन्म होता है और वह 'द्विज'
कहा जाने लगता है । इससे उपनीत बालक को विनश्वर स्थूल शरीर की
अपेक्षा अविनाशी ज्ञानमय शरीर प्राप्त होता है । इस विशेष महत्त्व को ध्यान में
रखते हुए इसके निर्माण में शुचिता और पवित्रता पर विशेष ध्यान दिया गया है।
यज्ञोपवीत की निर्माणविधि आगे परिशिष्ट में दी गयी है I
किस स्थिति में नवीन यज्ञोपवीत धारण
करें-
यज्ञोपवीत संस्कार हो जाने पर द्विज
को इसे अखण्ड रूप से धारण किये रहने का निर्देश दिया गया है। शास्त्रकारों के
अनुसार ब्रह्मचारी को एक यज्ञोपवीत तथा स्नातक को दो या उससे अधिक (तीन) यज्ञोपवीत
धारण करना चाहिये यथा –
'ब्रह्मचारिण एकं
स्यात् स्नातकस्य द्वे बहूनि वा । ' (आश्वलायनगृह्यसूत्र )
इसी तरह श्रौत- स्मार्त कर्मों की
निष्पत्ति के लिये दो यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये, यदि उत्तरीय वस्त्र न हो तो तीसरा धारण किया जा सकता है I
यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौते
स्मार्ते च कर्मणि ।
तृतीयमुत्तरार्धे च वस्त्राभावे
तदिष्यते ॥ (हेमाद्रि)
कुछ लोग इस स्थिति में एक कपड़ा या
गमछा बायें कन्धे पर रख लेते हैं।
उपवीत संस्कारित ब्रह्मसूत्र है,
जो संस्कार के दिन से मृत्युपर्यन्त शरीर से अलग नहीं किया जाता है
। इतने कड़े नियमों का पालन करते हुए कई अवसर आते हैं, जब
धारण किये हुए यज्ञोपवीत को अशुद्ध मानकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करने की आवश्यकता
पड़ती है। शास्त्रकारों के अनुसार इन स्थितियों में धारण किये हुए यज्ञोपवीत को
अपवित्र मानकर नवीन यज्ञोपवीत के धारण करने का निर्देश दिया गया है—
१ - यदि स्वत: की असावधानी से
यज्ञोपवीत बाँये कन्धे से खिसककर बाँये हाथ के नीचे आ जाय या उससे निकलकर कमर के
नीचे आ जाय या वस्त्रादि उतारते समय उससे लिपटकर शरीर से अलग हो जाय अथवा
यज्ञोपवीत का कोई धागा टूट जाय तो नवीन प्रतिष्ठित यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये——
वामहस्ते व्यतीते तु तत् त्यक्त्वा
धारयेत् नवम्।'
२- मल-मूत्र का त्याग करते समय कान में
लपेटना भूल जाय अथवा कान में लिपटा सूत्र कान से सरककर अलग हो जाय-
मलमूत्रे त्यजेद् विप्रो
विस्मृत्यैवोपवीतधृक् ।
उपवीतं तदुत्सृज्य धार्यमन्यन्नवं तदा
॥ (आचारेन्दु)
३-उपाकर्म,
जननाशौच, मरणाशौच, श्राद्धकर्म,
सूर्य-चन्द्रग्रहण के समय, अस्पृश्य से स्पर्श
हो जाने तथा श्रावणी में यज्ञोपवीत को अवश्य बदल लेना चाहिये-
(क) सूतके मृतके क्षौरे
चाण्डालस्पर्शने तथा ।
रजस्वलाशवस्पर्शे धार्यमन्यन्नवं
तदा ॥ (नारायणसंग्रह)
(ख) उपाकर्मणि चोत्सर्गे
सूतकद्वितये तथा ।
श्राद्धकर्मणि यज्ञादौ
शशिसूर्यग्रहेऽपि च ॥
नवयज्ञोपवीतानि धृत्वा जीर्णानि च
