क्रियोड्डीश महातन्त्रराज पटल १६
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज पटल १६
में त्र्यम्बकमृत्युञ्जयमन्त्र, मृतसञ्जीवनी विद्या,
भूतिनीसाधन, आद्याविभूषिणीसाधन, पराकुण्डलिनीसाधन, सिन्दूरहारिणीसाधन, सिंहिनीसाधन, हंसिनीसाधन, नटीसाधन, चेटीसाधन, कामेश्वरीसाधन, कुमारीसाधन, सुन्दरीसाधन, यक्षसाधन, भीमवक्त्रध्यान, महावक्त्रध्यान, हयाननध्यान, सिंहवक्त्रध्यान,महावीर ध्यान का वर्णन किया गया है।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराजः षोडशः पटल:
Kriyoddish mahatantraraj Patal 16
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज पटल १६
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज षोडश पटल
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज सोलहवाँ पटल
क्रियोड्डीश महातन्त्रराजः
अथ षोडशः पटल:
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६- त्र्यम्बकमृत्युञ्जयमन्त्रः
श्रीदेव्युवाच
इदानीं श्रोतुमिच्छामि पूर्वमुक्तं
च त्र्यम्बकम् ।
प्रभेदे कथितं देव शान्तिं मृतसञ्जीवनीम्
॥१॥
श्री देवी जी ने कहा- हे देव! अब
पूर्व में कहे गये त्र्यम्बक प्रयोग का मुझसे वर्णन कीजिये। साथ ही उसके प्रभेदरूप
में पठित मृतसञ्जीवनी विद्या का भी वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
ईश्वर उवाच
शृणु देवि ! प्रवक्ष्यामि यन्मां
त्वं परिपृच्छसि ।
मातॄणां तिसृणामम्ब गर्भजातो यतो
हरः ।। २।।
अतस्त्र्यम्बक इत्युक्तं मम नाम
महेश्वरि ।
वशिष्ठोऽस्य ऋषिः
प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतः ।। ३ ।।
देवताऽस्य समुद्दिश्यस्त्रम्बकः
पार्वतीपतिः ।
विभक्तैर्मन्त्रवर्णैश्च षडङ्गानां
च कल्पनाम् ।।४।।
ततश्च वह्निबीजेन समन्ताज्जलधारया ।
प्राचीरं चिन्तनं कुर्यात्ततः
सङ्कल्पमाचरेत् ॥५॥
पुनः संकल्प्य देवेशि !
भूतशब्छ्यादिकं च यत् ।
ततः पश्चात् करन्यासं कुर्याच्च मम
सुन्दरि ॥६॥
श्री ईश्वर ने कहा- हे देवि ! जो
तुम पूछती हो, वह कहता हूँ; श्रवण करो। मैं तीन मातृकाओं के गर्भ से उत्पन्न हूँ; इसी कारण हे महेश्वरि ! मेरा नाम त्र्यम्बक है। इसके ऋषि वशिष्ठ, छन्द अनुष्टुप् एवं देवता पार्वतीपति त्र्यम्बक हैं। विभक्त मंत्रवर्णों
से षडंग आदि की कल्पना करनी चाहिये। तत्पश्चात् वह्निबीज (रं) से जलधारा देनी
चाहिये। प्राचीरचिन्तन करके संकल्प का आचरण करना चाहिये। हे देवेशि ! हे सुन्दरी!
पुनः संकल्प करके भूतशुद्धि करने के पश्चात् करन्यास करना चाहिये ॥२-६॥
त्र्यम्बकं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
यजामहे तर्ज्जनीभ्यां स्वाहा । सगन्धिं पुष्टिवर्धनं मध्यामाभ्यां वौषट् ।
ऊर्वारुकमिक बन्धनादनामिकाभ्यां हुम्। मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठाभ्यां वौषट् ।
मामृतात् करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिषु ।
उपरोक्त करन्यास के पश्चात् हृदयादि
न्यास करना चाहिये।
ततो द्वाविंशन्मन्त्रवर्णाभ्यसेत्
पूर्वपश्चिमयाम्योत्तरेषु वक्त्रेषु४ | उरोगलोर्ध्वास्ये
३ । पुनर्नाभिहृत्पृष्ठकुक्षिषु४ । लिंगपायूरुमूलान्ते ६ । जानुयुग्मे २।
गुल्फयोर्युग्मे २ । स्तनयोः २ । पार्श्वयोः २। पादयोः २ । पाण्योः २ । नासिकयोः २
। शीर्षे १ । मन्त्रवर्णान्त्र्यसेत्क्रमात् पुनस्ततः पादाद्येकादशस्थानेषु
न्यसेत् । शिरो १ श्रूयुगला १ क्षिषु १ वक्त्रे १ गण्डयुगे १ भुजयोः २ हृदये १
जठरे १ पुनः गुह्यो १ रु १ जानु१ पादेषु १ न्यासमेवं समाचरेत् ।
तदुपरान्त ३२ मन्त्रवर्णों द्वारा
३२ अंगों का न्यास करे । पूर्व, पश्चिम,
दक्षिण, उत्तर मुख में; वक्षःस्थल,
गलप्रदेश व ऊर्ध्व मुख में न्यास करे। तत्पश्चात् नाभि, हृदय, पीठ (पृष्ठ ) एवं कुक्षियों में न्यास करे।
लिङ्ग, गुदप्रदेश, जंघामूल में न्यास
करे। जानुयुग्म में, दोनों गुल्फों में, दोनों स्तम्भों में, दोनों बगलों में, दोनों पैरों में एवं दोनों हाथों में न्यास करे। दोनों नासिकाछिद्रों में,
शिर में तथा ग्यारह पैर आदि स्थानों में न्यास करे। शिर में,
दोनों भौहों में, दोनों नेत्रों में, मुख में, दोनों कनपटी में, दोनों
भुजाओं में, हृदय में एवं उदर में न्यास करे। तत्पश्चात् गुह्य,
उरु, जानु एवं पैरों में न्यास करे ।
तत उक्तध्यानेन ध्यात्वा
मानसोपचारैः सम्पूज्य विशेषार्घ्यं संस्थाप्य शैवोक्तपूजावाहनादिकं
पञ्चपुष्पाञ्जलीन्दत्त्वा वरुणं पूजयेत् । त्र्यम्बकं हृदयाय नमः। इत्यादि
षडङ्गानि पूजयेत्। ततोऽष्टपत्रेषु ॐ अर्काय नमः । एवमिन्दवे,
वसुधायै, जलाय, वह्नये,
वायवे, व्योम्ने, यजमानाय,
तद्वाह्ये पूर्वादितः ॐ रामाय नमः, ॐ राकायै
नमः, ॐ प्रभायै नमः । ॐ ज्योत्स्नायै नमः । ॐ पूर्णायै नमः ।
ॐ उषसे नमः । ॐ पूषायै नमः । ॐ स्वधायै नमः । ॐ विश्वायै नमः। ॐ विद्यायै नमः । ॐ
सितायै नमः । ॐ कृत्यै नमः । ॐ श्रद्धायै नमः । ॐ सरायै नमः । ॐ सन्ध्यायै नमः । ॐ
