माहेश्वरतन्त्र पटल ४०
माहेश्वरतन्त्र के पटल ४० में श्रीकृष्ण की रहस्य लीला का वर्णन है।
माहेश्वरतन्त्र पटल ४०
Maheshvar tantra Patal 40
माहेश्वरतन्त्र ज्ञानखण्ड पटल ४०
नारदपञ्चरात्रान्तर्गतम्
माहेश्वरतन्त्र चालिसवाँ पटल
माहेश्वरतन्त्र चत्वारिंश पटल
अथ चत्वारिंशं पटलम्
स्वामिन्युवाच –
कलावति महाप्राज्ञे यत्त्वयोक्तं
प्रियाश्रयम् ।
विरुद्धमिव मे भाति विरुद्धलक्षणः
किल ।। १ ।।
स्वामिनी ने कहा- हे कलावति !
महाप्रज्ञावान्, तुमने जो कुछ प्रिय के लिए कहा
है। वह विरुद्ध लक्षणों के कारण मुझे तो विरुद्ध के समान लगता है ॥ १ ॥
एकपत्नीव्रतधरोऽनुकूल इति कीत्तितः
।
दक्षिणो बहुपत्नीकः सर्वास्वविषमः
स्मृतः ॥ २ ॥
वस्तुतः एकपत्नीव्रत का पालन करने
वाला नायक अनुकूल कहा गया है और दक्षिण नायक तो बहुत सी पत्नियों को रखने के कारण
सभी में विषम नहीं कहा गया है । २ ।।
एकस्मिन्नायके साfव कथमेतद्वयं भवेत् ।
अश्रद्धेयमिवाभाति यदि जानासि तद्वद
॥ ३ ॥
एक नायक में दो नायकत्व कैसे हो
जाता है ?
यह तो अश्रद्धा के योग्य लगता है । अतः यदि तुम जानती हो तो कहो ॥ ३
॥
कलावत्युवाच -
स्वामिनि प्रवक्ष्यामि तव
प्रश्नोत्तरं शुभम् ।
यस्य श्रवणमात्रेण स्वास्थ्यं तव
भविष्यति ।। ४ ।।
कलावती ने कहा--- हे स्वामिनी सुनो,
मैं तुम्हारे शुभ प्रश्न का उत्तर कहती है। जिसके श्रवणमात्र से ही
तुम्हें स्वास्थ्य लाभ होगा ॥ ४ ॥
एकदा पुष्परागाद्रों क्रीडनाय गतः
प्रियः ।
आरुह्य शिविक दिव्यां
सुवर्णकलशोज्ज्वलाम् ।। ५ ।।
एक बार प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण
पुष्पराग पर्वत पर क्रीड़ा करने के लिए गए । वे दिव्य शिविका [ विमान ] पर आरूढ़
होकर वहाँ गए। वह विमान सुवर्ण के कलश के समान उज्ज्वल था ॥ ५ ॥
उपर्युपरिविन्यस्तनानातोरणमण्डिताम्
।
हंसपारावतशुकपिकसारसनादिताम् ॥ ६ ॥
उसके ऊपर नाना प्रकार के तोरणों को
लगाकर उसे सजाया गया था। वह विमान हंस, पारावत
[कबूतर] तोता, कोयल, और सारस आदि
पक्षियों के कलरव निनाद से गुज्जायमान था ।। ६ ।
नवरत्नविचित्राभां कामगां च
मनोजवाम् ।
शतयोजनविस्तीर्णा नानाक्रीडारसालयाम्
॥ ७ ॥
वहीं नवीन रत्नों की विचित्र आभा
वाले और इच्छानुसार जहाँ चाहें वहाँ चले जाने वाले और मन के समान गति वाले विमान
थे। सौ योजन तक फैले हुए उसमें नाना प्रकार के रसवान् केलिगृह थे ।। ७ ।।
काञ्चने मध्य कलशे विन्यस्ते
चोपरिस्थिते ।
कोटिचन्द्रप्रभागौर
रत्नेनोल्लासिताम्बराम् ॥ ८ ॥
उसके मध्य में स्थित सुवर्ण के कलश
के ऊपर करोड़ों चन्द्रमा की कान्ति के समान गौर वर्ण के रत्नजटित उज्ज्वल अम्बर था
।। ८ ।।
