लक्ष्मी द्वादश व अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं
श्री लक्ष्मी द्वादशनाम स्तोत्रम् व
श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् का पाठ करने से मां लक्ष्मी शीघ्र ही
प्रसन्न हो मनचाहा फल प्रदान करती हैं और भक्तों द्वारा धन,
सुख और समृद्धि के लिए पाठ किया जाता है।
श्री लक्ष्मी द्वादशनाम व अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्
श्री लक्ष्मी द्वादशनाम स्तोत्रम्
श्रीगणेशाय नमः ।
॥ अथ श्री लक्ष्मी द्वादशनाम
स्तोत्र ॥
ईश्वरीकमला
लक्ष्मीश्चलाभूतिर्हरिप्रिया ।
पद्मा पद्मालया सम्पद् रमा श्री:
पद्मधारिणी ॥
द्वादशैतानि नामानि लक्ष्मी संपूज्य
य: पठेत् ।
स्थिरा लक्ष्मीर्भवेत्तस्य
पुत्रदारादिभिस्सह ॥
ईश्वरी,
कमला, लक्ष्मी, चला,
भूति, हरिप्रिया, पद्मा,
पद्मालया, संपद्, रमा,
श्री, पद्मधारिणी। इन १२ नामों से देवी
लक्ष्मी की पूजा की जाए तो स्थिर लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है।
इति: श्री लक्ष्मी द्वादशनाम
स्तोत्रम् ॥
श्री लक्ष्मी द्वादशनाम व अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
श्रीलक्ष्मी अष्टोत्तरशत नाम
स्तोत्रम्
श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
॥ अथ श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम
स्तोत्र ॥
देव्युवाच
देवदेव महादेव त्रिकालज्ञ महेश्वर ।
करुणाकर देवेश भक्तानुग्रहकारक ॥ १॥
अष्टोत्तरशतं लक्ष्म्याः
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
देवी ने कहा- हे देवाधिदेव महादेव !
हे त्रिकाल ज्ञाता महेश्वर! हे करुणाकर! हे भक्तों पर कृपा करने वाले दयालु
देवेश्वर! आपसे लक्ष्मी जी के १०८ नाम यथार्थ रूप में सुनना चाहती हूँ।
ईश्वर उवाच
देवि साधु महाभागे
महाभाग्यप्रदायकम् ।
सर्वैश्वर्यकरं पुण्यं
सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २॥
हे महा भाग्यवती साध्वी देवी! यह
स्तोत्र महान भाग्य प्रदान करने वाला, सभी
ऐश्वर्यों को देने वाला, पवित्र, सभी
पापों को दूर करने वाला है।
सर्वदारिद्र्यशमनं
श्रवणाद्भुक्तिमुक्तिदम् ।
राजवश्यकरं दिव्यं गुह्याद्गुह्यतमं
परम् ॥ ३॥
यह स्तोत्र समस्त दरिद्रता का शमन
करने वाला, सुनने मात्र से ही भोग-मोक्ष
देने वाला, राजा ( आज के समय में सरकारी व्यक्ति) को वश में
करने वाला, दिव्य, गुप्त से भी गुप्त, श्रेष्ठ है ।
दुर्लभं सर्वदेवानां
चतुःषष्टिकलास्पदम् ।
पद्मादीनां वरान्तानां विधीनां
नित्यदायकम् ॥ ४॥
यह स्तोत्र सभी देवों के लिये
दुर्लभ है, ६४ कलाओं को प्रकाशित करने वाला
है। पद्म आदि से लेकर वर पर्यंत विधियों को नित्य देने वाला है।
समस्तदेव संसेव्य मणिमाद्यष्टसिद्धिदम्
।
किमत्र बहुनोक्तेन देवी
प्रत्यक्षदायकम् ॥ ५॥
तव प्रीत्याद्य वक्ष्यामि
समाहितमनाः शृणुम् ।
यह समस्त देवों द्वारा सेवित,
अणिमादि आठ सिद्धियों को देने वाला है। यहाँ और अधिक क्या कहें यह
तो देवी लक्ष्मी के प्रत्यक्ष दर्शन करवाने वाला है। तुम्हारी प्रसन्नता के लिये आज
वह स्तोत्र कहता हूं, एकाग्र मन से सुनो!