दिवायै नमः । ॐ निशायै नमः । तद्वाह्ये ॐ आर्यायै नमः । ॐ आर्द्रायै नमः । ॐ
प्रज्ञायै नमः । ॐ मेघायै नमः । ॐ कान्त्यै नमः। ॐ शान्त्यै नमः । ॐ पुष्ट्यै नमः
। ॐ बुद्ध्यै नमः । ॐ घृत्यै नमः। ॐ मत्यै नमः। ततो धूपादिविसर्जनान्तं कर्म
समापयेत् ।
तदनन्तर पूर्वकथित ध्यान के द्वारा
मानसिक पूजन कर, विशेषार्घ्यं स्थापित कर
शैवोक्त पूजन एवं आवाहनादि करके पाँच पुष्पांजलि प्रदान करके वरुणदेव का पूजन करे
। त्र्यम्बकं हृदयाय नमः इत्यादि से षडंगपूजन करे । तत्पश्चात् अष्ट कमलदल के मध्य
में इस प्रकार पूजन करे- ॐ अर्काय नमः । इन्दवे नमः। वसुधायै नमः । जलाय नमः ।
वह्नये नमः। वायवे नमः। व्योम्ने नमः। यजमानाय नमः। कमलदल के बाह्य भाग में
पूर्वादि क्रम से पूजन करे। ॐ रामाय नमः। ॐ राकायै नमः । ॐ प्रभायै नमः । ॐ
ज्योत्स्नायै नमः । ॐ पूर्णायै नमः । ॐ उषसे नमः । ॐ पूषायै नमः । ॐ स्वधायै नमः ।
ॐ विश्वायै नमः। ॐ विद्यायै नमः। ॐ सिताय नमः । ॐ कृत्यै नमः । ॐ श्रद्धायै नमः ।
ॐ सरायै नमः । ॐ सन्ध्यायै नमः । ॐ दिवायै नमः । ॐ निशायै नमः । उसके बाहरी भाग
में ॐ आर्यायै नमः । ॐ आर्द्रायै नमः । ॐ प्रज्ञायै नमः । ॐ मेधायै नमः । ॐ
कान्त्यै नमः । ॐ शान्त्यै नमः । ॐ पुष्ट्यै नमः । ॐ बुद्ध्यै नमः । ॐ धृत्यै नमः
। ॐ मर्त्यै नमः । तदुपरान्त धूप आदि द्वारा विसर्जन कर्म करे।
प्रयोगस्तु शनैश्चरे कुजे वा
अश्वत्थमूलं स्पृष्ट्वा सहस्रं जपेत् ।
पुरश्चरणविधानेन सर्वं
कुर्यान्महेश्वरि ।
साक्षान्मृत्योर्विमुच्येत किमन्याः
क्षुद्रिकाः क्रियाः ।।७।।
प्रत्यहं जुहुयान्मन्त्री
चतुःस्थण्डिलविधानतः ।
द्विसहस्रं दूर्वावटजवाभि करवीरकैः
।।८।।
बिल्वपत्रं पलाशञ्च तथा
कृष्णापराजिता ।
वटवृक्षस्य समिधं जुहुयादयुतावधिः
।।९।।
धनधान्यसमृद्धिः स्यात्सत्यं सत्यं
महेश्वरि ! ।।१०।।
यह प्रयोग शनिवार अथवा मंगलवार के
दिन करना चाहिये तथा अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष को स्पर्श कर मन्त्र का एक हजार जप करना
चाहिये। हे महेश्वरि ! पुरश्चरण-विधान में समस्त कर्म करना चाहिये। इस प्रयोग के
करने से साक्षात् मृत्यु से भी मुक्ति प्राप्त होती है;
अन्य क्षुद्र क्रियाओं का तो कहना ही क्या है। साधक को चाहिये कि
प्रतिदिन चतुःस्थण्डिल में विधानपूर्वक हवन करे। दो हजार दूर्वा (दूब), वट, जवा, कनेर पुष्प, बिल्वपत्र, पलाश तथा कृष्णापराजिता एवं वटवृक्ष की
समिधा — इन सब वस्तुओं से दश हजार हवन करने पर साधक के
धन-धान्य की वृद्धि होती है। यह निःसन्देह सत्य है ।। ७-१०।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – मृतसञ्जीवनी विद्या
अतः परं देवि! शृणु मृतसञ्जीविनीं
तथा ।
आदौ प्रासादबीजं तदनु मृतिहरं तारकं
व्याहृतिं च ।
प्रोच्चार्य त्र्यम्बकं यो जपति च
सततं संपुटं चानुलोमम् ।। ११॥
त्र्यम्बकमिति मृत्युञ्जयमन्त्रस्य जपात्सर्वसिद्धिर्भवति
।
एतन्मन्त्रं जपेदाशु व्याधिमुक्तो
भवेद्ध्रुवम् ।।१२।।
हे देवि ! अब मृतसंजीवनी विद्या का
श्रवण करो। सर्वप्रथम सर्वप्रासाद बीज (हौं) का उच्चारण करे;
तत्पश्चात् मृतिहर बीज, तारक तथा व्याहृति का
उच्चारण कर जो साधक निरन्तर सम्पुट तथा अनुलोम से त्र्यम्बक मन्त्र का जप करते हैं,
उनको मृत्युञ्जय त्र्यम्बक मंत्र के प्रसाद से सर्वसिद्धि प्राप्त
होती है। इस मन्त्र के जप से निश्चित रूप से साधक व्याधिमुक्त हो जाता है ।। ११-१२
॥
प्रासाद बीज - हौं,
मृतिहरबीज- ॐ जूं सः, तारकम् — ॐ, व्याहृति — भूर्भुवः स्वः ।
ध्यानं शृणु महादेवि-
स्वच्छं स्वच्छारविन्दं
स्थितमुभयकरे संस्थितौ पूर्णकुम्भौ
पाण्योर्हेलाक्षमाले निजकरकमले द्वौ
घटौ नित्यपूर्णौ ।
द्वाभ्यां तौ च स्रवन्तौ शिरसि
शशिकला चामृतैः प्लावयन्ती
देहं देवो दधानो विदिशतु विशदा
कल्पजालां श्रियं नः ।। १३ ।।
एवं ध्यात्वा त्र्यम्बकाय
महारुद्राय नमः ।
महाघोरं यदि तदा पूजयेत्परमेश्वरम्
।। १४ ।।
ततः सुरसुन्दरीत्यादि योगिनीसाधनम्
।
ततो भूतिनीसाधनम् ।
हे महादेवि! अब ध्यान का श्रवण करो।
दोनों हाथों में स्वच्छ कमलदल धारण करने वाले; दो
हाथों में पूर्ण कुम्भ धारण करने वाले; दो हाथों में हेलाक्ष
धारण करने वाले दो हाथों में पूर्ण एवं स्रावी घट धारण करने वाले; शिरोभाग में अमृतस्त्राविणी शशि (चन्द्रमा) को धारण करने वाले श्री सदाशिव
कल्पजाल तक हम लोगों को श्री प्रदान करें।
इस प्रकार त्र्यम्बक महारुद्र का
ध्यान करके मन्त्र जप का प्रयोग करते हुये परमेश्वर सदाशिव का ध्यान करे।
तदुपरान्त सुरसुन्दरी आदि साधना करने के पश्चात् भूतिनी साधना करनी चाहिये ॥ १३-१४
॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – भूतिनीसाधनम्
श्रीदेव्युवाच
योगिनी साधनं ज्ञातं
भूतिनीसाधनोत्तमम् ।
तद्वदस्व महादेव! कृपास्ति यदि मां
प्रति ।। १५ ।।
श्री देवी जी ने कहा- हे महादेव !