त्यजेत् ॥ (ज्योतिषार्णव)
४-प्रायः तीन-चार मास में यज्ञोपवीत
शरीर के मलादि से दूषित और जीर्ण हो जाता है, अतः
नया यज्ञोपवीत धारण करे-
धारणाद् ब्रह्मसूत्रस्य गते
मासचतुष्टये ।
त्यक्त्वा तान्यपि जीर्णानि
नवान्यन्यानि धारयेत् ॥ (गोभिल
आचारभूषण)
उपर्युक्त स्थितियों में उपाकर्म
संस्कार के समय अभिमन्त्रित उपवीत को अथवा अभिमन्त्रित यज्ञोपवीत न होने की स्थिति
में विधि से अभिमन्त्रित कर उपवीत को धारण करे ।
अभिमन्त्रित यज्ञोपवीत को धारण
करना-
स्नानादिकर एक आसन पर बैठकर नवीन
यज्ञोपवीत में हल्दी लगाकर संकल्प कर निम्नलिखित विनियोग पढ़कर जल गिराये। तदनन्तर
नीचे दिया मन्त्र पढ़ते हुए एक यज्ञोपवीत धारण करे । आचमन करे और फिर दूसरा
यज्ञोपवीत धारण करे । इस प्रकार एक-एक करके ही यज्ञोपवीत पहनना चाहिये-
विनियोग-
ॐ यज्ञोपवीतमिति मन्त्रस्य परमेष्ठी
ऋषिः लिङ्गोक्तादेवताः, त्रिष्टुप्
छन्दः यज्ञोपवीतधारणे विनियोगः ।
यज्ञोपवीत धारण करते हुए यह मन्त्र
पढ़े-
ॐ यज्ञोपवीतं परम पवित्रं
प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं
यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥
ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा
यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ॥
पुराने (जीर्ण) यज्ञोपवीत को
उतारना- इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर पुराने उपवीत को कण्ठी- जैसा बनाकर सिर पर
से पीठ की ओर से अलग कर दे-
एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं
धारितं मया ।
जीर्णत्वात् त्वत्परित्यागो गच्छ
सूत्र यथासुखम् ॥
त्याज्य यज्ञोपवीत को जल में
प्रवाहित कर दे अथवा किसी पवित्र स्थान पर छोड़ दे ।
इसके उपरान्त यथाशक्ति
गायत्रीमन्त्र का जप करे अथवा कम-से-कम दस गायत्रीमन्त्र का जप करे और 'ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु' कहते
हुए हाथ जोड़कर भगवान् का स्मरण करे ।
नवीन यज्ञोपवीत को अभिमन्त्रित
करना-
श्रावणी उपाकर्म के दिन वर्षभर के
लिये यज्ञोपवीत को अभिमन्त्रित कर रख लेना चाहिये। किसी कारणवश यज्ञोपवीत
अभिमन्त्रित न हो तो नवीन यज्ञोपवीत को निम्न रीति से अभिमन्त्रित कर धारण करना
चाहिये ।
सर्वप्रथम शुद्ध आसन पर पूर्वाभिमुख
होकर बैठे और आचमन करने के उपरान्त अपने सामने पलाश के पत्ते अथवा किसी पात्र पर
नवीन यज्ञोपवीत को रखकर जल से प्रक्षालित करे । तदुपरान्त निम्नलिखित एक-एक मन्त्र
पढ़कर अक्षत - चावल या एक-एक फूल अथवा जल को यज्ञोपवीत पर छोड़ता जाय-
प्रथमतन्तौ ॐ ओङ्कारमावाहयामि ।
द्वितीयतन्तौ ॐ अग्नि-मावाहयामि ।
तृतीयतन्तौ ॐ सर्पानावाहयामि ।
चतुर्थतन्तौ ॐ सोममावाहयामि ।
पञ्चमतन्तौ ॐ पितॄनावाहयामि ।
