यम सूक्तं
सूक्त,
स्तोत्र, स्तुति आदि से किसी भी देवों की
प्रार्थना की जाती है। यम द्वितीया, श्राद्ध तर्पण या अंतिम यात्रा पर भगवान यमराज के प्रसन्नार्थ व यम यातना से मुक्ति के लिए या जब कोई
व्यक्ति मृत्यु से भयंकर कष्ट भोग रहा हो तो उसकी निवृति के लिए यम सूक्तं का पाठ
करें। यहाँ इस सूक्त के साथ में भक्तों के हितार्थ यमराज के चौदह नाम व यम मन्त्र
भी दिया जा रहा है।
यम सूक्तम्
यमराज हिन्दू धर्म के अनुसार मृत्यु
के देवता हैं। इनका उल्लेख वेद में भी आता है। इनकी जुड़वां बहन यमुना (यमी) है।
यमराज, महिषवाहन (भैंसे पर सवार)
दण्डधर हैं। वे जीवों के शुभाशुभ कर्मों के निर्णायक हैं। वे परम भागवत, बारह भागवताचार्यों में हैं। यमराज दक्षिण दिशा के दिक् पाल कहे जाते हैं
। दक्षिण दिशा के इन लोकपाल की संयमनीपुरी समस्त प्राणियों के लिये, जो अशुभकर्मा हैं, बड़ी भयप्रद है। यमराज की पत्नी
देवी धुमोरना थी। कतिला यमराज व धुमोरना का पुत्र था। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा
से भगवान सूर्य के पुत्र यमराज, श्राद्धदेव मनु और यमुना
उत्पन्न हुईं।
यम का स्वरूप
ऋग्वेद के देवता गोष्ठी में यम का
महत्वपूर्ण स्थान है। ऋग्वेद के तीन सूक्तों में उसके विषय में कथा प्राप्त होती
है(१०/१३५.१५४)। उनको छोड़कर भी यम
का उसकी बहिन के साथ कथोपकथन युक्त एक अन्य भी सूक्त है। उस सूक्त का नाम 'यमयमीसंवादसूक्त' (१०.१०)।
वरुण-बृहस्पति-अग्नि आदि देवो के साथ भी उसकी स्तुति अनेक मन्त्रो में प्राप्त
होता है । निरुक्तकार यास्क ने उसके विषय में निरुक्त शास्त्र में यम शब्द की
व्युत्पत्ति करते हुए कहते है - 'यमो गच्छतीति सतः' (१०.१९) इति । यहाँ यम शब्द उपरमार्थक यम् धातु से
कर्ता में निष्पन्न होता है। उसका अर्थ है जो प्राणियों को उपरमण करता है अर्थात्
प्राणियों के प्राण को छुड़ाकर ले जाता है। निरुक्त में यमशब्द से पुनः अग्निदेव
कहलाता है। और भी निरुक्त में कहा गया है - 'अग्निरपि यम
उच्यते' (१०.१२) इति । वहाँ पर यम् धातु
प्रदान रूप अर्थ है । यच्छति प्रयच्छति कामान् स्तोतृभ्यः इति यमः । परलोकतत्त्व
विषय में मृत्यु की अमरता विषय पर और मृत्यु से परे जीवन विषय में ज्ञान यम सूक्त
से प्राप्त होता है। यम शब्द का यमज रूप अर्थ भी है। वहाँ पर यमयमी दोनों पद से
दोनों के द्वारा विवस्वत्सरण्वोः संगमेन जातं यमजापत्यद्वयं का ग्रहण किया जाता
है।
ऋग्वेद में यम मृत्यु इस नाम से
मृत्यु के अधिष्ठाता देव रूप से स्तुति की जाती है । मृत आत्मा को वह शरीर देता
है। मृत्यु के बाद सभी मनुष्य उसके समीप ही जाते है। वैसे वेद भी कहता है - 'सङ्गमनं जनानाम् ' (१०.१४.९) इति
। वह हमारा पूर्वपुरुष, मृत्यु के बाद परे जो अमृतलोक का
मार्ग पहले से ही जाना जाता है- 'यमो नो गातुं प्रथमो विवेद'
(१०.१४.२) इति । और वहाँ जाकर के वह प्रेत लोक
के अधिपति के रूप में जाने जाते है। वह ही मृत्यु के परे लोगों के लिए आश्रय का