योगिनी साधन का ज्ञान मुझे हो चुका अब यदि आपकी मेरे प्रति कृपा है तो भूतिनी-साधन
का भी वर्णन कीजिये ॥ १५॥
विशेष-
इस ग्रन्थ में योगिनी साधन नहीं दिया गया है; इससे
प्रतीत होता है कि ग्रन्थ का कुछ भाग अवश्य ही खण्डित है।
श्रीश्वर उवाच
आद्या विभूषिणी देवी
पराकुण्डलधारिणी ।
हारिणी सिंहिनी चैव हंसिनी च ततो
नटी ।। १६ ।।
कामेश्वरी तथा प्रोक्ता रतिदेवी ततः
प्रिया ।
इत्यष्टौ नायिकाः प्रोक्ताः
साधकानां सुखावहाः ।। १७ ।।
श्री ईश्वर ने कहा- हे प्रिये! आठ
नायिकायें साधक वर्ग के लिए सुखप्रदायक हैं। यह हैं— आद्या विभूषिणी, पराकुण्डलधारिणी, हारिणी, सिंहिनी हंसिनी, नटी,
कामेश्वरी एवं रति देवी ॥ १६-१७॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – आद्याविभूषिणीसाधनम्
यथामन्त्रं महेशानि आद्या विभूषिणी
तथा ।
मंत्र:
हूँ फट् फट् ह्रीं भूतिनीं हूं हूं
हूं ।
क्रोधास्त्रद्वयं मायान्ते भूतिनीं
च त्रिकूर्चतः ।। १८ ।।
अथवा - शृणु देवेशि ॐ ह्रीं ह्रीं
फट् फट् विभूषिणी हूं हूं हूं ।
तारं लज्जाद्वयास्त्रद्वयं
विभूषिणीक्रोधद्वयम् ।
हे महेशानि! जिन मन्त्रों से आद्या
विभूषिणी का साधन करना चाहिये। वे हैं - हूं फट् फट् ह्रीं भूतिनीं हूं हूं हूं।
क्रोध द्वय (हूं हूं), अस्त्र द्वय - (फट्
फट्) मायान्त (ह्रीं) में भूतिनी बीज, त्रिकूर्च मिश्रित
करे। अथवा हे देवेशि ! मद इस प्रकार भी है— ॐ ह्रीं ह्रीं
फट् फट् विभूषिणी हूं हूं हूं। तार (ॐ लज्जाद्वयास्त्रद्वय (ह्रीं ह्री फट् फट्)
विभूषिणी क्रोधद्वय (हुं हुं) मिश्रित करे ।। १८ ।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – ध्यानम्
दक्षे कर्त्तरिकां परेऽसिलतिकां
हस्ताब्जके विभ्रतीं
ह्युत्तुङ्गस्तनशोभिवक्षसि
चलैर्हारादिभिः शोभिता ।
दन्तान्तर्गतमांसशोणितवसासिक्तास्ति
यस्यास्तनुः
कालश्यामलवर्णिकार्येगभुजंगैर्वेष्टिता
रक्षतु ।। १९ ।।
दक्षिण हाथ में कर्त्तरी ( कैंची)
तथा दूसरे हाथ में तलवार धारण करनेवाली, ऊंचे
कुम्भ के समान स्तन वाली, वक्षस्थल में आभूषण धारण करने वाली,
दांतों के अग्रभाग से दुष्टों के मांस, रक्त
एवं वसा (चर्बी) को चबाकर पीने से जिसका शरीर भीग गया है, ऐसी
काल के समान श्यामल वर्ण वाली तथा आम्र के आश्रित व भुजंगों से वेष्टित देवी हमारी
रक्षा करे ॥ १९ ॥
स्थानं वृक्षतले तत्र यामिन्यां
दिवसत्रयम् ।
जपेदष्टसहस्रं तु
ध्यायेदेकाग्रमानसः ।। २० ।।
जपान्ते च महापूजा पुनर्धूपं
निवेदयेत् ।
चन्दनोदकमिश्रेण दत्त्वार्घ्यं
तुष्यति ध्रुवम् ।। २१ ।।
माता वा भगिनी भार्या हृष्टा भवति
कामिता ।
करामलकतां कृत्वा माता भूत्वा
जगत्त्रयम् ।। २२ ।।
शताष्टपरिवारस्य ददात्यञ्जनभूषणम् ।
भगिनी चेन्महाभागा सहस्रयोजनादपि ।।
२३ ।।
ददाति स्त्रियमानीय दिव्यं रसं
रसायनम् ।
भार्या चेत्पृष्ठमारोप्य स्वर्गं
प्रयाति नित्यशः ।। २४ ।।
दीनाराणां सहस्रन्तु रसं चैव
रसायनम् ।
सर्वाशां पूरयत्येव सदा देवी
विभूषिणी ।। २५ ।।
तीन रात्रि तक (अश्वत्थ) वृक्ष के
नीचे ध्यान कर एकाग्र मन से आद्या विभूषिणी के मन्त्र का आठ हजार जप करे। जप के
अन्त में महापूजा करे तथा फिर धूप का निवेदन करे अर्थात् प्रदान करे। चन्दनमिश्रित
अर्घ्य प्रदान करने से भूतिनी सन्तुष्ट होती है। अपनी इच्छानुसार माता,
भगिनी या भार्यारूपों का ध्यान कर उसका पूजन करे। इससे देवी प्रसन्न
होकर अभीष्ट वर प्रदान करती है। यदि देवी की माता के रूप साधना की जाती है तो
दिव्य दृष्टि मिलती है। वह साधक के एक सौ आठ परिवारों का पालन करती है तथा दिव्य
अंजन प्रदान करती है । भगिनी (बहन) होने पर सहस्र योजन दूर स्थित दिव्य स्त्री
लाकर देती है तथा रस, रसायन आदि प्रदान करती है। भार्या
(पत्नी, प्रिया) होने पर साधक को अपनी पीठ पर चढ़ाकर नित्य
ही स्वर्ग को ले जाती है, सहस्रों स्वर्णमुद्रायें एवं रस,
रसायन प्रदान करती है। इस प्रकार देवी साधक की समस्त कामनायें पूर्ण
करती है। २०-२५ ।।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – पराकुण्डलिनीसाधनम्
पराकुण्डलिनीध्यानं शृणु देवि!