तस्मिन्विमानप्रवरे संस्थितः
पुरुषोत्तमः ।
द्विषट्सखीसहस्रेषु मध्ये चन्द्र इवोडुषु
॥ ९ ॥
उस श्रेष्ठ विमान में भगवान्
पुरुषोत्तम अवस्थित थे। वे बारह हजार सखियों के मध्य मानों तारों के मध्य चन्द्रमा
के समान विराजमान थे ॥ ९ ॥
मनोनुसारिगमनं विमानं कृष्णयोषिताम्
।
तीर्य गृध्र्वमधश्चापि
पुष्पाद्रिशिखरेऽपतत् ॥ १० ॥
भगवान् कृष्ण और उनकी स्त्रियों का
वह विमान मन की गति के अनुसार तिरछे, ऊपर
और नीचे चलता था। वह पुष्पाद्रि के शिखर पर उतरा ।। १० ।।
तत्र चन्द्रप्रभो नाम्ना हृदः
पीयूषपूरितः ।
रचित स्वर्णसोपान: स्वर्णपङ्कजभूषितः
॥ ११ ॥
वहाँ एक चन्द्रप्रभ नामक तालाब अमृत
से भरा हुआ था । उस तालाब की सीढियाँ सोने से बनी थी। वह तालाब सोने के ही कमलों
से भूषित था ॥ ११ ॥
अस्ति दक्षिणतस्तस्य सरः
परमसुन्दरम् ।
नाम्ना पिञ्चनदं ख्यातं
शतयोजनविस्तरम् ।। १२ ।।
उसके दक्षिण में अत्यन्त सुन्दर एक
सरोवर है । 'पश्चनद' नाम
से विख्यात सौ योजन तक विस्तृत वह सरोवर था ।। १२ ।।
अधोधः कल्पितै: सप्त शतैर्मणिचितान्तरै:
।
जातरूपमयैर्दिव्य
सोपानेर्बद्धमायतेः॥१३॥
उसमें नीचे की ओर सात सौ मणियां
विचित्र रूप से चित्रित थी । आयताकार रूप से उसमें दिव्य सीढ़ियाँ बनी थी ।। १३ ।।
वैदूर्य पद्मिनीखण्डै: पद्मरागसरोरुहैः
।
मराललीला पतनैर्मण्डितं तत्र तत्र ह
॥ १४ ॥
वैदूर्यमणि और पद्मिनी के खण्डों से,
लाल कमलों से तथा मराल [ - हंसों ] के लीला पूर्वक उड़ने से वह
सरोवर शोभित था ।। १४ ।।
तत्र या याः कृताः क्रीडा
जलस्थलविभेदतः ।
त्वया स्वपतिना साकं तास्ताः स्मर
भामिनि ।। १५ ।।
हे भामिनी ! तुम्हारे द्वारा अपने
पति के साथ वहाँ पर जो जो क्रीड़ा जल में की गई और स्थल पर जो क्रीड़ा की गई उन सब
को स्मरण तो करो ।। १५ ।।
प्रियः सरसि सर्वाभिः सखीभिः
परिवेष्टितः ।
समन्तान्निपतद्वर्षे राहतो यत्र विद्रुतः
।। १६ ।।
आरुरोह ततस्तूर्ण सरोविश्रान्तिमण्डपम्
।
प्रतिजग्मुः प्रियाः
सर्वास्तत्रोत्तीर्णं सरोवराः ॥ १७ ॥
उस सरोबर पर सभी सखियों से घिरे हुए
[भगवान् कृष्ण ] प्रिया के साथ उस सरोवर पर स्थित विश्राम मण्डप में एकाएक चढ़े।
तब सभी प्रिया भी उस सरोवर को पार करने के लिए चल पड़ी ।। १६-१७ ।
तावत्पपात सहसा पुनरेव सरोजले ।
उत्तीर्णगम्भीरजल:
कुत्रचिद्विजनस्थले ।। १८ ॥
उसी समय सरोवर के जल में वे सहसा
कूद पड़े और गहरे जल को पार कर किसी निर्जन स्थान में पहुँचे ।। १८।।
अनेक कुञ्जगहने प्रच्छन्नोऽभवदेकलः।
मृगयन्त्यः प्रियाः सर्वा
विचेरुस्तत्र तत्र च ॥ १९ ॥
वह अनेक लता आदि के गहन कुञ्ज में
छिप गए। वहाँ पर सभी प्रियाओं ने इधर-उधर उन्हें खोजा ।। १९ ।।