अष्टोत्तरशतस्यास्य महालक्ष्मीस्तु
देवता ॥ ६॥
क्लींबीजपदमित्युक्तं शक्तिस्तु
भुवनेश्वरी ।
अङ्गन्यासः करन्यास स इत्यादिः
प्रकीर्तितः ॥ ७॥
विनियोगः- हाथ
में जल लेकर कहे ॐ अस्य श्री महालक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रस्य शिव ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, श्री महालक्ष्मी देवता,
क्लीं बीजं, ह्रीं शक्तिः श्री महालक्ष्मी
भगवती प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ।
इसके पश्चात् अङ्गन्यास (शरीर के
अंगों में मंत्रों का न्यास) और करन्यास (हाथों की उंगलियों और अंगों में मंत्रों
का न्यास) आदि करें।
ध्यानम् -
वन्दे पद्मकरां प्रसन्नवदनां
सौभाग्यदां भाग्यदां
हस्ताभ्यामभयप्रदां
मणिगणैर्नानाविधैर्भूषिताम् ।
भक्ताभीष्टफलप्रदां
हरिहरब्रह्मादिभिः सेवितां
पार्श्वे
पङ्कजशङ्खपद्मनिधिभिर्युक्तां सदा शक्तिभिः ॥ ८॥
जो कमल धारण करनेवाली,
प्रसन्न मुख वाली, सौभाग्य और समृद्धि प्रदान करनेवाली, अपने दोनों हाथों से अभय प्रदान करनेवाली, रत्नों
से सुशोभित, भक्तों की इच्छाएँ पूरी करनेवाली, कमल, शंख, और निधि
(धन-संपत्ति) रूपी शक्तियों से युक्त है और त्रिदेव (विष्णु, शिव, ब्रह्मा) भी जिनकी सेवा करते हैं, मैं उन देवी को प्रणाम करता हूँ।
सरसिजनयने सरोजहस्ते
धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि
प्रसीद मह्यम् ॥ ९॥
हे कमल जैसे नेत्रों वाली,
कमल धारण किए हुए हाथों वाली, अत्यंत श्वेत
वस्त्र, सुगंधित मालाओं से सुशोभित, भगवती, हरिप्रिया, मनमोहक, तीनों लोकों में ऐश्वर्य प्रदान करने वाली,
मुझ पर प्रसन्न हों।
श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम्
ॐ प्रकृतिं विकृतिं विद्यां सर्वभूतहितप्रदाम्
।
श्रद्धां विभूतिं सुरभिं नमामि
परमात्मिकाम् ॥ १०॥
वाचं पद्मालयां पद्मां शुचिं
स्वाहां स्वधां सुधाम् ।
धन्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं
नित्यपुष्टां विभावरीम् ॥ ११॥
अदितिं च दितिं दीप्तां वसुधां
वसुधारिणीम् ।
नमामि कमलां कान्तां कामा
क्षीरोदसम्भवाम् ॥ १२॥
अनुग्रहपदां बुद्धिमनघां
हरिवल्लभाम् ।
अशोकाममृतां दीप्तां
लोकशोकविनाशिनीम् ॥ १३॥
नमामि धर्मनिलयां करुणां लोकमातरम्
।
पद्मप्रियां पद्महस्तां पद्माक्षीं
पद्मसुन्दरीम् ॥ १४॥
पद्मोद्भवां पद्ममुखीं
पद्मनाभप्रियां रमाम् ।
पद्ममालाधरां देवीं पद्मिनीं पद्मगन्धिनीम्
॥ १५॥
पुण्यगन्धां सुप्रसन्नां
प्रसादाभिमुखीं प्रभाम् ।
नमामि चन्द्रवदनां चन्द्रां
चन्द्रसहोदरीम् ॥ १६॥
चतुर्भुजां
चन्द्ररूपामिन्दिरामिन्दुशीतलाम् ।
आह्लादजननीं पुष्टिं शिवां शिवकरीं
सतीम् ॥ १७॥
विमलां विश्वजननीं तुष्टिं
दारिद्र्यनाशिनीम् ।
प्रीतिपुष्करिणीं शान्तां