महेश्वरि ! ।
कर्णे कुण्डलधारिणी शशिमुखी,
लीलावती सस्मिता
शैलश्रोणिविलम्बिकाञ्चिवितता
व्यामुग्धलोकत्रया ।
मुक्ताहारमरीचिकान्तिविलसत्प्रोत्तुङ्गकुम्भस्तनी
पायात्कुण्डलधारिणी
त्रिजगतामानन्दसन्दोहभूः ।। २६ ।।
हे देवि ! हे महेश्वरि ! अब
पराकुण्डलिनी का ध्यान श्रवण करो। कुण्डलों से विभूषित कानों वाली,
चन्द्रमा के समान मुखवाली, त्रिलोक को मुग्ध
करने वाली, मोतियों के हार की कान्ति से विभूषित, उन्नत कुम्भ के समान स्तनों वाली तीनों लोकों को आनन्द प्रदान करने वाली
देवी कुण्डलधारिणी हमारी रक्षा करें ॥ २६ ॥
विशेष-
इस ग्रन्थ में इसका मन्त्र नहीं दिया गया है। फेत्कारिणी तन्त्र के अनुसार इसका
मन्त्र इस प्रकार होगा ॐ ॐ ह्रीं ह्रीं फट् फट् कुण्डलधारिणी हूं हूं हूं फट् ।
श्मशाने पूजयेदेतामयुतं जपमाचरेत् ।
आयाति तत्क्षणाद्देवी ततः
कुण्डलधारिणी ।। २७ ।।
साधकेनापि रक्तार्घ्यं देयं तुष्टा
वदत्यपि ।
किं कर्त्तव्यं मया वत्स
मातरुक्त्वेति साधकः ।। २८ ।।
पञ्चाशतञ्च दीनारान्देहि
त्रैलोक्यदायिनि ।
श्मशान में इसका पूजन करे तथा दश
हजार जप करे। देवी कुण्डलधारिणी उस समय प्रसन्न होकर साधक के सामने प्रकट हो जाती
है। साधक भी उसे रक्त का अर्घ्य देकर सन्तुष्ट करे। इससे देवी प्रसन्न होकर कहती
है- हे वत्स! मेरा क्या कार्य है? तब साधक कहे
हे माता ! तू त्रैलोक्यदायिनी हो; अतः पचास स्वर्ण मुद्रायें
मुझे प्रदान करो।। २७-२८ ।।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – सिन्दूरहारिणीसाधनम्
अतः परन्तु चार्वङ्गि!
सिन्दूरहारिणीमनुः ।। २९ ।।
क्रोधद्वयेन्दुसंयुक्तः
सिन्दूरहारिणीपदम् ।
कूर्चबीजत्रयं चास्त्रं सम्प्रोक्तं
विविधं तथा ।। ३० ।।
हे चार्वङ्गि ! अब सिन्दूरहारिणी का
मन्त्र कहते हैं- इन्दु (ऐं) से संयुक्त क्रोधद्वय (हुं हुं ) । सिन्दूरहारिणी पद
का उच्चारण करके कूर्चबीजत्रय (हूं हूं हूं) फट् का उच्चारण करने पर सिन्दूरहारिणी
मन्त्र का उद्धार होता है ।। २९-३०॥
ध्यानम्
सिन्दूराकृतिहारिणी
चलदलव्यालोलशाखास्वरा
सोत्कण्ठीकृतगात्रयष्टिशुभगा
शुभ्रांशुचन्द्रस्मिता ।
अन्तः सन्ततदन्तकान्तिमलिना
त्रैलोक्यशोभाकरी
पायादुन्नतबाहुयुग्मलतिका
सिन्दूरहारिण्यसौ ।। ३१ ।।
सिन्दूर के समान आकृति वाली,
पीपल के पत्ते की भाँति कम्पायमान ज्वर, उत्कण्ठित
देह से सुशोभित, सुन्दर उज्ज्वल हास्ययुक्त मलिन दन्तकान्ति
वाली, त्रिलोक को शोभित करने वाली एवं दीर्घ बाहुयुक्त
सिन्दूरहारिणी देवी हमारी रक्षा करे॥ ३१ ॥
शून्ये देवालये गत्वा निर्जने निशि
साधकः ।
तत्त्वसंख्यादिनं यावज्जपस्तत्त्वसहस्रकः
।। ३२ । ।
तदन्ते महतीं पूजां
वस्त्रालङ्कारभूषणैः ।
कुर्यात्साधकवर्यस्तु भार्या भवति
कामिता ।। ३३ ।।
वरं वरय शीघ्रं त्वं प्रोक्ता
सिन्दूरहारिणी ।
रक्षति द्वादशदिनं देवि
सिन्दूरहारिणी ।। ३४ ।।
साधक निर्जन तथा जनशून्य देवालय में
रात्रि में जाकर २५ दिन तक १५ हजार जप करे; तदुपरान्त
वस्त्र एवं अलंकारों से देवी की महापूजा करे। इस प्रकार करने पर देवी प्रसन्न होकर
साधक की भार्या बन जाती है और साधक से कहती है कि हे साधक ! वर मांग। साधक उससे
अपनी भार्या होने को कहे। त्पश्चात् देवी साधक की बारह दिनों तक उसकी रक्षा करती
है ।। ३२-३४॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – सिंहिनीसाधनम्
अतः परं देवि! शृणु सिंहिन्याश्च
महामनुम् ।
मायाद्वयं क्रोधद्वयं सिंहिनीति
पदन्ततः ।। ३५ ।।
पुनः क्रोधं तदन्ते च सिंहिनी च
महामनुः ।
ह्रीं ह्रीं फट् फट् सिंहिनी हूं
हूं फट् ।। ३६ ।।
शैलाये निर्जने वापि सिंहिन्याः
पूजनं तथा ।। ३७ ।।
हे देवि ! अब सिंहिनीमन्त्र का
श्रवण करो। दो मायाबीज (ह्रीं ह्रीं), दो
क्रोधबीज (फट् फट्), सिंहनी पद, तदुपरान्त
क्रोधबीज (हूं हूं फट् ) -- इनके द्वारा सिंहनी का मन्त्र बनता है। सिंहनी का पूजन
पर्वत शिखर पर या निर्जन स्थान में करना चाहिये ।। ३५-३७॥
ध्यानम्
शैलाग्रक्रमदुर्गमन्तु
अटवीदुर्गास्तु दैत्याहते
केशाग्रस्थ समस्त विष्णुचरणं
प्रभ्रष्टसंसिंहिनी ।
यावन्तो बलदण्डवारणबलात् प्रक्षु
क्वसिद्धाङ्गना
शेषं पातु
समस्तमन्तककुलव्याकल्पभाना कला ।। ३८ ।।
उपरोक्त ध्यान सिंहिनी का है। इस
ध्यानमन्त्र को पूजन के समय अवश्य ही उच्चारित करना चाहिये ॥ ३८ ॥
'फेत्कारिणी तन्त्र' में इसका ध्यान इस प्रकार मिलता है-
शैला- द्रुम-दुर्ग -
दन्तुरदरी दुर्गान्त दैत्यस्थिता