षष्ठतन्तौ ॐ प्रजापतिमावाहयामि ।
सप्तमतन्तौ ॐ अनिलमावाहयामि ।
अष्टमन्तौ ॐ सूर्यमावाहयामि ।
नवमतन्तौ ॐ विश्वान् देवानावाहयामि
।
प्रथमग्रन्थौ ॐ ब्रह्मणे नमः,
ब्रह्माणमावाहयामि ।
द्वितीयग्रथौ ॐ विष्णवे नमः,
विष्णुमावाहयामि ।
तृतीयग्रन्थौ ॐ रुद्राय नमः,
रुद्रमावाहयामि ।
इसके बाद ‘प्रणवाद्यावाहितदेवताभ्यो नमः' मन्त्र से 'यथास्थानं न्यसामि' कहकर उन-उन तन्तुओं में न्यासकर चन्दन आदि से पूजन करे । फिर यज्ञोपवीत को
दस बार गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित करे । इस प्रकार नूतन यज्ञोपवीत की
प्रतिष्ठा करनी चाहिये । तब वह धारण करने योग्य हो जाता है। यज्ञोपवीत ब्रह्मसूत्र
है। गायत्रीमन्त्र द्वारा अभिमन्त्रित है। इसमें नौ देवताओं का वास है। अतः इसकी
प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिये जरूरी है कि यह सदा पवित्र रहे, जिससे इसके धारणकर्ता का बल, आयु और तेज अक्षुण्ण
बना रहे ।
शौचादि के समय यज्ञोपवीत की स्थिति—
गृह्यसूत्रकारों ने उपवीत को शौच,
लघुशङ्का के समय दाहिने कान में लपेटने का विधान किया है, यथा-
१ - 'निवीती दक्षिणकर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा पुरीषे विसृजेत्' (वैखानसधर्मप्रश्न
२।९।१ शौचविधि)।
२- ‘यज्ञोपवीतं शिरसि दक्षिणकर्णे वा कृत्वा' (बोधायनगृह्यशेषसूत्र ४।६।१)।
३– '.....कर्णस्थब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः ।
कुर्यान्मूत्रपुरीषे च..... ' (याज्ञवल्क्यस्मृति आचाराध्याय)
४- ‘कर्णस्थब्रह्मसूत्रो मूत्रपुरीषं विसृजति'
(आग्निवेश्यगृह्यसूत्र २।६) इत्यादि ।
मल-मूत्र का त्याग करते समय दाहिने
कान में सूत्र लपेटने के रहस्य के पीछे अनेक कारण दिये गये हैं। सिर मानव शरीर में
ज्ञान का केन्द्र होता है तथा दाहिने कान में रुद्र, आदित्य, वसु आदि देवताओं का वास बताया गया है,
अतः इस क्षेत्र को अपवित्रता से मुक्त रखने हेतु यज्ञोपवीत को कान पर
रखने का विधान किया गया है, यथा—
आदित्या वसवो रुद्रा वायुरग्निश्च
धर्मराट् ।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं
तिष्ठन्ति देवताः ॥
पुरुष नाभि के ऊपर पवित्र है,
नाभि के नीचे का भाग मलमूत्र - धारक होने से विशेषतः शौच के समय
अपवित्र होता है । इसीलिये उस समय पवित्र यज्ञोपवीत को वहाँ न रखकर ऊर्ध्वभाग –
कर्णप्रदेश में रखा जाता है।
शरीरविज्ञान के अनुसार यदि मानव
शरीर का अवलोकन करें तो मध्य में वीर्यकोष है। यहाँ से निकलनेवाली रक्तवाहिनी
नाड़ी दाहिने कान से होते हुए शरीर के मल-मूत्रद्वार तक जाती है। प्रायः लघुशङ्का
या शौच के समय जोर लगाने से वीर्य अज्ञात रूप से स्खलित होने लगता है। यदि इस पर
ध्यान न रखा जाय तो यह शरीर को भयङ्कर रोगों से ग्रस्त कर सकता है। अतः महर्षियों ने