निर्देश किया है। वैसे वेद में भी कहा गया- 'यमो
ददात्यवसानम् अस्मै' (१०.१४.९) इति।
मृत्यु के परे लोगो के लिए वे जो स्थान आश्रय रूप से निर्देश किया वहाँ पर पिशाच
आदि अशुभशक्ति युक्त अनिष्टविधान के लिए असमर्थ होते हैं। उसका अपना निवास स्थान
स्वर्ग लोक है।
वैदिक मन्त्रों में वह वैवस्वत
कहलाता है। निरुक्त में और बृहद्देवता में वह विवस्वत्सरण्वो के पुत्र के रूप में
इस प्रकार का उपाख्यान प्राप्त होता है। सरमा वंशीय श्वान उसके दूत हैं। और
वेश्वानचार नेत्रों से युक्त है। उनकी नाक विशाल और उनका वर्ण विचित्र है। मृत लोग
जिस मार्ग से जाते है उस मार्ग के वे रक्षक है। वेद में कहा- 'पथिरक्षी' (१०.१४.११) इति । ये
श्वान जैसे मृत लोग के विनाश के लिए समर्थ नही होते हैं, उस
प्रकार की वैदिक ऋषियो के द्वारा प्रार्थना की गई है। और वेद में भी कहा गया है- 'ताभ्याम् एनं परि देहि राजन् स्वस्ति चास्मै अननीतं धेहि' (१०.१४.१२) इति । और अन्ये कौशिक कपोतादयः अपि तस्य
दूता: । (१०.१६५.४) इति।
ऋग्वेद मन्त्रों में उसे सभी जगह
राजन् इस रूप में सम्बोधन किया गया है। वह लोगो के प्रभु है। अत मन्त्रो में उसे 'विश्पतिः' कहलाता है। मृत लोग स्वर्ग लोक प्राप्त
वरुण के साथ यमराज को भी आनन्द उपभोगरत के रूप में देखते है। वैसे वेद में भी कहा
गया- 'उभा राजाना स्वधया मदन्ता यमं पश्यसि वरुणं च देवम्'
(१०.१४.९) इति । सोमपायी इस नाम का भी कुछ
मन्त्रो में उसकी स्तुति की गई। हमारे पूर्व पुरुषों के साथ एक जगह बैठकर वह
सोमपान करते है। वैसे वेद भी कहते है - ' यस्मिन् वृक्षे
सुपलाशे देवैः संपिबते यमः' (१०.१३५.१) इति । वह सभी अच्छे कर्मों का और बुरे कर्मों के साक्षी रहता है। देवता
प्राप्ति पितृदेवो के साथ उसका घनिष्ठ सम्बद्ध है। अग्निदेव के साथ भी उसकी मित्रता
है। अग्नि यम का पुरोहित है। यम को इन्दो - ईरानीदेव यह भी लोक में सुने जाते हैं,
क्योंकि ईरानी धर्म ग्रन्थों में आवेस्ता का उसका यम नाम अलग से
प्राप्त होता है।
ऋषियो के द्वारा प्राकृतिक शक्ति यम
की सृष्टि है ऐसा कल्पना नही किया गया है, अपितु मृतको के अधिष्ठाता देव रूप से यम की कल्पना की गई है। यम सूक्त में
यम ही प्रथम मरणशील कहा गया है, वह ही मृत्यु के द्वार का
सबसे पहले अतिक्रान्त किया गया है। और मृतको के लिए मार्ग का अन्वेषण उन्होंने
किया है। और वेद में भी कहा गया- 'परेयिवांसं प्रवतो महीरनु
बहुभ्यः पन्थामनुपश्पशानम्' (१०.१४.१) इति
।
यम यमी ये यमज भ्राता के मेल से ही
मनुष्यों की उत्पत्ति की जो कथा सुनाई जाती है,
वह महत्वपूर्ण नहीं है। यम सूक्त में भी उसका समर्थन नही किया गया
है। भारतीय कभी भी उस प्रकार का चिन्तन नही करते है। अपितु संयम धन यम अपनी बहन को
इस निन्द्य कर्मपाश से छुड़ाकर आशीर्वाद देता है । और जिससे वह कामवेग से शान्ता
मुक्त होती है। और अन्त में लज्जित यमी अपने भाई यम के पैर में गिरकर क्षमा मांगती