केशत्रस्त समस्त
विश्वचरणा प्रभ्रष्ट चन्द्रासनी ।
यावत्तारविदन्त धारण- वन
प्रक्षुब्ध-सिद्धाङ्गना
सेयं पातु
समस्तमस्तककुलव्यालम्बिमालाकुला ।।
गत्वैकलिङ्गं यामिन्यां प्रजपेदयुतं
मनुम् ।
ततो हृष्टातिवरदा सिंहिनी चेति
पूजिता ।।३९।।
किं करोमि वदत्येव भार्या भवति
कामिता ।
दिनावसाने यामिन्यां सिंहिन्यायाति
राति च ।
वस्त्रयुग्मं रसमयं साधकाय दिने
दिने ।। ४० ।।
रात्रि के समय एकलिङ्ग अर्थात्
शिवमन्दिर में जाकर दश हजार मन्त्र का जप करे। मन्त्र के जप व पूजन से वरदायिनी
सिंहिनी देवी प्रसन्न होकर साधक से कहेगी - हे साधक ! मैं तेरे लिये क्या करूँ,
आज्ञा कर। साधक इच्छानुसार (भगिनी, माता,
भार्या बनने का) वर मांगे। सिंहिनी देवी साधक को प्रतिदिन वस्त्र एवं
रसमय पदार्थ प्रदान करती है ।। ३९-४० ॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – हंसिनीसाधनम्
अतः परं शृणु चार्वङ्गि हंसिनीसाधनक्रमम्
।
ॐ हूं हूं हूं फट् हंसिनी ।
प्रणवञ्च त्रिकूर्चास्त्रहंसिनीकथितो
मनुः ।। ४१ ।।
हे चार्वङ्गि ! अब हंसिनीसाधन की
विधि का श्रवण करो। ॐ हूं हूं हूं फट् हंसिनी — यह
हंसिनीसाधना हेतु मन्त्र है ॥ ४१ ॥
ध्यानम्
शुभ्रा शुभ्रसरोजतुल्यनयना
सायुग्मबाणान्विता
शुश्रूषा कुलमुग्धसाध्यवनिता
संसेविता सादरम् ।
किञ्चित्तिर्यगपाङ्गलोलवलितव्यामुग्धस्मेरानना
दिव्या काञ्चनरत्नहारललिता
श्रीहंसिनी पातु नः ।। ४२ ।।
श्वेत एवं कृष्ण कमलदल के समान
नेत्रवाली, दो शर से युक्त, सेवा में तत्पर, मुग्ध, साध्य
वनिता से आदरपूर्वक सेवित, कुछ एक अपाङ्ग भाग को तिरछा कर
मधुर हास्य करने वाली, मनोहर स्वर्णमाला को धारण करने वाली
हंसिनी देवि हमारी रक्षा करे ॥ ४२ ॥
वज्रपाणिगृहं गत्वा प्रतिमां शोभनां
लिखेत् ।
अवधानेन सम्पूज्य जपेदयुतसंख्यकम्
।। ४३ ।।
यावदर्धनिशा देवी हंसिन्यायाति
निश्चितम् ।
चन्दनार्घ्यप्रदानेन दृष्टा भवति
हंसिनी ।। ४४ । ।
किं मया ते प्रकर्त्तव्यं शीघ्रं
तद्वद साधक ! ।
वस्त्रालङ्कारभोज्यानि दिव्यार्थं
सम्प्रयच्छति ।। ४५ ।।
अवशेषव्ययाभावान्न ददाति प्रकुप्यति
।। ४६ ।।
वज्रपाणि (बौद्ध) के गृह (मन्दिर)
में प्रवेश करके हंसिनी देवी को प्रतिमा लिखे तथा सतर्कतापूर्वक मन्त्र का दश हजार
जप करे। हे देवि! आधी रात के समय हंसिनी देवी साधक के सम्मुख आकर उपस्थित होगी। उस
समय साधक चन्दनादि द्रव्यों द्वारा देवी का आनन्दपूर्वक पूजन करे तथा अर्घ्य प्रदान
करे। प्रकट होने पर देवी साधक से कहती है— हे
साधक ! इस समय मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ ? आज्ञा कर इस
प्रकार कहकर देवी साधक को वस्त्र, आभूषण, भोज्य पदार्थ आदि प्रदान करती है। साधक इन सभी पदार्थों को पूर्णतः व्यय
कर दे; अपने पास कुछ भी न रक्खे; अन्यथा
देवी क्रुद्ध हो जाती है।।४३-४६॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – नटीसाधनम्
इतः परं महामाये शृणु मे नटीसाधनम्
।
ॐ हूँ हूँ फट् फट् नटी हूँ हूँ हूँ
।। ४७ ।।
तारं कूर्चक्रोधास्त्रद्वयतो नटीति
पदमुद्धरेत् ।
कूर्चत्रयन्तु मन्त्रोऽयं कथितो
नर्तकीमनुः ।। ४८ ।।
हे महामाये! अब नटीसाधन के क्रम को
मुझसे श्रवण करो। ॐ हूं हूं फट् फट् नटी हूं हूं हूं- यह नटी का मनु अर्थात्
मन्त्र है। इसे नर्तकी मन्त्र भी कहते हैं ।। ४७-४८॥
ध्यानम्
फुल्लेन्दीवरसुन्दरोदरमुखी
प्रोत्तुङ्गकुम्भस्तनी
द्योतन्ती मृगमीनयुग्मनयना सानन्दमन्दस्मिता
।
क्षीराम्भोनिधिसम्भवा विलसिता
भक्तारिसंनाशिनी
वीणागीतविशालिनी भगवती
व्याहारवाक्चातुरी ।। ४९ ।।
खिले हुये कमलदल के समान मुख एवं
उदर वाली,
अत्यन्त ऊंचे कलश के समान स्तन वाली, मृग एवं
मीन के समान नेत्र वाली, आनन्दपूर्वक मन्द मन्द हास्य करने वाली,
क्षीरसागर से उत्पन्न, भक्तों के शत्रुओं का
नाश करने वाली, वीणा के द्वारा मनोहर गान करने वाली, मृदुभाषिणी भगवती नटी का हम ध्यान करते हैं ॥ ४९ ॥
नीचपाशं गमं गत्वा सप्ताहजपपूजने ।
नटी सुसिद्धा भवति धूपं
दद्यान्मुहुर्मुहः ।। ५० ।।
चन्दनेनार्घ्यं देयन्तु नैवेद्यञ्च
मनोहरम् ।
सुवर्णफलमेकन्तु व्ययं
त्यक्त्वानुगच्छति ।
सदा कामभोगदात्री भार्या भवति
नर्तकी ।। ५१ ।।
दिने दिने नटी देवी स्थायिनी भवति
ध्रुवम् ।।५२ ।।
नीचे के स्थान में जाकर एक सप्ताह
तक जप व पूजन करे। बार-बार धूप देने से नटी प्रसन्न होती है तथा साधक को तत्क्षण