इस प्रवाह को रोकने के लिये जहाँ एक ओर कर्णवेध संस्कार में कर्णच्छेदन की रीति
प्रचलित की, वहीं यज्ञोपवीत द्वारा इस नाडी को
बाँधकर वीर्यरक्षा करने का प्राविधान भी किया और उन्होंने इस नियम को बनाया । यह
रक्तचाप पर नियन्त्रण रखता है और हृदय को मज़बूत बनाता है ।
यज्ञोपवीत की तीन स्थितियाँ
यज्ञोपवीत तीन रूपों में धारण किया
जाता है और उन तीन स्थितियों के तीन नाम हैं, जो
इस प्रकार हैं - १ - उपवीती (सव्य), २-निवीती (कण्ठी की तरह —
माला की तरह), ३ - प्राचीनावीती ( अपसव्य) ।
क-उपवीती-
यज्ञोपवीत (जनेऊ) जब बाँयें कन्धे से
दाहिने हाथ के नीचे दाहिनी तरफ होता है तो इसे उपवीती या सव्यावस्था की स्थिति
कहते हैं। सामान्य स्थिति में जनेऊ ऐसे ही पहना हुआ रहता है और सभी मांगलिक एवं
देवकार्य भी सव्यावस्था में ही होते हैं ।
ख-निवीती-
जनेऊ को गले में कण्ठी की तरह (माला
की भाँति ) धारण करने को निवीती - अवस्था कहा जाता है। तर्पण में जब सनकादि ऋषियों
को जलांजलि दी जाती है तो निवीती होकर ही दी जाती है। इसी जनेऊ को जब आगे न करके
पीठ की ओर माला कराकर पहना जाता है, वह
भी निवीती-अवस्था कहलाती है, ऐसा ग्राम्य धर्म (मैथुनकर्म)- के
समय करने का विधान है ।
ग- प्राचीनावीती-
यज्ञोपवीत (जनेऊ) जब दाहिने कंधे से
बायें हाथ के नीचे बायीं ओर किया जाता है तो इसे प्राचीनावीती या अपसव्यावस्था
कहते हैं । सम्पूर्ण पितृकर्म - श्राद्ध-तर्पण आदि अपसव्य होकर ही करने की विधि है।
कन्याओं का उपनयन संस्कार नहीं
होता-
स्त्रियों का विवाह-संस्कार ही
द्विजत्व - सम्पादक उपनयन है । वैवाहिक वर प्रदत्त उपवस्त्र को ही विवाह तक
यज्ञोपवीत की तरह लपेटना कन्याओं का उपनयन- सूत्रधारण होता है । पुरुष के लिये शास्त्रों
में प्रयुक्त 'संस्कार' शब्द
जैसे उपनयनवाचक है, वैसे ही स्त्री के लिये शास्त्रवचनों में
आया 'संस्कार' शब्द उसके विवाह का बोधन
कराता है । 'असंस्कृत:' यह
पुंलिंग शब्द 'अनुपनीत:' इस
अर्थ में आता है, 'असंस्कृता' यह
स्त्रीलिंग शब्द 'अविवाहिता' अर्थ
में आता है। अत: विवाह से भिन्न स्त्रियों का कोई उपनयन-संस्कार पृथक् नहीं होता।
इसीलिये पुरुष को विवाह के पूर्व ही यज्ञोपवीत-संस्कार करना चाहिये, जिससे पत्नी भी उपवीती हो जाय ।
संस्कारों के अनुपालन में शुचिता और
पवित्रता का विशेष ध्यान रखना होता है । स्त्री के शरीर का निर्माण इस तरह हुआ है
कि उसे मास में कुछ दिन (रजोधर्म के समय) अपवित्र दशा में रहना पड़ता है। इसी तरह
प्रसवकाल में भी वह अपवित्र दशा में रहने के लिये बाध्य होती है । पुरुष के समान
स्त्री ब्रह्मचर्यधर्म का पालन (रजस्वला होने पर) करनेयोग्य नहीं होती । अतः उनके
