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सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्र

सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्र

श्री सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्र माता सिद्धिलक्ष्मी की स्तुति और उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन करता है। यह स्तोत्र आर्थिक समृद्धि, धन वृद्धि, सभी कार्यों में सिद्धि और सफलता प्रदान करता है।

सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्र

श्री सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् 

Siddhi Lakshmi Stotram

श्री सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रं 

सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्र

सिद्धिलक्ष्मीस्तुतिः

आकारब्रह्मरूपेण ओंकारं विष्णुमव्ययम् ।

       सिद्धिलक्ष्मि! परालक्ष्मि! लक्ष्यलक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥

सगुण साकार ब्रह्म के रूप में ओंकाररूप अविनाशी भगवान विष्णु ही विद्यमान हैं। हे सिद्धि की देवी सिद्धिलक्ष्मी, परम लक्ष्मी और समस्त प्रकार के लक्ष्यों (पुरुषार्थों व मनोकामनाओं) को पूरा करने वाली माता लक्ष्मी, आपको बारंबार नमस्कार है।

याः श्रीः पद्वने कदम्बशिखरे राजगृहे कुंजरे

          श्वेते चाश्वयुते वृषे च युगले यज्ञे च यूपस्थिते ।

शंखे देवकुले नरेन्द्रभवने गंगातटे गोकुले

     या श्रीस्तिष्ठति सर्वदा मम गृहे भूयात् सदा निश्चला ॥

जो लक्ष्मी (श्री) कमल के वन में, कदम्ब के वृक्ष की चोटी पर, राजभवन में, हाथी पर, श्वेत घोड़ों के समूह में, बैलों के जोड़े में, यज्ञ में और यज्ञ के यूप (स्तंभ) में निवास करती हैं तथा जो शंख में, मंदिरों में, राजाओं के महलों में, गंगा जी के तट पर और गोकुल (गौशालाओं) में हमेशा वास करती हैं, वही लक्ष्मी माता मेरे घर में भी सदा निश्चल (स्थिर) होकर वास करें।

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी

     गम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुद्धवस्त्रोत्तरीया ।

लक्ष्मिर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भै-

     र्नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमांगल्ययुक्ता ॥ 

जो देवी कमल के आसन पर विराजमान हैं, जिनका कटिप्रदेश (कमर) विपुल और सुंदर है, जिनके नेत्र कमल के पत्ते के समान आयताकार (विशाल व सुंदर) हैं, जिनकी नाभि गहरी आवर्त (भंवर) के समान है, जो वक्षस्थल के भार से कुछ नम्र (झुकी हुई) हैं और जिन्होंने शुद्ध/शुभ्र वस्त्र धारण किया है; मणियों से सुसज्जित श्रेष्ठ हाथियों द्वारा स्वर्ण के कलशों से जिनका अभिषेक किया जाता है, तथा जिनके हाथ में कमल शोभायमान है—वे सर्वमंगलकारिणी माता लक्ष्मी हमेशा मेरे घर में निवास करें।

सिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रम्

ॐ अस्य श्रीसिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः,अनुष्टुप् छन्दः,सिद्धिलक्ष्मीर्देवता, मम समस्त दुःखक्लेशपीडादारिद्र्यविनाशार्थं सर्वलक्ष्मीप्रसन्नकरणार्थं महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती देवताप्रीत्यर्थं च सिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रजपे विनियोगः ।

ॐ सिद्धिलक्ष्मी अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।

ॐ ह्रीं विष्णुहृदये तर्जनीभ्यां नमः ।

ॐ क्लीं अमृतानन्दे मध्यमाभ्यां नमः ।

ॐ श्रीं दैत्यमालिनी अनामिकाभ्यां नमः ।

ॐ तं तेजःप्रकाशिनी कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ब्राह्मी वैष्णवी माहेश्वरी

करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिन्यासः ।

ॐ सिद्धिलक्ष्मी हृदयाय नमः ।

ॐ ह्रीं वैष्णवी शिरसे स्वाहा ।

ॐ क्लीं अमृतानन्दे शिखायै वौषट् ।

ॐ श्रीं दैत्यमालिनी कवचाय हुम् ।

ॐ तं तेजःप्रकाशिनी नेत्रद्वयाय वौषट् ।

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ब्राह्मीं वैष्णवीं फट् ॥

॥ अथ श्री सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् ॥

ब्राह्मीं च वैष्णवीं भद्रां षड्भुजां च चतुर्मुखाम् ।

त्रिनेत्रां च त्रिशूलां च पद्मचक्रगदाधराम् ॥ १॥

मैं ब्राह्मी, वैष्णवी और भद्रा देवी का ध्यान करता हूँ,जो छह भुजाओं वाली हैं, चार मुखों वाली हैं,तीन नेत्रों वाली हैं, और त्रिशूल, पद्म, चक्र तथा गदा धारण करती हैं।

पीताम्बरधरां देवीं नानालङ्कारभूषिताम् ।

तेजःपुञ्जधरां श्रेष्ठां ध्यायेद्बालकुमारिकाम् ॥ २॥

मैं उस देवी का ध्यान करता हूँ जो पीताम्बर धारण किए हुए हैं,विभिन्न आभूषणों से सुसज्जित हैं,तेज से भरपूर हैं और कुमारिका रूप में श्रेष्ठ हैं।

॥ अथ श्री सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् मूलपाठः ॥

ॐकारलक्ष्मीरूपेण विष्णोर्हृदयमव्ययम् ।

विष्णुमानन्दमध्यस्थं ह्रींकारबीजरूपिणी ॥ ३॥

देवी ‘ॐ’ के रूप में लक्ष्मी हैं, विष्णु के अविनाशी हृदय में निवास करती हैं। वे आनंद रूप विष्णु के मध्य में स्थित हैं और ‘ह्रीं’ बीज रूपिणी हैं।

ॐ क्लीं अमृतानन्दभद्रे सद्य आनन्ददायिनी ।

ॐ श्रीं दैत्यभक्षरदां शक्तिमालिनी शत्रुमर्दिनी ॥ ४॥

हे अमृतानंदस्वरूपा भद्रे! आप तुरंत आनंद देने वाली हैं।हे श्रीं! आप दैत्यों का नाश करने वाली, शक्तियों से युक्त और शत्रुओं का विनाश करने वाली हैं।

तेजःप्रकाशिनी देवी वरदा शुभकारिणी ।

ब्राह्मी च वैष्णवी भद्रा कालिका रक्तशाम्भवी ॥ ५॥

देवी तेज फैलाने वाली, वरदानी और शुभ कार्य करवाने वाली हैं।वे ब्राह्मी, वैष्णवी, भद्रा, कालिका और रक्त-शाम्भवी हैं।

आकारब्रह्मरूपेण ॐकारं विष्णुमव्ययम् ।

सिद्धिलक्ष्मि परालक्ष्मि लक्ष्यलक्ष्मि नमोऽस्तुते ॥ ६॥

देवी ‘आ’ और ‘ॐ’ ब्रह्मरूप हैं, अविनाशी विष्णु रूप में स्थित हैं। हे सिद्धिलक्ष्मी, परालक्ष्मी और लक्ष्यलक्ष्मी! आपको नमस्कार है।

सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ।

तन्मध्ये निकरे सूक्ष्मं ब्रह्मरूपव्यवस्थितम् ॥ ७॥

इनका तेज करोड़ सूर्यों जैसा है, और प्रकाश करोड़ चंद्रों जैसा है।उस तेज के मध्य ब्रह्मरूप सूक्ष्म शक्ति स्थित है।

ॐकारपरमानन्दं क्रियते सुखसम्पदा ।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ॥ ८॥

ॐ का परमानंद सुख और समृद्धि देता है। हे सर्वमंगलमयी शिवे! आप सभी लक्ष्यों को पूर्ण करने वाली हैं।

प्रथमे त्र्यम्बका गौरी द्वितीये वैष्णवी तथा ।

तृतीये कमला प्रोक्ता चतुर्थे सुरसुन्दरी ॥ ९॥

पहली शक्ति त्र्यम्बका गौरी कहलाती हैं। दूसरी वैष्णवी, तीसरी कमला और चौथी सुरसुंदरी।