सिद्धि की प्राप्ति होती है। चन्दनमिश्रित अर्घ्य एवं मनोहर नैवेद्य प्रदान करने
पर नटी नर्तकी स्त्री की भाँति प्रसन्न होती है तथा साधक को समस्त कामभोग प्रदान
करती है। नटी देवी साधक को स्वर्ण आदि प्रदान करती हुई स्थिर रहती है। नटी द्वारा
प्रदत्त धन को पूर्णत: व्यय कर देना चाहिये; लेशमात्र
भी शेष नहीं रखना चाहिये ।। ५०-५२॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६ – चेटीसाधनम्
अतः परं महादेवि चेट्या आकर्षणं
शृणु ।। ५३ ।।
मन्त्रो यथा
तारं कूर्चद्वयान्ते च अस्त्रयुग्मं
ततः परम् ।
चेटी क्रोधद्वयञ्चोक्तं चेटी
मन्त्रोत्तमोत्तमः ।। ५४ ।।
हे महादेवी! अब चेटी का आकर्षण
श्रवण करो। तार (ॐ), कूर्चद्वय (हूं
हूं), अस्त्रयुग्म (फट् फट्), चेटी,
क्रोधद्वय (हूं हूं) - इस प्रकार चेटी का मन्त्र है - ॐ हूं हूं फट्
फट् चेटी हूं हूं ॥ ५३-५४॥
ध्यानम्
देव्येषाऽमृतभाषिणी शशिमुखी
भ्रष्टोत्तरीयाधरा
बिभ्राणा कलशं सरोजममलं स्वर्णं च
सीमन्तके ।
श्रीखण्डादिदिलेपनामलवपुः
सौरभ्यसम्भाविता
किञ्चिद्धर्मसमाहितापिकरवा
पायात्प्रभा चेटिका ।। ५५ ।।
अमृतभाषिणी,
चन्द्रमुखी, भ्रष्ट उत्तरीय को धारण करने वाली,
मनोहर अधरोष्ठ वाली, सुन्दर कलश धारण करने
वाली, मांग (सीमान्त) में स्वर्ण धारण करने वाली, श्रीखण्ड (चन्दन) आदि के लेप से सुगन्धित शरीर वाली, कोकिला के समान सुन्दर मनोहर कण्ठ वाली यह चेटी देवी हमारी रक्षा करे॥ ५५
॥
अत्रापि भीषणस्थाने
नामोच्चारणमात्रतः ।
ध्रुवं चेटी समागत्य चेटीकर्म करोत्यपि
।। ५६ ।।
अथवा स्वगृहद्वारे त्र्यहं रात्रौ
जपं चरेत् ।
आगत्य नियतं देवी चेटीकर्म करोति च
।।५७।।
भीषण स्थान में नाम के उच्चारणमात्र
से ही चेटी देवी निश्चित रूप से आती है एवं चेटीकर्म करती है अथवा स्वयं के घर पर
तीन दिन एवं तीन रात्रि तक मन्त्र का जप करने से चेटी देवी आकर चेटी (दासी) का
कर्म करती है ।। ५६-५७॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६- कामेश्वरीसाधनम्
कामेश्वरीप्रयोगः
तारं कूर्चास्त्रयुग्मं कामेश्वरी
भूतिनी ततः ।
परं ङेन्तं क्रोधत्रयं कामेश्वर्या
मनुः स्मृतः ।। ५८ ।।
तार (ॐ),
कूर्च (हूं), अस्त्रयुग्म (फट् फट्), कामेश्वरी भूतिन्यै हूं हूं हूं। इस प्रकार कामेश्वरी का मन्त्र है - ॐ
हूं फट् फट् कामेश्वरी भूतिन्यै हूं हूं हूं ॥ ५८ ॥
ध्यानम्
ॐ तालस्कन्धसमागता मधुरता कामन्तु
पुष्पान्विता
गायत्री मधुराधरा स्मितमुखी
वीणायुता गायती ।
रक्ताम्भोजविलोचना मधुमदैर्युक्ता
समन्तादियं
पायात् पुष्पधनुर्धरा मधुमुखी
कामेश्वरी भूतिनी ।। ५९ ।।
तालवृक्ष में निवास करने वाली,
मधुपान में आसक्त, पुष्पों से युक्त, साधक की रक्षा करने वाली, मधुर अधरों वाली, स्मितमुखी, वीणा बजाकर गायन करने वाली, रक्तकमल के समान नेत्र वाली, मधुमद से युक्त,
पुष्पधनुष धारण करने वाली, मधुमुखी कामेश्वरी
भूतिनी हमारी रक्षा करे ।। ५९ ।।
तत्र स्थानं समागत्य कृत्वा मांसस्य
भक्षणम् ।
मांसादिना बलिं दत्त्वा सहस्रं
जपमाचरेत् ।। ६० ।।
मनुमर्कं सहस्रन्तु जपित्वा
सिद्धिमाप्नुयात् ।
जपन्निशीथमायाति रक्तेनार्घ्यं
निवेदयेत् ।। ६१ ।।
कामेश्वरी भवेत्तुष्टा भार्या भवति
कामिता ।
सर्वाशां पूरयत्येव राज्यं यच्छति
निश्चितम् ।।६२।।
उस (मातृ) स्थान पर जाकर मांस का
भक्षण करे तथा मांसादि की बलि प्रदान कर मन्त्र का एक हजार जप करे। इस प्रकार बारह
हजार जप करने पर सिद्धि प्राप्त होती है। रात्रि में जप करते समय रक्त से अर्घ्य
प्रदान करे। ऐसा करने पर कामेश्वरी देवी सन्तुष्ट होती है तथा साधक की भार्या बनकर
उसकी समस्त आशायें पूर्ण कर उसे राज्य तक प्रदान करती है;
यह निश्चित है ।। ६०-६२ ॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६- कुमारीसाधनम्
हूं हूं फट् फट् देव्यै हूं हूं हूं
।
क्रोधद्वयास्त्रयुग्मं च देवीति
पदमुद्धरेत्
ङन्तं क्रोधत्रयं गुप्तं
कुमारीमन्त्रमुत्तमम् ।। ६३।।
हूं हूं फट् फट् देव्ये हूं हूं
हूं- यह कुमारीमन्त्र है। क्रोधद्वय (हूं हूं), अस्त्रयुग्म
(फट् फट्) एवं 'देव्यै' यह पद, पुनः क्रोधत्रय (हूं हूं हूं) से कुमारी देवी का मन्त्र बनता है ।। ६३॥
ध्यानम्
दिव्यकार्मुक हेमाभा कुमारी
दिव्यरूपिणी ।
सर्वालङ्कारसंयुक्ता भार्या भवति
साधिता । । ६४ । ।
दिव्य धनुष को धारण करने वाली,
स्वर्ण के समान कान्ति वाली, दिव्य रूप वाली,
समस्त अलङ्कारों से विभूषित कुमारी देवी भार्यारूप में सिद्ध होती
