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लक्ष्मी स्तोत्र

लक्ष्मी स्तोत्र

देवीभागवतपुराण के स्कन्ध ९ अध्याय ४२ श्लोक ५१-६७ में तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण के खण्ड २ प्रकृतिखण्ड अध्याय ३९ के श्लोक ५२- ७२ में वर्णित माँ लक्ष्मी को समर्पित इन्द्रकृत श्री संपदा लक्ष्मी स्तोत्र अथवा लक्ष्मी ध्यान स्तोत्र का पाठ करने से आर्थिक संपन्नता, बुद्धि, सौभाग्य की प्राप्ति होती है, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

श्री संपदा लक्ष्मी स्तोत्र

श्रीसंपदा लक्ष्मी स्तोत्रम्

Shri Sampada Lakshmi Stotram

महालक्ष्म्याः ध्यान स्तोत्रम्

इन्द्रकृतम् श्रीसम्पदालक्ष्मी स्तोत्रम्

लक्ष्मी ध्यान स्तोत्र

॥अथ श्रीमहालक्ष्मी ध्यान स्तोत्रं॥

पुरन्दर उवाच

नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः ।

कृष्णप्रियायै सततं महालक्ष्यै नमो नमः ॥ १ ॥

पुरन्दर बोले- भगवती कमलवासिनी को नमस्कार है। देवी नारायणी को नमस्कार है, कृष्णप्रिया महालक्ष्मी को निरन्तर बार-बार नमस्कार है ।

पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः ।

पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥ २ ॥

कमलपत्र के समान नेत्रवाली और कमल के समान मुखवाली को बार-बार नमस्कार है। पद्मासना, पद्मिनी और वैष्णवी को बार-बार नमस्कार है ।

सर्वसम्पत्स्वरूपिण्यै सर्वाराध्यै नमो नमः ।

हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः ॥ ३ ॥

सर्वसम्पत्स्वरूपा तथा सबकी आराध्या देवी को बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीहरि की भक्ति प्रदान करनेवाली तथा हर्षदायिनी भगवती लक्ष्मी को बार-बार नमस्कार है ।

कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ।

चन्द्रशोभास्वरूपायै रत्‍नपद्मे च शोभने ॥ ४ ॥

हे रत्नपद्मे ! हे शोभने ! श्रीकृष्ण के वक्ष:स्थल पर सुशोभित होनेवाली तथा चन्द्रमा की शोभा धारण करनेवाली आप कृष्णेश्वरी को बार-बार नमस्कार है ।

सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ।

नमो वृद्धिस्वरूपायै वृद्धिदायै नमो नमः ॥ ५ ॥

सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी को नमस्कार है। महादेवी को नमस्कार है। वृद्धिस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मी को नमस्कार है। वृद्धि प्रदान करनेवाली महालक्ष्मी को बार-बार नमस्कार है ।

वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्या लक्ष्मीः क्षीरसागरे ।

स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥ ६ ॥

गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता ।

सुरभिः सागरे जाता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥ ७ ॥

हे भगवति! आप वैकुण्ठ में महालक्ष्मी, क्षीरसागर में लक्ष्मी, इन्द्र के भवन में स्वर्गलक्ष्मी, राजाओं के भवन में राजलक्ष्मी, गृहस्थों के घर में गृहलक्ष्मी और गृहदेवता, सागर के यहाँ सुरभि तथा यज्ञ के पास दक्षिणा के रूप में विराजमान रहती हैं ।

अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालया ।

स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥ ८ ॥

आप अदिति, देवमाता, कमला तथा कमलालया नाम से प्रसिद्ध हैं और हवि प्रदान करते समय स्वाहा तथा कव्य प्रदान करते समय स्वधा नाम से कही गयी हैं ।

त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वाधारा वसुन्धरा ।

शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा ॥ ९ ॥

सम्पूर्ण जगत्‌ को धारण करनेवाली विष्णुस्वरूपिणी पृथ्वी आप ही हैं। आप भगवान् नारायण की आराधना में सदा तत्पर रहनेवाली तथा विशुद्ध सत्त्वसम्पन्न हैं । 

