कालीशतनाम स्तोत्रं
श्रीबृहन्नीलतन्त्र के
भैरवपार्वतीसंवाद अंतर्गत २३ वें पटल में देवी को समर्पित कालीशतनाम स्तोत्रं का निरूपण
है,
जिसमें उनके नामों का उल्लेख है और जहाँ देवी काली की महिमा का
वर्णन किया गया है। यह स्तोत्र सर्वज्ञता प्रदान करने वाला है। इसके पाठ से सभी
प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करने में सहायक होता है और साधक को जीवन में
सुख-समृद्धि प्रदान करता है। व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक लाभ, जैसे लक्ष्मी की प्राप्ति और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह मां के
शक्तिशाली और परोपकारी स्वरूप को दर्शाती हैं, जो संसार को
धारण करती हैं, उसका पोषण करती हैं और उसे आनंदित करती हैं। देवी
का सान्निध्य प्राप्त होता है, अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त हो
जाती हैं, व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।
कालीशतनाम स्तोत्रम्
kali shat naam stotra
कालीशतनामस्तोत्रं
श्रीदेव्युवाच ।
पुरा प्रतिश्रुतं देव क्रीडासक्तो
यदा भवान् ।
नाम्नां शतं महाकाल्याः कथयस्व मयि
प्रभो ॥ १॥
देवी ने कहा- हे देव पूर्व में जब आप
क्रीड़ा में आसक्त थे तब आपने माँ काली के १०८ नामों को कहने का वचन दिया था,
अब वह वचन पूरा करें।
श्रीभैरव उवाच ।
साधु पृष्टं महादेवि अकथ्यं कथयामि
ते ।
न प्रकाश्यं वरारोहे स्वयोनिरिव
सुन्दरि ॥ २॥
भगवान भैरव ने कहा- हे महादेवि आपने
बहुत ही उचित प्रश्न किया है। मैं आपको वह अकथनीय (जिसे कहा न जा सके) बताता हूँ,
जिसे व्यक्त करना उचित नहीं, हे वरारोहे,
जैसे स्वयं का योनि-स्थान गुप्त रखा जाता है, वैसे
ही यह भी गुप्त रखने योग्य है।
प्राणाधिकप्रियतरा भवती मम मोहिनी ।
क्षणमात्रं न जीवामि त्वां बिना
परमेश्वरि ॥ ३॥
हे परमेश्वरी! तुम मेरी मोहिनी(मन
मोह लेने वाली) हो और मुझे प्राणों से भी प्रिय हो। तुम्हारे बिना मैं एक क्षण भी
जीवित नहीं रह सकता।
यथादर्शेऽमले बिम्बं घृतं
दध्यादिसंयुतम् ।
तथाहं जगतामाद्ये त्वयि सर्वत्र
गोचरः ॥ ४॥
जैसे किसी स्वच्छ दर्पण में घृत,
दधि आदि से युक्त पदार्थ का प्रतिबिंब दिखाई देता है, उसी प्रकार, मैं (ईश्वर) संपूर्ण जगत के आदि में
अर्थात् तुम्हारे भीतर हर जगह दिखाई देता हूँ या उपलब्ध हूँ।
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि जपात्
सार्वज्ञदायकम् ।
हे देवी! सुनो,
मैं तुम्हें बताता हूँ, जिसके जप करने से
सर्वज्ञता (सब कुछ जानने वाला) प्रदान करने वाला है।
श्रीकाली शतनाम स्तोत्रम्
सदाशिव ऋषिः प्रोक्तोऽनुष्टुप्
छन्दश्च ईरितः ॥ ५॥
देवता भैरवो देवि पुरुषार्थचतुष्टये
।
विनियोगः प्रयोक्तव्यः
सर्वकर्मफलप्रदः ॥ ६॥
इसके ऋषि सदाशिव, छंद अनुष्टुप् और देवता
भैरव है। इसका पाठ पुरुषार्थ चतुष्टय (धर्म, अर्थ,
काम और मोक्ष) और सभी कर्मों के फल प्राप्ति के लिए विनियोग है।
महाकाली जगद्धात्री जगन्माता
जगन्मयी ।
जगदम्बा गजत्सारा जगदानन्दकारिणी ॥
७॥
जगद्विध्वंसिनी गौरी
दुःखदारिद्र्यनाशिनी ।
भैरवभाविनी भावानन्ता सारस्वतप्रदा
॥ ८॥
चतुर्वर्गप्रदा साध्वी
सर्वमङ्गलमङ्गला ।
भद्रकाली विशालाक्षी कामदात्री
कलात्मिका ॥ ९॥
नीलवाणी महागौरसर्वाङ्गा सुन्दरी
परा ।
सर्वसम्पत्प्रदा भीमनादिनी
वरवर्णिनी ॥ १०॥
वरारोहा शिवरुहा महिषासुरघातिनी ।
शिवपूज्या शिवप्रीता
दानवेन्द्रप्रपूजिता ॥ ११॥
सर्वविद्यामयी