है॥६४॥
रात्रौ देवगृहं गत्वा तत्र शय्यां
प्रकल्पयेत् ।
सितवस्त्रं चन्दनं च ज्योतिः पुष्पं
प्रदापयेत् । ६५ ।।
धूपं तु गुग्गुलं दत्त्वाष्टसहस्रं
जपेन्मनुम् ।
जपान्ते नित्यमायाति
चुम्बनालिङ्गनादिभिः ।। ६६ ।।
कामिता जायते भार्या सत्यं देवी
कुमारिका ।
ददात्यष्टौ च
दीनारान्दिव्यवस्त्रयुगं तथा ।। ६७ ।।
कामिकं भोजनं दिव्यं परिवारस्य
दास्यति ।
अन्याश्रमगृहाद्द्द्रव्यमानीयाशु
प्रयच्छति ।। ६८ ।
नित्यं सहस्रं जप्त्वा तु सा चायाति
कुमारिका ।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शृणु मे
प्राणवल्लभे ।। ६९ ।।
रात्रि में किसी देवमन्दिर में जाकर
वहाँ शय्या का निर्माण करे। श्वेत वस्त्र, श्वेत
चन्दन एवं सुगन्धित श्वेत पुष्प अर्पित करे। गुग्गुल का धूप प्रदान कर आठ हजार
मन्त्र का जप करे। जप के अन्त में कुमारी देवी आती है तथा साधक का चुम्बन एवं
आलिंगन करके उसकी भार्या बनकर उसे आठ स्वर्णमुद्रायें प्रदान करती है; साथ ही दिव्य वस्त्र के साथ-साथ इच्छित एवं दिव्य भोजन देती है तथा अपनी
सहयोगिनियों सहित साधक की सेवा करती है। देवी जितना भी धन प्रदान करे, उन सबको व्यय कर देना चाहिये। कुछ भी शेष नहीं रखना चाहिये। हे प्राणवल्लभे
। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, जो भी पुरुष कुमारी देवी के
मन्त्र का एक हजार जप करता है, उसके समीप कुमारी देवी आती है
तथा अन्य का भी धन लाकर साधक को दे जाती है ।। ६५-६९ ।।
मुहुर्मुहुर्जपन्मन्त्रं क्रोधस्य
मन्त्रमुत्तमम् ।
क्रोधाधिपं व्योमवक्त्रं वज्रपाणिं
सुरान्तकम् ।।७० ।।
एतन्मन्त्रमविज्ञाय यो
जपेत्सिद्विकांक्षया ।
तस्य स्यान्निष्फलं कर्म अन्ते
नरकमाप्नुयात् ।
कलिकल्पतरोर्वल्ली भूतिनी
सिद्धिरुच्यते ।। ७१ ।।
क्रोधमन्त्र का बार बार जप करना
अतिश्रेष्ठ है। इस मन्त्र को जो लोग विना जाने ही जप करते हैं,
उन्हें कभी भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती और अन्त में वे नरकगामी
होते हैं। कलियुग में भूतिनीसाधन को कल्पवृक्ष के समान कहा गया है ।।। ७०-७१।।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६- सुन्दरीसाधनम्
साधनक्रमः
अतः शृणु परं देवि
सुन्दरीसिद्धिसाधनम् ।
सुन्दर्यादिप्रभेदेन प्रत्येकं
पूजयेच्छिवे ।। ७२ ।।
प्रातरुत्थाय सुस्नाते नित्यकर्म
समाचरेत् ।
ततः प्रासादमारुह्य पूजास्थानं
सुशोभनम् ।। ७३ ।।
बिल्वमूले श्मशाने वा प्रान्तरे च
चतुष्पथे ।
तत्रस्थः साधयेद्योगी योगिन्यादि च
भूतिनीम् । । ७४ ।।
हे देवि! अब सुन्दरी सिद्धि साधन का
श्रवण करो। हे शिवे ! सुन्दरी आदि का भेदानुसार पूजन करे। साधक प्रातः काल शय्या
से उठकर स्नानादि कर्म करने के उपरान्त घर के पूजास्थल में,
बेलवृक्ष के मूल में, श्मशान में, वनप्रान्तर में या चतुष्पथ (चौराहे) में भूतिनी का साधन करे।।७२-७४ ।।
अजिनासनगः शुद्धस्तिलकं मूर्ध्नि
कारयेत् ।
ततो विधिवदाचम्य सूर्यार्घ्यं
प्रददेत्ततः । । ७५ । ।
स्वस्तिवाचनिकं कृत्वा शान्तिपाठं
पुनः पुनः ।
गणेशं बटुकञ्चैव पूजयेद्यन्त्रकोपरि
।। ७६ ।।
ततश्चोदङ्मुखो भूत्वा संकल्पं तत्र
कारयेत् ।
गणेशं क्रोधभैरवं च
पूजयेत्परमेश्वरि ।।७७ ।।
मूलमन्त्रेण प्राणायामं
षडङ्गन्यासमाचरेत् ।
पूर्ववच्च पुनर्ध्यात्वा मानसैः
पूजयेत्तत: ।।७८ ।।
कृत्वार्घ्यं स्थापनं तत्र
पट्टमष्टदलं लिखेत् ।
तन्मध्ये च विनिर्माय चन्दनेन
विलेपनम् ।। ७९ ।।
लज्जाबीजं लिखेत्तत्र पुनर्ध्यात्वा
प्रपूजयेत् ।
निशायां पूजयेद्वीरं दिवसे
पूजयेत्पशुम् ॥८०॥
मूलमन्त्रं महादेव मासं व्याप्य
जपेत् सुधीः ।
अर्द्धरात्रे ततः पूजां बलिं कृत्वा
विधानतः ।
निर्भयः सञ्जपेन्मन्त्रं हृद्गतं च
निवेदयेत् ॥। ८१ ।।
मृगचर्म के आसन पर आसीन होकर स्वयं
के माथे पर तिलक करे तथा विधिपूर्वक आचमन करके सूर्य भगवान् को अर्घ्य प्रदान करे
एवं स्वस्तिवाचन के साथ शान्तिपाठ करे । यन्त्र के ऊपर भगवान् गणेश
एवं बटुक भैरव का पूजन करे। तदुपरान्त उत्तर की ओर मुख कर संकल्प करे। हे
परमेश्वरि ! गणेश एवं भैरव का पूजन कर मूलमन्त्र से प्राणायाम एवं षडंगन्यास करे,
तत्पश्चात् देवी का मानसिक ध्यान करे। अर्घ्य का स्थापन कर एवं अष्टकमलदल
लिखकर उसमें चन्दन का लेप करे। इस दल के मध्य में लज्जाबीज (ह्रीं) लिखकर ध्यान कर
पूजन करे। रात्रि में वीरभाव से एवं दिन में पशुभाव से पूजन करे। हे महादेवि !