है। जिसके द्वारा रक्षित संयम धन और यमके द्वारा रक्षित भारतीय संस्कृति है।
यमसूक्तम्
यमराज के चौदह नाम
यमराजजी की आराधना के लिए यमराज के
चौदह नामों का पाठ करें । इन्हीं नामों से इनका तर्पण किया जाता है।
यम,
धर्मराज, मृत्यु, अन्तक,
वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय,
औदुभ्बर, दघ्न, नील,
परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र
और चित्रगुप्त ।
यमसूक्तम्
यम मन्त्र
ॐ सुगन्नुपंथां प्रदिशन्नऽएहि,
ज्योतिष्मध्येह्यजरन्नऽआयुः।
अपैतु मृत्युममृतं मऽआगाद्,
वैवस्वतो नो ऽ अभयं कृणोतु।
ॐ यमाय नमः।
यजुर्वेद अध्याय ३२ यम सूक्तम्
Yajurved chapter 32
यमसूक्त
शुक्लयजुर्वेदः/अध्यायः ३२
यजुर्वेद
उत्तरार्ध
बत्तीसवां अध्याय
॥ अथ यम सूक्तम् ॥
ॐ तद् एवाग्निस् तद् आदित्यस् तद्
वायुस् तद् उ चन्द्रमाः ।
तद् एव शुक्रं तद् ब्रह्म ता ऽ आपः
स प्रजापतिः ॥१॥
परम पुरुष ही अग्नि है। वही आदित्य
है। वही वायु है। वही चंद्रमा, प्रकाशमान व
ब्रह्मज्ञानी है। वही जल और वही प्रजापति है ।
सर्वे निमेषाः जज्ञिरे विद्युतः
पुरुषाद् अधि ।
नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये
परि जग्रभत् ॥२॥
सारे काल उस परम पुरुष से ही यज्ञ
में उत्पन्न हुए. उस से ऊपर कोई नहीं है।
उस को ऊपर, बीच आदि से कोई भी
पार नहीं पा सकते।
न तस्य प्रतिमा ऽ अस्ति यस्य नाम
महद् यशः ।
हिरण्यगर्भ ऽ इत्य् एषः मा मा हि৶सीद् इत्य् एषा
यस्मान् न जात ऽ इत्य् एषः ॥ ३॥
उस परम पुरुष की कोई प्रतिमा नहीं
है। आप का यश महान है। आप का नाम अत्यंत महान् है। 'हिरण्यगर्भ', 'मा हिंसीत्', 'यस्मान्
जात' इत्यादि मंत्रों में उस परम पुरुष की प्रशंसा और नाम का
बारंबार वर्णन किया गया है।
एषो ह देवः प्रदिशो ऽनु सर्वाः
पूर्वो ह जातः स ऽ उ गर्भे ऽ अन्तः ।
स ऽ एव जातः स जनिष्यमाणः प्रत्यङ्
जनास् तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥ ४॥
वह परम पुरुष सभी प्रदेशों में
व्याप्त है। वह पूर्व और अंत में भी व्याप्त है। वही उत्पन्न हुओं में विद्यमान है।
वही उत्पन्न हो रहे प्राणियों में भी विद्यमान है। वही जन्म लेने वालों में भी
व्याप्त होगा। वह सभी में सर्वविधि व्याप्त है।
यस्माज् जातं न पुरा किं चनैव य
आबभूव भुवनानि विश्वा ।
प्रजापतिः प्रजया स৶रराणस् त्रीणि
ज्योती৶षि
सचते स षोडशी ॥ ५॥
जिससे पहले कोई उत्पन्न नहीं हुआ,
उस परमात्मा से सभी लोक उत्पन्न हुए हैं। वह परम पुरुष प्रजा के साथ
रहते हैं। वह परम पुरुष तीन ज्योतियों को धारते हैं। प्रजा के साथ रहने वाले
प्रजापति सोलह कलाओं वाले हैं।
येन द्यौर् उग्रा पृथिवी च दृढा येन
स्व स्तभितं येन नाकः ।
यो ऽ अन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै
देवाय हविषा विधेम ॥६॥
उस परम पुरुष ने स्वर्ग को उग्र
बनाया । उसने पृथ्वी को दृढ़ बनाया । उसने स्वर्ग को स्थिर बनाया । उसने अंतरिक्ष
में शोभा रची । हम (उनके अलावा) अब किस देव के लिए हवि का विधान करें ?