लिये उपनयन का विधान नहीं है । मनुजी ने बताया है कि स्त्रियों का विवाह-संस्कार
ही उनके यज्ञोपवीत संस्कार के समान है—
'वैवाहिको विधि:
स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।' ( मनुस्मृति २ । ६७)
उपनयनसंस्कार के मुख्य कर्म तथा
उनकी सामान्य विधि-
उपनयन संस्कार की विधि बहुत विस्तृत
है तथापि उसके मुख्य करणीय कर्मों का यहाँ संक्षेप में उल्लेख किया जाता है ।
सर्वप्रथम अन्य सामग्रियों के अतिरिक्त जो विशेष सामग्री है,
उसका संचयन कर लेना चाहिये। यथा—कटिसूत्र,
नवीन कौपीन, प्रावरणवस्त्र, मौंजी आदि की मेखला, संस्कारित यज्ञोपवीत, मृगचर्म, पलाश आदि का दण्ड तथा भिक्षापात्र आदि ।
सर्वप्रथम वटु (माणवक ) - को
स्नानादि कराकर अलंकारादि से अलंकृतकर आचार्य के पास ले आये। आचार्य उसे
मन्त्रपूर्वक कटिसूत्र और कौपीन धारण कराते हैं, मेखला बाँधते हैं और माणवक को गायत्रीमन्त्रपूर्वक शिखाबन्धन करवाते हैं
और मन्त्रपूर्वक एक यज्ञोपवीत भी धारण करवाते हैं । तदनन्तर माणवक को मृगचर्म और
बिना मन्त्र के दण्ड धारण करवाया जाता है । तदनन्तर आचार्य अपनी अंजलि में जल लेकर
माणवक की अंजलि को जल से पूरित करते हैं और माणवक उस जल से सूर्य को अर्घ्य प्रदान
करता है और 'तच्चक्षुर्देवहितं०' इस मन्त्र द्वारा उससे सूर्यदर्शन तथा सूर्योपस्थान कराया जाता है।
तदनन्तर आचार्य माणवक के दक्षिण कंधे के ऊपर से अपना दाहिना हाथ ले जाकर 'मम व्रते०' इस मन्त्र के द्वारा उसके हृदय का
स्पर्श करते हैं । इस क्रिया को हृदयालम्भन कहते हैं । तदनन्तर आचार्य माणवक के
अंगुष्ठसहित दाहिने हाथ को पकड़कर उससे नाम पूछते हैं तथा किसके ब्रह्मचारी हो -
ऐसा प्रश्न करते हैं। आचार्य उसकी रक्षा के लिये मन्त्रपूर्वक उसे प्रजापति आदि
देवताओं का संरक्षण प्रदान करते हैं ।
गायत्रीमन्त्र का उपदेश-
तदनन्तर माणवक उपनयनवेदी स्थित
अग्नि की प्रदक्षिणा करके आचार्य के उत्तर की ओर बैठता है,
आचार्य उपनयनांग- -हवन का कार्य सम्पन्न करते हैं और उसे
ब्रह्मचर्यव्रत तथा आचार की शिक्षा प्रदान करते हैं। तदनन्तर आचार्य गायत्रीमन्त्र
का उसके दक्षिण कर्ण में निम्न रीति से उपदेश करते हैं *-
१-
प्रथम बार गायत्री के प्रथम पाद - 'ॐ
भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्' को
कहकर माणवक से उसका यथाशक्ति उच्चारण करवाते हैं। पुनः गायत्रीमन्त्र के द्वितीय
पाद - ' भर्गो देवस्य धीमहि ' इसे
सुनाकर उससे उच्चारण करवाते हैं । पुनः गायत्री के तृतीय पाद— 'धियो यो नः प्रचोदयात् ' - इसे सुनाकर उससे
उच्चारण करवाते हैं।
* शास्त्रों
में क्षत्रिय एवं वैश्य बालकों के लिये अन्य गायत्रीमन्त्र का भी विधान आया है,
परंतु सभी द्विजों के लिये ब्रह्मगायत्री मन्त्र का उपदेश भी विहित