क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा शारदा शुभा ।

परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा ॥ १० ॥

आप क्रोध तथा हिंसा से रहित, वर प्रदान करनेवाली, बुद्धि प्रदान करनेवाली, मंगलमयी, श्रेष्ठ, परमार्थ तथा भगवान्‌ का दास्य प्रदान करनेवाली हैं ।

यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम् ।

जीवन्मृतं च विश्वं च शश्वत्सर्वं यया विना ॥ ११ ॥

आपके बिना सम्पूर्ण जगत् भस्मीभूत तथा सारहीन है। आपके बिना यह समग्र विश्व सर्वथा जीते-जी मरे हुए के समान है ।

सर्वेषां च परा माता सर्वबान्धवरूपिणी ।

धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी ॥ १२ ॥

आप समस्त प्राणियों की श्रेष्ठ माता, सबकी बान्धवस्वरूपिणी और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष (पुरुषार्थचतुष्टय) - की मूल कारण हैं ।

यथा माता स्तनान्धानां शिशूनां शैशवे सदा ।

तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरूपतः ॥ १३ ॥

जिस प्रकार माता शैशवावस्था में स्तनपायी शिशुओं की सदा रक्षा करती है, उसी प्रकार आप सभी प्राणियों की माता के रूप में सब प्रकार से उनकी रक्षा करती हैं ।

मातृहीनः स्तनान्धस्तु स च जीवति दैवतः ।

त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम् ॥ १४ ॥

स्तनपायी शिशु माता के न रहने पर भी दैवयोग से जी भी सकता है, किंतु आपसे रहित होकर कोई भी प्राणी जीवित नहीं रह सकता- यह निश्चित है ।

सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मां प्रसन्ना भवाम्बिके ।

वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि ॥ १५ ॥

अम्बिके! आप अत्यन्त प्रसन्नतापूर्ण स्वरूपवाली हैं, अतः मुझ पर प्रसन्न हों । हे सनातनि ! शत्रुओं के द्वारा अधिकृत किया गया मेरा राज्य मुझे पुनः प्राप्त कराइये ।

अहं यावत्त्वया हीनो बन्धुहीनश्च भिक्षुकः ।

सर्वसम्पद्विहीनश्च तावदेव हरिप्रिये ॥ १६ ॥

हे हरिप्रिये ! मैं जबतक आपके दर्शन से वंचित था; तभीतक बन्धुहीन, भिक्षुक और सम्पूर्ण सम्पदाओं से विहीन था ।

ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम् ।

प्रभावञ्च प्रतापं च सर्वाधिकारमेव च ॥

जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमेव च ॥ १७ ॥

अब आप मुझे ज्ञान, धर्म, पूर्ण सौभाग्य, सम्पूर्ण अभीष्ट, प्रभाव, प्रताप, सम्पूर्ण अधिकार, परम ऐश्वर्य, पराक्रम तथा युद्ध में विजय प्रदान कीजिये ।

श्रीमहालक्ष्मी ध्यान स्तोत्रम् फलश्रुति:

इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।

कुबेरतुल्यः स भवेद्‌राजराजेश्वरो महान् ॥ १८ ॥

जो मनुष्य तीनों सन्ध्याकाल में इस परम पवित्र स्तोत्र का पाठ करता है, वह कुबेर के समान महान् राजराजेश्वर हो जाता है।

पञ्चलक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ।

सिद्धस्तोत्रं यदि पठेन्मासमेकं तु सन्ततम् ॥

महासुखी च राजेन्द्रो भविष्यति न संशयः ॥ १९ ॥

पाँच लाख जप करने पर मनुष्यों के लिये यह स्तोत्र सिद्ध हो जाता है। यदि कोई मनुष्य एक मासतक निरन्तर इस सिद्ध स्तोत्र का पाठ करे, तो वह परम सुखी तथा राजेन्द्र हो जायगा, इसमें सन्देह नहीं है ।

।।इति श्रीमद्देवीभागवते च श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे इन्द्रकृतं लक्ष्मी ध्यानस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

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