पञ्चमे विष्णुपत्नी च षष्ठे च वैएष्णवी तथा ।

सप्तमे च वरारोहा अष्टमे वरदायिनी ॥ १०॥

पाँचवीं विष्णुपत्नी, छठी भी वैष्णवी,सातवीं वरारोहा और आठवीं वरदायिनी हैं।

नवमे खड्गत्रिशूला दशमे देवदेवता ।

एकादशे सिद्धिलक्ष्मीर्द्वादशे ललितात्मिका ॥ ११॥

नौवीं शक्ति खड्ग-त्रिशूलधारी, दसवीं देवदेवता, ग्यारहवीं सिद्धि लक्ष्मी और बारहवीं ललितात्मिका हैं।

श्री सिद्धि लक्ष्मी स्तोत्रम् फलश्रुति

एतत्स्तोत्रं पठन्तस्त्वां स्तुवन्ति भुवि मानवाः ।

सर्वोपद्रवमुक्तास्ते नात्र कार्या विचारणा ॥ १२॥

जो मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे सभी कष्टों और उपद्रवों से मुक्त हो जाते हैं— इसमें कोई संदेह नहीं।

एकमासं द्विमासं वा त्रिमासं च चतुर्थकम् ।

पञ्चमासं च षण्मासं त्रिकालं यः पठेन्नरः ॥ १३॥

जो व्यक्ति १, २, ३, ४, ५ या ६ महीने तक रोज तीनों समय यह स्तोत्र पढ़े—उसे महान फल मिलता है।

ब्राह्मणाः क्लेशतो दुःखदरिद्रा भयपीडिताः ।

जन्मान्तरसहस्रेषु मुच्यन्ते सर्वक्लेशतः ॥ १४॥

दुःख, दरिद्रता और भय से पीड़ित मनुष्य हजार जन्मों के कष्टों से मुक्त हो जाते हैं।

अलक्ष्मीर्लभते लक्ष्मीमपुत्रः पुत्रमुत्तमम् ।

धन्यं यशस्यमायुष्यं वह्निचौरभयेषु च ॥ १५॥

अलक्ष्मी दूर होकर लक्ष्मी प्राप्त होती है। अपुत्र को उत्तम पुत्र मिलता है, धन, यश और आयु बढ़ती है। अग्नि और चोर भय से रक्षा होती है।

शाकिनीभूतवेतालसर्वव्याधिनिपातके ।

राजद्वारे महाघोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे ॥ १६॥

भूत, प्रेत, वेताल, रोगों,राज-कार्य और युद्ध जैसी भयावह स्थितियों से रक्षा करती हैं।

सभास्थाने श्मशाने च कारागेहारिबन्धने ।

अशेषभयसम्प्राप्तौ सिद्धिलक्ष्मीं जपेन्नरः ॥ १७॥

सभा, श्मशान, कारागार या किसी भी भयानक परिस्थिति में सिद्धि लक्ष्मी का जप करने से भय दूर हो जाता है।

ईश्वरेण कृतं स्तोत्रं प्राणिनां हितकारणम् ।

स्तुवन्ति ब्राह्मणा नित्यं दारिद्र्यं न च वर्धते ॥ १८॥

भगवान द्वारा रचित यह स्तोत्र सभी जीवों के कल्याण के लिए है। जो ब्राह्मण इसे नित्य पढ़ते हैं, उनमें दरिद्रता नहीं बढ़ती।

या श्रीः पद्मवने कदम्बशिखरे राजगृहे कुञ्जरे

श्वेते चाश्वयुते वृषे च युगले यज्ञे च यूपस्थिते ।

शङ्खे देवकुले नरेन्द्रभवनी गङ्गातटे गोकुले

सा श्रीस्तिष्ठतु सर्वदा मम गृहे भूयात्सदा निश्चला ॥ १९॥

जो श्री लक्ष्मी कमलवन, कदंब वृक्ष, राजमहल, हाथी,सफेद अश्वों, वृषभ, यज्ञ-स्थल, शंख, देवालय,राजभवन, गंगातट और गोकुल में विराजती हैं—वही स्थिर लक्ष्मी सदा मेरे घर में स्थायी होकर रहें।

॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ईश्वरविष्णुसंवादे दारिद्र्यनाशनं सिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ 

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