अहं विचिन्वती तत्र गता गहनधामनि ।
विलीय संस्थितं कृष्णमद्राक्षमतिसुन्दरम्
॥ २० ॥
तत्रः मामागतां सुभ्रूविलोक्य
प्रहसन् प्रियः ।
नासाग्राहिततर्जन्या कौतुकी
सन्त्यवारयत् ॥ २१ ॥
मैं खोजती हुई उस मण्डप में गई।
वहीं पर अत्यन्त सुन्दर विग्रह वाले भगवान् कृष्ण को देखा। मैं उन्हें देखकर
उन्हीं की रूप माधुरी में विलीन हो गई । हे सुन्दर भौहों वाली ! वहीं पर मेरे आने
पर प्रिय ने मुस्कुराते हुए देखकर मेरी नाक पकड़ कर कौतुक करते हुए रोका ॥ २१ ॥
प्रिय उवाच-
कलावति कलाभिज्ञे मां विचिन्वन्ति
योषितः ।
न पश्यन्ति परं चात्र विभ्रमन्ते
यतस्ततः ।। २२ ।।
प्रिय ने कहा- हे कलावति,
हे कलाओं को अभिज्ञ ! मुझे युवतियां खोज रही हैं। हमारे ही अगल बगल
यहाँ वहाँ रहकर भी भ्रमित होती हुई मुझे वो नहीं देख पा रहीं है ॥ २२ ॥
त्वमप्यत्रैव सत्यतिष्ठ मया सह
कलावति ।
त्वया सह करिष्यामि लोलाखेल रहः
स्थितः ॥ २३ ॥
अतः तुम भी हे कलावति,
मेरे साथ यहीं ठहर जाओ। इस एकान्त स्थान में रहकर मैं तुम्हारे साथ विभिन्न
प्रकार की लीला और खेल भी करूंगा ॥ २३ ॥
इत्युक्त्ताहं स्थिता तत्र बहुमानेन
मानिता ।
तत्र नानाविधाः क्रीडाः
प्रियश्चक्रे मया सह ॥ २४ ॥
इस प्रकार उनके कहने पर मैं बहुत
मान से सम्मानित हो कर वहीं रुक गई । घहाँ पर प्रिय ने मेरे साथ अनेक प्रकार की
क्रीडाएं की ॥ २४ ॥
तदा मया कृतः प्रश्नः
त्रियमुद्दिश्य भामिनि ।
नायकाः सन्ति चत्वारस्तेषु वा को
भवानिति ।। २५ ।।
तब हमने प्रश्न किया कि लोक में चार
प्रकार के नायक होते हैं उनमें से आप कौन हैं ? ।।
२५ ।।
ततः प्रश्नोत्तरं प्राह कृष्णः
कमललोचनः ।
तदहं ते प्रवक्ष्यामि
यथाश्रुतमनिन्दिते ॥ २६ ॥
तब उस प्रश्न का उत्तर कमल लोचन
भगवान् कृष्ण ने जो दिया था मैं उसी को तुमसे कहूँगा । हे अनिन्दिते ! जैसा हमने
सुना वैसा ही कहूँगा ।। २६ ।।
श्रीकृष्ण उवाच-
अनुकूलो दक्षिणश्च द्वैविध्यं मयि
वर्त्तते ।
तदन्यत्र विरुद्धं स्यादविरुद्धं
मयि स्फुटम् ।। २७ ।।
श्रीकृष्ण ने कहा- मुझमें अनुकूल और
दक्षिण नायकत्व के गुण विद्यमान हैं। वह दूसरे में विरुद्ध भले ही होए किन्तु मेरे
में विरुद्ध नहीं है ।। २७ ।
रसोऽहं मूर्तिमान् साक्षात् घनीभूतः
कलावति ।
प्रतिस्याद्यभागं मां विद्धि
द्वितीयं स्वामिनीं प्रियाम् ॥ २८ ॥
हे कलावति ! मैं साक्षात् रस का
घनीभूत हुआ मूर्तिमान रूप हूँ। उसके आदि के भाग को मुझे जानो और द्वितीय भाग मेरी
प्रिय स्वामिनी को समझो ॥ २८ ॥
नावयोविद्यते भेदो भोक्तृभोग्य
स्वरूपयोः ।
मदात्मा स्वामिनी प्रोक्ता
स्वामिन्यात्माहमेव च ।। २९ ।।
हम दोनों में कोई भेद नहीं है