यं क्रन्दसी ऽ अवसा तस्तभाने ऽ
अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने ।
यत्राधि सूर ऽ उदितो विभाति कस्मै
देवाय हविषा विधेम ।
आपो ह यद् बृहतीः यश् चिद् आपः ॥७॥
जिसको परम पुरुष की शक्ति से ज्ञानी
जन मन के द्वारा सब ओर देखते हैं, जहां
प्रकाशवान सूर्य उदय हो कर चमकता है, (अब हम उन के अलावा)
किस देव के लिए हवि का विधान करें । 'आपो ह यद् बृहती: '
और 'यश्चिदाप: ' में उसी
परम शक्ति का गुणगान किया गया है ।
वेनस् तत् पश्यन् निहितं गुहा सद्
यत्र विश्वं भवत्य् एकनीडम् ।
तस्मिन्न् इद৶ सं
च वि चैति सर्व৶
स ऽ ओतः प्रोतश् च विभूः प्रजासु ॥८॥
वह परम पुरुष सभी में गुप्त रूप से
मौजूद है,
जो सब का आश्रयदाता है, जो सब पर दृष्टि रखता
है । सभी प्राणी प्रलय में उस में लीन हो जाते हैं । सभी में वही ओतप्रोत है ।
प्रजाओं में वही प्रकाशवान है ।
प्र तद् वोचेद् अमृतं नु विद्वान्
गन्धर्वो धाम विभृतं गुहा सत् ।
त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्
तानि वेद स पितुः पितासत् ॥९॥
परम पुरुष अमर है। विद्वान् पुरुष
उस के बारे में कुछ कह सकते हैं। उस का धाम दिव्य है जो गुप्त रूप से सब में
विद्यमान है, जिस में तीन पद गुप्त रूप से निहित
हैं, जो ज्ञाता और जो पिता का भी पिता है।
स नो बन्धुर् जनिता स विधाता धामानि
वेद भुवनानि विश्वा ।
यत्र देवा ऽ अमृतम् आनशानास् तृतीये
धामन्न् अध्य् ऐरयन्त ॥१०॥
वह परम पुरुष सब का बंधु है। वह सब
को उपजाने वाला, विधाता, आश्रय
दाता और सारे लोकों और लोगों का ज्ञाता है। उस के वहां तीसरे धाम में अमर देवता आनंदपूर्वक
विचरण करते हैं।
परीत्य भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य
सर्वाः प्रदिशो दिशश् च ।
उपस्थाय प्रथमजाम्
ऋतस्यात्मनात्मानम् अभि सं विवेश ॥११॥
वह परम पुरुष सभी प्राणियों व समस्त
लोकों को घेरे हुए है। वह सभी दिशाओं में व्याप्त है। वह सभी उपदिशाओं को घेरे हुए
है। वह अजन्मा व अमर है। सभी ज्ञानी आत्मरूप को जान कर अपने आत्मरूप का इस में
समावेश कर देते हैं।
परि द्यावापृथिवी सद्य ऽ इत्वा परि
लोकान् परि दिशः परि स्वः ।
ऋतस्य तन्तुं विततं विचृत्य तद्
अपश्यत् तद् अभवत् तद् आसीत् ॥१२॥
परम पुरुष स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक
में परिव्याप्त है। वह लोकों व दिशाओं में व्याप्त है। वह अपने आप में परिव्याप्त
है। फैले हुए सत्य के तंतु को जान कर ज्ञानी वैसे ही हो जाते हैं और देखते हैं,
जैसे पहले थे।
सदसस् पतिम् अद्भुतं प्रियम् इन्द्रस्य
काम्यम् ।
सनिं मेधाम् अयासिष৶म् स्वाहा ॥ १३॥
परम पुरुष को सभी पाना चाहते हैं।
वह अद्भुत, इंद्र देव का प्रिय व काम्य है।
हम उस से (श्रेष्ठ) बुद्धि व (श्रेष्ठ) धन चाहते हैं। परम पुरुष के लिए स्वाहा।
यां मेधां देवगणाः पितरश् चोपासते ।
तया माम् अद्य मेधयाग्ने मेधाविनं
कुरु स्वाहा ॥१४॥
हे अग्नि ! जिस श्रेष्ठ बुद्धि की
देवतागण और पितरगण उपासना करते हैं, उस
बुद्धि से आप हमें बुद्धिमान बनाने की कृपा कीजिए । अग्नि के लिए स्वाहा ।
मेधां मे वरुणो ददातु मेधाम् अग्निः
प्रजापतिः ।
मेधाम् इन्द्रस् च वायुश् च मेधां
धाता ददातु मे स्वाहा ॥१५॥
वरुण, अग्नि व प्रजापति हमें बुद्धि प्रदान करें । इंद्र देव बुद्धि धारण करते
हैं। वे हमें बुद्धि प्रदान करें। इन सभी देवों के लिए स्वाहा ।
इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे
श्रियम् अश्नुताम् ।
मयि देवा दधतु श्रियम् उत्तमां
तस्यै ते स्वाहा ॥ १६ ॥
परम पुरुष हमें यह ब्रह्मज्ञान और
क्षात्र तेज इन दोनों से युक्त करें (शोभित करने की कृपा करें) । हमें देवता
श्रेष्ठ शोभा धारण कराने की कृपा करें। इसी के लिए उन्हें यह आहुति प्रदान करते
हैं।
इति: यमसूक्तम् समाप्त॥

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