शुक्लमाल्याम्बरां श्रियम् ॥ १८॥
भास्करीं बिल्वनिलयां वरारोहां
यशस्विनीम् ।
वसुन्धरामुदाराङ्गीं हरिणीं
हेममालिनीम् ॥ १९॥
धनधान्यकरीं सिद्धिं सदा सौम्यां
शुभप्रदाम् ।
नृपवेश्मगतानन्दां वरलक्ष्मीं
वसुप्रदाम् ॥ २०॥
शुभां हिरण्यप्राकारां समुद्रतनयां
जयाम् ।
नमामि मङ्गलां देवीं
विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ॥ २१॥
विष्णुपत्नीं प्रसन्नाक्षीं
नारायणसमाश्रिताम् ।
दारिद्र्यध्वंसिनीं देवीं
सर्वोपद्रवहारिणीम् ॥ २२॥
नवदुर्गां महाकालीं
ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम् ।
त्रिकालज्ञानसम्पन्नां नमामि
भुवनेश्वरीम् ॥ २३॥
हे माँ आप ही प्रकृति, विकृति, विद्या,
सर्वभूतहितप्रदा, श्रद्धा, विभूति, सुरभि, परमात्मिका, वाक्
(वाणी), पद्मालया, पद्मा,
शुचि, स्वाहा, स्वधा, सुधा, धन्या, हिरण्ययी, लक्ष्मी,
नित्यपुष्टा, विभावरी, अदिति, दिति, दीप्ता,
वसुधा, वसुधारिणी, कमला, कान्ता, कामा, क्षीरोदसम्भवा, अनुग्रहप्रदा, बुद्धि, अनघा,
हरिवल्लभा, अशोका, अमृता, दीप्ता, लोकशोकविनाशिनी, धर्मनिलया, करुणा, लोकमातर, पद्मप्रिया,
पद्महस्ता, पद्माक्षी, पद्मसुन्दरी, पद्मोद्भवा, पद्ममुखी, पद्मनाभप्रिया, रमा, पद्ममालाधरा,
देवी, पद्मिनी, पद्मगन्धिनी, पुण्यगन्धा, सुप्रसन्ना, प्रसादाभिमुखी, प्रभा, चन्द्रवदना,
चन्द्रा, चन्द्रसहोदरी, चतुर्भुजा, चन्द्ररूपा, इन्दिरा, इन्दुशीतला, आह्लादजननी,
पुष्टि, शिवा, शिवकरी, सती, विमला, विश्वजननी, तुष्टि, दारिद्र्यनाशिनी, प्रीतिपुष्करिणी,
शान्ता, शुक्लमाल्याम्बरा, श्रिया, भास्करी, बिल्वनिलया, वरारोहा, यशस्विनी, वसुन्धरा,
उदाराङ्गी, हरिणी, हेममालिनी, धनधान्यकरी, सिद्धि, सदा सौम्या, शुभप्रदा, नृपवेश्मगतानन्दा,
वरलक्ष्मी, वसुप्रदा, शुभा, हिरण्यप्राकारा, समुद्रतनया, जया, मङ्गळा,
विष्णुवक्षःस्थलस्थिता, विष्णुपत्नी, प्रसन्नाक्षी, नारायणसमाश्रिता, दारिद्र्यध्वंसिनी,
देवी, सर्वोपद्रवहारिणी, नवदुर्गा, महाकाली, ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका, त्रिकालज्ञानसम्पन्ना,
भुवनेश्वरी हैं, मैं आप को नमस्कार करता हूँ।
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराजतनयां
श्रीरङ्गधामेश्वरीं
दासीभूतसमस्तदेववनितां लोकैकदीपाङ्कुराम् ।
श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्धविभवद्ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधरां
त्वां त्रैलोक्यकुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे
मुकुन्दप्रियाम् ॥ २४॥
जो सागर पुत्री,
विष्णु पत्नी, तीनों लोकों की पालनहार और सभी
देवताओं की पूजनीय हैं, जिनके सौम्य कटाक्ष से भी देवगण धन्य