क्योंकि मुझमें और उसमें भोक्ता और भोग्य का स्वरूप विद्यमान है । मेरी आत्मा
(उपनिषद् आदि श्रुतियों के द्वारा) स्वामिनी कही गई हैं और मैं उन स्वामिनी की
आत्मा हूँ ।।२९ ।।
मदन्यः पुरुषो नास्ति न च स्त्री
स्वामिनीपरा ।
काकी रमते यस्मात् द्विधाभूतो
रसस्ततः ।। ३० ।।
मुझसे अन्य कोई पुरुष नहीं है और न
तो मेरी स्वामिनी से अलग अन्य कोई स्त्री ही है। क्योंकि एकाकी रमण नहीं किया
जाता। इसी लिए रस को दो में रहने वाला कहा गया है ॥ ३० ॥
पुंस्त्रीरूपविभागाम्यां रसोऽहं
विलसाम्यहम् ।
ब्रह्मानन्दमयीं साक्षान लक्ष्मीमपि
संस्पृशेत् ॥ ३१ ॥
पुरुष और स्त्री रूप के दो विभाग
में मैं ही रस हूँ और मैं ही विलास करता हूँ। वह रस साक्षात् रूप से ब्रह्मानन्दमय
है जो लक्ष्मी को भी स्पर्श नहीं कर पाता है ।। ३१ ।।
तेनाहमनुकुलोऽस्मि नायक: कमलेक्षणे
।
यथाहं दक्षिणास्तत्प्रकार वदामि ते
।। ३२ ।।
हे कमल के समान नेत्रों वाली इसी [
लक्षण के ] कारण मैं अनुकूल नायक हूँ और जिन गुणों के कारण मैं दक्षिण नायक हूँ,
उन्हें मैं तुमसे कहता हूँ ।। ३२ ।।
यथानर्घस्य रत्नस्य परितः किरणावलिः
।
प्रसर्पति न सा भिन्ना मणिमस्तु
विचारतः ॥ ३३ ॥
स्वामिन्या एव ताः सख्यः कलारूपाः
कलावति ।
न स्नामिन्या विभेदोस्ति
सखीनामणुमात्रत ।। ३४ ॥
जिस प्रकार मूल्यवान् रत्न के चारों
ओर किरणों का घेरा होता है और जो मणि किरण से होकर किसी भिन्न व्यक्ति के पास जैसे
नही जाती है उसी प्रकार स्वामिनी के साथ वे सखियों, हे कलावति ! कला रूप हैं । सखियों और स्वामिनी में भी उसी प्रकार अणुमात्र
भी भेद नहीं है ।। ३३-३४ ।।
अत एवासु सर्वासु द्रवीभूतो
वसाम्यहम्
बहिश्वापि घनीभूतस्ताभिः
क्रीडारतोस्म्यहम् ।। ३५ ।।
अतः इन सभी में मैं द्रवीभूत होकर
रहता हूँ और बाहर से भी घनीभूत मैं उनसे क्रीडा में रत भी हूँ ।। ३५ ।।
क्रीडमानोऽपि सर्वाभिः
स्वामिनीप्रेमविह्वलः ।
अतोऽह दक्षिणश्चास्मि नायको हि
कलावति ।। ३६ ।
सभी सखियों के साथ रमण करते हुए भी
मैं स्वामिनी के लिए प्रेमविह्वल हो जाता हूँ । अतः हे कलावति,
में दक्षिण नायक हूँ ।।३६।।
अत्रापि नैव विहतमानुकूल्यं
विचारतः।
भेदद्वयोपचारो हि कदाचिन्मयि वर्तते
॥ ३७ ॥
विचारतः यहाँ भी अनुकूलता विहत है ।
ये दो भेद मुझमें कभी-कभी रहते हैं ।। ३७ ।।
इति मानिनि यत्पृष्टं त्वयैतत्कथितं
मया ।
प्रियेण कथितं साक्षात्स्वमुखेन यथा
तथा ॥ ३८ ॥
इस प्रकार हे मानिनी,
जो तुमने पूछा है उसे मैंने तुमसे कह दिया। प्रिया के द्वारा कहा
गया साक्षात जैसा था वैसा हो मैंने तुमसे स्वमुख से कहा है ।। ३८ ।।
प्रश्नोत्तरावसाने च
विचिन्वन्त्यश्च ताः प्रियाः ।