शर्वसर्वाभीष्टफलप्रदा ।
कोमलाङ्गी विधात्री च
विधातृवरदायिनी ॥ १२॥
पूर्णेन्दुवदना नीलमेघवर्णा कपालिनी
।
कुरुकुल्ला विप्रचित्ता कान्तचित्ता
मदोन्मदा ॥ १३॥
मत्ताङ्गी मदनप्रीता
मदाघूर्णितलोचना ।
मदोत्तीर्णा
खर्परासिनरमुण्डविलासिनी ॥ १४॥
नरमुण्डस्रजा देवी खड्गहस्ता भयानका
।
अट्टहासयुता पद्मा पद्मरागोपशोभिता
॥ १५॥
वराभयप्रदा काली कालरात्रिस्वरूपिणी
।
स्वधा स्वाहा वषट्कारा
शरदिन्दुसमप्रभा ॥ १६॥
शरत्ज्योत्स्ना च संह्लादा
विपरीतरतातुरा ।
मुक्तकेशी छिन्नजटा जटाजूटविलासिनी
॥ १७॥
सर्पराजयुताभीमा सर्पराजोपरि स्थिता
।
श्मशानस्था महानन्दिस्तुता
संदीप्तलोचना ॥ १८॥
शवासनरता नन्दा सिद्धचारणसेविता ।
बलिदानप्रिया गर्भा
भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ॥ १९॥
गायत्री चैव सावित्री महानीलसरस्वती
।
लक्ष्मीर्लक्षणसंयुक्ता
सर्वलक्षणलक्षिता ॥ २०॥
व्याघ्रचर्मावृता मेध्या
त्रिवलीवलयाञ्चिता ।
गन्धर्वैः संस्तुता सा हि तथा
चेन्दा महापरा ॥ २१॥
पवित्रा परमा माया महामाया महोदया ।
इति ते कथितं दिव्यं शतं नाम्नां
महेश्वरि ॥ २२॥
यह श्लोक बताता है कि हे महेश्वरी
(देवी)! ये आपके दिव्य सौ नामों में से अंतिम हैं।
कालीशतनामस्तोत्र फलश्रुति:
यः पठेत् प्रातरुत्थाय स तु
विद्यानिधिर्भवेत् ।
इह लोके सुखं भुक्त्वा
देवीसायुज्यमाप्नुयात् ॥ २३॥
सुबह उठकर जो इसका पाठ करता है,
वह विद्यानिधि अर्थात् उसे ज्ञान, धन की
प्राप्ति होता है और इस लोक में सुख भोगने के बाद वह देवी (महाकाली) के साथ एकाकार
हो जाता है, अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति करता है।
तस्य वश्या भवन्त्येते सिद्धौघाः
सचराचराः ।
खेचरा भूचराश्चैव तथा स्वर्गचराश्च
ये ॥ २४॥
उस (सिद्ध साधक) के वश में सभी
सिद्धियाँ, सभी चर-अचर जीव, आकाशचारी (हवा में उड़ने वाले), भूचर (भूमि पर चलने
वाले) और यहाँ तक कि स्वर्गचारी (स्वर्ग में विचरण करने वाले) भी आ जाते हैं।
ते सर्वे वशमायान्ति साधकस्य हि
नान्यथा ।
नाम्नां वरं महेशानि परित्यज्य
सहस्रकम् ॥ २५॥
हे महेशानि! जो सहस्र नामों को
छोड़कर केवल कुछ श्रेष्ठ नामों अर्थात् काली के शतनाम का ही पाठ करते हैं,
तो वे अन्य नाम भी साधक के वश में आ जाते हैं।
पठितव्यं शतं देवि
चतुर्वर्गफलप्रदम् ।
अज्ञात्वा परमेशानि नाम्नां शतं
महेश्वरि ॥ २६॥
भजते यो महकालीं सिद्धिर्नास्ति कलौ
युगे ।
हे देवी! काली शतनाम स्तोत्र का पाठ
चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का फल देने वाले हैं। हे परमेशानि महेश्वरि!
इनके महत्व को जाने बिना जो महाकाली को भजता है, उसे कलियुग
में सिद्धि प्राप्त नहीं होगी।
प्रपठेत् प्रयतो भक्त्या तस्य
पुण्यफलं श्रृणु ॥ २७॥
लक्षवर्षसहस्रस्य कालीपूजाफलं भवेत्
।
बहुना किमिहोक्तेन वाञ्छितार्थी
भविष्यति ॥ २८॥
जो भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है,
वह इसके पुण्य फल को सुनता है। एक लाख हज़ार वर्ष (एक करोड़ वर्ष)
तक काली पूजा करने का जो फल मिलता है, जिसका वर्णन नहीं किया
जा सकता, क्योंकि इतनी पूजा के बाद व्यक्ति की सभी इच्छाएं
(वाञ्छित) पूरी हो जाती हैं। वही फल काली शतनाम स्तोत्र का पाठ करने से प्राप्त
होता है।
इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे भैरवपार्वतीसंवादे कालीशतनामनिरूपणं त्रयोविंशः पटलः ॥

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