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मार्तण्ड भैरव स्तोत्रम्
कालिका स्तुति
कालिकापुराण में
वर्णित मेनका देवी द्वारा की गई इस कालिका स्तुति का पाठ करने से सबको मोहित करने
वाली माँ कालिका भक्त की सभी मनोकामना पूरी करती है।
मेनकाकृत कालिका स्तुति:
Kalika stuti
।। मेनकोवाच
।।
प्रेरयन्तीं
जगद्धाम चण्डिकां लोकधारिणीम् ।
प्रणमामि
जगद्धात्रीं सर्वकामार्थसाधिनीम् ।। १९ ।।
मेनका बोली-
सम्पूर्ण जगत् को प्रेरित करने वाली, लोक को धारण करने वाली, सब कामनाओं की अथवा सभी के कामनाओं की पूर्ति करने वाली,
जगत् का पालन करने वाली चण्डिका देवी को मैं प्रणाम करती
हूँ ॥ १९ ॥
नित्यानन्दां
ज्ञानमयीं योगनिद्रां जगत्प्रसूम् ।
प्रणमामि
शिवां शुद्धां विधिशौरिशिवात्मिकाम् ।। २० ।।
मैं नित्य
आनन्दस्वरूपा, ज्ञानमयी, योगनिद्रा, जगत् को उत्पन्न करने वाली, ब्रह्मा-विष्णु-शिव स्वरूपा, शुद्धसत्वा, शिवा देवी को प्रणाम करती हूँ ॥ २० ॥
मायामयीं
महामायां भक्तशोकविनाशिनीम् ।
कामस्यवनितां
भद्रां त्वां चितिं शिवाम् ।। २१ ।।
मायामयी,
स्वयं महामाया, भक्तों का शोक नष्ट करने वाली,
कामदेव की स्त्री, भद्रा (कल्याणकारिणी), चिति (चैतन्यरूपा), उन आप शिवा देवी को मैं नमस्कार करती हूँ ॥ २१ ॥
सत्त्वोद्रेकाद्
या भवित्रीह नित्या नित्या चापि प्राणिनां बुद्धिरूपा ।
सा त्वं
बन्धच्छेदहेतुर्यतीनां कस्ते गद्यो मादृशीभिः प्रभावः ।। २२।।
सत्त्वगुण की
अधिकता के कारण जो नित्य होने वाली अर्थात् मूल प्रकृति हैं,
जो शाश्वत, बुद्धि स्वरूपा भी हैं। वही आप,
यतियों के बन्धन को दूर करने का कारण हैं। इस प्रकार का
आपका कौन-सा प्रभाव है, जो मेरे जैसी स्त्रियों द्वारा वर्णन किया जा सके ?
॥ २२ ॥
या त्वं साम्नां
सिद्धिरुक्तिस्तथार्चा या वृत्तिर्या यजुषां दीर्घरूपा ।
हिंसाचैवाथर्ववेदस्य
सा त्वं नित्यं कामं त्वं ममेष्टं विधेहि ॥२३॥
जो
साममन्त्रों द्वारा अर्चा, उक्ति तथा सिद्धि, यजुष् (यजुर्वेद के छंदों) की दीर्घरूपा वृत्ति,
अर्थववेद में वर्णित बलि आदिगत हिंसा है,
वह आप ही हो अर्थात् स्तुति, यज्ञ और बलिदान तीनों आप ही हो। ऐसी आप सदैव मेरी अभीष्ट
कामनाओं को पूर्ण करो ।। २३ ।।
नित्यानित्यैर्भागहीनैः
पुरस्थै: स्तन्मात्रैयैर्यत्यते भूतवर्ग: ।
तेषां
शक्तिस्त्वं सदा नित्यरूपा का ते योषा योग्यं वक्तुं समर्था ।। २४ ।।
जिससे नित्य
और अनित्य भागों से रहित हो शरीर में स्थित तन्मात्राओं द्वारा प्राणिमात्र का
संचालन किया जाता हैं। उनमें सदैव शाश्वतरूप से विद्यमान रहने वाली आप शक्ति हो ।
कौन ऐसी स्त्री है जो आपकी वर्णनीय विशेषताओं का वर्णन करने में समर्थ हो ?
॥ २४ ॥
क्षितिर्धरित्री
जगतां त्वमेव त्वमेव नित्या प्रकृतिस्वरूपा ।
यया वशः क्रियते
ब्रह्मरूपः सा त्वं नित्या मे प्रसीदास्तु मातः ।। २५ ।।
जगत को धारण
करने वाली धरती भी आपही हो, नित्य प्रकृतिरूप वाली भी आपही हो,
जिसने ब्रह्म को भी अपने वश में कर लिया है,
हे माता! ऐसी जो नित्य, अविनाशी आप हो, वह मेरे पर प्रसन्न होओ ।। २५ ।।
त्वं
जातवेदोगतशक्तिरूपा त्वं दाहिका सूर्यकरस्य शक्तिः ।
आह्लादिका
त्वं बहु चन्द्रिकायास्तां त्वामहं स्तौमि नमामि चाम्बिकाम् ।। २६ ।।
आप अग्नि के
भीतर रहने वाली उसकी शक्ति हो, आपही सूर्य के किरणों की दाहिका शक्ति भी हो । आप ही
चन्द्रिका में पर्याप्त रूप से स्थित आह्लादिनी शक्ति भी हो। ऐसी आप अम्बिका को
मैं नमस्कार करती हूँ। मैं आपकी स्तुति करती हूँ ॥ २६ ॥
योषा
योषित्प्रियाणां त्वं विद्या त्वं चोर्ध्वरेतसाम् ।
वाञ्छा त्वं
सर्वजगतां माया च त्वं तथा हरेः ।। २७ ।।
आप कामीजनों
के लिए स्त्रीस्वरूपा हो तथा आप ऊर्ध्वरेतस् योगीजनों के लिए विद्या हो,
सभी प्राणियों के अन्तर में विद्यमान वाञ्छा भी आप ही हो और
आप ही विष्णु की माया भी हो ॥। २७ ॥
याऽनेकरूपाणि विधाय
नित्यं सृष्टिं स्थितिं हानिमपीह कर्त्री ।
ब्रह्माच्युतस्थाणुशरीरहेतुः
सा त्वं प्रसीदाद्य पुनर्नमस्ते ।। २८ ।।
जो अनेक रूपों
को नित्य धारण कर इस संसार का सृष्टि, पालन और संहार क्रमशः ब्रह्मा,
विष्णु तथा शिव की कारणभूत हो,
उनके ही माध्यम से करने वाली हैं, ऐसी आप आज मुझपर प्रसन्न होओ। आपको बार-बार नमस्कार है ॥
२८ ॥
॥ इति श्रीकालिकापुराणे मेनकाकृत: कालिका स्तुति:नाम एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१॥
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