साधक एक मास तक देवी की साधना एवं पूजा करे। विधिपूर्वक बलि देकर अर्द्धरात्रि में
पूजन करे एवं निर्भय होकर मन्त्र का जप करे ।। ७५-८१ ।।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६- यक्षसाधनम्
अतः परं महादेवि ! यक्षसाधनमुत्तमम्
।
हे महादेवि ! अब श्रेष्ठ यक्षसाधन
का श्रवण करो ।
यक्षमन्त्रः
गगनो ग्रहणश्चैव युक्तचन्द्रार्द्धशेखरः
।। ८२ ।।
एकाक्षरमहामन्त्रो साधकैर्जप्यते यदि
।
संख्ययाष्टसहस्राश्च सर्वसिद्धिप्रदायकः
।। ८३ ।।
'हं'
इस एकाक्षर यक्षमन्त्र का आठ हजार जप करने से साधक को सभी प्रकार की
सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।।८२-८३ ॥
श्रीदेव्युवाच
भीमवक्त्रादियक्षाणां महामन्त्राः
श्रुता भया !
चन्द्रशेखर तद्ध्यानं संक्षेपेण वद
प्रभो ।। ८४ ।।
श्री देवी जी ने कहा- हे चन्द्रशेखर
! भीमवक्त्रादि यक्षों का नाम मैने सुना। अब उनका ध्यान संक्षेप में कहने की कृपा
करें ॥ ८४ ॥
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज
पटल १६- यक्षाणां ध्यानानि
भीमवक्त्रध्यानम्
प्रत्यालीढपदं कृष्णं
खर्वकर्बुरमूर्धजम् ।
द्विभुजं दक्षिणे कर्त्री वामे
खर्परधारिणीम् ।
व्याघ्रचर्माम्बरधरं त्रिनेत्रां
भीषणाननाम् ।। ८५ ।।
प्रत्यालीढ़ पद,
कृष्ण वर्ण, खर्व कर्बूरमूर्धज (केश), दो भुजायें, दाहिनी भुजा में कर्तरी, वाम भुजा में खर्पर को धारण करने वाले, व्याघ्रचर्म
को धारण करने वाले एवं त्रिनेत्रधारी भीमवक्त्र का हम ध्यान करते हैं ।। ८५ ॥
महावक्त्रध्यानम्
ध्यायेद्देवं महावक्त्रमग्निवर्णं
त्रिनेत्रकम् !
द्विभुजं दक्षिणे खड्गं खेटकं
वामहस्तकम् ।। ८६ ।।
कृष्णकेशन्तु कुटिलं विकृतास्यं
भयानकम् ।
साधकाय प्रयच्छन्तमभयं वरमेव च
।।८७।।
अग्नि के समान वर्ण वाले,
त्रिनेत्रधारी, दो भुजायें धारण करने वाले, दाहिनी भुजा में खड्ग एवं बायीं में खेटक को धारण करने वाले, काले केश वाले, कुटिल एवं चौड़े मुख वाले, भयानक, साधक के लिये अभय व वर प्रदान करने वाले
महावक्त्र यक्ष का हम ध्यान करते हैं । ८६-८७॥
सिंहवक्त्रध्यानम्
ध्यायेद्देवं सिंहवक्त्रं
जटाभारसमन्वितम् ।
विकृतास्यं द्विजिह्वं च
चतुर्नेत्रं द्विकर्णकम् ।।८८।।
द्विभुजं च गदापाणिं वामे
चाऽभयसंयुतम् ।। ८९ ।।
जटाभार से समन्वित,
सिंह के समान मुख वाले, दो जिह्वा वाले,
हाथ में गदा धारण करने वाले, चार नेत्र वाले,
वाम हाथ से अभय प्रदान करने वाले सिंहवक्त्र का हम ध्यान करते हैं
।।८८-८९ ॥
हयाननध्यानम्
श्वेतो हयाननः सर्वो
द्विभुजोऽतिभयानकः ।
दक्षे डमरुकं धत्ते वामे चैव
त्रिशूलकम् ।। ९० ।।
श्वेत वर्ण,
अश्व के समान मुख वाले, छोटे शरीर वाले,
भयानक स्वरूप वाले, दाहिने हाथ में डमरु एवं
बायें हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले हयानन यक्ष हमारी रक्षा करें ॥ ९० ॥
महावीरध्यानम्
ध्यायेद्देवं महावीरं द्विकर्णन्तु
त्रिनेत्रकम् ।
द्विभुजं हास्यवदनं वराऽभयविधारकम्
।। ९९ ।।
दो कान वाले,
तीन नेत्र वाले, दो भुजा एवं स्मित मुख वाले,
वर एवं अभय प्रदान करने वाले महावीर यक्ष का हम ध्यान करते हैं ।।
९१ ॥
इति क्रियोड्डीशे महातन्त्रराजे
गौरीश्वर-संवादेषोडशः पटलः । । १६ ।।
क्रियोड्डीश महातन्त्रराज में
गौरी-शंकरसंवादात्मक सोलहवाँ पटल पूर्ण हुआ ।। १६ ।
आगे जारी...... क्रियोड्डीश महातन्त्रराज पटल 17
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