घनकुञ्जान्तरे लीनं
दृष्ट्वाजग्मुस्त्वरान्विताः ।। ३९ ।।
प्रश्न के दिए जाने वाले उत्तर के
अन्तिम क्षण में वे प्रिय सखियाँ खोजते हुए उस गहन कुञ्ज के अन्तर में एकाएक मुझे
लीन देखकर आ गई ।। ३९ ।।
ततः प्रियेण सहिता आगतास्तव
सन्निधिम् ।
एतत्सर्वं तु जानासि विशेषस्तु
मयोदितः ॥ ४० ॥
उसके बाद प्रिय के सहित वे तुम्हारे
पास आ गई। यह सब तुम मेरे द्वारा विशेष रूप से जान लो ॥ ४० ॥
तस्मान्मानिनि मानस्ते प्रियेण सह
नोचितः ।
आनन्दोऽपि निरानन्दः प्रतिभाति विना
त्वया ॥ ४१ ॥
इसलिए हे मानिनि ! तुम्हारा प्रिय
के साथ मान करना उचित नहीं है । क्योंकि तुम्हारे विना आनन्द भी निरानन्द के रूप
में लगता है ।। ४१ ।।
तस्मादुत्तिष्ठ तत्पार्श्वमलंकुरु मनस्विनि
।
त्वया विरहितं चण्डि प्रियं नो
वीक्षितुं क्षमाः ।। ४२ ।।
अतः हे मनस्वनी,
तुम उठो, और उनके पार्श्वभाग को अलङ्कृत करो ।
हे चण्डि ! तुम्हें छोड़कर हम लोग प्रिय को देखने में समर्थ नहीं हैं ।।४२।।
इति पाण्डित्यचातुर्य कलावत्या
प्रयोजितम् ।
निशम्य हृष्टवदना वाक्यं चेदमुवाच ह
।। ४३ ।।
इस प्रकार कलावति के द्वारा
प्रयुक्त पाण्डित्यपूर्ण और चतुराई युक्त वचनों को सुनकर प्रसन्न मुख होकर इस
प्रकार के बचनों को उसने कहा ।। ४३ ।।
स्वामिन्युवाच -
कलावति महाप्राज्ञे मानस्ते वचसा
गतः ।
तथापि मानिनीनां च समयान् वेत्सि
हृद्गतान् ॥ ४४ ॥
स्वामिनी ने कहा- हे कलावति ! हे
प्राज्ञवान् ! तुम्हारे वचनों से मेरा मान अब चला गया। तथापि तुम मानिनियों की
हृद्गत शपथों को तो जानती ही हो ॥ ४४ ॥
आगच्छामि यदि स्वैरं गौरवं
मेऽपगच्छति ।
तस्मात्प्रियः करे घृत्वा सुखं नयतु
मामिति ॥ ४५ ॥
यदि मैं अपने से आ जाती हूँ तो मेरा
गौरव चला जायगा । इसलिए तुम मेरा हाथ पकड़ कर सुखपूर्वक प्रिय के पास मुझे ले चलो
॥ ४५ ॥
इत्थं तया निगदिता सखी प्राप्ता
प्रियान्तिकम् ।
प्रहृष्टवदनां दृष्ट्वा प्रियोऽपि
मुमुदे भृशम् ॥ ४६ ॥
इस प्रकार उससे समझाई गई सखी प्रिय
के पास आ गई और प्रसन्न मुख मुद्रा में उसे देखकर प्रिय [ भगवान् कृष्ण ] भी
अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥४६॥
॥ इति श्रीमाहेश्वरतन्त्रे
उत्तरखण्डे शिवपार्वती सम्वादे चत्वारि पटलम् ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीनारदपाश्वरात्र आगमगत
'माहेश्वरतन्त्र' के उत्तरखण्ड (ज्ञान खण्ड ) में
माँ जगदम्बा पार्वती और भगवान् शङ्कर के संवाद के चालिसवें पटल की डॉ० सुधाकर
मालवीय कृत 'सरला' हिन्दी व्याख्या
समाप्त हुई ।। ४० ।।
आगे जारी........ माहेश्वरतन्त्र पटल 41

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