है । अत: इसी मन्त्र का उपदेश ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य - तीनों वर्णों को प्रदान किया जाता है ।
२- द्वितीय
बार गायत्री मन्त्र की आधी ऋचा - ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो
देवस्य धीमहि'
सुनाकर उससे उच्चारण करवाते हैं फिर शेष आधी ऋचा 'धियो यो नः प्रचोदयात्' सुनाकर उच्चारण करवाते
हैं ।
३-
तृतीय बार में सम्पूर्ण गायत्री मन्त्र 'ॐ
भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात्'
को उसके कान में सुनाकर उससे उच्चारण करवाते
हैं।
इस प्रकार तीन बार के अभ्यास से
माणवक को गायत्रीमन्त्र का उच्चारण प्रायः सहज होने लगता है । यह गायत्रीमन्त्र
ब्रह्मगायत्री कहलाता है। इस गायत्रीमन्त्र के द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र हैं,
इसका गायत्री छन्द है और इसके देवता सविता (सूर्य) हैं ।
उत्तरांगकर्म-
गायत्री- मन्त्र दान के अनन्तर
माणवक आचार्य को दक्षिणा प्रदानकर उन्हें प्रणाम करता है और आचार्य आशीर्वाद
प्रदान कर उसका अभिनन्दन करते हैं ।
तदनन्तर माणवक उपनयनाग्नि में
घृतयुक्त समिधा प्रदान करता है और हाथों के द्वारा अग्नि को तापकर अपने देह के
विभिन्न अंगों में अग्नि का आप्यायन करता है और स्रुवमूल से वेदी से भस्म ग्रहण कर
अनामिका अँगुली के द्वारा ललाट, ग्रीवा,
दक्षिण स्कन्ध तथा हृदय में मन्त्रपूर्वक भस्म (त्र्यायुष्) धारण
करता है, यह कर्म त्र्यायुष्करण कहलाता है। इससे आयु की
वृद्धि होती है, इसका क्रम इस प्रकार है-
'ॐ त्र्यायुषं
जमदग्नेः - इति ललाटे'
'ॐ कश्यपस्य
त्र्यायुषम् —इति ग्रीवायाम्'
'ॐ यद्देवेषु
त्र्यायुषम् - इति दक्षिणांसे'
'ॐ तन्नो अस्तु
त्र्यायुषम् - इति हृदि ।'
तदनन्तर अग्नि तथा गुरु का अभिवादन
करना चाहिये । गुरु के अभिवादन के अनन्तर जो विद्या, अवस्था तथा तपोवृद्धजन हों, उनका भी माणवक को उस समय
अभिवादन करना चाहिये ।
तदनन्तर ब्रह्मचारी बटुक नये पीत
वस्त्र को गले में झोली की तरह डालकर दण्ड ग्रहण करके भिक्षा की याचना करता है ।
सर्वप्रथम ब्रह्मचारी को माता से 'भवति
भिक्षां देहि मातः' कहकर भिक्षा
माँगनी चाहिये। क्षत्रिय ब्रह्मचारी 'भिक्षां भवति देहि
मात:' यह कहे और वैश्य ब्रह्मचारी 'देहि भिक्षां भवति मातः' - ऐसा कहे। पुरुषों से 'भवन् भिक्षां देहि' ऐसा कहे । ब्रह्मचारी 'स्वस्ति' ऐसा कहकर भिक्षा ग्रहण करे और प्राप्त
भिक्षा को आचार्य को निवेदित करे । अन्त में आचार्य को दक्षिणा प्रदान कर
ब्राह्मणभोजन का संकल्प कर अग्नि को विसर्जित करना चाहिये ।
आगे इस संस्कार की प्रयोग विधि दी जा रही है।
आगे जारी.... उपनयन संस्कार विधि

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