हो जाते हैं और जिनका वास श्रीरंगधाम में है, जहाँ वे सदा
मुकुन्द के साथ विराजमान रहती हैं। मैं उस लक्ष्मीजी की वंदना करता हूँ।
मातर्नमामि कमले कमलायताक्षि
श्रीविष्णुहृत्कमलवासिनि विश्वमातः
।
क्षीरोदजे कमलकोमलगर्भगौरि लक्ष्मि
प्रसीद सततं नमतां शरण्ये ॥ २५॥
हे माता! हे कमले! कमल के समान
विशाल नेत्रों वाली, भगवान विष्णु के
हृदय-कमल में निवास करने वाली, जगत्जननी, क्षीरसागर से उत्पन्न, कमल के समान कोमल गौर वर्ण
वाली, शरण में आए जनों की रक्षक, सदैव प्रसन्न रहने वाली, हे देवी लक्ष्मी! आपको प्रणाम
है।
श्रीलक्ष्मीद्वादशनाम व अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
श्रीलक्ष्मी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र
फलश्रुति:
त्रिकालं यो जपेद्विद्वान् षण्मासं
विजितेन्द्रियः ।
दारिद्र्यध्वंसनं कृत्वा
सर्वमाप्नोत्ययत्नतः ॥ २६॥
जो विद्वान यह स्तोत्र तीनों
संध्याओं प्रातः, मध्याह्न, सायाह्न में ६ महीनों तक अपनी इंद्रियों-ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों
पर नियंत्रण रखते हुए जपता है, दरिद्रता को नष्ट करके सब कुछ
बिना प्रयास के ही प्राप्त कर लेता है।
देवीनामसहस्रेषु पुण्यमष्टोत्तरं
शतम् ।
येन श्रियमवाप्नोति
कोटिजन्मदरिद्रतः ॥ २७॥
देवी के सहस्रनाम स्तोत्र की तरह ही
यह पवित्र अष्टोत्तर शत नाम स्तोत्र है इससे करोड़ों जन्मों में दरिद्र हुआ
व्यक्ति हो तो भी उसे श्री की प्राप्ति होती है।
भृगुवारे शतं धीमान्
पठेद्वत्सरमात्रकम् ।
अष्टैश्वर्यमवाप्नोति कुबेर इव
भूतले ॥ २८॥
इस स्तोत्र का एक वर्ष तक प्रत्येक
शुक्रवार को १०० पाठ करे तो पाठ करने वाले को आठों प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त होते
हैं। वह भूमि पर कुबेर की तरह रहता है।
दारिद्र्यमोचनं नाम स्तोत्रमम्बापरं
शतम् ।
येन श्रियमवाप्नोति
कोटिजन्मदरिद्रितः ॥ २९॥
माँ लक्ष्मी का दरिद्रता मोचन नामक
यह श्रेष्ठ शतनाम स्तोत्र है इससे करोड़ों जन्म के दरिद्री को भी श्री प्राप्त
होती है।
भुक्त्वा तु विपुलान् भोगानस्याः
सायुज्यमाप्नुयात् ।
प्रातःकाले पठेन्नित्यं
सर्वदुःखोपशान्तये ।
पठंस्तु चिन्तयेद्देवीं
सर्वाभरणभूषिताम् ॥ ३०॥
इसका पाठ कर्ता अपने जीवन में विपुल
भोगों को भोग कर मृत्यु के उपरांत सायुज्य मुक्ति पाता है। इसको प्रतिदिन प्रातः
पढ़ने से सभी दुख शान्त हो जाते हैं। सभी आभूषणों से विभूषित देवी लक्ष्मी का
चिंतन करते हुए इस स्तोत्र को पढ़े।
॥ इति
श्रीलक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ इतिश्री श्री लक्ष्मी द्वादशनाम व अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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